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Full text of "Sri Vrat Raj"

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॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ 


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विविधग्रन्थानां लेखकेन रिसच रमकालर इत्युपाये- ३ 
धारणा पॉडतवस्यण माथवाचार्स्पण संपादितया कर ऊे 
भाषाराकया चर समलकत: । ६०) ! 


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मुद्रक और प्रकाशक- 


खेमराज श्रीकृष्णदास, 


अध्यक्ष-" श्रीवेड्डंटिश्वर !! स्टीम-प्रम, बस्बई 





सन्‌ १८६८ के आक्ट २५ के अनुसार रजि्टरी सब इक प्रकाशकने अपने ्ाधीन रकबा है 





पस्तावना. 


७७" आए 


अखिछ विश्वके सारे मानव समाजोंपर दृष्टि डांडकर देखढीजिए, आधुनिक और प्राचीन सभ्यताओंपर पूरा विचार 
.._ कर छीजिए, भूमण्डछके किसीभी छोटेसे छोटे और बढेसे बडे खण्डको के छीजिए चाहें असभ्य कहडछानेंवाले नरोंकाही 
अभूह क्यों न दो ? कोइ भी समुदाय एवं संप्रदाय ब्रतों और उ्सवोसे खाली नहीं है, अपने २ ढंगके सभी उत्सव मनाते 
हैं और त्रत करते हूं । ब्रतोंकी महिसा वेदनेभी बडे ही आदरके साथ गाई है, त्रत करनेवाला सुयोग्य पुरुष जगदीशस्से 
प्राथना करता हैं कि- अग्नेमप्तपते बे चरिष्पामि ततच्छकेयम्‌ , तन्‍्मे राध्यताम्‌ , इदमहमन तात्स- 


तव्यम्नुऐेमे ' हे ब्रत्ेंके अधिपते | सबसे बडे परमास्मन ! में व्रत करूंगा, ऐसी मेंरी इच्छा है में उस बतको पूरा करम्कूं , 
यह मुझ शक्ति दीजिए । यह शो ब्रतकर्ताकी ब्रतार॒म्भसे पहिढका बीत हैं कि, वह ब्रतके पूरा करनेसे मेरा कल्याण होगा 
इस्र भावनासे प्रेरित होकर उसकी सफछलाक छिए परमात्मासे प्राथना करता हें । जब वह घतनिष्ठ होजाता है तो उस 
काछमें सत्य मानता हैं. कि, में अपने जीवनके अमूल्य समयको वृथा द्वी नष्ट कर रहा था उससे अब विरत होकर सच्चे 

उपयोगकी ओर जाता हूँ। जितना में ब्रतमें समय लगाऊंगा वही सच्चा समय हैं, बाकी तो अनूत यानी झूठा उपयोग है 

उससे जीवनकी कोई साथकता नहीं होती । यह हे त्रतपर दिकोंका विश्वास:कि, ब्रव ही सच्चा जीवन बनाता है यही 
कारण है कि, किवमीदही ऋगूवेदकी ऋषाओंमें अत्यन्त सम्मानके साथ ब्रव] शब्दका उल्लेख; किया है- आदित्य 


शिक्षीत प्रलेन, वयमादित्य ब्ले, जन्‍्मनि ब्रते, पत्नो अभिरक्षाति ब्रतम्‌, अपामपि ब्रते ” 
ऋगूवेद ७ भन्त्रोंके वे थोढेस टुकडेभी दिखा दिये हैं जिनमें श्रत शष्दुका प्रयोग परिर्फुट दीख रहा है हाब्दके 
अथेका विचार तो निरक्तम किया गया है | इसे महर्षि यास्क ने कमके पर्य्पायोंमें रखा है, इसी कारण ही 

है कि, प्रद एक कसे विशेष दी है । वृ८"घातुसे छणा।टि धू प्रत्यय होकर प्रत शब्द बनता है । निरुक्तकारनें इसक 
विवरण  बृणोलि ” पदसे किया है कि, जो कमे कत' &ो बूत करें वह ब्रत है। दूसरा विवरण-उन्होंने वारयरि 
पदसे दिया है कि, जो भपनेग्रें प्रवृत्त हुए पुरुषकों ख्री आदिं अपचारोंस रोकता है, यह नियम कराता है, एवं अतेकों 
विपिड़ कर्मोंसे रोकता है; लिन्हेँ कि, परिभाषाप्रकरणमें श्रतराजने गिन २ कर समझाया है | यदि विचार करके देखा 
ज्ञाय तो निरुक्तकारके दोनों अथे ब्रतराजके श्रतपर घटत हैं। यह एक तरहइके सकस्पविशेषको श्रत कद्दता हैं, इस हल* 
राजके प्रतछे अथेपर गद्दरी दृष्टिस विचार किया जाय तो दोनोंक़े अथैका स्वारस्थ एकद्दी दोता हे। महर्षि यास्‍्कके 
अर्थ उसका कोई मी वास्तविक भेद नहीं रहजाता | श्रतराजकारका अर्थ कमके पदार्थंस्र किसी भी अश्र्मे बाहर नदी 
.. जा सकता, ब्रतियोंके सामान्य धर्मों तथा उपवासके धर्मोर्में विस्तारके ख्राथ वे पंद्वार्थ लिखे हुए हैं; जो कि, उन्हें करने 
और छोडने चाहिये । निषिद्ध कर्मांका रोकनेवाठा बत ही ह। क्योंकि, उनके करमेमें त्रतीको ब्तके भंग होनेंका पूर 
इसा है । इसी कारण वह उनको नहीं करता | इस तरह यह्‌ प्रत, त्रतीका वारक भी सिद्ध होता है तथा इसका 

फछ त्रवकर्ताकों प्राप्त द्ोता दे इसके सविधि पूणे दोनेंम उसकी उन्नति तथा खंडित करनेस प्रय्यवायकी प्राप्ति होती है इस 
तरह यद्द पाप और पुण्य दोनोंदी फरलोंका देनेवाछा भी है । अत एवं दूसरा भी निरुक्तकारका अथ ब्रतराजके ₹ 

















304४ पक्के जप३ ३मक ७ तक ९ बाई 


इष्टिपथम पैर समाया हुआ थी। यद्यपि उन्होंने उत्सव शब्दका बहुत कम प्रयोग किया है पर उत्सर 
एक भी इनसे नहीं बचा दे त्यौद्ारोंको इन्होंने ब्रतके कहा है और भिन्न भी प्रति पादन 
सकटपतुर्थी श्रादि जिनमें केवछ उतस्सवक साथ देव पूजन भादि भी किए जाते है। बहुतसे उं त्खवोंक 
पढ्ेख ही कर दिया है । जो केवछ ब्रतका भथे उपवास समझते हूँ उन्हें यह आंति होजाती है. कि 
आजायंगे पर पूर्वोक्त अथोम तो छत्सव भी ब्रतोम ही आजाते हैं । कितनी दी जगह ब्रतोंकी पूज 

४ कलेप्यश्व महोत्सवः३  बढा भारी इत्सव करना चाहिए। इस तरद्द अनेकों उत्सवरों 

होजाता है; वे भी ब्॒तोंमें ही भाजावे हैं। जो जाति जितनी दी नई होती है उधके उत्सव उ8 
हस्खदों का सम्घन्ध, उस जातिके गणय मान्य विशिष्ट पुरुषों क्री अलधारण महत्त्तपूणे घटना? 

ही सम्माभकी ट| 





















हिंसे देखनेवाडे समुदाय उत्सवोंकों जन्म दे देती हैं। समय रे पर इस्छ 






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५2 


लिया करते ह। किन्तु उसका जन्म थोड़े स्मयका होनेके कारण उन घटनाओंकी संख्याके कम होनेसे उनके उत्तय + 
. कम डुआ करते हैं। यही कारण हैं कि, चार छः हजार वर्ष मात्रकी जनमी हुई जातियोंके उत्सव इसने ही कम हैं. कि 
उनकी स्रेख्या डेगलियोंबर ही गिनी जा ख्रकती है ।, अत एवं उन जातियोंकों उनका ज्ञान अनासास ही है । उनके हरि 
हासका झ्ञान करनेके छिए इन्हें कोई कष्ट नहीं उठाना पढ़ता | उनके अबोध बाछक आपही आप अपने बढ़े बुढ़ों 
बातों बातोंनें ही सुनकर जान जाते हैं । पर जिप्न जातिको संसतारकी सभी जातियां अपनेस भव्यन्त आाषीन भा गेक 
नवमस्तक होती हैं, जिसका इतिद्वास ढाम्ों वर्षका पुराना माना जाता हैं, जो अपनेकों अमादि सनातन एवम श्वा 
मानवसमाजको सभ्यता सिखानेवाढ्ा गुरु कहटतौ हे. जिसके अनेकों दी विशिष्ट पुदभोंकी घटना विशेषोध् संत सत्सः 


भौर ब्त इतने कम नहीं हैं नो कि आधुनिक जातियोंके उत्सवों और ब्रतोंकी तरह अगुद्धियोंपर सेभाओ जा सडक । ; 


वह ऐशस्री किसी साधारणकी बात॒क्नो छूकर प्रज्नछ्चितद्दौ हुए हैं जो कि ) बातोंसे ही बता दिय जाये । ले बढ जवण्य व 
महत्त्वहीनही हैं जो कि, उपेक्षाके गड्ढेमें गेरकर बूर देने योग्य हों । प्रत्यककी स्मृति जातिमे नवीन जीवन, रे 
हरएकके साथ जातिके गौरवकी मात्राएं णत्यम्त प्रचुरताक स्राथ छगी हुईं हैं। पूव पुरुषों ॥। गौरवाग्प ६ इतिहास इन 
साथ मिद्धा हुआ है उनकी अ्रद्धाकी अमृश्य कहानी मिली हुई हे जिस अद्धाको योग भाप्यकार कं राव + ॥ आा3, 

कहा हे । इनका स्मृतियोंने सादर स्मरण किया है । इतिहास प्रन्थोंने इनका सौरवॉकी गरियारी ओोपझिक (वा परावृ 
विस्तारके साथ गाया हे । पुराणोंने इनका हर जगद्द उल्लेख करके इनकी प्राचीनवाकी 7न्‍्द भि बजाई 






















है । जँ।क थे; नौ. 
आष॑ ग्रन्धोंमें रत्नोंकी तरह उचित स्थरूोंपर पुवेहुए इन अतोत्सब्रोंका अनेकों पर्मशास्रकारोंत भ्रपनी अपनी शक्ति 
अनुसार संभह किया है | फिर भी रनसे बहुतस्रे बाकी बच गये हैं क्योंकि, जो सृष्टिक आरंभकामी उस्ताव बत कर+ 
हूँ उनके ब्रद्मादिकोंका पता विता अक्षौकिक साधनोंके कहाँस मिठसकता है ? जातिके चधके हुए खिना। १, (३... । * 
आबाल बुद्ध वनिताओंतक व्याप्त थे इस्र गिरे समयके संग्रह कारोंको इन्हें हिन्दृपमशाख्रोंसि मद. लि 0 05१ / 
यही कारण हे कि, पूरा नहीं कह पाय है। फिर भी इनका परिश्रम अगण्य नहीं है उन्होंने अवध पी , 5, >्वाहिबाँब। 
भपमी संप्रहकौ हुई निधि देकर एन्‍्हें अगाड़ी बढनेके लिए उत्साहित किया है। अनराजक छेखफ़को इस पुराने अप्रट 
अच्छी सहायता मिली हे तथा बहुतस्री नृशन खोज करके इस कमीको पूरा कर दिया है। («. ४! अदौौप भा्ेएढ 
विश्वनाथशर्म्मा आजसे दोसौ वर्षके छगभग पहिले हुए थे, आपने पुराण, घर्मशाश्र तवा अनेक राधे: थ. थोक 
इकट्ठा करके समन्वय और विशेष विधियोंके साथ ब्रतोत्सवॉको अपने वतराज अस्धमें रख (॥ 2 ।६ल्‍होँं। ४,०३५ इश्न 
कमीको पूरा किया हे तथा इसमें ये इतने कृतकाय हुए हें कि, इनसे पट्टिछ॒का दूसरा फोईभी दुबे विधस +; बंध करते. 
बाढ्य नहीं हुआ हे । दूसरे संग्रहकारोंके क्तोत्सवोंके संग्रहको अपने प्रन्थमें छेतीवार हमारे: यश की इन ते कोई 
हैतशता नहीं कौ है । किन्तु उसके नामका आदरक स्राथ रहेख सप्रप्ाण किया है कि, अमुकने इस इस पुराणम डिया 
था, रुखे म॑ यहां रख रहा हूं। इनका प्रन्थ ज्तराज नि्णयसिन्धुस कियश्ती तरहभी कम नहीं दे । इनके लिणयक सामते 
फसछाकरभट्टके घमेसिणय अंगण्यसे बन जाते हैं। त्रत और उत्सवोंकी तिथियाँके निर्णय करनेके सप्य इन्हें लिलों व 
खिन्धुक निर्भय बहुतही अखरा है; यहांतक कि, स्पष्ट शब्दोंमें कहदिया है कि, इन कारणोंसे ऐसा जिण। ५9, ?,: | 
है निणय ठौक नहीं दे | यादि दूसर शब्दोंम कह तो यह कह सकता हू कि. निणयसिन्धुकी जिन पा या + माजेत मु ३ कू 
अगूढ़ टीका अमेखिन्धुभौ नहीं कर सका था जिनका कि, जान छेना दूसरोंके छिए महा कटिन काये था, । परि4 















| दूर *, हक] - हि. भर हे रे कह 
2 3 जा रजक सामने अनाथासही रखदों हे। अतोत्सवॉकी विधियोंके निर्णयकी निणयमि- [शी ८१०,) 


हे के 
कम ब्रलराजने भथुमात्रभी मुछादिजा नहीं किया है । यही नहीं, किन्तु सप्रमाण सिद्ध करनेबो 4 मी ही). जहां 
| & बहा हमने यथाज्ञान इन्हें परिस्कुट करनेकौ चेष्टा की हे तथा करतीवार इस्र बातक़ाभी ब्यात रखा है 
रण पे बदुनेपाये। निज्वेष कहतीबार [_] इसकोष्टकके बीचमें कहदिया हैजब इकनेस भीटा! शन्‍्तों। 





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ष देकर :उस्रविषयको पूरा प्रकटकरनेका प्रयत्न कियाहे।दूस्नरे स्थछों पर भी जहां हरापटि-: 5... 2 
केक पूणे चें्टा कौ हे । यह सब कुछ करके हम इसी परिणामपर पहुंचे है कि, |. .” 
>यन्थोक 5०: कार मे. । । * | 0. ५ श्र ' जीने | क; द | भ । . 
का परिष्कारही ब्रत्राजके नामसे श्रीविश्वनाथजीने करढाला है ' इसके सभी मिल्‍ूय कक , 
हो टिक हूं जो कि, आजतकके किसी धमंशास्रोंके संप्रह करपेवाेग ,। है है. 
| है, द्स 8 करंयाणकारी विषयॉपर ध्यपन न दिया हो. रा७5४) आर टू 8 












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होगे कमंकाए्हक बहुत बड़ भागकोी !हछा हैं। देवोपासनाक लिये तो इसने अमृतक निधिकाही काम किया है। 
'बॉफे पत्ते, धषासल एबम उसकी प्रिश स्त्री इसने पृणरूपस दिखाई हैं । जिनके बधप्रयोग्स उपासक इृष्ठदेवका 
ताक्षात्‌ करसकता है, जिन जिन विशिष्ट पुदुषोंने उन विंधियोंसे इष्टद््‌वका साक्षात्कार करके अपने ऐहलॉकिक एव 
कछौकिक कार्मोको पाया हैं उनका पूरा इलिहास शन्य प्रशाणों कर साथ दिया है जिसके देखनेसे कलियुगके कलुषित 
की भी श्रद्धा उनमें उत्पन्न हो तथा वह भी रख्यपुत्॑ड अपना कल्याण करसके | हवनादिका भी बहुतसा विषय 
#र्थी है अनेक तरहकी आहुति और भद्दोंक भी विधान विस्तारके साथ आये है | कोई भी छोकिक कर्मकाण्डका देवता 
की महा होगा! जि ५: कि, पूजन हवन इसमें न आया हो | सतदीक्षी सब बातें विस्तारके साथ, आगई हैं। बत- 
कि उताओे मानवीय उर्शशाणा थी बहुत बड़ा भाग कहृदिया है, जो हि जाहि त: «णॉरपे इधर उधर सुत्र्भ 
णिक्की तरह पिरोया हुआ है। हविष्य !सलुओंके न्ामपर खात्रालाशुकामी निणय करदिया हैं। इस तरह इन्होंने धर्म 
सके क्रिसीसी छप्योगी सालजनीय विष्यकों नहीं छोडा है । जिन्हें देखकर हम यह कह देँ कि, श्रतराणके नामपरे 
मी मेक जि लीं अखिल 7] देश है, एवं जो भी कुछ ऊत्याएइवट, छतझछाप है बह सब उसको कह- 
[या है तो कोई अत्युक्ति 7 होगी। "3 फछके कमकलापमें ऐप्ले अनेकों ही मन्त्र प्रचलित हैँ जिनकी कि, भाष्यकारोने 
कसी दूसरे देवतामें योजना की है तथा उनका आधुनिक ईसंछाण्डमें दूसरे देवताले पयिषयमें विनिय्ोग देखा- 
ता हैं ऐस ही दोसौके छगभग मन्त्र इस ब्रतराजमें भी आये हैं जिनका कि. अथ यहांके विनियोगके अनुसारही 
॥गे किया है । जहां तक हो सका हें यह भी ध्यान रखा है कि, किसी भी भाष्यकारसे विरोध न हो, यह योजना 
! इस 0२ जकी टीकाके दसरी जगह कम देखनेको मिलेगी। यह कियासी इसी उ्देश्यसे हू टि,सन्त्रदे अथसे उसी 
बताका परिषृण अनुसन्धान करके कर्म्नलापकों खर्बोत्क्टॉंगुणवाछा बताया जासके; क्योंकि, बिना देवताका' अनु- 
हुधान किय उच्च कमको श्रतियोंने उन्तम नहीं;बताया है । जो मंत्र यहां जाये है वह ही आजक कृथ्रझाण्डके प्रन्धोंमें 
हीं होंगे विनियक्त कियेगये हैं । इस अथने उनके लिये वहाँ भी पथ दिखादिया है कि, इस अर्थसे उनदे देवता 
का अरुसभान ए7 दीजिये | बेदके भाष्यकारों हा अथ वहांकी व्यवस्थाक अनुसार ह। ऐसा क्यों क्रियागवा इसका | 
7। भी वहाँ टीका 27.75 ५; गया हैं । यद्यपि पुराना पक एसाभी आर्प संग्रदाय था कि, मन्त्रोंका अर्थ न मानकर 
बअछ मज्जोंमे आय हुए नाम्रोंक अलुसार विलितोगों गे व्यवस्था करके उन्हीं नामदाले सनन्‍्त्रोंस उस सामके देवताओंकी 
[ति करने छह ता था पर लिकुफने इस कोई महरूर नहीं दिया है तथा भा.वि :खिकिए अपनी शिक्षार्म' अथके अनु 
बानके विना थत«वोगयो निरथक बताया है । इस अथस रूप जाव्डी ब'स्यजिक् छाम उठा सकेंगे यह हमझकर इस 
टीका उनका विलिर नुसार अथ ऋरदिया है ! 0५. ८.0००५ और _जा ब्रतादिक लिखनेमें अन्तर तो यही 
है कि. निशमसिन्धने प्रत्येक मामके जुद ज॒दे ब्रतोत्सव दिखाय है पर उतने साखोंका हिसाब छोड़कर विधियोंका 
हिसाब लिया है । रिपदाण लेकर 5४:५० सब त्रत और उत्सव एक साथ दिखा दिय हैं इसमें भी निणय 
सिन्धुस इसदी संख्या बहुत ज्यादा है। वारत्त ते निणण्सिन्धुमें है ही नहीं । इनके सिवा और भी अनेकों क्त हूँ 
का कि इस अन्थों मे कोई धरसेप्ती नहीं आया है | सब 767 विस्तारके साथ कहे गये है । इसमें व्यय कियगये 
कालकों तो हमण | ताएये साथक समझा है । 5सर्ग एक हमारी (7७४ यह भी हैं कि गजुस्मति आदि 
सभी पघमण। जक अन्य पाषोंके आयशित कबनेमे के |) ततकुरूफ भाम्यायण आदिका विधान करते हैं अतातमकों 
गभीर रृष्रिसे दल तव थी ये सत्र उप्यासों: ू४; - हैं जो कि; ब्रतोमें रावा. थे रीतिसे विधान किय +% ' 
ही नहीं, शवोंयी 7 टनिरोंए कम उपवास हों. शासोपतास बतके उपवास तो प्रायश्ित्तोंके उपद्ःसोते भी अग।... 
बढ्गये है । अनेकों भव्य पुरुषोंने भी अपनेको तोएएरगों 5 शुद्ध करकेद्दी सुखमय ईश्वरीय याज में बसनकी योग्वत 
पाई थी। ये ।समतोए- करके पुरुषको केबस्यत? अधिकारी बना देते ह। इस कारण धो: छामीको भी शववासात्र 
पादुय हैं। सकाम पुरुष इनको विधिक साथ जाझो .7 पूरा करके अपनी कामनाश्येको अन ही पाजाते हैं अत" 
हव आुक्तिक जा।नी यही है । करिए ए वााप्िषप्टी शिक्षा भादि वेदिक ग्रन्थोंमें भी तो यही बाल है. । पतित प्राणियोंको 
ड्य टिका "एस 7 बतही तो ह पव सभी :70 7४ शिष्ट पुरुषों में देखा जाता ४ । ऐसे ४5 /िएुछिलेपादक बरतोंका 
7, हमने अपनी ४ डगौग मनवरत (ण्टिसके साथ किया, है कि, अतगाजक वाह हुए सब जन आदिकॉको तो 
शायद इस जीवनमें ले करस सं घगके पापहरी परम पवित्र स्मग्णसेदी अपने 7पॉनो सध्डाए 


। 


! 22000 42275 हे ; 394 2600 260 25008 0260264755 खक90/7 77%: 32 
कप हक अफियोश जा ६ बलियमाथ कल पोफेसिलिफारमब्कत. ह५.. जता फणामा्रमलांसहाानापाशपपथाकपात भाप मन दफा. "लाना... शरण 








आओ 
रत 
चर 





अर, 


























. 















७७ अ्रवराजमें आये हुए संग्रह अन्थ-हेंसाट, कल्पतरु, मर्दंनरत्त, प्रथ्वीचन्दोंद्य, गौडनिवन्ध, पटूप्रिंशम्मत 






शेखर, शारदातिहक, पद/थादिश, गोविन्दाणंव, भाग॑वाचनदीपिका, माधवीय, : ज्ञानमाला, निर्णयास्ृत, देवनिर्णध 
_ आचार/मयूख, दुर्गाभक्तितरंगिणी, शिवरहस्य, काछादश, रुद्रयामछ, अद्धायामछ, वाचम्पतिनिबन्ध, पुराणसमुख्यय 


आदि ग्रन्थ हैं। ब्रतराजकारने अपने ग्रन्थमें इनका उल्लेख किया है। 


. _पुराण-त्रह्म, पाद्म, वेष्णव, विष्णुध्, विष्णुधमोत्तर, शैव, लिड्, गारुड, नारदीय, बृहन्ञारदोीय, भागवत, आध्ेय 
: ककान्द, भविष्य, भविष्योत्तर, अश्ववैवर्त, मार्कण्डेय, वामन, वाराह, मात्स्य, कौर्म, अज्ाण्ड, दृबी, भारत: आदिश्य 
पंचरात्र, गणेश, कालिका, नूर्सिह, अगस्त्यसंद्विता आदि इसने पुराणोंम आये हुए ब्रतों और उत्सवोंको तथा ब्रत और 
उत्सवोंस संबन्ध रखनेवाढे विशेष वचनोंको ब्तराजमें रखा है | स्कान्द और भविष्य तथा भविष्योत्तर और विप्छा, 
घर्मोत्तरके ब्रत अधिक संख्यामें आये हैं | 
_ स्मृति-मजु,याज्ञवल्क्य, नारद, देबर, विष्णु, हारीत, यम, आपतस्तेब, कात्यायन, बृहस्पति, व्यास, गदर, पक्ष, वच्िण्ठ 
इद्धसिष्ठ, सत्यव्त, पेठीनसि, छागढेय, बोधायन आदि आई हैं। 
























. बेद-ऋगू। साम; यजु, कृष्ण यजु और अथव तथा दूसरी दूसरी शाखाओंक भी मंत्र भाये हैं। कर्मकाण्ड 
यद्यपि उल्केंस नहीं किया हैं पर अन्थके कल्वरको देखनेस पता चलता है कि, कमंकाण्डका भी कोई प्रस्थ नही 
बचा हे | इसकी भाषाटीका करती वार हमें इन अन्धों मेंस जो मिछ्सके उन सब भन्‍्थोंकों इकठ़ा करना पढ़ा तथा इनके 
अछादा और भी बहुलस भ्रन्थ हमें इकट्टे करने पड़े । इस प्रन्थका पूपक्ष आदि दिखानेके लिये नि्णयसिन्धु, घमसिन्धु, 
जयसिंहकल्पहुम आदिका उल्ेख किया है तथा चारों वेदोंका सायणभाष्य और मिरुक्त आदि बदिक अन्थोंका भी एप, 
योग हुआ है ।'सर्वेदेवप्रतिष्ठाप्रकाश, गोविन्दार्चनचन्द्रिका, मंत्रमहाणव, मंत्रमहोद्धि, नवग्रद्विधानपद्धति, अतिप्नार्सप्रह 
मुन्त्रसंहिता, प्रहशान्ति, पारस्करगृह्मसूत्र, आपस्तंबसूत्र, सूय्येसिद्धान्त, :महरलाघव, छीछ [हूर्तेचिन्तामणि, तू 
ब्क्‍्योतिषाणव, कमकाण्डसमुश्यय,आश्वछायनसूत्र, व्याकरणमहाभाष्य, वाल्मौकीरामायण, हिरण्यकेशीय बक्षक मंसमुचय, 
भादिका भी टीकामें उपयोग हुआ है । इन अन्थोंके प्रमाण आदि हमारी टीकामें मिलेंगे। कहीं हमने नामनिर्ेश कर 
दियाहे तो कहीं विषय दिखायाहे उसके नामका और कोई संकेत नहीं किया है । इस मदग्रन्थर्म हमें एक वर्षके करीय 
अनवरत परिश्रम;करना पडा । फिर भी नहीं कह सकते कि, यह परिपूणे होगई क्योंकि, मानवी बुद्धि कहीं स्थगित 
होती ही है | सायणाचाय्येके अनुभवके अनुसार किसीनकिसी कक्षामें अज्ञाम रह ही जाता है। यद्यपि बेद्‌ पुराणों 
संभिद्चित,सेवा करनेके पीछे हम छिखनेके कार्य्येसे विरत हो छेखिनीको विश्राम देते हुए दूसरी रीविसे धर्मसेवार्मे लगे 
हुए थे, दूसरे शब्दोंमें यह कहें तो कह सकते हैं कि, हम अपने अधीत वेदवेदाज्ञोंका उपयोग करना छोड़क र निरयंक 
ही सुढा रहे थे कि, भारतके अतिप्राचीन “ श्रीबेंकटेश्वर ” प्रेसके स्वत्वाधिकारी एवम्‌ क्षेमराज णदास 


नामके प्रसिद्ध फमंके अधिपति भनातनपर्मभूषण रावबहादुर सेठ श्रीरड्रनाथजी वया अ्री के 


से 












# 



















छा सा ३. टी 
"रम सहदयताके साथ कलमसे देश और धमंसेवा'करनेमें अम्सर किया। यह उन्हींकी प्ररणाका फल 
हमें; अह्यसूजका + _ पावपकाश आदि तथा अतराजकी इस भाषाटीकाकों धार्मिक देशदासिद्ोर् 
रख से मे 5 2१3! 
न सर कार इनक हृदयसे घमके .छिये कितना प्रेम पं कितनी श्रद्धा हैं कि, धर््रयारके 
ला हुए प्रतिवादिभयेकर अठक अधीश्वर राजसम्भानित जगदूगुरु श्रीमद्नन्ताचार्यजी महाराजको देख मुझे 
अर न अकीफ पहाड़ी स्थानोमें भी छोगोंमें घा्मिक जीवनकी रूहर वहा देनेके छिये भेजा। यही क्‍यों! सनात्ल- 
क्‍ बा आपने कफ समयपर अपूब त्याग किया हे । भारतके विशिष्ट पुरषोके स्मृविचिन्द्दोंको देखनेकें लिये भने 
द ब्ोचपोत .... था मकर देखा हे ! यदि थोड़े शब्दोंमें कह तो यद्द कह सकते हैं कि, यह उन्हीं की धामिंक भावनाओं 
. आजम ते हुईं. रचिर प्ररणा हे जिसे कि. मैं' इस भा' े _थ 
पा पड 5 है सनंसा 200 रण ! में, प्तराजकी इस भ्राषाटीकाके रूपमें रख रहा हूं । 
.: “पंल्वंकके विषय-सेगंदाचर एफ क्रते का मन ५ 
देवता । मा मक भहिसुस॑ हक 2 कक किए ३ सिलर » पेमें, प्रायश्वित्त, उपवासधम, हविष्य उपयुक्त रद्रमेडल, बस: 
बुर जादि वे लिएय हैं, जिनका! सभी रो उक्त वस्तु,भद्रसेंडछ, इसके 
2. ढेकर जम्रावसतककी तिथियोंके ब्रत तथा दोड़ी भादि सब 






































. श्सच, प्रतोंकी देंब पूजा, कथा, उद्यायन तथा विधि और उनकी तिथियोंका निर्णय एवं ,अन्य ऐतिहासिक बृत्त है, इसके 
पीछे वारत्त हैं । इनमें प्रत्येक वारके सूये आदि देवोंका पूजन ओर उनकी. कथाएँ वर्णित हैं । बुध और “बुंहस्पतिके 
ब्रत हमने और भी दूसरे अन्थोंत्ते छाकर जोढ दिये हैं । कुछ प्रदोष आदिके ब्रत भी ऐसे ही गयेहँ (जो वार तिथि 
दोनोंसेद्टी सज़न्‍्ध रखते हैं। व्यतीपातके ब्रत दान आदि।आये हैं जिस्रके लाराके प्रकरणकों 'किकर हमने एक /वेदिक 
.टिप्पणी दी है। संक्रान्तिके प्रकरणके पीछे रक्षपुजा आदिका प्रकरण आया हैं। पीछे मंगछागौरीकें त्त आदि आकर और 
भी बहुतसे ब्रव भादि आये दूँ द्वो कि, भनुक्रमणिकामें सब भिन्न भिन्न करके दिखा दिये गये हैं. और भी अनेकों धम्म- 
शाखरके प्रयोजनीय विषय आये ह्‌ ज़िनका प्ष्ठाइ[अनुक्रमणिकामें लिखा हुआ हैं पर मूछमें कहीं मासोके मार्नोमें हेर- 
फेर हुआ है। हमने उसे अविरोधके पथसे लेजानेकी चेष्टा(की हे फिर भी विवेकी पाठक उसे सुधारकर पढ़ छेंगें । 
यद्यपि शिढायन्त्रोंसे किक्कीही वार मनमानी रीतिसे दूसर दूसर प्रेसॉने इसका प्रकाशन किया था, पर इतने बडे धार्मिक 
सान्य प्रन्थका पदार्थ विचार एवं धर्मशाखके दूसरे दूसरे मन्थोंको रखकर सेशोधनपूर्वक परिष्कारके साथ किसीने भी 
इसका प्रकाशन नहीं किया । [धमंशाख्रके प्रतिष्ठित ग्रन्थकी यह दुर्दशा देखकर अनेकों माननीय पुरुषोंके मुखसे उच्च- 
: श्वरसे यही शब्द निकले कि,ऐसा न होना चाहिये;इस प्रन्थका सुधारके साथ यथायें रूपमें प्रकाशन हो। हिन्दू संस्क्ृतिके 
पोषक एव शास्रोंके उद्धारका अनवरत ब्रत रखनेंवाले वेकुण्ठवासी सेठ: श्रीक्षेमराजजीने खाडिछकर आत्मारामजी 
शास्त्री तथा महाबछ कृष्णशास्त्रीको आमंत्रित करके इसका संशोधन करा, आवश्यक टिप्पणियॉसे मूछका' परिष्कार 
कराके आजसे ४३ वर्ष पद्दिल़े अपने श्रीवेंकटश्वर प्रेंस बेबईंसे प्रकाशित किया । अबतक यहे ग्रन्थ (कितनीही वार उसी 
रूपमें प्रकाशित हो चुका हैं। हमने हिन्दीटीका छिखते|वार इसकी टिप्पणीपरभी ध्यान दिया है एवम्‌ यथाज्ञान मूल 
' और टिप्पणीकाभी संझोधन किया है (तथा उसके दिखाये पाठभेदोंकाभी अथ करते चले हैं,जहाँ कि, हमने उसका अर्थे 
दिखांतां आवश्यक समझा है । [पद्‌ पद्पर इस बातका ध्यान रखा है कि, धर्मशाखमें, हमारी साधारण बुद्धिके दीषसे 
/ कोई उछटा सीधा अथ न होंजाय जिससे कि, धार्मिक जनोंके! हृद्योपर कुछका कुछ प्रभाव पडे । आदमीके हाथसे 
ढिखी/हुईं टीकार्मे कोई गलती न हो इस बातपर हृदय विश्वास!नहीं करता क्योंकि “भत्य॑स्प चित्तममिसंचरेण्यम!ः 
भनुष्यके[चेचछ चित्तका क्या ठिकाना है ? आज एक बातका निश्चय करता है तो कछ उसको ;असत्‌ समझकर उसे 
त्यागनेको छशावढा होता ह । हां, मेरेसे जितनाभी हो सका हे शुद्ध ही संपन्न करनेकी चष्टा की हँ(जो कुछ किया है 
बह धार्मिक जगत॒की क्षेवा तथा बिद्वानोंके मनोविनोदक भावको' छेकर ही किया है कि, धार्मिक,जन अपने अश्विष श्रतो- 
स्सबॉका जान अनार [सही प्राप्तकर सकेंगे । तथा विज्ञ!7० न इसकी सरठतापर [प्रसन्नता प्रकट करेंगे आशा भी यही 
करता हूँ कि, भारतक सभी सप्रदायोंके सुयोग्य हिन्दू इस (पत्ता कर हमारे परिश्रसको सफछ करेंगे ॥ 


विदुषां वशवद्‌ :-< 
प० माधवायार्य्यः । 





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ञ्ि किनाण्व।ज भंजचतराशीः रुप भािगर सु: 
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ः दफन "या पधकको ४ ८ | हि लनिधदि नंशु के नि न्त है मन | [9 
सवेषां नस्तनोह अतिदिनशुदये श्रीहरिः शान्‍्तर्मा 


हे ह ।7॥ ५5 | 0 कह आ 4 हर न 
जगन्निवाश्चस्य हरः परतन्षी जनो भुत्रि 4 अध्याय 5 57 0025 2 4 ४ 45९०५ की 
है अध्क्कलरर * | हि का ॥५ कआ८ ६ के 9 गुल्कु के. नी पक दूध ब्कक्ज न ४ हि | है च ॥] 
अस्माभित्रतराजस्य बविश्वनाभकृते: खलु | अनन्‍्यन्व/लयवयेदद 7५ , ४३०१२०१-१ ७ || 
|] रे मारदेनानवेरि 2 ०28 ही हवा था 4 उपलककल ७ 
ढेखकाग। पाठकारगों प्रसाद्नानवरस्थितेः | सम्पूछ वायापाव ह्ठा कारंग्रइण वे ॥ ४ 
| श्खै 


। | 
य्यं 4६4 /#॥ श्रिः पु स्‍क५ है ह:दह। ने एव 0, ४ १२... *; के 7 डा 5 है ई 
सारट्य सावधातु 'ब शांखिलसइडछाम्डयां । शा साश।पा। 5, बस्ती) कर 0 क ६, 
है 
५५ हक 2७५ 


ऐ धरा यज्ेस जूत ्ध ० 3 है| हि ४ २>मक्त छ्द्य थे ४ " है ५४ ञ | हे ४ |] ये हे । | 
ताभ्यां महातयज्ञेप सब स्यन्वान्बिछोब्य व ॥ स्वछे स्थल ६. मीौरि: बहकाय ... '... | २॥॥ 


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असल कि लक 
जिस समिकिक: 





टि पूर कप प्निः ८90507 0८६२२ ५,४ * देय के | न्‍्थों हर ' ॥ 
खसब।त्सयपय | थे 3 53 | ४ २३४, ५ १97३० | साउग्र अन्य ,3 4 , » ८४ई,६ / | * ० । | | #।| 


नंगारिनागधरनीमितीय/एद्ध:7 5: ]) आरोहणेन स्थाविष्य्प ब५,5ब- ०-५: || ८ | 
परं त्वस्थ च्‌ ग्रन्थस्य कर्मणा स्वेन सूचितः ॥ हैगिप्ठ ,८ ५...) मे उध्यवरयय: न कक की 
भोरेश्वरो बापुजीजो5विधायवास मुद्रण ॥ अठो सो हटास्मामि: धूजितों ' नेब अदला, । ॥ !०9॥| 
 इलि तन्नोर॒रीक्ल्ल गथाथ्रत्रि अमुद्रयन ॥ तयोड-ताि दावकोरोज्याना मै वजर | ४१ ॥ 
जल्ारूघनीयधीशस्य पुरो वादः प्रब्तित: | तत्र साब्यादिशिनां: विपुरीकारिंद स्रति | १२ ।। 
न्‍्वायाधीशमुखादेषा निर्गता वे सरस्वती ॥ प्रतिधाटिसुदिलोपथ अन्धों बाह्य थे ॥ + ५ ॥॥ 
सब देथं बादिने च सत्वरं प्रतिदिन, ॥ इलि तन्निंगंतां "दीव.. ७.9. ८ ४ २४ ॥| 
लक्ष्मी निगमर-्जे वा. कु बेखित पुनः स्वयम्‌ ॥ अपीला रू द पादशोष अज्लाम्रे 
:. तत्रापि बत्येतरमौश्मज्या खुविपक्षयणों ॥ स्वाशा देशों डा ,पी 
 भाष्टअेमेलज्रेब सत्यः प्रतिवादों रविष्यति ॥ 3 2 क 
कूतअ् निश्चयश्ञापि जल्लेन मअथमेन यः | कृत निश्चय: सोपएथ सत्य ख्थान्यथः ने हि॥१८॥ 
शवमुक्तना बिवादख् स्म्पूणः समकायत ॥ फारगुन 2/बक्पक्ष-4 दृशस्थां भौमवास/ ।) * “, ॥| 
दक्षाधिफा्टाइ झाल्बशतते श्रीश्ञाद्धिबाहन || सत्य ख्रवंत्र जयति सत्ये सर्थ ५ लिपिनम्‌ ॥ २० || 
'सत्येन बद्धंते कौलिंः खत्येन सुखमभेधते ॥ असत्यं सर्वदा धेयमस-येनायशों भवेत्र | ६१ ॥ 
यजप्यसत्येन जीयाश्सो दष्याश्म न किम्‌॥ स्रारमित्य विजानन्तु सुध्ियो न्‍्यवट्ारिणः | | “२ ॥| 
न मन्तब्य छदा ग्कन राजसैदिरवत्मनि ॥ बय विजयिन: मुज्ञास्तथापि कि द अहन || २३ |] 
बहुद्च्यब्ययों नूनसुभयोरपि जायते ॥ तत्रापि किंचिजयिनों रुष्पमित्यभिभायत ॥२४॥| ः 
पराजयी तु घुदर्रों इंझ्माजाति स्वतः || तस्मायदि जना! सुज्ास्तदा आणप्वतु भे बच: ॥ २५॥। 
(- बिबादे तु खयुत्पन्न इभयोरपि स्ांत्बनम्‌ | उभ्ाभ्यामेव कऋतेब्ये नान्यस्थन्र निचायताम ॥ २६ ॥ 





रे मा] रथ ३ र्क हि ; हब ष्जु पृ के द ॥0)॥ 


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हि के है. ॥ ० हे ु ॥ 
शा +५ ६ ४, + 76६ ५६] /* ६ डा 


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नो न्महादुद॒क्ा स्वाइन्मशंत्वीधि सज्नना: || २७॥। 


( सत्दय-. ३ ब पहिद इसे टिप्पणीके रूप ह 
बेब खा शस मुझ टिप्पणीक रूपम प्रकाशित किए पीछे मोरेश्वर बापूजीन अविनारफे वज्ष हो श्रका 
0, छ इन्हें खचके साथ पुस्तक अर्वेकटेश्वर प्रेसकौ देन्ौ पड़ी भी इस्रीका विवरण इन 'होकोमे है! 




































*- रे ०.7 हित ३ //आरी 2/0७ कि 27570 /5207 82 शणी (07782 // सन 
0. दशीकमक 2 शहआ मे हरय कलथे का. 3... (मकर. स्‍धपब «००५ १ ऋषामाभमपरजाकपंबमाकापरदाा॒बजलक- नद#प्ाजतकक कैश "जे. न्‍लमादपोकपवी॥०+ जानने (% 2. छिपे भर 


विषय: पृष्ठाक: 
लटक 
परिभाषाप्रकरण । 
भन्नल्ाचरण ला, 
ग्रन्थकाप्रार्भ्भकाल ' ड़ 
जतका लक्षण हि 
ब्रतका समय रा श 
ब्रतका निषिद्काल १ 
देश भेदसे निषेष ३ 
तके आरंभ और समाप्तिकी तिथि ”! 
अतारंसके बार डे 
द » योग ११ 
: ध्तके वर्ज्य दिन 2 
भद्राका विचार श 
ब्रतके देश ह १? 
व्तके अधिकारी . 
 ज्तमें चारों बणोका अधिकार है 
व्तमें छ्लियोंका अधिकार ११ 
ब्लेस्छोंका अधिकार ग् 
ब्ेश्य शाद्वोंके लिये दो रातसे )2 
अधिक उपवासका निषेध ६ 
सघधवाकों पतिकी आज्ञासे अधिकार ?? 
यज्ञ आदि नहीं करसकती ?? 
विभवाका अधिकार ? 
ब्रतके धर्म ' छ 
संकल्पकी विधि & 
पौदेके कृत्य 2? 
अश'्तकेलिय विशेष श 
बिनालापेहीप्रारंभ ?ः 
व्रतिथोंके सामान्यघर्म ८ 
ब्तकी देवबपूजा ११ 
ब्रतकी देवमूर्ति १? 


बतीको ऋतुकालम ल्वृदारगमनकी आज्ञा?! 


इसीका दूसरा पत्त 


मांससझकत ध्तु गे 
आरंभमें नानदीमुखश्राद्वका विधान . ९ 
संकरिप त्तकों न करनेका प्रायश्वित्त ?? 


विशेषपरिर्थितिमें प्र।यश्वित्तका अमात 
प्रायश्वित्तकरके फिर अती हो १ 


उपबासके धर्म रा 
उपवापका भ्र्थ १ 
उपबासीके गुण ५; 
उपकासका रूदि अ्रथं ;. १० 


उपबास और श्राद्वमं दातुनका निषेध? 





(४ हू 
ह ४ 4 कं है ५ हा भें श छः ६ धर ५ 
/ हम, + 
ड है 


20260 5/2%:/0:000022 0 /ैअष्यना 23 क 202 ाथ०४2 22222: कि ४2:789 82 ३5 
उधरण्कद्रपर्द ऋजेर भी जपन'. ७ अनारअआकस+काकों अपाफपार) 4िीकल्‍०९७०. २ “कप बपे४८केपेरप +ल्‍+भक३० कर. ॥ ५ ककनतरककॉमिनरको मार्क यमन क. कृपकानात ।पजतोपे-अभमाताइअभपपान्‍कनकी 


और “ 
व्रतराजस्य विषयानुक़रमणिका । 


विषय; ' 





समय पानीपीनेकी आज्ञा... १० 
ब्रतकी पारणाके नियम १) 


ब्रतमें अन्नके स्मरणआदिका निषेध: ११ 


उबटनआदिका अविधघान है 

पतितआदिके दशनादिकोंका न्षिध 
करनेका प्रायध्ित्त हे 

सन्ध्या अब करें .. ?) 


सूथ्योद्यके विना दान बतका अभाव १२ 


आचमनसे शुद्धि १9 ' 
प्रशवका उपयोग | )१ 
झ्ियोंको अतकरनेमें सुविधाएँ १? 
व्रतिनी रजल्वलाकी व्यवस्था... 7! 
सूतकमें व्य उस्था , 
त्रतकर्ताके प्रतिनिधि हक... आई 
काम्यकर्मके प्रतिनिधिका विचर हर ड 
किनके प्रतिनिधि नहींहोते १२ 
व्रतकी दविध्यची ने ? 
मांसका विवेचन १२ 
ब्रतकेलिय आजश्य कवस्तुएं १७ 
पंचपद्षतव ) हे 
पंचगय्य ?) 
पंचाम्ृत १६ 
तीनमघुर अर 
छः रस. न 
चतु'सम ( चारपराबर ) हा. न 
सर्वेगन्ध 79 
यक्षकद्‌म या 
सर्वोषधी .... ११ 
सोमाग्याष्टक ह ?) 
अशक्षअर्ध्य १) 
संडलकेलिये पांचरंग १) 
कोतुकर्सेज्ञ क न्‍ 7? 
सातमृत्तिकाएँ १५७ 
सात घातुए. ११ 
सात धान । 
सत्रह धान १? 
| अठारह धान ; १? 
शाक्र )) 
कलश १? 
उसका परिमाण )9 


प्रतिमा और उसके द्रव्यके परिमाण . !! 
जहां दोमकी संख्या न कहद्दी द्वो भृ८ 


अप्मिमु व कर्म 
झा धानादिकर्म 





कै '+लपकटटर/मिकप  आपप पिन कम नर काल टन्‍उणज 7५ है सेन 42: 7 कल _टपीरिल्‍ह के 40708 घत सार कमी छत मक+ करती ४३7७ ४० फरआ पर: यह पक 777] 
उन 
वि ट् ँ 
/2॥ थ्ृ के 





प्रष्ठाक: 
धान्यके प्रतिनिधि १८ 
जहां मंत्र ओर देवता न कहें हो वहां ?? 
मूलमन्त्र बनानेकी विधि १) 
द्रव्य के अभावमें प्रतिनिधि १ 
पवित्र ११ 
| १९ 
अ्रमृतधूप १३ 
दशाडडधूप १ 
सुवगमान )) 
रजतकामान ११ 
तबेकी तो ल २० 
काप्रॉपणका विवेचन !ह 
धानके बॉँट १५9 
होमकी चीज! मान ») 
इसी का दूसरा मान न 
होम द्व्यके प्रतिनिधि १' 
आहुति केसे देना ' ( 
यवादिक्रे प्रतिनिधियोंका अ्रभाव 5३ 
'ऋत्विजॉका रण ११ 
अद्तवच्र + लक्षण ») 
आच!येआदिक भूषण १! 
श्रतका आग मधुपके )) 
ऋत(्विजों की संख्या 75 
दक्षिणएविव्रान | ;) 
सर्वतोभद्रमेडल ११ 
लिंगतो मदर “क। 
चतुलिंगतोभद्र 7 
द्वादशर्लिंगोद्भव २४ 
मण्डलों के देवता ओर उनके 
आवाहन।दिके मन्त्र १$ 
| लक्ष पूजनकी उद्यापवर्वि(धि २९ 
आचार्य्यका वरण ११ 
ऋत्विजोंकी प्राथना ३० 
दुष्ट परवोकी निष्का तन )9 
पंच गव्यसे प्रोत्तण ४) 
स्व॒स्ति प्राथना १! 
शग्न्यु तारण ४१ 
प्राणप्रतिष्ठा ११ 
क्लशपर देवपूजन २२ 


पुरुषसूक्तके मंत्रोंस घोड शीपचार पूजन 77 


३४ 
रे 








प्रश्नांक: 
स्विष्टक्त्‌ होम 3८ 
मुदाओंके लक्षण, और नाम डरे 
उपचार हड 
अडतीस उपचार ; 
षोडश उपचार ५ ११ 
देश उपचार पु १ 
रातिपूजनके अनुपधुक्त उपचार ४० 
पाद्ाञ्ञ ४ | १) 
आखचमनाह़ है 
श्रर्ध्या ड़ है १9 
उद्गतंन 79) 


स्तान पात्रके द्वव्य 
उपचारके सब द्वब्यका प्रतिनिधि 2 
पूर्ति आदिके स्नानका निशय है. 
देव पूजनके देय पदाथ 7? 
शंखके श्भिषेक १! 
जिम त्तका उद्यापन न कहा हो उसमें ?? 
उद्यापनके कथनपर ९४६ 
खंडितव्रतकों पूरा करनेकी विधि )9 





हू जा ज्णा हुजऊ जयूदणायु ह जुचू३ह ॥ 








यमद्वितीयाका निशुय, यमुनाक्षन ... "! 
इसके कृत्य हे 
यमद्वितीयाकी रु था, व दिनो कटा थ से तो तन 5 


इसीमेंभेयादोज और यमपूजन ८ 


ततीयाक गत । 


सब तरतोंकी सामान्य पूजाविधि._ ४७. चैत्र० शु० तृ० सौभाग्यशयनत्रत.. ८१ 
५५ आह सतीदेवी ओर शिवपूजन आदि पर 
प्रतिपदाक त्रत॥ ., इसीमें गौरीके डोलाका उत्सव ८४ 
चन्रशक्का प्रतिपदाके संबत्सरके प्रारभकी विधि | इसीसें मनोरथ तृतीयाका अत के 
इसमें उद्यव्यापिनी तिधिका विधान उसकी कथा हे 
उथा निणंय ?! । इऋन्यतीका बत ८९ 
महाशान्तिका विधान ? । अहन्धतीके पूजनकी विभि हे 
पूजन 7. अद्न्थती अतकी कथा ९.० 
चे० शु० आरोग्य प्रतिपदाका अत ५३ | इसबतका उधापन ». ९२ 
च० शु०विद्या प्रतिपदाका व्रत 4४ | वेशासशुक्तृतीयाकों शत्यतृतीयाका अत ५३ 
चं० शु८ तिलक अत ? | वैशासस्रान है 
साधारण ल्लियोंको बेदका अधिकार नहीं५५ | परशुराम भयन्ती ५४ 
चेंत्र० शु० प्रं० नवरात्रका प्रारंस ५६ अक्षषतृतीयाका नियाय १) 
चं० शु० प्र० प्याऊका दान और बसे इसकी विधि १? 
घटका दान ५९ | इसको युगादि कथन ओर कर्तव्य हे 
श्रावण शु० प्र० रोटक ब्रत )) | कथा १) 
ु उसीमे सोमेश्वरके पूजनकी विधि । ज्ये० शु० तू० इंभाजत ५६ 
हे सब त्रतोंकी शिव पूछा ५७ श्रा० झु० तृ० मधु्वावत १) 
्ध रोटक ब्रतकी कथा ९८ श्सी को सगणुगोरी ब्रत हे 
. “ डैप्रवासकी प्रार्थनाके मन्त्र ५९ | खरणगौरीकी पूजा १ 
स्थाषंस ओर पूजन ? | ह्वर्णगोरीकी : 
दकाप स्वणेगोरीकी कथा ९८ 
आभ्वित शु७ पतिपद दोहित्र प्रति ; गत | हे 
| ५ 
इसमे धमाका भांद किन 320 तेतकी विधि... १०% 
सामाकें जीतेनी, पितालिकों «१ 
मुडतकां अम्राव , 2००. $ हि है 3 हा शिशानिती क हु 
धोरद नकतत्रका प्रा 5 5 पी अंभोकी 
बे भर है । | | अंगोषफी पूजा * १०४ 











4७७४० ७०७७७ आज च ससग/&१ ०#१९०॥०५९८ ३३४६ 


; | विय: । 


एृष्ठाक: | 

नवरात्रशब्दका श्र्थ ६२ | कबा 
घटस्थापनका समरथ्र, राजिमें निषेध?! | उद्यापन 
नवरात्रके घटकी हथापना वि 7 | झा० घु० तू बतदूगौरीय। 
नवरात्रकी दुर्गापूजा ६३ | 
अगपूछा ६५ 

| कुमारीपूछा ६६ 
प्रारंभके पीछे सृतकर्में विशेष ६७ 
कार्तिकत्ुक्लाप्रतिपत्‌ ५; 
क्रथां भ्द मे 
इसीमेंबलिकौपूजा २ससीलींचनाव गोका 25३ | रत 
अन्नकूटकी कथा तथा विधि न 
गोवधनके भोगके मेंत्र ७५ 

द्वितीयाके ब्रव | 

कार्तिकशुद्धाह० ग्रमद्वितीयाकी अत. ७०५ 





हे! 


भू 
, ईसकी कथा! 


( 


->यकयॉटिसानासर्वीिल्‍राकक: के 


| नाममंत्रोंसे पूछा 

| अगपूजा 

| आव णपूआ 

पुष्पपूणा है 

| एऋसोशआाठनामोंसे पूजा 





दर्यागिधापतिजत 

मे।+ ह[० इ७ पिति 

पूजन ड 
भंगपूजा 

कथा 

महिता तथा इसमे 4-: ::.।: निषेश 
दोष शास्तिका मंत्र 

स्यपन्तकमरा ही कथा 

जान हु ० चेक («६ कप (विनायकका 
पूजा 






 आ्राखिनक्ृ० चु७ दरारम्नलिता बत 
| कपा है 

| कार्तिक कुण्सू ० कूरक बहुर्थीका (५ 
कथा 

का माघ शु» ब० गोौरीमतुर्भीशत 














संकटनाशन कथा 


 अगारकचहुर्थीके अतरी कया 


> झका<+ सल- 





विषय! 


ताथाारकप्रदवतपटेनपंरा।बपवएखखासबा 





पश्चमीके ब्रत । 
चैठ हु० प०७ वन्पादिको दोलाका 
उत्सक ० ८८ १९१ 
का० शु० नागरपचमीजत । 
भा० ॥० देमादिका नागपंचपीवत १९३ 
शआरा« झु० नागदश्बत और कथा ११ 





माहपद शु०प० ऋषिपंचभी बत_ १५९५ 
ब्रतकी विधि १९६ 
ऋषिपुजानिधि ही 
कृषा । ९८ 
भविष्यपुराणकी कद्दी ऋषिपंचमीकीकथ[२०० 
उद्यापन २०४ 
आ*+ झु० उपाश्ललिताजत २०६ 
. » की पूजा २०७ 
कथा २१० 
उद्यापन २१९ 
मा* शु० वसनन्‍्तपंचमी र्ज्ड २२० 
षट्ठीक त्रत। 
भाइपद छु० ललिताषष्ठीका ब्त २२० 
७ 5० कपिलाषप्टीका व्रत २२१ 
ब्रतकी विधि २२२ 
का० कृ० स्कन्दषष्टोका अत २१३१ 


भाद्र०वा मार्गशीष हु ० वम्पाधषण्टी कान्रत 5 ३ ३ 


निर्धनकीविधि २३६ 
सप्तमीके ब्रत | 
बै० शु« गंधाबीकी उत्पत्ति० २२७ 
भा क० शीतलासप्मी न 
कथा २३८ 
भा० ० मुफक्ताभरण्त्त २१४१ 
उमामहेखरकी पूजा ' 3१ 
कथा हे २४२ 
आ० शु० विश्वशास!प्रवेश २४८ 


» # 'रसस्‍्वतीकी पूजाकी विधि ,,. 


माघ कु० रथप्प्तमीका व्रत १४६ 
५... कंभा २७५० 
». अचलासप्तमी # / २०५३ 
७... पुत्रसप्मीजत २५५ 

. अष्टमीके ब्रत | 
.चअत्र शु० भवानीकी उत्पत्ति २५६ 


? ** झा जेककी कलीका प्राशन ,, 
7?  बुधवारकों बुधाश्मीडा ब्रत ,, 


ब्रतकी विधि पूजा २५७ 
कथा २०५ 
उशधापन , ६३ 
आमण ० दशाफल्तत पूृणाविधि २६५ 
का . २३६९६ 


पृष्ठाका 


विषय: पष्ठांकः 





भाद्र ० कृ० जन्माष्टमीका व्रत २७० 
इसका मिश॒ुय कि 
पारणा ४५३ 
ब्रतप्रयौग शे७४ 
पूजाविधि २७५ 
कथा २७८ 
शिष्टाचारले प्रापततुई कथा २८४ 
उद्यापन २८% 
भाहपद 2० ज्येष्ठातत २९२ 
ज्येष्टादेबीकी पूजा २९, ३ 
भविध्यपुराणकी कही अतकी विधि 
ओर कथा २९४ 
स्कल्द पु० कही ज्येष्ठाके बृतकी विधि २५५ 
उद्यापन '. २९६ 
भा० शु० दूर्भाध्मीका व्रत २९७ 
निणय $) 
इसका ल्ियॉको नित्य विधान २९८ 
ब्रतकी विधि ओर पूजा आदि हे 
महालक्ष्मी त्रत ३०० 
पूजन है 
कथा ३०२ 
आख्ि० छशु० मद्यश्मी ३१६ 
५ ऊ#० अशोकाश्पी न 
मार्गशी> क० कालसैरवकी अश्मी ,, 
इसका निर्णय ११ 
कृष्णाएमीकी क्या ३१७ 
नवभीके ब्रन ! 
चेतन झु० रामनवसीका वत० ३१६ 
रामनवमीका निणुय 98 
रामकी प्रतिवादानका प्रयोग २३२१ 
श्रीरामपूजा ३२१ 
कथा ३२४ 
रामनामके लिखनेंक|वत ३३० 
कथा ओर उद्यापन.... हा 
भ।० शु० अदुःख नवमीका व्रत ३३२ 
गोरी ओर गणपति शा पूजन कि 
कथा ३३३ 
आखश्वि० शु० भद्रकालीका तब्रत ३१८ 
नवरात्र 5 ३३८ 
दुगके पूजनकी विधि ३३९ | 
अरधध्य ओर अध्येके पात्रॉका फलपुष्प ३४१ 
तथा दूसरी बस्तृओंके समपर्णेका फल ,, 
आवरणपूणा १४६ 
चौसठ देवी ओर माताएँ हि 
| पांच मुख शोर आयुध ३४७ 


का० झु० अत्मनवसीके अतकी कभा ,) 


विषयालक्रमणिका । 







२ कक: 4व ३ कप के हि २४२८: 





विषय: 


पृष्ठीक: 
2४७७७॥॥७/७॥एए/ए७७७॥७शएशएशश/श/श/शआशाणााआ“ आ अयक 
तुलसीका विवाह ३४७ 
कथा ३४८ 
है द्शमीके ब्रत । 

ब्य० 'झु० दशहराका बत्‌ ३५२ 
दशहू रानामका गंगास्तोन्न 

झोर उप्रके पाठकी रीति ३५३ 
आपादढ शु० आश्वादशमीका अत १५६ 
यह मन्वादि हट का 
ब्रतक्की विधि हा 
भा० शु० दशाबताएजत ३५८ 
श्रा० शु० विणयादशमीका व्रत । 

निणेय एवं यात्राका विधान ३५७९ 
इसके कृत्य ») 

एकादशीके ब्रत । 

एकादशी निशय ३६१ 
उम्रमें अ्रुणों दयका स्वरुप ११ 
वैष्णबका लक्षण ३६२ 
स्मार्तोक्ा वेष १ 
इकादशीके भेद 9$ 
परेद्रत्र॒त, उपोषण 5 
हेमाहिके मतस्ते एकादशीके भेद ३६ ३ 
विदोष 39 
तब्रतके न करनेपर प्रायश्चित २६५ 
दशमीमें त्रतकी विधि हर 
ग्रतके नाशक ५४ 
अशतकिमें विशेष विधि ११ 
ब्रतमें वर्ज्य 93 
बज्थकि कियेसे प्रायरिचत 


दांतुन निषेष, कियेसेह्ानि, विशेषधिश्ि 
उपबासके प्रहणकीविधि, एकादशीका 
सकरक, शावादिकॉको विशेष, रातिका 
संकल्प जागरण, द्वादशीखें निवेदन- 
मंत्र, द्वादशीमें बज्ब॑पदार्थ ३६५ 

विधि सुतकर्मेभीकरे, रजकेदशनमे भी 
करे, द्वादशीमें उपवास, आठ मह्दा- 
द्वादशीयों, शुक्लकृष्ण दोनोंका उद्य॒[- 


पन, उसकी विधि ३६५ 
पूजाकी विधि ३७२ 
पुशणोकी कही दोनों एकादशियोंके 

उद्यापनकी विधि 7! 
आपाद छु० गोपदत्तकी उद्यापनविधि३७५ 
पूजाविधि १? 
कथा | ३७६ 

पुरुषोत्तममास की कमलाएकादशीका 

मादष्त्म्य २७२ 


आ० झु० एकादशीकों वामनका अबतार३ ८५९ 


उपर मा “४ पक सआकन्म मकइभ कप लक 2 तक कप + ५०२६३ 9४५५८ १ कर 0 >लज कलम कर परम 
०48०८: 2६5:४७३ 72८ ८४5०४, ता 2 ०० ++++०-५९: 34 कपल प्र पसपमभमा ४ मप्र इस मा क एके हर. कि 






विषयः 








कार्तिक० झु० प्रबोधके उत्सवकी विधि३८ 


१! भीष्मपंचकत्रत ३८३. द्वादशीके ब्रत । 
प्रबोधके मेत्र २८४ | चें० छु० द्वा० दमनोत्सव 
तुश्सीविवाह डे इसमें दमनपूजनकी अबरब दर्तव्यता 





मार्ग० कृ० एकादशीका व्रत एका दशीकी 
उत्पत्तिका भाहात्म्य - ३८६ 


वें? छु० द्वादशीमें व्यतीपात योग 
 आषाढ शु० को विना खऋनुराधाके 


अण०्मा०कृष्णा परमा एकादशीकी कथा ४७ 





मार्गशीष शु० अनज्ञत्रयोद्शीवत 
चतुदशोके व्रत । 


५१९ 









४७५ | चे० झु० रातमें झ्िब आदिका पूजन ५३३ 
» | इसीमें कुछ विशेष 
४७६ | वबें० श० नृ्सिहचतुर्दशीका त्रत हर 





नृर्सिहचतुरदंशी निशाय 


ड़ 









,» वैतरणीव्रत २९१ | योगके पारणाका विधान छः कथा ५३२ 
मार्गशीरष कृष्णा एकादशीका साहातय ३९३-| आपषाढ भादपद और कार्तिककी अनन्तचतुदशीका त्रत ५३७ 
मार्गशीष शुक्ला एकादशीकी कथा या शुक्ला द्वादशियॉमें अनुराधा श्रवंण ब्रतकी विधि, पूजा के 

- माहात्म्य ३९९.| ओर रेवतीके योगमें पारणाका निेध!! अंगपूजा, नामपूजा ५३९ 
पोष कृष्णा एकादशीका माहात्म्य- ४०२ | अनुरावाके प्रथमपादकीही वर्ज्ज्ञ्., || शंगपूजा छा 
मावकृष्णा आमलीकी एकादशीकी श्रावण छु० द्वा० द्ित्रत और पवित्रा - पीठपूजा ऐे 

कथा था माहात्म्य ४०८... रोपण कक अनतनन्‍्तपूजा ५४/) 





पोष शुक्ला ए० की कथा या माहात्य४०५ 

चेत्रकृष्णा पपमोचनी एकादशीकी 
कथा या माहात्म्य 

चेत्रशुक्ला कामदा एकादशीकी कथा 


भा० शु० श॒द्ठा द्वादशीको दुग्धब्॒तका 
संकल्प 

दूधके विकारकी त्यागात्यागव्यवध्था 

यही श्रवणके योगमे श्रवणद्वादशी 


४१९ 


या माहात्म्य ४९२, | कहद्दाती है हे 
वेशाखक्रष्णा वरूथिती एक्नदशीकी इंसीकी विष्णुविशखलसंज्ञा ओर 
कथा या माहात्म्य 4२४ साहात्म्य 


वेशाखशुक्ला मोहिनी एकादशीकी कथा | 


इसीपर हेमादि ओर निशयामतकी 
या! माहादय ४२६ 


मं ही 
रॉ 


' व्यवस्था. , 
ज्येष्र कृष्ण परा एकादशीकी कथा ब्रतकी विधि ४ 
या माहात््य ४२८ | विष्णुधर्मका कहा दूसरा विधान 


ज्यष्ठ शुक्ला निजला एकादशोकी कथा 
या माहात्म्य ड्र९ 
आषाठकृध्णा योगिनी एकादशीकी कथा 

या भाहात्म्य ड्३े२ 

'. आ्झुं०पदञ्मा एकादशीकीकथा या मा.४३४ 
यही शयनी हे ४३६ 

इसीमें विष्णुशयन और चातुर्माध्यत्रत 
हण होता हे इसका माहात्य्य 


ब्रह्ममैवर्त, भविष्य और विष्णु रहस्यका 
कहा बिधानान्तर 
“क्रथा 
इसीम्ें वामन जयन्तीका ब्रत 
बासन पूजा ओर उनके अंगेंकी पूजा 
शिक्ष्यके दानका संकश्प 
“पौ० झ७ द्वा० सुरुप द्वादशीका ब्रत 


न 





है 2 








अथिपूंजा, अगपूजा, आवरण पूजा ५४३ 









४७७ | पत्रपूजा, पुष्पपृजा, एकसो आठ-नामोंसे 

| पूजा पड, 
डोरेकी श्रार्थवा, डोराके बांधनेके मंत्र 

४७८ | ओर जीणके बिसंजनके मन्त्र... ५४६ 
वायनेके मंत्र, पुराने डोरेके दानके मंत्र 

हा ओर कथा ५४७ 
अनन्तके व्रतका उद्यापन ५५४ 

४७९ | नष्ट डोरेकी विधि ५५६. 

»..| भाद्र० शु० कदलीवतकी विधि 






हं८० 


पक 


रंभाका रोपण 

कथा 

गुजरातीयोंके आचारसे प्राप्त उमा« 
भहेंचवर सहित कदलीका पूजा -५५८१ 






9). 


हा 








हट: 
४८२ 








४८६ | कथा ५०५९. 
४८९:। उद्यापन १६, 
४९० | कार्ति० कृ० नरकचतुदेशीका जत. ५६२ 






इश्चमें प्रात:तिलके तेलसे क्षान विधान ,, 












ओर उसकी . कथा ,, स्नानके विशेष जप ले 
३ ब ईहे हु 
आवण कृष्णा कामिछा एकादशीडी.... त्रयोदशीके ब्रत इसमें ओर अमावस्यामें दीपदान 
कथा या माहात्म्य 3४६ | आषा० झु० जयापार्व॑तीका व्रत कथा विधान ४ 
आवशण शुक्ला पुत्रद एकादशीकी कथ। ओदि |. ४>+$ | सनत्कुमारसंहिताके कहे नरकचतुदशी 
या माहात्य * ४४८ | भा० शु० गोत्रिरात्रत्रत ओर कथा ४९८ तीन दिनके विधान ११ 
: भद्रपद कृष्णा अजा एकाद शीकी कथा गुजरातियोंका गोत्िराक्त 4०] | काठ झञ० वैकुण्ठ चैंतुदंशीका वत. ५६५ 
' या माहाक्त्य ४५० | उद्यापन ५०६ | कथा | ५ ६ ६ 
भा शु० परिवर्तिनी ए०कथा या मा० चेत्र शु 
० अशोक प्िरात्रत्रत ५०७ ल्‍ रण 
आखश्विनकष्णा इन्दिरा एकादशींकी कथा केथा जे 40 08% कि हक हा 
माद्दार यृ गम का ०] 
या की ु डणड | [७9कु० त्र० महावारणीयोग . . ५११ ब्रत और जा पा ५६८ 
आ० झु० पाशांकुशा एडादशीकी कथा समें गंगासनानकी विशेषता और फेरे. ,). | ब्रतकी पारणा ' कई 
या कि कक 6. *. ४४७ | कार्तिकया श्रावणकी शनिवारी व्रत को वीधि, पूजा ५७१ 
9 3 जरमा एका कीरूथ यासा ०४० त्योदशीको प्रदोष त्रत तथा क्‌ न 
शु प्रवेषधिनी के, । .. >पो ), | कालान्तरमें पूजाका विधान 'पजर 
0 7१: बसी एका०कथा था सं|४६ ० प्रकारान्तर ' 
आभास इक एकादशीडी कथा ४६५ कह न 
० “४६५. | प्रदोष्॒नतकी कथा ४५१८ उद्यापन 


७९४६ . 


22 


हँ 





































पूर्णिमाके ब्रत। 
शिमाका निर्णय 
चेत्रीकों बित्रवश्भदानकाफल ५5 
 दमनसे सब देवोंकी पूजा 
वैशाखी कार्तिकी ओर माघीके दानकी 


ए 


प्रशंसा ५८८ 
ज्य० शु० वटसाविन्नीका त्रत न 
ब्रतकी विधि ») 
पूजा विधि ७८९ 
पूजा. ११ 
अगपुजा ब्रह्मसत्यपूजा ७९, ० 
कथा - ५९१ 
अब्द साध्यत्रत ६०१ 
उद्यापन ६०१५ 
'आषाढीको गोपब्रत्रत और उसकीपूजा६ ०४ 
कथा ६०५ 
उद्यापन ६०७ 
आधाढ झु० पौ० कोकिलाहत “६०८ 
उसकी विधि पद 
कथा ६१० 
उद्यापन ६१५ 
श्रावण पौ० रक्षाबन्धनकी विधि ,, 

निर्णय, कथा ६१६ 
झद्ोंके मन्‍्त्ररहित ६१७ 
रत्ाबन्धनके मन्त्र ओर फल ६१८ 


भा० पो० उमामदेंशरकी कथा ,, 


शिवके अगोकी पूछा ६२१२ 
शक्तिके अगोंकी पूजा ६२३ 
उद्यापन ६२४ 
आश्वि० पो० कोजागरबत भर रे७ 
कथा है ० 

कार्तिकीको ज्रिपुरोत्वैवक्था / | ६३०. 


का० झु० चतु०कार्तिकमासका उद्यापनों: ३५ 
मार्ग ० कृ० पौ० द्वार्निशी पूर्णिमाका 
त्रत 


१] 


कथा... - ६३८ 
का ० पो० होलिकाका उत्सव ६४२ 
हो लिकाका निर्णय ६४४ 
अमावस्याके त्रत। 
भां० कुशप्रहणी ६४५ 
» पिंठोरीव्रत. ६४६ 
ब्रतकी विधि ९१ 
कथा है 
आ० कु० अम। गजष्छायापर् ६४८ 
कार्ति० श्रमा० लक्ष्मीत्रत और बलिके 
राज्यका उत्सब विधि. +9 


. _विषयानकऋमणिका । 


भविध्यपरीक्षा 


राजाओंके लिये विशेष 


मार्ग ० अमा० गौरीतपोब्रतका विधान .६५१ 


9 इसको महात्रत कहा है 
सोमवती अमावस्याका व्रत 
पूजन 

कथा 

अश्वत्थकी पूजाका मंत्र 
प्रदक्तिणाका संत्र 

उद्यापन 


पोष अमावस्या अर्थघोदय त्रत 
कथा 


मलमासके ब्रत 
इतिहाससह्ठवित व्रातान्तर 
मलमास ओर ज्ञयमास सकज्ञा 
चायमाप्त कब आता हे 

पू० आ० मी 8 का० पू० तक चार म 


वर्षोका स्वस्तिक व्रत गो ल्‍ उपसि आदिका समय प्रकारा- . . 
8 | ?! न्तरसे उद्यापन 5) 
च्‌ 'आश्चिन छु० ए० से का० हु ० ए० 
रविवारमें सूर्य त्र्त ६७७ | प्ासोपधास ब्रत छह 
सूर्यकी पूजा ११ आ० झु० ए० का० शु७:ए० तक 
कथा है कब बारणापारणात्रत छ्र्ड 
आश्विन आदिके रविवारोंमें आशादित्य संक्रान्तिके त्रत घश९ 
न्रत +£) | धान्य संक्रान्तिके व्रत कब करे, सूर्यका 
दल )) पूजन, उद्यापन 9) 
सूयके अगोंकी पूजा ९-९ | लबण संक्रान्तिके ब्रतशर उसकी विधि७ ३० 
आ० शु० झन्त्य रवि६ दानफलब्रत ६८४ | सोगसेक्रान्तिका अत और विधि... ७३१ 
पूजा १) रुप संक्रान्तिका गत ओर विधि |. 
कया ११ एकभमषप्कका निर्णय 29 
सोमवारको शिवपूजा 4० | शत घेनु और उसका बत्स 25 
कथा 2 | जलघेनु ओर उसका वत्स कप 
उद्यापन ११३ | शुढ़ वेनु ओर उसका बत्स .. | ,, 
प्रकारान्त रखे सखोमवारका ब्त ६९३ 77% अल आर अनीज ७३२ 
शिवका पूजन तथा आठ सोमभाग्यसंक्रान्तिका त्रत इसमें सोनेके 
सोमवारोंका ब्रत ६५४ कम्लका २१ 
उद्यापन ६५* | ताख्बूलु,संक्रान्तिका अत और विधान ,, 
27% अत अमल ते 8 सनोर्रिय संक्रान्तीका त्रत उद्यापन , ७३३ 
शिवका पूजन ५५ १॥ अशोक संक्रास्तीका ज्त इसमें सोनेके 
दूसरी रीतिसे ६९८ सूर्यकी पूजा 3 
मंगलवारके त्रत . ४०१) | कप्िलाका दान * १5 
ब्रतकी विधि १! आयु धक्रान्ती जत तथा धान्य- 
मगलका येत्र इसके बनानेकी विधि संक्रान्तीकी तरह उद्यापन विधान ७३४ 
ओर पूजनकी रीति ७०२ | घन संक्रान्ती ब्रत पूर्वबत्‌ उद्यापन विधान 
मंगलका कवच ७०३ | सब संकान्तीयोंका उद्यापन 
। कथा ७०५ | पनु संकान्तीकी विशेषता 







ध्‌ 


वशन्ट०० ०-७१ भा दधानानन वपिभभयिनशनयिनानल्‍्क्दनन परम जननतू कि -+क-कानूना वनननम«न-राम, चलन  ज्शशष्यडस्डस्सड 
8:5००+-24० 56.2500-० "या: पर: 2३७१०. ध दर धादवथधाका अप कर २०2७, ध६0-4- "7० 32५. ५ जिक्र 202 
3 न-+-मगक-ु(+3५००७-६.९२०अिनमम-+-०० 


विषय, छुच्चां$,, 


६५० | उद्यापन जड़े 
१) टी० बुद्धका बतादि ७०७ 
बृहस्पंतिवारका ब्रत ओर स्तोत्र ७०८ 
३१२ | शभ्रावणमे झुक्रवारके वरलध्ष्मीकाब्त ७०५ 
६५५ | पूजाकी विधि | हल 
ते आग पूजा न 
, ६५७ | कथा मा 
६६० | श्रावण श० शनीचरका त्रत ७१३ ' 
३६४ | पूजन 2३६ 
१9 कथा ह हर 
३६६४ | व्यतीपातके ब्रत ७१७ 
)2 व्यतीपातकी उत्पत्ति ७१८ 
१६९७ । चन्द्र सूर्यका बर हा 
"६६ कह 
पूजन की 
३४० | तारदीयंका व्यतिपात जत ७२१ 
८“ | हर्ष्यक्षका इत्त ेु मी 
दान विधाव ७२४ 





मध्य ॥ 





विषयः पृष्ठांकः 
रविका बते ज्ञान ७३६ 
मकर संक्रान्तिमं घ्तकंब्लदानकी ं 

सहिमा.. * हद 


मकर संक्रान्तिमें दधि मनन्‍्थनका दाव ७३७ 
पानोंके दानका तत और उसका 


उद्यापन _.. ७८ 
मौन त्रत ओर उद्यापन ७३९, 
प्याऊके देनेक़ी विधि ओर उसका 

उद्यापन । ” छ४० 
लाख पद्मॉंकी विधि 2 हे “७४१ 
लाख आदि दीप दानोंकी वि: ७४२ 
लाख दुबोग्रे पूजनेकी विधि ७७४३ 
इसका माहात्म्य पे 

लाख प्रदक्तिणाओंकी ।वोधे और 

शिवजीकी कथा ७५१ 
लक्षादि प्रदक्षिणाएँ अश्वयकी. ७५४ 
अश्वत्यका मन्त्र ज्५ण 
पूणाविधि 


मै 


पी रन] हे 

अश्वत्यरूपसे ।विष्णुका आर्विभाव तथा 
उसकी लाख प्रदक्षीणाएं, कार्तिक 
माहातयसे ७७६ 
विष्णुकी लाख प्रदक्षिणाश्ोंकी विधि ७५९ 
उल्यापन 


७६० 
तुलसीकी लाख प्रदक्षिणाओंकी विधि ,, 
उद्यापन ७६१ 


$ ॥' ह 
गो आहयण अप्ि और हनुमानकी लाख 
प्रदक्षिणाओंकी विधि ७६२ 


है हनन कपल 2०८८ आसार २८ 


विषयानुक्रमाणेका । 


08723 20670 287 दर 


विषय३ 





ब्रद्मइृत्यादि महापाप, उनके समपाप, 
छातिअंशकर पाप, संकर करनेवाले 


पाप, मलिन करनेवाले पाप और 
.._ उपपातकोंका उल्लेख )१ 
उद्यापन . ७६३ 


लाख बेलपत्रोंसे पुजा ओर उसका 


माहात्म्य ७९१४ 
उद्यापन ७५६६ 
शिवकी नाना लक्ष पूजा विधि. ७६७ 
उद्यापत ७६८ 
तुलसीकी लक्ष पूजा विधि ७६९ 
प्राथनाके मन्त्र 8) 
पतन्र लेतेके मन्त्र ११ 
विधि ७० 
उद्यापन $ 
विष्णुकी लक्ष पूजाकी विधि ७७१ 
उद्यापन ७७२ 
बिल्वबत्तीकी विधि ५ 
उद्यापन ७७३ 
रंद्र बत्तीकी बिधि ७५४ 
उद्यापन ७७६ 
सामान्यसे लक्षबत्ती व्रत ७७७ 
उद्यापन ७७९ 
विष्णुका सक्षबत्ती व्रत ७८४ 
उद्यापन ७०३ 
देहबत्ती व्रत ऐ 


इत्यतुक्रमणिका ॥ 








! ९& ५ अकक-अन्‍ननभकनन हि 









पृष्ठांक: 






विषय: 


टरशक) 
20७0७॥/७//॥/#/#एशनशणशशा 
डउयापत ७८५ 
विष्णु ओर सूर्यकी लाख नमस्कार विधि हे 
उद्यापन ७८६ 
श्रा, भो० मंगला गौरीका त्रत ७८५ 
गोरीकी पूछा मे 
कथा ७८८ 
उद्यापन ७९५ 
मोन वत और कथा ७९६ 
उशापन ७९८ 
पंच घान्यपृजा ७९६९ 
उद्यापन ८0०0 
| शिवामुफ्ति जत ु ८०१ 
उद्यापन ८0३ 
हस्तिगोरीन्नत ८०१ 
कथा मी 
कृष्पाण्डी अततथा कथा ८०७ 
उद्यापन ८५०९ 
ककटी रा व्रत उद्यापनसद्ित ८१५ 
कर्कटीका पूजन ८१५ 
उद्यापनकी विध «१९ 
कोटी दीपदानका उथापन ८२० 
पार्थिव लिन्नषका उद्यापम ८२१ 
व्रतराजमें आये हुए िषय 'छोकबद्ध 
या अल्युक्रमणिकाध्याथ * ८१२ 
सात घानोंसे लक्ष पूजा विधि ८२४ 
लक्ष पूजाका उद्यापन ८५५ 
टठीकाकारकी कृष्ण प्रार्थना. ८२६ 











१ ाननशणशछ ७ऋऋछछऋनऋऋछछ 





अभिला देव सबितः 
श्रप्मि दुर्त बृणीसहे 
आश्विनावर्तिस्मदा 
प्रभित्य॑ देव सविताएम्‌ 
प्ष्परसां गन्धर्वाणाम्‌ 
प्रदितिद्य जनिष्ट 
प्रंहों मुख मांगिरसो 
प्रति सप्तिम्‌ 
प्रग्नेरप्रस: 
प्रमिह्तन्यरतः क्णैम्‌ 
प्रमिर्दाद विशम्‌ 
म्रिमुक्थऋषय: 
ग्रमिबिशईघ्सते 
प्येत्रद्म ऋभमव: 
उछुनीते पुनरत्माझु 
प्यन्त इष्म 
याध्याप्म 
तो देबा 
द्विरि भोगे: 
में त्व॑ं नो अन्तम 
'अत्ये वो निषदम्‌ 
म्वपूर्णाम्‌ 
अभिस्व धृष्टिम दे 
अग्रिमीक पुरोहशितम 
अपत्ये तायबों यथा 
अदश्र मस्य 
अयुक्त सप्तशन्ध्युवः 
अधादेवा उदित: 
शरयोदष्ट्री अचविषा 
अग्रे त्वच यातुधनस्य 
आममुर्धादिव: 
अरायिकाण विकटे 
आप्यायस्व समेतु ते 
आइदास इन्द्रबन्त 
आादित्याबू याचिषामहे 
आये गो) परिनिरक्रमीत्‌ 
आपो हिँष्ठा मयोभुष;: 
आपो अधस्मान्‌ मातर:ः 
आकलेशु 
आदित्यवरा 
आपः सजन्तु 
आंद्ों पुष्करिणीम्‌ 
आदर: करिणीम्‌ 






पृष्ठांक: 


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सन्न्र, 

आकृष्णेनरजल] २२९ 
आत्वाहाष॑मन्तरेडथि ३७० 
आवहन्ती पोध्या ६९२ 
इन्द्रवी|वश्वतस्परि ५५ 
इय वो प्रति भस्मत्‌ २६ 
इद विष्णुविचकमे २७ 
इम मे गंगे यमुने २८ 
इदमाप: प्रवहत ४१ 
इरावती, घेनुमती १९५ 
इषे त्वोज त्वा २२६ 
इहैवेधि मापच्यो हरा ३७० 
इममिन्द्रो अदीवरत्‌ हर 
इह प्रव्नृह्दि यतमः ६४३ 
उदीरतामवर उत्परास २७ 
उदुत्य जात वेदसम्‌ २२६ 
उद्वयं तमसस्परि मर 
उद्यन्य सिन्रमह १9 
उदमादयमादित्यो २२७ 
उद्बुध्यए्वाम २५७ 
उभोभया विन्लुपर्धेहि ६४२ 
उतारूधान्‌ र्ृ॒णु॒द्ठि ६४३ 
उद्भे तिष्ठ हर 
रध्बोमवप्रति ६४ रे 
ऋषभ वा समानानाम्‌ २७ 
एह्मम इद होता ३४ 
एपो द देव? प्रदिशोनु ३५ 
एवा पित्रे १ ५६ 
एतावगिस्थ महिसा ३२ 
ओमासश्रषणीधरुतः २६ 
ओषधय: समवदन्त ६३ 
कद्ुद्गाय प्रचेतसे २७ 
कद्मेन प्रषा भूता न 
कांसोस्मिताम्‌ ६४ 
काण्डात्काण्डात्‌ ु ६३ 
कुमारं माता युवति समुदब्धपू २७ 
क्षुत्पिपासामक्ञां ज्येष्ठाभ्‌ ६५ 
ऊणुष्ब पाज; ६४३ 
गन्धद्वारां दुराधर्षाम्‌ १५ 
गशानान्धवा ु २८ 
गोरीमिंमाय ३३३ 
घृत्त मिमिश्षे ध्ड 

| चरँमा मनसो जातः ३३ 
चत्वारि अज्ा: ३५ 


चन्द्राप्त 
बित्र देवानाम 

ब्मया श्रत्र बसवो 
जातवेदसे सुववाम सोमम्‌ 
जुझ्ों दमूना 

ततो विराड्जायत 

ते यज्ञ बहिंधि 
तस्माक्ष्ञात्सवहुत सेद्वत 
तस्मायज्ञात्मवेहुत ऋच: 
तस्मादा अजायन्त 
तह्मा अरंगमामवो 
तत्त्वायामि 

अम्बक यजामह 
तबनक्षुदवहितम्‌ 
तरणिबिश्वदशेतो 
तत्सूर्यस्य देवत्वम्‌ 
तन्मित्रस्य वद्णस्य 
तदविष्णो: परम पदम्‌ 
तव अमास आशुषा 


बेस सोमा$सिधारयु 


तदस्य प्रियमभिपायों 
ताममिवर्णा तप्ना ज्वलन्तीम्‌ 
त्यानु ज्षत्रियां प्रथ 

ताम्रआवह 

नीणि पदा विचक्रमे 

त्रिदवः ध्रृथिवी 

निपादुर्ध्व 

तीब्णेनामे चज्ञु षा 

देवस्त्वा सविता पुनातु 
दधिक्राव्ण: 


देवस्थत्वा सवितुः 


धाम ते विश्व भुवनम्‌ 
धाम्नो धाम्नो राजन 
प्रवा योः ध्रुवा पृथिवी 
भव ते राजा बर्णों 
ध्रुव धवेण हृविषा 
नाभ्या आसीदन्तरिक्त 
मृचत्ा रक्षः परिपाहि 
निघुसीद गणपते गणेघु 
परं सृत्यो नु परेहि 
प्रत्यक्ष देवानां विश: 
पबित्र ते वितत ब्रद्मश॒ध्पते 
प्रतद्‌विष्णुः स्ल्कैंसे 


पृष्ठोंक३ 





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१५ 
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मन्त्र: 
प्रो मात्रया तन्‍्वा 
प्रतिस्प्ृशों विंछल 
पुरुष एवेदं सर्वे 
रणादबि 
पूणमसि पूण मे 
ब्रह्मजबड्ान वरमे पुरस्तात्‌ 
ब्राह्मणोस्य मुख 
भद्रा अशथा हरितः 
मिन्धि विशा अपदिषः 
मरुतो यस्य हि क्षय 
मयि वापो 
मधुवाता ऋतायते 
मही दो: 
मनसः काममाकृ तिम्‌ 
भाई प्रजा: परासिचम्‌ 
मानस्तोके तनयथे 
भोघुण: परापरा निऋतिः 
यत्पुरुषेश हविषा 
यत्पुरुष व्यद्धघु: 
यज्ञेंन यज्ञमयजन्त 
यमाय सोम सुनुत 
यदकन्द प्रथम जायमान' 
बदापो अध्न्या 


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फजक33>>जी-ऊऊ-+ च्न्‍व 


भन्त्र 


यरत्वा हृदा कीरिणा 
यस्मे त्वे सुकृतो जातवेद: 
यतो विष्णुविचकमे 
यत्पाकत्रा मनया 

यद्दों देवा 

य; झुचिः प्रयतो भूत्वा 
यत इन्द्र भयामह 
यत्रेदानी पश्यसि 
यज्षरिपुसंनममाना 

याः फलिनी या अफला , 
युवा सुवासा 

येक्यो माता मधुमत्‌ 
यो व शिवतमों रस: 
रत्तोह णंवा जिनमा 

वायो शर्ते हरीणाम्‌ 
विश्वानि वो दुर्गहा 
विष्णोनुकं 

विद्यामेषि रजस्श्हा 
विष्शोः कर्माणि पश्यत 
विचक्रमे पृथ्चिवी 
विश्वमित्सवनम्‌ 

हँस झुविषद्‌ वसुरन्‍्तरिक्षसद्‌ 


३०१ 


६४६९३ 


३० 

श्र 
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२७ 

१०२ 
२९२७ 
२५८ 
३ ् 
५५६ 
३२६ 


इति मन्त्रसूची समाप्ता । 











हिरण्याहपा उबसो विरोके 
हिरण्यग्थः समबर्ततामे 


हिरण्यवर्गाम 
स्वत्त्ययनं ताक्ष्यम्‌ 
सहद्नशीर्षा 
सप्ताययासन्‌ 

सहि रत्नानि 
सबितुष्दवा प्रधव 
सनोबोधिशभ्रुधि 
संवत्सरोडसि 
सकतुमिव तितउना 
स्प्तत्वा हरितो वहान्त 
स्वादुः पवस्व 
स्योनाप्भिवि 
संबनसापयसा 
सूर्यों देबीमू 
झुक्रमसि 

शन्नो देबी 


| शममि अभिमिः करत 


शुचीबोपह ब्या 


शुकेषु में हरिमाणम्‌ 
श्वियेजातः 





३२४ 


अथ॑ क्‍ 


क 


. भाषादीकासमेतः । _ 


4 « “4०- अल 
श्रीगणेशायनम३ ॥ श्रीमुरुभ्योनम; ॥ 

#कारविपम्रेशगुरून्सरस्वती गौरीशसूर्यो च हरिं च मेरवम्‌ । प्रंणम्यं देवान्कुरुते हि भन्थ 
देवज्ञशर्मा जगतो हिताय ॥ १॥ बविष्ण्वचेनं दानशिवाचंन च उत्सर्गधर्मत्रतनिर्णयश्व ॥ वेदात 
पुराणात्स्मृतितश्च॒ तद्द्रतोक्तसिद्धान्तविधिं विधत्ते ॥ २॥ संगह्य सर्वेस्य मं पुराणं सिद्धान 
न्तवाक्य सुनितिः प्रणितम॥ लोकोपकाराय कृतो निबन्धो ब्रतप्रकाशः सुधियां मुदे स्थात ॥३॥ 
यावन्तों ब्राह्मणा लोके धरमशाख्रविशारदाः ॥ तावन्तः कृपया युक्तांः कु्वेन्त अन्थशोधनम्‌ 
॥ ४ ॥ विज्ञाप्यन्ते मया सर्वे पण्डिता गुणमण्डिताः ॥ प्रचारणीयो अ्न्थो5यं बालवद्रालकस्य 
में ॥ ५ ॥ रामाडुसुनिभूसंख्यें ( १७९३) वस्विष्वड्भेरइंसखूयके ( १९५८ ) ॥ वर्ष शाके श॒कपक्षे 
पश्चम्यां तपसः शुभे ४3 । ६॥ विलोक्य विविधान्‌ ग्न्थॉल्िख्यतेज्ञजनाथ वे ॥ तन्निमित्तोय- 
मारम्भः किमज्ञातं मनीषिणः ॥ ७॥ चित्तपावनजातीयः शाण्डिल्यकुलमण्डनः ॥ गोपालात्म- 
जदवज्तः सड़मेश्वरसंज्ञितः ॥ ८ ॥ दुगोघट्टे बसन काइयां नत्वा पितपितामहान्‌ ॥ कु वें 





विश्वनाथोईई ब्तराज॑ सविस्तरम्‌ ॥ ९ ॥ 





भाषाटीका ॥ 


फल चिप ८49 
नमो भगवते नारायणाय ॥ ह 
तव्कृपालेशतो मंन्दाः धिदुषां यान्ति पृज्यताम्‌ । 

ते देव देवदेवेश राधाकान्ते द्याकरम ॥ 

सद्गुरून खिलाँश्वेव नत्वा(ह माधवीं मुदा । 

इृदानीं ववराजस्य हैन्‍्दवीं वृत्तिमारभे ॥ 

जिसकी क्ृपाके छेशस मन्‍्द जन भी विद्वानोंके पूज्य 
बनजाते हू उस दयाके खजाने राधाके प्यारे देवदेवेश देव 
और सब सद्गुरुओंको नमस्कार करके में माधवाचाये 
आनंद्स इस समय ब्रतराजकी भाषाटीकाका प्रारंभ 
करता हूं ॥ द 

ओंकार वाधरूयें इंश्बर तथा प्रज्ञानधन  परत्रह्म परमा- 
व्माको और विन्नोंके अधिषति गणपतिजी महाराज एवम्‌ 
सब गुरुदेव श्री सरस्वती जी, गौरीजी, भगवान्‌ सूय्येनारा- 
यण, श्रीविष्णु भगवान्‌ , भैरव और अशेष देवताओोंको 
नमस्कार करके मे काशी श्षेत्रका रहनेवाढा संगमेश्वर 
उपनामवाछा श्री गोपाछजीका बारूक ज्योतिषी विश्वनाथ 
शर्म्मा, संसारके कल्याणके लिये यह अन्थ बनाता हू ॥१॥ 
बेदोंमें पुराणोंमे और स्मृतियोंमें जो, श्री विष्णु नमगूवानके 
पूजनका दानका और शिवजीकी पूजाका विधान हैँ तथा 
उत्सग घरमका निणय हें एवम्‌ ब्रतमें कहे हुए सिद्धान्तोंकी 
जो विधियाँ हैं वे सब इस हमारे ग्रन्थमें यथावत्‌ रहेंगीं 
॥ २ ॥ यही नहीं किन्तु मेने इस ग्रन्थमें सबके -प्राचीन 
प्रतोंका संग्रह किया है. तथा ऋषि मुनियोंके बनाये हुए 


सिद्धान्त वाक्योंका भी उल्लेख किया है, भेरा इसके बना- 
नेमें निजी कोई भी स्वार्थ नहीं हें केबल छोकके कल्याणकी 
कामनासे प्रेरित होकर ही इस लिखने बेठा हूँ मेरी आन्त- 
रिक इच्छा यह हैं कि यह मेरा अ्न्थ विद्वानोंके आनन्दके - 
डिय हो ॥१॥ इस संसारमें जितने भी धम शास्रक जानने: 
वाले विद्वान ब्राह्मण हैं वे सबकेसब मुझपर दया करके भेरें 
इस छोटेस प्रन्थका संशोधन करनेकी कृपा करेंगे ॥-॥ में 
गुण मण्डित सकल पंडित गणोंस जिनीत प्राथना करवा हूं 
कि, जिस तरह मांबाप बाढककी अस्पष्ट तोतछी बोलीका 
प्रचार आनन्द्से करते हैं रसी वरह आप अपने इस बाल- 
कके ग्रन्थकों भी प्रचछित करेंगे । ५ ॥ संबत्‌ सतन्नह सो 
तिरानवैके तथा शक सोलह सौ अठानवेके माघ सुदी पंच- 
मीके दिन ॥६॥ अनेकों ग्रन्थोंको देखकर -भज्ञ छोगोके 
लिय मैंने छिखना प्रारम्भ किया है। ऐसेही लोगोंकों 
आप हे ७ ष्हे 
समझानेके कारण ही मैंने यह आरंभ किया हूं. क्योंकि, 
विद्वान तो सब कुछ जानतेही हैं।॥७॥ मेरा जन्म चित्तपावन 
जातिमें हुआ हैं मेरा वंश शांडिस्य कुमें खास खान रखता 
है, मुझे छोग संगमेश्वर कहा करते हैं मेरे पिता श्रीका नाम 
गोपालजी है में ज्योतिषी हूं ॥॥ ८ ॥ बनारसमें मेरा रहना 
४ अर च्े प्री 

दुर्गा घाट पर होता है वही में प्रिता तथा बाबा भादिको 
प्रणाम करके खासे विस्त्रके साथ त्रतराज नामक ग्रन्थको 

छिखता हैँ ॥९॥ <-:< ... 


पाई /दानय: 2५७ पापा: एफ: अग्पपधिनकआाा3 2पप।प२२/४०४४४३ पक वन उ प्पथम नवाब गे पम्प पप कप; फससमि नर पसक उप मपपा के २३८८८ 





. >धर्म शाख्रतो प्राणिमात्रके लिये उपादेय हे,अश्जनोंके लियेशपने 
'संप्रहको कंदना ,विद्वानोंके लिये नहीं यह प्रम्थकारक़ी विनज्जंता मात्र है, 


(२) ब्रतराजं: | ः 

प्रतलक्षणम्‌ ॥ अन्र केचित्स्वकतंव्यविषयों नियतः संकलपों ब्रतमिति ॥ तन्न,-अश्निहोत्रसंध्या- 
वन्दनादिविषये सड्ुल्फेतिप्रसक्ते! । अतोषभियुक्तप्रसिद्धिविषयों यः संकल्पविशेषः स एव 
ब्रतम्‌॥ न च ब्रर्त संकल्पयेदित्यनन्वय इति वाच्यम्‌ । पाक पचाति दाने दद्यादितिवत्मत्यया- 
नुम्हाथ प्रयोगोपपत्तेरिति नव्या३ ॥ 


..[_ ता्मॉस्वे- 


के बाते 
८4/24/6770, 0 2: 
स्काउट काट [टन बबक 


. श्रथ ब्रतकाऊ) ।. 


तत्रादों निषिद्धकालमाह हैमाद्रौ गारग्य:-अस्तगे च गसे शुक्रे बाले वृद्ध मलिम्लुचे ॥ 
उद्यापनसुपारम्भं ब्रतानां नेव कारयेत्‌ ।। तत्रेव वृद्धमठबहस्पती-अग्म्याधानं घर तिष्ठां च यक्ष- 
दानव्तानि च ॥ माडल्यममिषेक च मलमासे विव्र्जयेत्‌ ॥ बाले वा यदि वा वृद्धे श॒क्रे चास्त॑ 
गते गुरो ॥ मलमासे च एतानि वर्जयेदेवदर्शनम ॥ लक्छः-नीचस्थे वक्रसंस्थेषप्पतिचर णगते 
बालवृद्धास्‍्तगे वा संन्यासो देवयात्रात्तनियमाबोधेः कर्णवेधस्तु दीक्षा । मौजीबन्धोइथ चूडा- 


पारिगयनावीधेवास्त॒देवपतिष्ठा वर्ज्या साद्भेः मयत्नात्रिदशपतिगुरों सिंहराशिस्थिते च ॥इति |. 
न॑।चस्थो मकरस्व:॥ कल्पतलरों देवी पुराणे-लिंहसंस्थं गुरु श॒ुक्र॑ सर्वारम्मेष॒ बजयेत ॥ प्रारब्ध॑ 
न॒ च सिद्धयेत महामयकरं भवेत्‌ ॥ पुत्रमित्रकंलत्राणि हम्याच्छीप्रं न संशयः ॥ देवाराम- 
तडागषु व्रतोद्यानशददेषु च ॥ सिंहस्थं मकरस्थं च गुरु यत्नेन वर्जयेत्‌ ॥ वसिष्ठः-सिंहस्थे 


_ अब व्रत शब्द 6 अथेका निणय करते हैं कि, ब्रत शाब्दका 
असली अथ क्या है | कोई २ ब्रतके रहस्यक्ो न जानने 
बारें अपने करनेके कामको करनेके दृढ़ संकल्पको ही त्रत 
कहते हैं सो उनका यह कहना ठीक नहीं है, क्‍योंकि, फिर 
तो आपका, ब्तका लक्षण सन्ध्यावन्दन अग्निहोत्र आदियें 
भी चला जायगां पंर इनका त्रत शब्द्से ध्यवहार नहीं देखा 
जाता: किन्तु नित्य नियम शब्दस इनका व्यवहार छोकमे 
देखा जाता है। इस कारण यह मानना होगां कि जिसका 
योग्य पुरुष त्रवशब्दस व्यवहार करते चढे आरहे हैं उसीका 
च्ाम ब्रत है। यह त्रत भी एक ग्रकारंका संकल्पही है फिर 
ब्तका संकल्प करे यह करना नहीं बन सकेगा क्योंकि 
संकल्प आर ब्रत दोनों एक ठहरे, पर यह कहना भी ठीक 
नहीं हैं क्योंकि पके पकायेको पाक कहते हैं तो भी संसा- 
रमें ऐसा व्यवहार देखा जाता है कि पॉकको पकाओ तथा 
दियेको दान कहते हैं फिर भी छोकमें यह कहते हुएं छोग 
इृष्टि गोचर होते हैं कि दानको देदों इंसी तरह ब्रतका 


४२०९2 यह व्यवहार होजायगा ऐसा नये आचास्य 
हतेहें। | | । 


:. अब जतके समयका निर्वंचन करते हैं, ब्रतकाल- निषिद्ध 
को बंता देनेसे बतके समयका अपने आप निर्णय हो 
जाता हे इस रण सबसे पढिलि ब्रतके निषिद्ध कालकोही 
कहते हैं । हेसाद्रिमें गांग्येन कहा है कि-जब बृहस्पति और 
झुक 2 + पा३ अस्त हो गये हों, उदित भी- हों कमल इनका 
वो कोई वे इृद्काल हों, एस समयमें तथा 


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। ४५ लि | न] “कल, ! 

की । रे ८ न की । 


स्पतिका वाक्य है क्वि-श्रौत स्मार्त अप्रियोंकी स्थापना, 
प्रतिष्ठा, यज्ञ, दान, त्रतव और संगढकी कामनासे अभिषेक 
या मंगछका काम ओर अभिषक मल्सासमें न होना. 
चाहिये। यदि शुक्र और बृहस्पति अस्त होगये हों तथा 
उद्ति भी हो तो किसी तरह बाल्बृद्ध संभाले जा रहे हों 
अथवा मलमास हो तो न तो किसी अपूर्व देंवका दशन 
करना चाहिये एवम्‌ न पहिले निषेध किये हुए कामही करने 
चाहिये। छल्छका कहना है कि,बृहस्पतिजी महाराज मकर 
राशिपर विराज रहे हों अथवा रेढे बैठे हों अस्त हो अथवा 
बाल वृद्धोंमें गिने जा रहें हों अथवा नियत राशिको हांध- 
कर दूसरी अनियत राशिपर चले गये हों उस समय 
सन्यास तथा देवयात्रा न होनी चाहिये ब्रत और निय- 
सकी. कोई विधि तथा कणच्छेद दीक्षा जनेऊ भुडन उद्धाह 
वास्तु प्रतिष्ठा और मूर्तिप्रतिष्ठा न होनी चाहिये । सज्ज- 
नॉको कभी भी ऐसे समय ये काम न करने चाहिये यदि 
इहस्पतिजी सिंह राशिपर बेंठे हों तो भी ये काम न होने 
चाहिये | कल्पतरु देवीपुराण प्रन्थसे कहा है कि बृहस्पति 
ओर शुक्र सिंह राशिपर हों तो कोई भी त्रतादि शुभ कमे 
न करना चाहिये क्योंकि ऐस समयमें प्रारंभ किया हुआ 
कोई भी नांगलिक कम सिद्ध नहीं होता प्रत्युत महामयंकर 
होताहे | वो शीघ्रही पुत्र मित्र और परिवारको नष्टकर 
डालता है इसमें कोई संदेह नहीं हैं। यदि देवमंदिर बगीची 
बावडी धत बाग और घर बनवाना हो-तो सिंह. राशि 
ओर मकर राशिपर बैठे हुए बृहस्पतिकों प्रयत्नंके साथ 
परित्याग कर दे | वक्षिएजीका कथन हे किं-सिंह राशिको 


परिभाषा ] भाषाटीकासमेतः । (हे) 





तु मघासंस्थ गुरु यत्नेन वर्जेयेव॥ अन्यत्र सिंहमागे तु सिहस्थोषि न दुष्पति ॥ सिहंस्थ- 
गरोबेजेनीयत्व॑ भमंदोत्तरमाग एवं, अन्यत्र तु सिंहांशा एवं वज्यें) ॥ तथा च मदनरत्नादि: 
धतकालविधानें--सिंहस्थितः सुरणरू्यंदि नर्मंदायाः त॑ वर्जयेत्लकलकमंसु सोॉम्यभागे॥ 
विन्ध्यस्य दक्षिणदिशि प्रवदन्ति चार्याः सिंहांशकें मुगपतावपषि वर्जनीय३ ॥ सिंहांशस्तु पूर्ण 
फरगुन्या! प्रयमः पाद। ॥ मुगपतो मकरस्थे ॥ मकरस्थे गुरो देशविशेषमाह लक्क:--नमदापूर्वभागे 
तु शोणस्योत्तरदक्षिणे ॥ गण्डक्याः पश्चिम भागे मकरस्थो न दोषभाक ॥ केषांचित्खीकते- 
-काणामन्येषां च ब्रतानामगस्त्योदयेप्यारम्भ॑ निबेधति हेमाद्रों लोगाक्षिः-उद्यानिका शिव- 
चवित्रकमेघपूजादूबाष्टमीफलाविरूठकजागराणि ॥ स्त्रीणां ब्रतानि निश्चिलान्यपि वार्षिकाणि 
कुर्यादगस्त्य उदिते न शुभानि लिप्छुः ॥ इति। डद्यानिका-प्रतविशेष॒॥ शिवपविन्र कम आषाढयामथवा 
भाद्रयां विहिते शिवपवित्रारापणस ॥ मेघपुना व्रतविशिष३ ॥ इवाष्टमी भाद्रशुक्काष्टनी | फलविरूढक माद्रपद- 
शुह्नचतुदेश्यां पाली पालीवरत कदलीव्रतापरनामकस॥ जागरस आदिनपोर्णपास्थां को जा गखतम॥कार्तिक शुक्र - 
'चतुर्देइयां विहित॑ जागरवते वा ॥ अन्नोमयत्रागस्त्योदयस्थावश्य मावित्वेन विधेरनवकाशल्वाप्त्तेपिकल रो ज्ञेग३॥ 
वार्षिकाणीत्यत्र र्षातु मवानि वार्षिकाणीत्येव व्युचत्तिन तु वर्ष मवानीति ॥ तथा सतिं शरेदांदिग्रीष्पप्य त- 
मगस्त्योदय नुजत्तेस्तन्मध्यें विहवितानां खीत्रतानां सवेधानारंभ एवापद्ेतेति॥अगस्त्पोदयकाबथ। दिवोदासीय- 
उदेति याम्याँ हरिसंक्रमाद्रवेरेकाधिके विंशतिमे ह्यगस्त्यः ॥ स सप्तमेषप्तं वृषसंक्रमाच्च म्याति 
गर्गादिभिरित्यनाणि ॥ ब्रतार॑ंमसमाप्त्योस्तिथिं विशिनष्टि हेमाद्रों सत्यत्रतः-उदयस्था तिथि- 
याँ हि न भमवेदिनमध्यमाक्‌ ॥ सा खण्डा न ब्तानां स्थादारम्भश्ष समापनम्‌॥ एतद्रग्॒ति- 


रिक्तायामसण्डायां प्रारंभभाह ॥ तत्रेव वृद्धवल्िष्ठ:-खखण्डव्यापिमातेण्डा यद्यखण्डा मे. 





भोगकर यदि बृददरपतिजी मघाराशिपर आये हों दो उन्हें 


 सावधानीके साथ छोड़ना चाहिये। यदि मधघाकों भोगकर 


सिंह राशिपर आये हों तो फिर कोई दोष नहीं हैं. । नमे- 
दाकेउत्तर भागमें ही सिंह राशिपर स्थित बृहस्पतिका त्याग 
किया जाता है और नजगहोंमें तो सिंहांशकाही निषध हें । 


- यही मदन रत्नादिके ध्ृत कालविधानमें छिखा हुआ हैं 


रा 


कि- श्रेष्ठ पुरुष ऐसा कहते हैं कि सिंहांशक म्रगपतिपर बेठे 
हुए बृहंस्पतिका त्याग विन्ध्याचलहकी दक्षिण दिशामें होना 
चाहिये। तथा सिंहस्थित सुरगुरुका त्याग नमेदाके उत्तर 
भागमं होता है । पूवाफाल्गुनीके प्रथम पादको सिंहांश 
कहते हैं।मगपतिका अथ सिंद्राशिपर और मकरस्थेका अथ 


मकर राशिपर यह होता है | छल्लाचायंजी मकर राशिपर 


बैठे हुए बृहस्पतिमें देश विशेष कहते हैँ-कि नमेदानदी के 
पूरवम तथा शोणनदीके उत्तर दक्षिणमें, और गंडकीके 


' पश्चिम मकर राशिपर बैठा हुआ भी बृहस्पति दूषित नहीं 
.. है। हेमाद्रिम छोगाप्चिने अगस्त्यके उदयमें बहुतसे उन 


: ब्रतोंके आरंभका निषध कियाहे जिन्हें प्रायः स्त्रियां किया 


करती हैं-कि जो कोई अपना कल्याण चाहे उसे चाहिये 


कि ख्रियोंके ब्रत उद्यानिका शिव पवित्रक मेघपूजा दूवां- 


- मी फल विरूढक और जागरण त्रत तथा वर्षा ऋतुके 
ब्रतोंको कभी न करे | उद्यानिका एक ब्र॒तका नाम है। शिव 


 परविन्नक एक व्रतका नाम है वह आषाढ वा भादोंकी पूर्णि- 


है! मेघपूजा एक ब्रतका नाम हे। दूवाष्टमी सादोंकी शुक्का ' 
प्टमीको कहते हैं । फलविहढक, भादोंकी शुक्ला चतुदशीके 
दिन होता हे जिसे पालीत्रत तथा कदली ब्रत कद्दते हैं -। 
आश्रविनकी पोणमासीके कोजागर ब्रतको जागर कहते है । 


अथवा कातिककी शुक्छा चतुरंशीको जागर ब्रत होताहे।यहां 


दोनों जगह अगस्त्यका उदय अवध्यंभावी है तब विधिके 
लिय कोई अवकाश ही न रहेगी इसकारण .- दोनों - जगह 
विकल्प किया हैं । “ वार्षिकाणि ” का वर्षामें होनेबाले 
ब्रतोंको न करे यह अथ है, यह अथ नहीं है कि वर्ष भरके 
ब्रतोंकोही न करे । यदि ऐसा न मानोंगे तो शरद्स छेकर 
ग्रीष्म तकके समयमें अगस्त्यका सम्बन्ध होनेस इस कांछमें 
कहें गये खी ब्रतोंका सवंथा तिबैध होजायगा । -दिवो- 
दासीयग्रन्थरम अगसत्यजीक उद्यका काछ- गरगग आदिके 
वचनोंको उद्धत करके कहा हैं कि, अगस्त्यजीका उदय 
दक्षिण दिशामें होता है जब कि सिंहकी संक्रांतिके इकीस 
अश बीत जाति हैं तथा वृषकी संक्रांतिके सात अश « ब्यतीत 
होनेपर अस्त होते हैं | हमाद्विमं सत्यत्नतने त्रतके आरंभ 
करने और समाप्ति करनेकी तिथिको बलाया हे कि-सूख्ये 
नारायणके उदयके समयमें तो जी तिथि हो पर मंध्याहके 
समयमें वह न रहे उस खण्डा तिथि कहते हैं इस खण्डा 
तिथिमें न तो ब्रतका प्रारंभ करना चाहिये तथा न क़तकी 
समाप्रि ही करनी चाहिये। तहां हीं वृद्ध वसिष्ठने खण्डासे 


: आाके दिन होता है ज़िसमें शिवजीपर'पवित्री चढ़ाई जाती। भिन्न जो भखण्झ तिथि है उसमें: ब्॒तके मारंभ करनेको 


32“ नननिललिकिल 





त्रतराज; । 


ततिथिः ॥ व्रतआरम्भणं तस्यामनस्तगुरुशुऋय॒क ॥ इति ॥ अनस्तामित 
णीयमित्यर्थ:॥ रत्नमालायामू-सोमसौम्यगुरुशु ऋचा सर: 


[ सामान्य 





गुरुगुक्रायां तिथौ ब्तमार 
सर्वेकमंसु भवन्ति सिद्धिदा॥ भा 


भोमशनिवासरेषु च॑ प्रोक्तमेव खहु कर्म सिद्धचाति ॥ विरुद्धसंत्ता इह ये च योगा: तेषामनि 


खलुपाद आद्यः॥ स वेध्तिस्तु व्यतिपातनामा सर्वोप्यनिष्टः 
नवपश्चशूले ॥ गण्डेषतिगण्डे च 


योगे अथमे सबजे व्याघातसंक्षे 


परिघस्य चाउ/धंम॥ तिम्नः 
पडेव नाह्यः शुभेष कार 


विवर्जेनीयाः ॥ दर्ज संकान्तिपातौ परिघमखदलं बेध्वातिं पातयोगं विष्कम्भायत्रिनाडी: शुर 


कृतिषु च षड्गण्डयोः पश्चज्चले ॥ गा! 
जन्मोत्थप्रासोड़तियिस (ल) ह तिथि 


व्याघाते वज्नरकेडडगः 


पितमृतिदिवसोनाधिमासान्कुहोरां जद्य 


व्युह्मां दब मां च॥ बह्ायामले- दिनभद्रा यदा रा: 


राजिभद्रा यदा दिवा ॥ न त्याज्या शुभकायेंषु प्राहुरेव॑ पुरातनाः ॥ इति ॥ 


पुण्यानि 


कक हैकि जिस गधाइकाक पवार जद, यह [77 _77_____- हैँ कि जिस मध्याहकालमें भगवान्‌ सूये देव आका- 


शको पूण् व्याप्त करते हैं उस समय जो तिथि खण्डित न 


तथा शुक्र ओर गुरु दोनों हों तब ब्रतका आरंभ करना 
चाहिये। यानी जिससे शुक्र और वृहस्पतिजी अस्त न हों 
उससे ब्लका प्रारम्भ करना चाहिये यह इस कथनका 
 वात्पय हुआ। रत्नमालामें कहा है कि-सोमवार बुधवार 
. इहेस्‍्पति और शुक्रतारकों कोई भी शुभ कम करो उसकी 
वैश्य सिद्धि होगी क्योंकि ये सिद्धि देनवाले हैं पर 
रविवार मंगछ और श निवारमें प्रारम्भ किया हुआ वो ही 
कम सिद्ध हो सकता है जो इनमें कहा गया है 
हो | सकते, जो री द्‌ मं (१ ४ 
नहा प्रथम पाद ही अनिष्ट कारी है पर वेश्रति और 
: व्यतीपात ये दोनों पूरे अनिष्टकारी हैं किन्तु परिघ योगका 
आधा भागहीं वजेनीय है । विष्कंभ और वज्॒ योगकी तीन 
पडियाँ एवम व्याघात योगकी नो घड़ियाँ तथा शूछयोगकी 
पांच घड़ियां और गेड अतिगे इयोगकी छः घड़ियां शुभ 
हमर सदा छोड़ देनी चाहियें। अमावस 
बे अथमचरण, वेधृति, 


॥ 


पातयोग तथा विष्केभकी 


बेब काना घडढियो गंड अतिगंडकी ३ घड़ियां शूढछुकी 
पांच, गे एक, और वजञ्ञकी ९ घड़ियें शुभका«सें 


बे र देनी चाहिये 'उवम्‌ पिताके, मरनेक। दिल, उनमास, 
ह रें नक्षत्र, जन्म मास, जन्म नक्षत्र 
" दिरागमन अमन और बे जन्मतिथिको झुभकामका, प्रारंभ या 
| मात ने ' अक्षयामलमें कहाहे कि दिनकी 





अथ देशमाह व्यासः-सर्वे शिलोब्याः पुण्य: 
विशेषान्रेमिषं तथा ॥ देवीपुराणे-देशो नदी गया शेलो 
कुरुक्षेत्र प्रयागं जम्बुकेश्वरम ॥ केदार॑ वाम पाद च कुडवं पुष् 
गया चामरकण्टकम्‌॥ कालअरं तथा विन्ध्यं तत्र वासों गृहस्य च ॥ 
मजः-सरस्वतीदषद्त्योदेवनद्योयदन्तरम ॥ त॑ बहानिर्मितं देश बल्मावर्त 
देशे य आचारः पारंपर्यकमागतः ॥ वर्णानां सानतरालानां स 
 याश्व पश्चालाः शरसेनिकाः ॥ एप बहार्पिदेशों वे बह्मा 
पंचाताः कान्यकुब्जा। । झुरसेनिझा३-मथुरादेशाः ॥ अनन्तरः सम; 


! सक्रांति, पात .. 


विवाह | हैं 


सागराः सरितस्तथा ॥ अ्ररण्यानि 
गड्जानमेद पृष्करम्‌ ॥ वाराणस 
कराद्यम्‌ ॥ सोमेश्वरं महापु० 
गुहः-स्ामि का तिकयः 
ते प्रचक्षते ॥ यह््मि 
सदाचार उच्यते॥ कुरुक्षेत्र * 
वत्तोदनन्तरः ॥ परत्याः-विरादा; 
॥ हिमवद्विन्ध्ययो म॑ध्ये यत्पराग्‌ 


भद्रा रातमें हो और रातिकी भद्रा दिनमें हो तो उ/ 
भद्गाका परित्याग न करना चाहिये ऐसा पुराने आचायोक 
मत है । ' 


अथ देश निर्णयः-ब्यासने कहा है कि, सब पव॑त पत्रिः 
3 ५ सब समुद्र और नदियाँ पुण्यवन ब्रतादि करनके दे 
हे नमिषारण्य तो विशेष करके है। देवी 


नदीका किनारा, गया, शेल,गंगा, नरमंदा, पुष्कर, बनारस, 
अर क्षेत्र, प्रयाग, जंबुकश्वर, केदार, वा 


ग मपाद, कुडव,पुष्कर, 
भहापुण्य, सोमेश्वर, अमरकटक, काछंजर, विंध्याचछ जह| 


« | कि गुह भगवान्‌ विराजते हैं। गुह स्वामिकातिकको कहते 


* ये सब पुण्य देश हैं। मनु महाराजने पुण्य दशकों 
बताया है कि सरस्व ती ओर हृषइती दोनों देव नदियोंके 


बी चमें जो अद्श हैं उच्च त्ह्मास निर्माण किये गये देशको 


सहित चारों वर्णोंकी परंपर के कमसे आया हुआ आचार 
* उस सदाचार कहते हैं। कुरुक्षेत्र विराट, पंजाब, मथुरा, 
यह त्रह्मषि देश है यह भी अद्यावर्षके बराबरका हैं । अब 
लि. ६५ उस्वतिके कुछ पदोंका आप्रही अर्थ करते हर 
कि भरत्य विराटको कहते हैं+पंचांग पं 7- न दर््यचांग कान्यकुब्जका नाम है 


ज॑ अर्थ किया है उसके हम सहमत नहीं 
पेजाब प्रान्तकाही पांचाल नामसे व्यवहार 
नहीं करते । पांचालका सीधा अर्थ यह रै 
कि जो पांच नदियोंसे भूषित हो ऐसा पंजाबही है कन्नोज नहीँ दे, 


॥ भाषाटीकासमेतः । (५) 





विनशनादपि ॥ प्रत्यगेव प्रयागान्व मध्यदेश उदाहत/॥ विनशन कुरुक्षेत्रम।आसम॒द्रात्त वे पूर्वा- 
दासमुद्रातु पश्चिमात ॥ तयोरेवान्तरं गियोरायावर्त विहब्ंधाः॥ सिन्धुनदीपश्रिमतीरव्या- 
वृत््यधमाह--कष्णसारस्तु चरति म्रगों यत्र स्वभावतः ॥ स ज्षेयो यज्ञियों देशो म्लेच्छदेश- 
सततः परः ॥ एतान्द्िजातयों देशाब्‌ संश्रयेरन्‌ प्रयत्नतः ॥ याज्ञवल्क्यो5पि--यस्मिन्देशे मृगः 
कृष्णस्तस्मिन्‌ धर्मान्निवोधत ॥ इति ॥ 


ब्रताधिकारिण: । 


स्कान्दें--निजवर्णाश्रमाचारनिरतः शुद्धमानसः ॥ अल्ब्धः सत्यवादी च सबवूतहिते रतः ॥ 
ब्रतेष्वधिकृतो राजन्नन्यथा विफलश्रमः ॥ श्रद्धावान्पापभीरुश्ध मददम्भविवर्जितः ॥ पूर्व निश्च- 
यमाश्रित्य यथावत्कमंकारकः ॥ अवेदानिन्दको धीमानधिकारी वब्रतादिष॥ निजवर्णाश्रमा- 
चारेत्यनेन चतुर्वणोॉनामधिकारों गम्यते ॥ अत एवं कौर्मे-बाह्मणाः क्षत्रिया बैद्याः शूद्राश्वेव 
द्विजोत्तम ॥ अर्च॑यान्ति महादेव॑ यकज्षदानसमाधिन्निः ॥ ब्रतोपवासनियमेहॉम ध्वाध्यायतर्पणेः ॥ 
तेषां वे रूद्रसायुज्यं सामीप्यं चातिदुलंभभम्‌॥ सलोकता च सारूप्यं जायते तत्मसांदतः ॥ 
देवलो5पि--ब्रतोपवासनियमेः शछारीरोत्तापनेस्तथा ॥ वर्णाः सर्वे विम॒च्यन्ते पातकेम्यों न 
संशयः ॥ _अज्राधिकारिविशेषणस्य पुंस्त्वस्याविवक्षितत्वात्खीणामप्यधिकारः ॥ भारते-मासु- 
पाश्ित्य कोन्तेय येषपि स्थुस पापयोनयः । ख्वियो वैद्यास्तथा शाद्वास्तेईपि यान्ति परांगतिम्‌ ॥ 
कचिन्म्लेच्छानामप्यधिकारो हेमाद्रों देवीपुराणे--स्नातेः अमुदितिहडैबाहिणेः क्षत्रियेरृमिः ॥ 
वेश्यः शद्रमंक्तियुक्तेम्लेंच्छेरन्येश्व मानवेः ॥ ख्ीमिश्व कुछशादंल तद्विधानमिद श्रण ॥ वेश्य- 
दस न कलर कप व टन अमन मिलन कम मन मम 


शूरसेन मथुराका नास है । अनन्तर बराबरकों कहते हैं । 
हिमालय ओर विन्ध्याचछके बीचका कुरुक्षेत्रस नीच नीचे- 
का तथा प्रयागस इधर २ का भाग मध्य देश कहलाता है। 
इस जछोकमें जो 'विनशन' शब्द आया हैं उसका कुरुक्षेत्र 
अथ होता है पूर्वी समुद्रस छेकर पश्चिमी समुद्रतकका 
तथा हिमालयसे लेकर विन्ध्याचछतकका देश आयावतं 
कहलाता है इसमें सिन्धुनदीका पश्चिमी किनारा भी 
आजाता है उसकी निवृत्तिके छिये यानी उसकी भी कहीं 


जो बुद्धिमान्‌ है उसका सब जअ्तादिकोंमें अधिकार है। . 
अन्थकार कहते हैं कि, उदाहत ऋोकमें जो यह कहा है 
कि, अपने ३ वण और आश्रप्तके आचारमें सदा छगे रहने- 
वाल, इससे प्रतीत होता हे कि ब्रवादिकों मैं चारोंही वर्णो ता 
अधिकार है। तब ही कूमे पुराणमें कहा गया है कि-हे 
द्विजोत्तम | जो ब्राह्मण, क्षेत्रिय, वैश्य और शूद्र, यज्ञ दान 
समाधि, ब्रत,उपत्रास, नियम,हो म, स्वाध्याय और लपंणस 


भगवान्‌ महादेवका अचन करते हैं उन्हें भगवान शिउ्रकी 
कृपासे अलद्यन्त दुलूम जो सायुज्य-सामीप्य सालोक्य और 
साहप्य आदि चारों मोक्ष हैँ वे मिलजाते हैं.। देवल नेमी _ 
कहा है कि,सभीवणके छोग ब्रत उपवास नियम ओर काय- 
क्शके व्पोंके करनेसे पापोंसे छूट जाते हैं. इसमें कोई भी 
सन्देह नहीं हैं । इन वचनोंमें अधिकारियोंक प्रति पुछ्िंगऊे 
शैब्दोंका प्रयोग किया है बह विवक्षिंत नहीं हे क्योंकिइससे 
पहिल कहे हुए पुरुषों केसे गुण यदि स्त्ियो्म हों तो वे भीव्रत 
करनेकी अधिकारिणी ह।भारतमं कहा हे कि हे कौन्तेय! जो 
पापयोनियोमें पेंदा हुए जीव भी हैं. तथा जो ख्री वेश्य (कोई 
'वेश्या:ऐसा प,ठ मानते हैं) और शूद्रहें वे सब मेरी उपासना 
करके परम्तगतिको पाजाते हैं। कहीं किसी २ में म्लेच्छों का 
अधिकारभी रेखा जाता है| हेमाद्विम देवीपु वचन 
है कि, है कुरुशादूछ ! जिसे ब्राह्मण क्षत्रिय बेश्य भक्ति- 
युक्त शूदर स्ली और म्लेच्छ तथा अन्य मनुष्य स््रान करके 
असन्नताके साथ कर सकते हैँ उस ब्रतका यह विधान है 


पुण्यदेशमें गिनती न होजाय इस कारण कहते हैं कि 
जिस देशमें काछा हिरण स्वभावसे विचरता हो वह यज्ञ 
करने छलायंक देश है, जहां क्ृप्णसार मृगः स्वभावसे नहीं 
विचरता हो वह म्लेच्छ देश है । मनुजी महाराज कहते हूं 
कि; ये जो हमने पुण्य देश बताये हैं इनका ट्विजातिगण 
न... २७ ७. हक 
पक साथ आश्रय ढें।याज्ञवल्क्यते भी कहा हेकि जिस 
देशमेकृष्णस्रर्रम्गग रहता हैँ उस देशक धर्माको मुझसे जानो। 






धथिकारि निणय-स्कन्द पुराणमें बताया है कि, हे 
राजन जो पुरुष अपने वणे ओर आश्रमके आचारमें छगा 
रहता हो, शुद्ध मनका हो, छोछुप न हो सत्य बोलनेवाला 
हो, सब प्राणियोंके कल्याणमें छगा रहता हो उसका ही 
ब्रतोंमें अधिकार है; नहीं तो व्यथेकाही परिश्रम है। जो 
पुरुष श्रद्धाल हे जिस पापोस डर छगंता है। जिसके मद 
और दंभ दोनों नहीं हैं, पहिछे निश्चय करके फिर उसीके 
अनुसार-करनेवाढा है, जो वेदकी निनदा नहीं करता तथा ' 























(30 


शद्रयोस्त द्विराब्राधिकोपवासो न भवति ॥ वेश्याः श॒द्वाश्व ये मोहाइपवासं परकुर्बते ॥ त्रिरा् 
पचचरात्र वा तेषाँ व्युष्टिन बिद्यते ॥ इति प्राच्यलिखितनिषधात्‌॥ व्युप्ट-फलम्‌॥ सभर्तकाण| 
खीणां भत्राद्याज्ञां विना माधिकारः। तथा च मदनरत्ने मार्कण्डेयपुराणे--या नारी हनतज्ञाता 
भरत्रां पित्रा खुतेन वा ॥ निष्पलं तु भवेत्तस्था यत्करोति व्रतादिकम ॥ भत्राक्षया स्वत्रतेष्बधि- 
कारः ॥ भायों भठेमंतेनेव व्रतांदीन्याचरेत्सदा ॥ इतिकात्यायनोक्तेः । यज्ु.--पत्यों जीवति 
या नारी ह्मपवासत्रतं चरेत ॥ आयुष्य॑ हरते भर्तु; सा नारी नरक॑ व्जेतव ॥ इाते विष्णुवचन 
'तद्धतुरनलत्तापरम्‌ ॥ यज्ञ काश्रित, नास्ति स््रीणां प्रथग्यज्ञो न ब्तं नाप्थुपोषणम ॥| भर्तः शुश्रृ- 
पर्यवेताछोकानिष्टान्‌ ब्रजात्ति ताः ॥ यहेवेश्यो यज्य पिच्रादिकेभ्यः कुयोद्धताभ्यचन सत्सक्रियां 
च॥ तस्य हाद्ध सा फल नान्यचित्ता नारी सुंक्ते भव॑शश्रपयेव ॥ इति स्कान्दात्‌ समभर्तका- 
णामेकादर्याद्रुपवासादावनधिकार इ/ति ॥तत्न॥ तस्यापि पृथकस्वात॑ंत्येण भत्रेनलुज्ञापरत्वात । 
अत एव व्यास/-काम भर्ठुरठज्ञाता ब्रतादिष्वधिकारिणी ॥ इति । शब्बभोषि-काम॑ भतुरत- 
ज्ञया ब्रतोपवासनियम! स्त्रीधर्माः ॥ इति | न चात॒ज्ञया व्रतेष्विव यक्ञेपि प्रथणथिकारापत्ति- 
रिति शड्बचम्‌। तस्याः श्रत्यध्यपनानाथिकारात ॥ यद्वा ।. स्कान्द्स्य भरठेंः श॒ुश्र॒ुषायाः स्ताव- 
कत्वेनाप्युपपन्नत्वादेति। न॒च भर्ठरठज्ञयेबाधिकारासिद्धाविधवाया ब्रतेइनथिकारापत्तिरिति क्‍ 
पाच्यम्‌। नारी खल्वनत॒ज्ञाता भर्जा पित्रा खुतेन वा॥ विफल तद्धभवेत्तस्पा यत्करोत्योध्व- 


बतराजः । [ सामास्य- 


































देहिकेमू॥ इते मार्क॑ण्डेयोक्तेः। पिन्नाद्याज्या तस्था अधिकार इति हेमाद्रिः॥ ख्तरीणां -----7_7->. ! पिनरादयाज्या तस्था आधिकार इति हेमात्रिः॥ ख्रीणां ब्रत- 


भाप झुनें। वेश्य और सुद्रोंके छिय दो राजे अधिक उप- | वचनोंसे ख्तरियोंको त्रत उपवास आदिका अधिकार नहीं' - 


वासको विधि नहीं है कि-जो वैश्य और शुद्ध मोहके | यह नहीं कह सकते. क्योंकि, ये स्वध्षत्र करनंकी मनाई _ 


वश होकर तीन रात व पांच रातका उपवास कर बैठते | करते हैं आज्ञा पाकर करनेकी मनाई नहीं करते, इसीडिये 
उन्हें उसका फल नहीं मिछता यह पहिलोंका छिखा हुआ | व्यासने लिखा हैं कि पतिकी आज्ञा लेकर इच्छानुसार ब्रत 


अनुरोध है। ऋोकमें जो व्युष्टि शब्द आया है उसका फल | करसकती है। शंखने भी छिखा है कि, पतिकी आशज्ञासे 
अथ है । सधवा स्वियोंकों विना पतिकी भाज्ञाके त्रतादि | स्त्रियां इच्छानुसार ब्रत उपरास और नियमोंको कर सकती 
करनंका अधिकार नहीं हे। ऐसा ही मदनरत्न ग्न्थन हैं । अब वहां यह शंका होती है जैसे त्रल आदि पतिकी . 
क डेंय पुराणसे उद्धृत करके छिखा है कि, जिस ख्रीको | आज्ञासे कर सकती हैं उसी तरह यज्ञ आदिकरनमें खत्रियों- 
पति पिता ओर पुत्रसे बल करनकी आज्ञा नहीं मिली हो | को कौन रोक सकता है ? उस पर उत्तर देते हैं फि, यज्ञ 
यदि वह ब्रतादि करेगी तो वे ब्रतादि उसको फल देनवाल | यजमान वेदप!ठी होना चाहिये और श्लियोंको बेदका 
नहीं होंगे।ख्ली, पतिकी आज्ञासे सभी ब्रवोंको कर सकतीहे | अधिकार नहीं है इस कारण पतिकी आज्ञा प्राप्त करनेपर 
क्योंकि कात्यायनने कहा है कि ख्रीको चाहिये कि हमेशा | भी यज्ञ आदि नहीं कर मकतीं। अथवा यों समझ लीजिये 
र्पाः आज्ञासे ही अतादिकॉकों करे, विना आज्ञाके न | कि पतिकी अनन्य भक्ताके लिये जो पत्तिके किये हुए शुभ 
करना चाहिये ॥ यह जो विप्णुका वचन हैं कि, जो स्री | कर्मॉंका भागीदार कहा है वह सेवा करनेत्रालियोंकी 
पतिके जीवित रहते हैए उपवास ब्रत करती है वो पतिंकी | प्रशंसा कीगयी है, यह मान लेनेपर भी ग्रन्थ छग सकता 
आयुका नाश करती है जिससे उसे नरक होता है इसका | है । यदि यह कहो कि पतिकी आज्ञासे ही स्री बतकरस- 
पत्पय बिना आज्ञासे करनेमें हे इसके सिवा और कुछ भी | क्‍ंती है तो जिनके पति नहीं हैं. वें विधवा स्त्रियें ब्त कर 


नहीं हट है कोई २ यह कहते हैं कि, स्कन्दपुराणमें छिखा | दी नहीं सकतीं, सो नहीं कह सकते. क्योंकि वे पिताकी 
इईआ है कि ख्ियोको  पतिप्त प्रथक्‌ यज्ञ त्रत और उपोषण तथापिताके अभावसें भाईकी आज्ञासे बरतादि कर सकती '* 
न करना चाहिये; उनको तो ५ तिकी सेवासे ही इष्ट छोक | _..' दैमाद्विने श्रीमार्कण्डेयजीके वचनसे कहा है किजो 
५. शाज्ञा तथा पुत्र और पिताके पूछे | 
(3५७ पी ावसे ही पके किये हुए देवपूजन | बच- से पक पी हे वे संब उसके निष्फल होते हैं इस! 


स्क कि 
. भिछ जाते हैं। पति अन्तःकर णक्ो लगा देगवाली सती | +..विंगा पतिक्की आज्ञा 





हे बचनसे पतिके अभावमें पिता आदिसे पूछकर कर सकती 
् असल | न पी द्विमिं 2 ७ ऊे ः का 
... ' हा फछ पाती है। इन . है। हेमाडिमें धरिबंशको लेकर, 





॥ 
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जी डनओता खिल. 


नटओा आलपक -१ चर पलसिलनकत दे बल्ब पलट सनक ५२२+ पान यड १ फल प्लस ताक.$ड 3: कस कल “पछ+ 





रि गँ के ले 0. 
र खियोके ब्त मुहणके बाड़े 
पा 

५ 


परिभाषा, | 


भाषाटीकंांसमेतत । द ः 


अहणे विशेषों हेमाद़ों हरिवेशें--स्रान॑ च कार्य शिरसस्ततः फलमवाप्लुयात ॥ स्लात्वा सल्ली 
प्रातरुत्थाय पति विज्ञापयेत्सती ॥ 





. थथ ब्रतधमा! । 


ब्रतसंकल्प विधिभोरते--गशहीत्वोहुम्बर॑पात्र वारिपृ्णेमददमुख/ ॥ उपवास तु ॒गद्दीयाद्यद्रा- 
संकल्पयेदबुधः | ओदुम्बरम्--ताम्रमयम्‌ । “ ओऔइुम्बरं स्मृतं ताम्रमू  इति विश्वोक्तेः । यद्वा 
अन्यन्नक्तत्रतादिकं कल्पयेदिति कल्पतरूशा श्रीरत्तसतु--कल्पतरूमते वाकारश्रार्थे। तेनाथमर्थ 
यत्तु नक्तादि कतुमिच्छेत्तदपि उक्तविजिनेव गहीयादिति तन्‍न्मतं परिष्कृत्य वाकारस्योपवास- 
पदस्य च्‌ वेयथ्यापत्तेयत्संकल्पयत्तद्‌गह्दीयादित्यनेनेवोपपत्तेरित्यदूबघत्‌ । ताम्रपात्राद्यमावे 
हस्तेनापि जल गहीत्वा संकल्पय दित्यक्तम्‌ ॥ मदनरत्ने तु यथा संकल्पयेदिति पाठः ॥ यथा 
कामफलमुल्लिखेद्त्यथंः ॥ अतण॒व॒ माकेण्डेय+-संकल्पं॑ च यथा कुर्यात्स्तानदानब्रतादिके ॥ 
. जनन्तरं झत्यमाह मदनरत्ने देवलः--अशुकत्वा प्रातराहारं स्नात्वा$चम्य समाहितः॥ सूर्याय 
देवताभ्यश्व निवेद्य ब्रतमाचरेत्‌ ॥ अन्न प्रातब्रेतमाचर दित्येबान्वयः । प्रधानक्रियान्वयस्याम्य- 
हिंतत्वात । अश्ञक्त्वेति त्वशक्तस्थाभ्य ठुत्तातक्ष्वादिभक्ष णापवाद३ ॥ केवित्त, ब्रतदिने आात- 
राहारमभ्ुक्‍त्वा ब्रतमाचरेदित्याहु। तन्न; उपवासो ब्रते कार्य इत्यनेनेबाश्धक्तततोइषधिकारस्य 
प्राप्तत्वादेतस्थ वेयथ्यापत्तेः ॥ अन्येतु, प्‌ृवदिने प्रातराहारम म्ुकत्वा अर्थादेकभक्त॑ कृत्वोत्तरदि 
लात्वाचम्य ब्रतादिक कुयोदित्याहु: ॥ परेतु, सबत्र पूर्वेद्यरेव साये संध्योत्तरं ब्रत म्राहमम 
किम कक जलकर "2 भटक वन लकी तक की खत अकबर कर डक कक दा 26 अर लि जल ली कल लि लब गज तन आ लटक मल 


लिखा है कि जब करेई व्रत करना चाहती होंतों उन ख्रियोंको 
चाहिय कि, शिर समेत स्लान करके पीछे पत्तिदेवकी आज्ञा 
प्राप्त करके ब्रत करें। तब वो उस ब्रतके फलछको पासकेंगी 
अन्यथा नहीं पासकतीं ॥ 


त्रतधमे-त्रतके सकट्पकी विधि महाभारतभ छिखी हे 
' कि; हाथ भरा भराया तांबेका पात्र छूकर उत्तर दिशाको 
ओर मुख कर संकल्पकरक उपवासको ग्रहण करना चा 
हिय । यदि रातका कोइ उम्रवास करना हो तो उसमे भी 
,इसी प्रकार संकरप करना चाहिय | अब ग्न्थकार इलोक 
की व्याख्या करते हैं कि, ओदुम्बर वांबेके पात्रकों कहते 
हैँ क्योंकि विश्वकोशर्मं ओदुम्बर तांबेके पात्रके परय्यायमें 
- आया है । कल्पतरु ग्रन्थमें ऊपरके इछोकका अर्थ करतेहुए 
लिखा हे कि दिनकी तरह रातक ब्रतादिकोंका भी संकटप 

करना चाहिय। श्रीद्ततने तो कर्पतरुकारके मतके इलोकर्मे 
आये हुए वाकारको “ च ? के अथसें माना हे चका और 
अथ होता है, यह करनसे इछोकका जो अथ होता हूँ कि 
दिनके ब्रतकी तरंह रावके ब्रवकोभी संकल्प पूवक ग्रहण 
करे वह पहिलेही कहा जा चुका है । इस तरह माने बिना 
इलोकम जाये हुए वा और उपवास य॑ दोनों पद ब्यथ हो 

जाते हैं क्योंकि; इनके विनाभी इनका तात्पय वाको विक*ः 
स्पार्थंक मानने पर निकल आता हे । यदि. तांबेका बर्तन 
उपस्थित म हो तो हाथमें ही पानी ढेकर संकटरप कर छना 
चाहिये। यद्दा 'संकेल्पयेतं'के स्थानलम मदनरत्नकारने यथा 
संकल्पयेत्‌ ऐसा पांठ लिखा हे -). यथाका तात्पर्य यह हे कि 


जैसी कामना हो उसको कहकर संकल्प करना चाहिये। 
इसी कारण माकंण्डेयपुराणमें कहा है कि जिन कामना- 
ओंको छेकर ब्रत करना चाहता हो उन्‍हें संकल्पमें कहकर 
ही स्नान दान और ब्रत आदि करने चाहिये । 


सकरपके बादके कृत्य-मद्नरत्लग्रन्थम देवढनें कहे हैं 
कि, बिना भौजन किये एवम्‌ स्नान आदिसे निषृत्त होकर 
एकामप्रवृत्ति करके भगवान्‌ सूय नारायण तथा अन्य देवता- 
ओके लिये नमस्कार कर प्रातःका्ू ब्रतका संकल्प करके 
ब्रतकी ग्रहण करना चाहिये | इस इलोकमें : प्रातब्रेतमाच 

रेत्‌ ' ऐसा अन्वय होता हे क्‍योंकि प्रधान क्रियाके साथ 
अन्वय होना अच्छा समझा गया हैँ, तब इसका अथ होता 
है कि प्रातःकालस ब्रतको करना चाहिये यह पह्चिछेही 
लिखचुके हूं ' अश्क्त्वा ” यह जो पद इलोकम हे इसका 
तात्पय यही होता है कि अशक्त पुरुष भरे ही कही हुई 
गड़ेली आदि चूंस ले पर प्रातः यह भी न होना चाहिये । 
कोई २ तो इसका ऐसा अथ करते हैं कि, प्रातःकालढ विना 
भोजन किय' हुए त्रत करना चाहिये उनका यह कहना 
ठीक नहीं है, क्योंकि शाख्रोंमें ऐसा कहाही ग्या है कि 
त्रतम उपवास करना चाहिये इससे विना भोजन किये 


हुएका ही ब्रत करनेका अधिकार प्रतीत होता है फिर विना 


भोजन,किय इस अथवबाले अभुकत्वा पदका इछोकमें छिख- , 
ना हो झूठा होता है । दूसरे कोई २ तो पहिले दिन प्रात 


- काछ भोजन न करके अर्थात्‌ एकभक्त यानी एक वार 
सायकालको ही भोजन कर दूसरे. दिल स्नानादि तथा 









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वारब्रतादों बहुशस्तथा दह्वत्वात लि. चान्वय इत्याहुः ॥ तामान्यथर्माः ॥ हेमाद्रो 
भविष्ये--क्षमा सत्यं दया दान॑ शोचमिद्धिददिग्रहः ॥ देवपूजाशिहवरन सन्तोषः स्तेयव्जेनम्‌ ॥ 
सर्वेत्रतेष्वयं धर्म: सामान्यों दशथा स्थितः॥ देवपजा-यहिवत्य॑ वर्त तस्य पूजा। अगभ्निहवन पृज्यदेवतेहे- 
बेन होम।॥/उपक्रमात्‌ । तञ्च सत्तमीत्रते स्यपूज। अग्निहवनम्‌। नषमीत्रते हुर्गापूजा। अतलुक्तदेवता- 
ब्रते इष्टदेवताएजा | हवन॑ व्याहतिहोम इति केचित॥अत्र क्षमादीनां स्वत्तन्त्रतया चतुर्वेगंसाधन- 
त्वेन विहितानां ब्रताड्तया विधानं ' खादिर वीयंकामस्थ यूप॑ कु्यात्‌ ' इतिवत्संयोगपृथक्त्वाह- 
पपन्नमिति हेमादिः । सवब्तेष्वित्यत्र सर्वव्रतपद मविष्यपुराणोक्तसवत्रतपरमतो व्ताम्तरे विध्य- 
न्तरसत्वे एव होमादीनाम ड्रत्वम्‌, नान्यथा | अतण्व एकादशीत्रतादों शिष्टानां होमाद्यनाचर ण- 
मित्ति केचित्‌ ॥ वस्त॒तस्तु येब्वेव पुराणान्तरोक्तत्रतेष होमादिविधिरस्ति, तद्विषयकमेव सर्व- 
पदम्‌, अन्यथा तद्तिरत्वेन संकोचापत्तरोति ॥ प्रथ्वीचन्द्रोदयेपभ्रिपुराणे--स्नात्वा ब्रतवता 
सर्वेब्तेयु ब्रतमूलेयः ॥ पूज्याः सुबर्णमय्याद्याः शक्तयेता भूमिशायिता॥जपो होमश्व सामान्‍य 
ब्रता:ते दानमेव च ॥ चतुविशद्वादश वा पश्च वा त्रय एवं वा॥विप्राः पूज्या यथाशक्ति तेभ्यों 
द्याञ्व दक्षिणाम्‌ ॥ व्रतमूतंयः तदेप्रतिमाः॥ देवछ/--अह्ाचर्यमहिंसा च सत्यमामिषबवर्जनम्‌ ॥ 

व्रतेष्वेतानि चत्वारि चरितव्यानि एनत्यशः ॥ स्त्रीणां तु॒प्रेक्षणात्स्पर्शात्ताभिः संकथनादपि॥ 

नश्यते बह्नचर्य च न दारेष्वृतुसंगमात्‌ ॥ स्वदारेष्डतुसड्रमादितिकाचित्पाठ: ॥ आपिपे-मांसम्‌। 

आमिष4 दृतिपानीयं गोवज क्षीरमामिषम्‌॥ मसूरमामिषं सस्‍्ये फले जंबीरम मिषम्‌ ॥ आमिए॑ 








आप छ हक रु रे छू 
आचमन करके ब्रतादिकोंको करना चाहिये; ऐसा कहते। वालेको खरके यूपकाही विधान * किया गया है। इलोकओं 
(3 ३ ( के कर है । 0 हु 
हैं। दूसरे कोई तो सब बतोंमें पहिले दिन सा्यकालकी | सर्वेत्रतेष' यह जो पद आया 


हैं जिसका सब त्रतोंमें, ऐसा 
न्ध्याके पीछे ये क्योंकि वारोंके | अथ कि है इसमें के करे 
सन्ध्याके पीछे अतका ग्रहण करना चाहिये क्योंकि वारोंके |... आयागया है इसमे ब्रत भविष्य पुराणके कहे हुए ही 


5 ७३ * छू ७ फ्र ७५ ७१७ ।$ ०१ न्‍ छक ५ 
ब्रतांदिकोम्लें एसा अनेक बार देखा गया है ऐसा कहते हैं । | हैं उन्हींमें होम आदिकी विधि हैं ब्रत मात्रम यह व्यवस्था 
इनके मतमे इस इलोकके प्रातः पदका अन्वय स्नात्वाके | 


साथ होगा जिसका यह अथ होगा कि प्रातःकाल सनान | पुराणके म्तकों छेकर छिखा हे कि-ब्रतके समयमें भूमिपर 


है ब्रताद्का अहण करना चाहिये। । 
योंके सामान्य घम-हेमाद्विमें भविष्यको लेकर कहा | 


हि २2 हे 
है कि-क्षमा, सत्य, दया, दानः शोच, इन्द्रियनिग्रह, देव- | _ _ ०. २ 
| | त्रतेंक अन्तम दान भी जे 

पूजा, अग्निहवन, सन्‍्तोष, अस्तेय-यह द्श तरहका सामान्य दीन भी दंना चाहिये। शक्तिके अनुसार 
धर्म सब त्रतोंम करना चाहिये । जिस देवताका त्रत हो _.. हे 

छे हक - । डर हि णा री स्य्टे ेः 
उसकी पूजा, ब्रतकी देवपूजा कहाती है । पूज्य देवताके | है दक्षणा देनी चाहिये। जिस देवका व्रत हो ब्रतकें 
उद्देशस अग्निम विधिके साथ किये हुए हवनको अग्निहवन | 


8 अर के के 
कहते ह। जिस बातको छुंकर इलोक ढिखा है यह बात | 


'उससेही प्रतीत हो जाती है । कोई २ ऐसा कहते हैं कि- 
' सप्तमौके ब्रतमें सूयेकी पूजा और सूयेक लिये हवन तथा 
नवसौके ब्रतमें ुर्गाकी पूजा और उसीके लिये हवन होना 


॥अक है 
पा अतका कोई देववाही न कहा गया हो | ख्रीके साथ समागम करनेसे बत नष्ट नहीं होता । इड्जोकर्मे 
हे न ईंट देवकी पूजा और व्याहृति ( भूमुबसस्वः ) | न दारेषु इसके स्थानमें स्वदारेषु ऐसा पाठ मानते हू 
४ ५७ 5 , - 5 | तब स्वदारम ऋतुगामी 
है पर यहां ये ब्रतके अंगके रूपमें | है, यह पश्चांतर भर्थ हे 


से हवन होना चाहिय। हेमाद्विने लिखा हैँ किए 

न बयम्‌ क्षमा 
आदि चतुवंगके साधन है दे 
ब्रिधान किय गये हैं इसक 


हू ! यही प्रयोजन हे कि इस हेत 
. भेत करनेसे ब्रतका अध्यु ह आर 





इय बढ जाता हे जस 'बीये चाहने 


माननेसे ठीक नहीं होगा । पृथ्वीचन्द्रोदय ग्रन्थमें अग्नि- 


रायन करनेबा ३ ब्रतीकों चाहिये कि सब ब्तोंमें स्नानके 
पीछे शक्तिके अनुसार सोने आदिकी बनाई हुईं ब्रतकी 
पूतिका पूजन करे फिर सामान्य जप होम करना चाहिये 


चौबीस या १९ या पांच या तीन आह्णोंको भोजन करों, 
लिये बनाई गईं उसकी भूतिको व्रतसूतति कहते हैं। देव: 


चर धर 
ढने लिखाह कि-जब कभी व्रत करे उस समय सदाही 
त्ह्मचर्य अहिंसा सत्य और निरामिष भोजन ये अवश्य ही 


् छा कक कक कक हक 
| कर ! ब्वियोंके देखनेसे छूनेसे तथा उनके साथ बातें चीरे 


करनेस बह्यचय्येका नाश होता है। ऋतुकालमें अपनी 


होनेपरभी अत नाश होजाता 


ख । सांस, मुसकका पानी और 


सस्योंमें मसूर आमिष तथा फोम जभीरी आम्रिष हूं 





रिमापा, | धाषाटीकासमेंत+ । े 


, अैक्तिकाचूण॑मारनाल तथामिषम्‌ ॥ इति स्मृत्यत्तरोक्त वा ॥ 









बताद्या 
तदाह शातातपः*-नानिष्ठा तु पितज्छाद्धे कर्म किंचित्समारनेत्‌ ॥ 
_रदीतजवानाचरणे ॥ मदनरत्ने छागलेयः-पू्व ब्रत॑-ग़हीत्वा यो नाचरेत्काममोहितः ॥ जीवन्भवति 
. चाण्डालो मृते च श्वाईमिजायते ॥ काममोहित इति विशेषणाद्याध्य:दिनाइनाचरणे न दोषः॥ 
तथा च हेमाद्रो स्कानदे-सवेभूतमय॑ व्याधिः प्रमादों गुरशासनम्‌ ॥ अव्तन्नानि पठ्य/्ते सकू- 
देतानि शाख॒तः ॥ सर्वेभ्यो भूतेभ्यः सकाशाद्रतकर्तुभयमिति हेंमाद्विः। मदनरत्ने तु सर्व- 
भूतभय्य व्याधिरित्यपरिचितत्वाद्यारूयातम्‌ सर्ववुतमयम्‌ -सर्वेभ्यों भूतेम्यः सकाशाद्वतक!ुमंयमिति 
सपोदिनयाद्भताडवैकल्पे न अताहानिमवर्तीत्यर्थः ॥ गुरुशासनम्‌ गुरोराज्ञा ॥ सकद॒क्त याउसकुत्यागे प्राय- 
श्रित्तम्‌ ॥ तदुक्त स्कानद्गारुडयोः-क्रोधात्ममादाल्वोभाद्वा त्रतमड़ो भवेद्यदि ॥ दिनत्रयं॑ न 
सुजीत मुण्डनं शिरसोउथबा ॥ न चात्र प्रायश्रित्तोक्तेरतिक्रान्तत्रतानाचरणमितिवाच्यम्‌ । प्राय 
श्रित्तमिदं कत्वा पुनरेव ब्रती भवेत्‌ ॥ इतिस्कान्दात ॥ ह 
द . भ्रथोपवासधमो: । ह 
तत्रोपवासस्वरूप कात्यायनवृद्धवासिष्ठाभ्यां दशितम्‌ ॥ उपावृत्तस्य पापेभ्यों यस्‍्तु वासों 
गुणेः सह॥ उपवासः स विक्तेयः सबभोगविवर्जितः ॥ ग्ुणेः-तज्ञाप्ययज नध्यानतत्कथा ओर 
वणादयः ॥ उपवासकृतामेते शुणा) शोक्ता मनीविभिः ॥ दया सर्वनूतेषु क्षातिरससया शौच- 





मनायासोःकापण्य च माड़ल्यमस्पृहेत्यादिनिर्विष्णुधर्मोत्तरागौतमादिप्रतिपादितेः ॥ तच्छ - 
लि: ोीससससिस नमन न न नमन नन मनन न न नमन न न मनन ऊन नम करन» 3७-3७» क+ भजन नम ननननननननननननन नमन नानक» «० «+++भ७०००५५५५७०५७.५५०.७.. ५ 


सीपीका चूरन भी इसी कोटिमें है तथा कांजिक भी आमि- 
पमें ही संभाला हैं, ये दूसरे २ स्मृतिकारोंके म्तोंखि आमिष 
गिनाये हैं । ब्रतादिकोंके आरंभ नांदीमुखश्राद्ध अवश्य 
करना चाहिये। यही शातातपने कहा हैँ कि-सांदीमुख 
श्राप पिनन पितरोंका पूजन किये किसी भी कमेका प्रारंभ 
ने करना चाहिये। | 


सकल्पित ब्रतको न करनेका प्रायश्रित्त-मद्नरत्नप्रैथमें 
छागलेयके मतको लेकर लिखा है कि, जो पुरुष पहले ब्रत 
महण करके काममोहित हो पीछे उसे न करे तो वो जीता 
हुआ ही चांडाल हैं तथा मरनेके बाद कुत्ता होता है।शहो कर्म 
जो ' कीममोहित ? लिखा हुआ है उसका यही तात्पथ्ये 
निकलता है कि, जो काम मोहित होकर न करे तो उसे 
प्रायश्वित्त है । यदि व्याधि आदि कारणोंस न कर सके तो 
उसके लिंये कोई दोष नहीं हे। ऐसा ही हेमाद्विंम स्कानदको 
प्रमाण है कि,किसी भी जीव आदिका भय,रोग, भूछ और 
गुरुकी वाज्ञा यदि ये एकवार उपस्थित भी होजाय तो 
इनसे त्रतका नाश नहीं होता। खोकमें जो 'सवभूतभयम्‌' 
यह पद आया हें, हेमाद्विने इसका अथे किया है कि चाहें 
किसी भी प्राणीसे भय हो; पर »८ मदनरत्नने इसका अर्थ 
यह किया है कि किसी भी अपरिचित जीवके भयसे ब्रतक- 
लाके भी व होनेपर यदि ब्रतमें चटि हो तो दोष नहीं है। पर 

> मदत्तरत्नने तो इसका अर्थ इस प्रकार कर दिया है कि मानों 
वो इससे परिचित ही न हों यह आशय भी इस ( अ्रपरिचितत्वाद 
व्याल्यातम्‌ ) को विभक्त करनेसे निकलता हे पढ़िले अविभक्त दशाका 


हे 


थे किया हे । 


परिचित सर्प आदिक भयसे कम छोप हो तो अवव्यमेव 
त्रतकी हानि होती है। सपे आदिके भयसे ब्रतका वैऋल्य 
होनेप रभी कोई दोष नहीं है । यह मन्यक वा फा उक्त रका 
आशय । गुरुशासनका अथे गुरुकी आज्ञा होता है। 
एक्वार इस अथवाला सक्षत्‌ शब्द कछोकमें रखा है इससे 
यही सिद्ध होता है कि (08 | / इन ब,तों ते ब्रत कम छोप 
करनमें आ्रयश्विव होता है। आदी स्कन्द औ८ गरुड़ पुएाणमें 
कहागया है कि क्रोच प्रमाद और छोनके कारण यदि जब्त 
भंग दोजाय तो तीन दिन भोजन न कराना चाहिये । यदि 
यद्द न हो सके तो शिरका मुंडन ही करडेनां चादिय: इससे 
यद्द बात नहींदे कि,जो ब्रत बिगड़ गया हो फिर वो किया 
ही न जाय;क्योंफि स्कन्द्पु एणमें ही लिखाहे कि,प्रायश्वित 
करके फिर त्रती होजाय अथात्‌ं जो त्रत बिगड़ गया हैं 
इक करके फ़िर उसे पूस करना चाहिये | 


.>अथ उपवास धम-बुद्ध कात्यायन और वसिष्ठजीन उप- 
वासका स्वरूप बताया हें कि, पापोसि निवृत्त हुए पुरुषका 
जो गुणोंके साथ वास है वह उपवास कहलाता है, उससे 
कोई भी भोग नहीं होता | इष्टद्व अथवा ब्तके देंवताके 
जपनेके मैत्र, यजंन, ध्यान और कथा सुनने आदिको गुण 
कहते ह, ये विद्वानॉने उपवास करनवालॉके गुण बताये 
हैं, सब प्राणियॉपर दया, सहन; अनिंदुन; पविन्नता, अप- 
रिश्रम, कृपणताका न छाना। संगछके काम करना और 
अनुचित इच्छाका त्यांग करना ये भी उपवास करनेवालोंके 
गुण हैं, इन्हें विष्णुधमात्तरपुराणमें, गौतमने प्रतिपादन 


- कि, के। तत्कथाश्रवणादय: में जो धत्‌ शब्द है उसके 


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ब्देनोराह्या देवता बतदेवत। व ॥ एवच पापनिद्ृत्या गरगाठुद्ठानसहितों मिराहारस्य वासो- 
प्रस्थानमुपवास इत्युकू॑भवति इदू च फलसाधनस्योपवासध्य स्वरूपमुक्ततू ॥ उपवास- 
पदार्थसतु स्म्रतिपुराणव्यवहरे झूठया निराहारावस्थानमात्रम॥ वृद्धवसिष्ठ:-उपवासे तथा 
आदे न कुपोहन्तवथावनम्‌ ॥ काछ्ठेनाति शोषः ॥ अतणव तात्रिन्दाति ॥ दब्तानां काष्टठसंयोगो 
हंम्ति सतकुलानि च ॥ इतिवाक्यशेयाद्विधोरिव नियंेधस्यापि विशेषपरता युक्तेव । लेन. 
अलामे वा निषेध वा काछ्ठानां दन्तवावने ॥ पणादिना विशुद्धयेत जिह्ोल्लेखः सदेव हि ॥ इति 
पंठीनसिवचनांत्‌॥ अछामे दन्तकाष्ठानां निषिद्धायां तथा तिथों ॥ अपां द्वादश गण्डूषेबिंद* 
ध्याइस्तवथावनमू ॥ इति व्यासवचनाञ्व पर्णादिना द्वादशगण्ड्पेव! दुष्तधावनं कार्यमेव ॥ 
देवलः-अधक्नज्जलवानाश सकृत्तांबूलचबेणात्‌ ॥ उपवासः प्रणर्येत दिवास्वापाश्च मेथुनात॥ 
अशक्तो तु तेबेव जलपानमम्यवुज्ञातमू--अत्यये चाम्बुपानेन नोपवासः प्रणश्यति ॥ अत्यये 
जडुपन विना-आाणात्ययें ॥ विष्युधने असकृजलपानं च दिवास्वापं च मेथुनम्‌ ॥ तांवलचर्वणं 
प्रांस वजयेद्धतवासरे ॥ असकृदित्युक्त्या सकृज्जलपानेनादोबः ॥ अत्र-पारणान्तं ब्र॒त जय 
बतानते विम्रभोजनम्‌ ॥ असमाप्ते बते पूर्व कुयात्रेव ब्रतान्तरम्‌ ॥ इति तश्यापि व्रतवासर- 
त्वान्मांसनिषेष/ः पॉरणारिनें एवं न तृपवासदिने | 'उपवासे प्रसक्तयभावाव | अतएव निणे- 
यांमृते व्यासः--व्जयत्पारणे मांस ब्रताहेपप्योषध सदा ॥ इति ॥ अश्छी ताम्यवतन्नानि आपो 
मूलें फुले पयः ॥ हजिआहांगकाम्या च गुरोब॑चनमोषधम्‌॥ इति स्कानदवचनात्मसक्तमोंबध- 








दो अर्थ होते हैं। पहिछा अथ वो यह है कि,जिप देवतारा | नका निषेध कर दिया हो । देवरूस्सूतिभ कहा है कि एक- 
ब्रत हो उसकी पूजा करनी चाहिय,जिस ब्रतका कोई देवता | वारकों छोड़कर ज्यादा पानी पीनेस तथा एकवारके भी 
न कहा गया हो उसमें अपने इष्टदेवका ही पूजन करलेना | पान खा छेनेसे; दिनके सोने और मैथुनंस उपवास नष्ट 
चाहिये, यह तत्‌ शब्दका दूसरा अथे होता है । इस प्रकार | दोजाता है। पाती पिये विदा न रहा जाय तो एकवुर 
उपवासशब्दका अथ होता हैं: कि, तिराहारका जो पाप-- | पानी पी छेना चाहिये, यह इसी वचनसे प्रतीत हो जाता है 
निश्वत्ति पूवेक गुणोंके साथ रहना है वह उपबास कहाता है | कष्टं|्े समय पानी पीनेसे उपवास नष्ट नहीं होता; 
'यह संकाम उपवासका रंक्षण-कहा गया है। स्वृति और | वो कष्टमी साधारण न हो किन्तु मरणान्तसा ग्रतीत- 
पुराणॉमें उपवास कम रूढि अथ निराहर रहना मात्रहें। | हो यह ( अत्यये ) का ग्रन्थकारका आशय हे | विष्णु- 
वृद्धवसिध्ते छिखा हे कि, उपवास ओर श्राद्धमें दृत्त-- | धर्मम लिखा हे कि, वारंवार पानी पीता, दिनमें सोना; 
पावन'न क्रना चाहिय | यह काठसे दन्त घावन करनका मेथुन करना,पानका चबाना ओर मांसका खाना ब्तके दिन 
हो निषेध है, अन्यसे करनेका नहीं ।यदी कारण हे कि | कभी न होना चाहिये | वार वार पानी पीनेका निषेध 
काठकी दातूनकी निन्‍्दा की हू कि, श्राद्ध तथा उपवासमें | किया गया है ' इस झारण एक बार पानी पीनेका कोई 
काठकी दांतुन करनेस सात कुछ नरकम पड जाते हैं, इस | दोष नहीं हैं। जब तक त्रतकी पारणा न हो उस दिन तक 
वाक्यविशेषस विधिकों तरह निषधकी भी विशेष व्यवस्था | ब्रतका दिन समझा जाता है । ब्रतकी समाप्ति ब्राह्मण- .. 
हो.जाती है कि काठकी दैंतूनकाही निषेध हैं, इसी लिय | भोजन अवश्य होना चाहिये । जबलक पहिला त्रत पूरा न 
पंठीचसीन लिखा है कि,जब क़ाठकी दांतुन न मिले अथवा | होढ़े तबतक दूसरे ब्तका प्रारंभ न करना चाहिये। पार- 
जब दातुन कर नेका निषध हो उस समय अन्य उपायोंसे | णाका दिन भी ब्रतका ही दिन है, इस कारण मांस आदि 
भुस्त पा लेनी चाहिये और पण आदिपे जोभ ३३५ ः निषिद्ध घस्तुओंका सेवन पारणाके दिन भी न ह होना 
दोहे हर हो जैक. दा कस 5 चाहिये। उपवासमें तो भोजनकी प्राप्ति ही नहीं हे । 
दिल दातुन न मिलता हो अथवा जिन तिधियोंमें काठकी । कर ्ज 2 है 2207 जल जे पक लिसजी हि 
छू कसतेका निषेध हो उनमें पानीके १ रहुडोस मुखझुद्धि | है कि अब और + या दे के हो मे. "ला निजीका. वचन 
इन छेनी चहिये|इन वचनोंसे यह सिद्ध रोज है कि पर्ण | रि । ग ७३-३० ९४३के ३: के कल 
आईदेस,जीभ दथा कुछ्ोंसि दांदोंडो उससम कप ० पैंगें। जिनकी ग्रांस सेज्ञा की गयो है ऐसी ओबधियोंको कभी 
जाहिये/ जब रि दृष्तुरू न मिड डर पा शृद्ध रखना | भोजनके काय्येसे न व्यज्ा चाहिये | जछ, फल, पश्च, 
200 »202७७४७ ४६ अथवा दाधुन कर- | अआह्वण कास्या, हंवि; मुरुक बचत और औपषध थे जांहों 















परिसाषा, | 


हज 






०२८ र्कमननानन»्न»५++-+--+-भम-+ कतजत+ "0 गानीशकीरश० ९७७ ०००० 






 भाषाटीकांसमेतः । __ (११) 





2 
चाय 


रूपमपि मांस प्रताहे वर्जयेद्त्यिथं: ॥ किष्णुरहस्ये-स्म॒त्यालोकनगन्धादिस्वादन परिकीर्त- 
नम्‌ ॥ अन्नस्य वर्जयेत्सव आसानां चामिकांक्ष णम्‌ ॥ गात्राग्यड्र शिरोभ्यड्रं ताम्बूल॑ चालुलेप- 
नम्‌ ॥ ब्रतस्थों वर्जयेत्सव यच्चान्यदलरागक़त॥इति ॥- हारीतः--« पतित्तपाखण्डादिनास्तिका- 
दिसंभाषणानृताछ्लीलादिकसुपवासादिष वर्जेयेत्र” इति अज्ञादिषदेर यत्पुरुषार्थनया सर्वदा 
निषिद्ध तदपि ऋत्वर्थतया संगह्मते । अत एवं ब्रताषिकारे सुमन्तुः--विहितस्यानलधश्ठानमििद्रि- 
याणामनिगप्रहः | निषिद्धसेवन नित्य वर्जेनीय॑ प्रयत्नतः ॥ पतितादेदर्शन तु विष्णुपुराणे--तस्या- 
वलोकनात्सूर्य पश्येत मतिमान्नरः ॥ सर्शादो ॥ विष्णुधर्मे--संस्पर्शों च नरः स्नात्वा शुचिरा- 
दित्यदशनात्‌ ॥ संभाष्य ताव्छुचिपदं चिन्तयेदयुत॑ बुध ॥ योगियाक्षवदवय:--यदि वाग्यम- 
' छोपः स्थाद्रतदानक्रियादिषु ॥ व्याहरेद्वेष्णवं मंत्र स्मरेदा विष्णुमव्ययम्‌ ॥ यमः--मानसे 
नियमे लुपे स्मरेद्विष्णुमनामयम्‌ ॥ इति ॥ बृहन्नारदीये-रजस्वलां च चाण्डालं महापातकिन॑ 
तथा | सूतिकां पतितं चेव उच्छिष्ट रजकादिकम्‌ ॥ व्रतादिमध्ये श्णयाद्यद्येषां ध्वनिमुत्तम३ ॥ 
अष्टोत्तरसहर्स्न तु जपेदे वेदमातरम्‌ ॥ वेदमाता-गायत्री ॥ मिताक्षरायाँ दक्ष--संध्याहीनोउशु- 
चिनित्यमनहेंः सर्वकर्मसु ॥ यदम्यत्कुरुते किंचित्र तस्थ फलमश्लुते ॥ अब प्रातःश्संध्यें- 
वाड्रमित्याहुः केचित्‌ ॥ अविशेषात्तत्सन्ध्योत्तरमाविनि कमांदों साड्रमिति युक्तमित्याहुः 
भाज्ञा।॥ पातःकालीनब्रतादिसंकल्पस्त प्रात ःसन्ध्यां कृत्वेव कार्य: ॥ प्रातःसन्ध्यां बुध: 








अंक 22कम्मन का भमकतउ-अकजए2०० कप 2. 


कृत्वा संकल्प॑ तत आचरेत ॥ इति गौइनिबंधधतस्मृते$ 


. बअतको नष्ट नहीं करते;इस स्कन्दाके वचनसे जो ओऔषधीके | 
रूपमें मांससज्ञक अरेषधोंका सेवन प्राप्त हुआथा उसकाभी | 
निराकरण उक्त नि्णयाम्ृतक वचनसे हो जाता है।विप्णुरह- | 
स्थमे लिखा है कि,अन्नका स्मरण, दृशन, गन्धोंका आस्वा* | 
दन,वर्णन और भासोंकी चाह इन सबका त्याग ब्रतक दिन | 
होना चाहियेतथा ब्रतीपुरुषको चाहिये कि शरीरका उब- | 
टना,शिरका तेल छगाना,पानका चबाना,सुगन्धित द्वव्योंका | 
छगाना,बढ ओर राग उत्पन्न करनेवाली वस्तुओंका सेवन | 


न करेहारीत कहते हैं कि,पतित,पाखण्डी और नास्तिकोंसे 


बोलना,झूठी बातें बनाना एवम्‌ गंदी बातें करना येघ्तब काम | 
ब्रतादिकॉम न करने चाहिये।भनज्ञका वात्पय केवछ भोजन | 


वस्तुस ही नहीं है किन्तु जो भोगजात निषेध किये हैं वे 


भी अन्नके कहनेस आजाते हैं कि निषिद्ध वस्तुओंके भी | 


स्सरण आदि न करने चाहिय। अथवा ब्रतमें अन्नादिक 


द्शन स्पशेन आदिका जो त्रतीपुरुषके लिय निषेध किया 
है वो निषिद्ध भी हवन आदिम करना चादिये अथात्‌ हव- 
नादिके विषयमें व्रती पुरुषको अन्नादि स्पशादिका निषेध | 


नहीं है । तब ही त्रताधिकारमें छुमनन्‍्तुन कहा है कि. कहे 
. हुएका- अनुष्ठान न करवा, इन्द्रियोंको न रोकना, निषिद्ध 
चीजोंका सवन करना इन क!मोंको प्रयत्नके सप्थ छोड 
देना चाहिये ॥ पतित आदिकोंके दशनमें तो-विष्णुपुराणमें 


कहा है कि; बुद्धिमान्‌ पुरुषको चाहिये कि, पत्रिताडि- | 


कॉको देखकर भगवान्‌ सूर्य नारायणके दशन करल।स्पशो- 


दिकक वारेमें-विष्णुपुराणमं कहा है कि यदि ब्रती कोई 


प्रतित भांदिस छू जाय तो स्तान करनके बादु सूये 





॥ माकेण्डेयपुराणे--सू्योदर्य बिना 


भगवानका दुशन करके शुद्ध हो जाता है।यदि उनसे बातें 
चीतें की हों तो दश हजार वार शुचिपद्‌ ( विष्णु भगवा 
नूका ) चिन्तन करके गुद्ध होजाता है। योगी याज्ञवहक्यनें 
कहा हे कि यदि ब्रत दान और क्रिया आदिकोंमें वाणोके 
यम (मौन) का छोप होजाय तो वेष्णव संत्रका अप अथवा 
विष्णु मगवानका ध्यान करना चाहिय | यमस्मृतिमें लिखा 
है कि, मानस नियमके छप्त हो जानेपर आधि व्याधि* 
रहित जो विष्णु भगवान्‌ हैं उनका स्मरण करना चाहिये । 
बुहन्नारदीयमें छिखा है कि, त्रतकरनेवाछा उत्तम पुरुष जो 
ब्रतादिकोंन रजस्वछ७ चांडाल,महापातकी- सूतिका,पतिव+ 
झूठ सुंदवा् एंदम्‌ धोबी आदिकी बात॑ सुने तो ब्रो 
१००८ हजार गायत्री जप करकही शुक्ध हो सकता है | 
मिताक्षरामें दुक्षन कहा हे कि, जो सब्ध्या नहीं करता वो 
सदाही अपवितन्न है; वॉ किसी भी बेदक कमंको नहीं 
घ ( धर 
कर सकता, यदि किसी १दिक कामको करता भी हे तो 
उसे उसका फछ नहीं घिछता | इस जिषयर्भ कोई २ ऐसा 
भी कहते हैं हि प्रातःकाल्की सन्ध्याक बारेमें ये बातें हे 
कि प्रातःकाल्की सन्ध्याही सब कार्याँका अंग है पर बुद्धि- 
मान्‌ शिष्ट छोगोंका यह कहना है किं,दोनों ही मुख्यहैं! प्रातः 
काछ होनेवाले कर्ममें ग्रातःकाछकी सन्ध्या तथा साँयका- 
छकी संध्याके पीछे होनेवाले कर्मांमें सायकालकी सैध्या 
अग हे वह पहिलछ होनी चाहिये । प्रात कालमें होनेवाले 
ब्रतसकलप तो प्रातः संध्या करके ही करने चाहिये, क्‍योंकि 
गौडनिर्वधप्रन्थमें छिखा हुआ है कि विद्वानको प्रातः 
कालकी संध्या करकृह्दी त्रतका संकल्प करना चाहिये! 


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कक्रमः ॥ इति ॥ क्रम/-उपकपः क्रिया ढे 
सयोदयशब्देन उषःकालो लक्ष्यते | “ त॑ बिना रात्ौ स्लानादिव् 





देय कल्प- 
उन्दोगपरिशिष्टे--सदोपवीतिना भाध्यं सदा बद्धाशिखेन च॑ ॥ विशिखो व्युपवीती 


ति न तंत्कृतम्‌॥ पियमत्याइड्रबणे आत्मालंभे अवेक्षणे ॥ अधोवायुसम॒त्सगें 


कं न कायम्‌ १) छतलि 





प्रहारेषतृतभाषणे ॥ मार्जारमूषकस्पर्श आक्रोशे ऋषधसंभवे ॥ निमित्तेष्वेष सर्वत्र. कर्म कुब- 


त्रपफ स्पृशेत्‌ ॥ माकण्डेयपुराणे--शिरःस्नातश्र कुर्वीत देव॑ पिच्यमथापि वा ॥ वराहप्राणे- 
ल्लानसन्ध्यातपंणादि जपो होमः सुराचनम्‌ ॥ उपवासवता कार्य सायसत्ध्याहुतीविना॥ 


भगवद्गीतायाम--तस्मादोमित्युदाहत्य यक्ञदानतपःक्रियाः ॥ पवर्तन्ते विधानोक्ताः सतत बहा- 


वादिनाम्‌ ॥ आपस्तम्बश--त्रिमात्रस्तु अयोक्तव्य: कमोरम्सेष सर्वेशः ॥. जिमान्र--प्रणवः (इति 


सामान्यपरिभाषा ॥ ) विस्त॒ता चेयं सामान्यपरिभाषा ५०० आचारमयूखे द्रष्टव्या ॥ अत्र ख्रीां विशेष॥ 


हेमाद्रो पाह्मे-गरमिणीसृतिकादिश्व कुमारी चाथ रोगिणी॥ यदाउशुद्धा तदाउन्येब कारयेत्पयता 
स्वयम्‌ ॥ प्र्ता-शुद्दा, स्वयंकु्यांठित्यरथं: ॥ पुंसोण्येष विधिर्लेंड्रस्पा विवक्षितत्वादोति दैमाद़िः ॥ 
एवं स्रीमी रजो दरंनेपि कार्यम ॥ तयाच सत्यत्रतः-प्रारब्धदीघंतपसां नारीणां चेद्रजों 
भवेत्‌ ॥ न च तत्र ब्रतस्य स्यादपसोधः कर्थंचन ॥ व्रतस्थ-उपवासस्येत्पर्थः ॥ पूजादिक त्वन्येत 
कारयेव। तथा च मदनरत्रे मात्स्ये-अन्तरा त॑ रजः्स्पर्श पूजामन्येन कारयेव ॥ सूतकेप्ये- 
वम्‌॥ तथा च तत्रेब-पूर्व संकलिपत॑ यज्च ब्रत॑ सुनियतब्रतेः ॥ मनन नरेः शुद्ध दानाच्चन- 


केण्डेयपुराणमें डिखा है कि, सूर्याद्यके बिना बत और | कभो यज्ञ दान और तपकी क्रिया करतेहं तब ओमू कहकर: 
दान आदिका क्रम नहीं है।क्रम उपक्रमको कहते हैं,जिसका ही अवृत्त होते हैं.। आपर्तम्बने कहा है कि, सभी कामोंके 
प्रारंभ भर्थ होता हे। कोई “ ब्रतदानाद क्रम: इसके | आरंभ त्रिमात्रका अयोग करना चाहिये । सभी _ त्िमात्र 
स्थानपर ००,३४६ ८ ४३३ ऐसा पाठ रखता हे 5 | अणव ओंकारको कहते हैं, इसे सब कोई जानता ६ । यह 
सतमें-प्रत दान भादिक जिम ऐसा अथ होगा कि ये। सामान्य परिभाषा बहुत बड़ी है, यदि विस्तार देखनः दो 
सूर्योदय विना ४ चाहिये । महिला | तो आचार मयूख नामके अन्थमे देखनको मिलेगा ॥ 
ढ़ हि भन्थमें लिखा है कि, उषः- मिटा हं-हेमाद्ियें 
डा कह... 4“कयोकि/कल्पतरुअन्थर्मे लिख हिये। श्वियोंको ब्त करनेमें विशेष सुविधाएँ-हेमा पद्म- 
झालक विना रातमें स्नान आदि न करने चा । छन्‍्दोग है के 
शिष्टमें भ। ऑराणसे हि कि, . जब गर्शिणी, पृतिकादिका 
परिशिष्टम लिखा हुआहै कि, उपवीतस सदा रहना चाहिये। 3 
तथा चोटी कभी भी खुली न रहनी चाहिये। जो मनुष्य | री ओर रोगिणी शुद्ध हों तो उस समय उन्हें 
कल दे पक अर ._ | मत दूसरेसे कराना चाहिये। यदि शुद्ध हो तो 
चोटीमें बिना गांठ दिये अथवा विना चोटीके तथा बिना हे ६ 
अते गीती न होकर जो अपना ज्रत अपने आपही करना चाहिये। क्योंकि अंथरार 
अनेऊ पहिरे एवम्‌ उपबीती न होकर शुभ काम करता | कर अप हक 
किये हएवे रोके वेदिक मंत्रोमे |  “यता ” का शुद्ध अर्थ करते है। हेमाद्रि कहते हैं कि, 
न किये हुएके वराबर है। पित फे वदिक मंत्रोंमें क्र ्‌ 
भे पीछे ने परों लेनेमें, | गम लिंगकी विवक्षा नहीं है इससे यह भी सिद्ध होता 
५ पेछि पाठादिक करनलेमें, अस्पृश्य अगोंको छू लनेमें, | « कै 
देखनेमें, अपनी सौगन्ध आदि खाने के | + “पवित्र और रोगादिकी अवस्थामें पुरुष भी अपना ब्रत 
देखनस, अपनी सोगन्ध आदि खाडनम, अधोवायुके दूसरेसे करा है। यदि गेगयी हो तो उस- 
आजतेपर, झूठ बोलने और प्रहार करने पर तथा बिल्ली | सण ह उकपा हे। यदि रजस्वढछा होगयी सर किक 
मूसेके छूने, किसीको गाली देने ने और बरी | भी ब्रतका त्याग न कर, पूजादि किसी दूसरेस करा 
चीज छू, कम करता हुआ पुरुष आचमन करके 3 2 हि हल जिनको लिखा ० कप आदि 
आर व अ ५ 8. ५ 5 | बड़ाबत कर रखा है यदि उस श्रतके बीच रजस्वढा भी 
जाता है | कस उराणस लिखा इआ हूं कि, देव और | होजौय तो भी उन्हें उच्च ब्रतको न छोड़ना चाहिये । यहाँ 
पिततर संबन्धी वैदिक कर्मोंको वाह घुरुष शिर सहित | ब्तका मतरढब उपवाससे है, अत स्वयम्‌ करती हुईं भी 
। -आक कफ धर ५ हे > फड , ध 
खान गले भारभ करे । आराहपुराणमे कहा हैँ कि उप- | जो नित्वांत पवित्रताके काय पूजा आदिक हैं उन्हें दूस* 
और ३ छ हद न संध्या तपंणादिक्ध जप होम | रेसे करा लेना चाहिये । ऐसेही मद्नरत्नमंथर्मे मत्स्यपु- 
हे पल ९ सायकाडकी सन्ध्या और आहुती | राणको लेकर लिखाहै हि, रजःस्पशेके समय पूजा तो 
हक *+० रच है यह बात नहीं होनी चाहिये ! | किसी दूसरेसे.ही करा लिया करें स्वयम्‌ न करुनी चाहिये 
..* ह। इसी कारण बद्वादी ज़न' ज़ब पूलकर्में भी यही व्यवस्थों है, पै 












वैसे ही बहां दिखा भी हुआ 


ख््ल 








विवर्जितम्‌ ॥ इंति ॥ अथ प्रतिनिषिः ॥ केन 





: भाषाणीकासमेत+ । 


॥ कारयेदित्यपेक्षायाम्‌, तत्रेव पेठीनसिः--भार्या पत्पेव्रेल॑ 






ऋचड-ट-िः-ससससस2स2-23933>-3030302:020040...0000.020..... ९४४४॥7/ १३१६ है लहर इआ॥: 22020 02/07/2247: 70:70 जम 2 मक्का 


६232 


कुयोद्वार्यायाश्र पतित्रेतम॥असामथ्येंपपरस्ताभ्यां ब्रतमड़ो न जायते ॥ अपरः-पुत्रादिः॥ तवैव 
बायुपुराणे--उपवासे त्वशक्तस्तु आहिताग्रिर्थापि वा॥ पुत्राद्या कारयेदन्याद्राह्मणाद्वापि कार- 
येव॥ उपवास प्रकुवांणः पुण्य शतशञ्॒ण लमेत्‌ ॥ नारी च पातिम्हिश्य एकादश्याझ्ुपोषिता ॥ 


' पुण्य शतग॒र्ण भोक्तामित्याह गालवों मुनिः॥ मातामहादीनारश्य 


ज्क दश्यामुपोषणे ॥। 





च भक्तितों विप्ा; समग्र फलमाप्लयुः ॥ एते च प्रतिनिधयो न काम्ये | तथा च मण्डन;-- 

के के रे छह | कु क हक । 0९५ 0. 
काम्ये प्रतिनिधिनास्ति नित्ये नेमित्तिक च सः॥ काम्येप्प्युपक्रमादूध्व कचित्मतिनियथि बिहुः ॥ 
न स्यात्मतिनिधिमत्रस्वामिदवाप्रिकर्मंस ॥ स देशकालयोः शब्दे 'नारणेः पुत्रभायथोः ॥ नापि 


निधातव्य निषिद्धं वस्तु कुच्नचित्‌ ॥ 


अथ बते हृविष्याणि । डे 
हैमाद छन्दोगपरिशिष्टे कात्यायनः-हविष्येदु यवा मुख्यास्तदल्ध ब्रीहयः स्मृताः ॥ माषको- 
द्रवगोरादीन सर्वाभावेषि व्जयेत ॥ तत्रवाभरिपुराणे-ब्रीहिषष्टिकमुद्वाश्व कछायाः सलिल॑ पयः ॥ 
श्यामाकाश्वेव नीवारा गोधूमादा व्रत हिताः॥ कृष्माण्डालाबुब्न्ताकपालकीज्योत्स्मिकास्त्य- 


जेत्‌ ॥ चतुर्मक्ष्य॑ सक्त॒कणाः शाक॑ दि घृत मधु ॥ श्यामाकाः शालिनीवारा 


यावक मूलत- 


नइलमू॥ ह॒विष्य॑ ब्रतनक्तादांवश्रिकायांदिके हितम्‌॥ मर्थु मांस विहातव्य॑ सर्वेश् ब्रतिम्रिस्तथा ॥ 


है कि नियम पूर्वक ब्रत करनेवालोने जो त्रत पहिलेही | 


पर भी न छोडना चाहिये. पर दान पूजा आदि पविच्नताके 


राज कहते हैं कि, पतिका ब्रत स्त्री तथा ख्रीका ब्रत पतिको 


करना चाहिये. दोनों ही न कर सकें तो किसी अपरसे | गयाहें वह उसीस तात्पय॑ रखता हे उसका प्रतिनिधि न 


| करना चाहिय। 
मतलब पुत्रादिकोंस है, वे ही ब्रतको पूरा करदें । इस विष- | 
यमें वहां ही वायुपुराणमें लिखा हैं कि, यदि आहितापि हो | 
अथवा उपवास करनेमें अशक्त हो तो उसे पुत्नस करा छना 


कराहें परन्तु ब्रतका भग न होने देना चाहिये। अपरका 


चाहिये, पुत्र न कर सकता हो तो दूसरे किसी कर सकने- 


वाले परिवांरके आदसीसे करा ढेना चाहिये, यदि उससे । 


कई. 


भी असंभव हो तो किसी आाह्यणसेही उपबास करा छेना 
चाहिये, इस प्रकार उपवास करानेवाले पुरुषको सौ गुना 
अधिक पुण्य फछ आ्राप्त होता है। महात्मा गारूब मुनि 
कहते हैं दि जो ख्री पदिक लिय एकादशीके दिन उपवास 
करती है उस सौ गुना अधिक फल प्राप्त होता है। जो 
मनुष्य नानी आदिकि बदले प्रेमपूवंक एकादशीका उपवास 
करता है वह हे ब्राह्मणो !. समग्र फछको प्राप्त होता 


है। ये प्रतिनिधि कास्य कर्ममें नहीं होते। ऐसा ही मण्ड- | 
नने भी कहा है कि प्रतिनिधि काम्य कमंका नहीं,हे, वो | 
तो नित्य और नेमित्तिक कर्ममें ही होता है, पर कोइ २ | 


काम्यकमम भी प्रारंभके पीछे प्रतिनिधि मानते हैं। संत्र- 
पर, स्वामीके काये. दववाके काय और अप्लिकाय इनमें 
ई अतिनिधि नहीं होसकता. यहीं क्यों ! देश, काछके 


मरीज. बवकब, 


१ नारणेरभिरेबस्रेत्यपिप्ाठ: । ६ मधु “मांते तिदायान्यदुजते. श्र हितमी रंतसित्यपिवाढः ।. हु रे 


न कपल नम टला मल 
| बिधानके विषयमें किसी दूसरे कालको किसी पुण्य 
संकल्प करके प्रारंभ कर दिया हो उसमें सूतकादिं आजाने- | कालछका प्रतिनिधि न बनाना चाहिय तथा किद्ली 
| देशका किसी दूसरे देशको प्रतिनिधि न मानना चाहिये, 
. कैत्योंको न करना चाहिये।॥ यदि स्वयं न कर सकता हो- | 


तो किससे कराना चाहिये. इस विषयमें पैठीनसि महा- 


पुण्य 


अरणिका प्रतिनिधि दूसरे काष्ठ वा पत्थरको न बना डेना 


| चाहिये तथा पुत्र और अपनी स्रीकाभी किसीको प्रतिनिधि 


ने बनाना चाहिये। ज़िस वस्तुका कहीं निषेध कर रिया 


अथ त्रतको हृविष्य चीजें-हेमाद्रि भन्थमें छान्‍्दोग्यपरि- 
शिष्टमें कात्यायनके वचन कहे हूं कि, दृविष्य अन्नोंमें जौ 
मुख्य कहे हैं, उनके पीछे त्रीहिकी गणना है, चाहें कुछ भी 
न मिले पर उडद, कोदों ओर सफेट सरसोंको कभी ग्रहण 
न करना चाहिये। इसी विषयमें अश्निपुराणमें कहा है क्रि, 
शाढी, सौंठी चावछ, मूंग तथा कराय, पानी, दूध, 


| ब्यामाक, नीवार और गेहूं आदि पारणमे हितकारी हैं ॥ 


पंठा या काशीफलछ, धीया, बैंगन, पाछकका' साग, 
ज्योत्स्निका इनका त्याग करना चाहिये। मीठा दि, घूक 


रही 


| चतुभक्ष्य, सामा, शाल्ली चावछ, नीवार, सत्त कण, शाक, 


साधारण चावढू, यावक, ये स प्‌ रातके मतादिसे हवि- 
ध्यान्न कह्दे गये ६ तथा अप्निकाय्यंसं भी इनका ग्रहण हो 
सकता हैं। पर किसी भी ब्रती पुरुषको मधु सांसका 


#नगोट-यदपि हमें कितने दी स्थलोमें सांस शब्द मिलता हैं, अर्थ 


| भी सीघ! मांस द्वी किया हुआ पायाणाता है जो कि, मांस आछज 


संघारमें प्रसिद्ध दे, मनुस्सृतिके श्राद्धप्रकरणमें मांस शब्द अनेक विशे- ' 
परणणोंके साथ दृष्टि गोचर होजाता है सब प्रन्थोंमें भी इसका कप- 








बअलश्जा । | सामान्य 






008 0777 727 28 


60/77/7027 70 कर 2000 04727 000772: 36208 000 ६2023 8.2/00 ॥527220न्‍3 240 
कमला अधना साया गाज मम] प्र 





77 मा 


पालकी पाथरी । ज्योखिता कोशातकी ॥ तत्रेव भविष्ये-हमन्तिक सितास्विन्नं घान्यं स॒ठ्ा यवा: 


स्तिलाः ॥ कलायकड़शुनीवारा वास्तु हिलमोचिका ॥ षष्टिका कालशाके च मूलक केम्ुकेत- 


श् 
स़्र 


रत ॥ कन्दः सेन्धवरसाम॒ुद्रे गव्ये च दषिसर्पिषी ॥ पयोग्लद्धृतसार च प्मसाम्रहरीतकी॥ 
पिप्पली जीरक॑ चेब नागरड्रकतिन्तिणी॥ कदली लवली धात्री फलान्यशुडमेक्षवम्‌ ॥ अतेहृ 


पक्क सनयो हृविष्याणि पचक्षते ॥ लवणे मधुसापिषी॥ इति क्चित्पाठः॥ दमान्दिक धाम्यं-कहमा 
स्तदपि सित श्वत्मस्विन्न च हृविष्यम्‌ ।। कलायाः सतीनकपयोंया मटर इतिप्रासिद्धाः ॥ वादाण इते दाक्षेण:. 
प्रासिद्वा॥ वास्तुई बथुवा इपि झरुपातः ॥ “हिल शुक्र मोचयति” इति क्षीरस्वास्युक्तेश्शकासारी हिल्साए क्‍ 
इति प्रतिद्धा। शाका जलोद्ववाः । गीडदेश हेलांचले इति प्रसिद्धा।। कालशाकम॒त्तरदेश कालिकेति प्रासिद्धम॥ 
केमुक केस॒त्रा इतिपृरवदेशे प्रिद्धम । नागरड़क तारिह्म। “ ऐशबतो नागरड्रो नादेयी भूमिजंबुका'' 


इत्यमराद॥नागर चेवेति पाठे।नागर शुण्ठी॥ढवली रायआंवव्ठेतिमहाराष्ट्रभाषयोच्यमान फलम।हरफररेवर्ड 
इतिमध्यदेशभाषया ॥ अतिेलपकमित्येतत्कवितहविष्याणामेव विशेषणम्‌ ।। मत्ु--मुम्यज्ञानि पथः सोमे 


मांस यज्चानुपस्कृतम्‌ ॥ अक्षारलवर्ण चेव प्रकृत्या हविरुच्यते ॥ अनुपस्कृतमप्क्रम । 


कभी भी ब्रतमें सवन न करना चाहिये। अन्थकारके यहां 
पालको, पाथरी और ज्योत्स्तिका, कोशावकीको कहते हैं | 
भविष्य कहा हे-हेमनत ऋतुमे होनेवाढा हेमन्तिक, 
विना भीगेहुए सफेद धान; मूंग, जो, तिछ, मटर, कांगुनी, 
नोवार, बथुआ, हिलमोचिका, सांठी चावछ, काल शाक, 
केबुकको छोडकर बाकी मूल, केद्‌, सैंधा और समुद्र नोन, 
तथा गऊके द्धी और घी, मछाईं आदि न निकाला हुआ 
दूध, कटहर,- आम, हरीतकी, पीपछ, जीरा, नारंगी, 
इमली, केला, लव॒ली, आमरछा ये सभी हविष्यान्न हैं। पर 
इंखका गुड हृविष्य अन्न नहीं हे । जो त्रतप्राह्म वस्तु तेलमें 
न पकाई हों वो ब्रतमें ग्रहण कर लेनी चाहिये। ऋषियोंने 
इन चीजोंको हृविष्य बताया है । जिनकी कि हम गणना 
करचुके हैं। कहीं २ “गव्ये च दधिसर्पिषी? के स्थानमें 
(छवणे सधुसपिषी ? ऐसा भी पाठ है जिसका अथ होता 
है कि, दोनों नमक, मधु और सर्पि इत्यादि भी ह॒विष्यान्न 
है। «मन्तिक, धानका नाम है कछमा, वह भी बिना भीगी 


संग नहीं आया हे, पुराणोमें भी इसकी पूरी कहानी मिलती है, इसे 
देखकर पत्येकके हृदयमें यह शैका होनी स्वाभाविक है कि, क्या 
प्राचीन आय्येक्ति यहां मांसकी गिनती हविध्यान्नतकमें हुआ करती 
पी ! जब सनुस्मृति इसे प्रकृतिसे हबि कह गयी ते) फिर इसके हृवि- 
चयान्नरपनेमें कौनसा सन्देह बाकी रहजाता है |उचित तो यह था 
कि जेसे अतशाजके लेखकने अग्रिपुराणका यह वचन डद्धत किया है 
कि-“ मधु मांस विद्यातव्यं सर्वैश्ध ब्रतिमिः सदा” सभी अतवालोंको 
रिइु मांसका सवेथा त्याग करना चाहिये, और इसी प्रस्4में पारणाके 
दिनको भी ब्तका दिन संभाला है, इससे यह बात सिद्ध होती दे कि, 
“ते अथवा परणाके दिन भधु सांसका प्रहणन कर॥ चाहिये। 
इसके पीछे इसी प्रकरणमें लेखक सनुका वचन इसके हविष्य होनेमें 
ल् है, तब इस ग्रन्धसे हविष्य और अहविष्यका निशेय करने- 
बी लोग हे विषयमें क्‍्यः समेंगे १ यद्यपि लेखकने इस विषयम्ें 
हे सा व करदी थी पर छेखककी व्यवस्था दुरूद हुई हे, 
हक हजार लाश उदे व्यवस्था, करना अत्यावश्यक है । मजु- 

| ३ ने खानेड़ी महाफशशहती बताया हे, तथा 


हुई सितओर श्रत-ह॒विष्य है । कछाय और सतीनक दोष 
पर्य्यायवाची शब्द हैँ। यह मटर करके प्रसिद्ध हे. इसे 
दक्षिण देशमें वाठाणे ऐसा बोछते हैं, वास्तुक बधुआगके 
नामसे असिद्ध हैं। “हि शुक्र-हिल माहिने शुक्रको जो, 
मोचयति ” छुडवादे उसे हिलमोचिका कहते हैं, ऐसी क्षीः 
स्वामीने व्युत्पत्ति की हैं। जिसे शुक्रासारी और हिलसार 
भी कहते हैं। यह एक पानीमें होनेंबाछा शाक है, जिस्म 
गौडदेशम हेलांचछ कहते हैं । काछशाक उत्तर देशों 
काहिका करके प्रसिद्ध हैं। केमुक केमुत्रा करके पूरव देश 
प्रसिद्ध हैं। नागरंग-नारंगीका नाम है, क्‍योंकि अमरधि 
हने ऐरावत, नागरंग) नादेयी, भूमिजम्बुका. ये पर्याय 
वाचक शब्द रखे हैं। यदि नागर चेव! ऐसा पाठ रखेंगे 
तो नागर झुंठी अथ होगा। छवली रायआंवलीको महा 
राप्ट्र भाषामें कहते हैँ। जिसे मध्यदेशम हरफररेवी 
कहते हैं । अतेछ पक्त यह कहे हुए हविष्य अज्नोंका 
ही विशेषण है । मनुस्मृति्त क हागया हे कि, दूर 


मांसकी निरुक्ति करतीवार यह भी कह्द दिया हैं जो मुझे यहां खाते | 
है मे उन्हें वहां खाऊंगा, इस कारण बुद्धिमान्‌ मांसको मांस कहते : 
हैं। इन वचनोंके देखनेसे प्रतीत होता दे कि मनुस्सनिकार माँस 


खानेको धर्म नहीं मानते फिर जहां कहीं मांसका विधान देख्षा जाता 
हे वो उन्हीं मांस खोरोकी विशेष व्यवस्थाके लिये 


शात् न बताएतो शान्नके सावेभोम पनेमें बडा आयेगा कि शाज्ष मां 
खोरोंपर द्वितकारी शासन नहीं रखता। जो किसी तरद्द भी मांस 
नहों खाते उनका वो कभी भी हृविष्य नहीं हो सकता पर जो मांग 


भक्तणमेंदी अपना कल्याण समझता है वो तो अतके उपवास कालमें' 


मांसके ही'स्मप्न देखता रद्द होगा, वो कभी भी सोजनके समय रुक 
नहीं सकता उसका हृचिष्य तो वो मांस ही होगा, यही समझकर 
शाह्षने भी कह दिया है कि, मांस भक्तण सदा ही सदोष .है पर जो 
जा रहा हे वो हृविष्यके स्थानमें भी खा सकता है| इसके कोई 
मसिका झपूर्व विधान नहीं माछ्म होता एवम्‌ न माँसकों अपूर्व हृवि- 
ध्यका हीं दिया जा रहा दे।. द 


् है जो अधमंकी 
तरफ ध्यान देकर मांस भक्षण करते हैं | याद उनकी भी व्यवस्थाएँ प 


करे सके, 3? करे कफ उन ए लय 
् 


परिमांती, ) . क्‍ ... भाषाटीकासमेततः | 


22/00/0270 4 220 %022 दम 27600 ४ 2 4000 00877 76 2 2222.0: 202 7:77 7770: 222 7 हि त52 62 ६222६ ९३४२ कक 
_िदकेव्य्वयइमगउधाधकरदरत पाक 'चदास्‍वाान्‍ामापापता: पा परतदिकाातधतताभ५आाकाातटासादतरा263 १०508 4वहव० तन, ामपयमपपरकक, 











अथ त्रताद्यपयुक्तानि वह्तूनि | 

तत्र पंचरत्वानि।आदित्यपुराणे-खुबर्ण रजत मुक्ता राजावत प्रवालकम ॥ रत्नपश्चकमारूयात॑ 
शेष वस्तु ब्वीम्पहम्‌ ॥ कनक॑ कुलिशं नील पद्मराग॑ च मौक्तिकम्‌ ॥ एतानि पश्चरत्नानि 
रत्नश,सत्रविदों विदुः॥ इति समयप्रदीपक्षतकालिकापुराणोक्तानि वा ॥ कुलिश हीरकम ॥ 
स्मृत्यत्तरे-अभावे सर्वरत्मानाँ हेम सर्वत्र योजयेत ॥ विष्णुधमोत्तरे-मुक्ताफले हिर्यं च वेदूय 
_ पद्मरागकम॥पुष्परा्ग च गोमेदं नीले गारत्मतं तथा। प्रवालयुक्तान्युक्तानि महारत्नानि वे नव॥ 
अथ पलवा॥हेमाद्रों अह्माग्डपुराण-अश्वत्थोहम्बरप्लक्षचूतन्यम्रोधपकछवाः ॥ पश्चनड्रा इति ख्याताः 
सर्वकमंसु शोभना/॥ पश्चमड्राः पंचपकछवा! ॥ पश्चगर्व चा॥तमप्रैव स्कान्दे-गोमूर्न गोमयं क्षीरं दथि 
सर्पियंथाक्रमम्‌ ॥ विष्णुधमें-गोमूत्रं मांगतश्रार्द शक्ृत्क्षीरस्थ च॑ तबयम॥दय दन्नो परतस्षेक- 
मेकश्व॒ कुशवारिजः॥ गोमूज्प्रमाणं तु प्रायश्रित्तमयूखे सेयम्‌ ॥ विष्णुधमें-गायदपा5दाय गो- 
मूत्र गन्धद्वारोति गोमयम॥आप्यायस्वेति क्षीरं च द्धिक्राव्णोषथ वै दथि ॥ शुक्रमसीति आज्ये 
कम लकी असल अशशलीिलश निकल लीन नम लिलन कलम लिए बिक िकिन मल कल निलकि२ / 0 की 6 कल $॥ 





सोम, मांस, और विना उपस्कार किया हुआ मांस एवम्‌ 


ह | राम! इस संत्रको बोढकर गोत्र एवम्‌ आप्यायस्व! इस 
खारी नौनको छोडकर बाकी नमक ये स्वभावसे ही हवि- 


न | मेत्रसे दूध तथा 'द्चिक्राग्णो? इस संत्रसे दृहि और शुक्र 
“यान्न हैं। अनुपरक्ृत अपक, यानी विना पकाया हुआ | मसि' से घी और 'देवस्य त्वा? से कुश का पानी सिलाना 
सांस भी ह॒विष्यान्न हैं । ः चाहिये। ऊपर कही हुई पांचों चीजोंके योगसे पेचगव्य 

ब्रतके लिये आवश्यक वस्तुएँ-सबसे पहिले आदित्य | बनता है। | 
पुराणके कहे हुए पंच रत्नोंको बताते हैं-सोना, चांदी, | गन्धद्वारां दुराधर्षो नित्यपुर्टा करीषिणीम । इंश्वरीं 
मोती, मूंगा और छाजवर्दी ये पांच रत्त कहें हैं। बाकी | सवभूतानां तामिहोउहये श्रियम्‌ ॥” यह छ्ष्मीयूत्तका संत्र 
दें लक्ष्मीके विषय इसका अर्थ यह अर्थ होता है कि, अनेक 


वस्तु अगाडी कहेंगे | समयप्रदीप अन्थमें रखे हुए कालिका- 
पुराणके कहे हुए पंचरत्न-सो ता, हीरा, नीढम, पुखराज | वरहकी स्वच्छ सुगन्धिकी द्वारभूत, किसीसे भी अभिभूत 
और मोती ये हैं रतन शाखवेत्ता इन्हें पांच रत्न मानते हैं । ने ने 
मूलशछो रुूमें जो कुलिशशब्द आया है उसका हीरा अथ हे ! 
स्मृत्यन्तरमें लिखा है कि, सब रव्नोंके अभावमें सब जगह 
सोनेकी योजना कर दे। विष्णुधर्मोत्तरमे कहा हे-मुक्ता, 
सोना, वेदूय्य, पद्मराग- पुष्पराग, गोमेद, नो, गारुत्मत 
ओर प्रवाछू ये महारत्न कहे गये हैं । 

पंचपल्व-हेसाद्विम जह्याण्ड पुशैणस कहा है कि, पीपर, 
गूछर, प्छक्ष, आम ओर वरकी डारें पंच पछव कहाती हैं। 
इस कोकमें पंचभगा ऐसा पाठ आया हे | जिसका पंच | 
पल्षव अथ है, ये सब कामोंमें उपयुक्त हैं| पंचगव्य-हेमा« | टैप है मं आपका बल 
द्र्भि स्कान्द पुराणसे पेचगठय कहा हे कि, गोमूत्र, गोवर, । वधक सत्त्व चारो ओरसे आजाय सुस बाजक खसंगमसक 
दूध) दृह्ी और गऊका ही सर्पि ये पंचगव्य कहाते हैं।| लिये हो ॥ 
विष्णुधमम कहा है कि, जितना पंचगव्य बनाना हो तो | “ओं द्धिकराव्णो अकारिष जिव्णोरश्वस्थ वाजिनः । सुर- 
आधाअंश तो गोमूत्र लेना चाहिये, तीन तीव भाग गोवर | भिनो सुखाकरत्‌ प्रण आयूषि तवारिषत ॥” दुधर्से शीघ्रही 
ओर दूधका होना चाहिये, दो भाग दही और ९ भाग धृत व्याप्त हो जानंवाले, बलशाली, व्यापन शील दृहीको इनमें 
तथा बाकीका कुशजलछ होना चाहिये । जितना पंचगव्य | मिला रहा हूँ। अथवा प्रत्येक पाद्‌ विश्लेषम प्रथ्वीको 
तयार करना हो उसमें हमें तीन अश गोवर और तीन अंश | आक्रान्त करनेवाले, जयशीर तथा बेगवाले अश्वका संस्का- 
इघके तथा दरें अंश दहीके तथा आधा अंश गोमूत्र | रकर दिया है। थो दृधि अथवा अश्व हमारे मुखोंमें 
ओर बाकी एक अंश कुशजलका मिलाकर ही तयार करना | सुगन्धि कर दे एवम्‌ हमारी आयुको बढा दे। “ओं शुक्र- 
वाहिय। जेसे २१ तोले पंचगव्यमें एक तोले गोगूत्र, दो | मस्यसतमसि धासमनामासि प्रिय देवानामनाधृष्ट देव यजन- 
गोले कुशजर तथा दो तोछे घी, ४ तोढे दही और ६ तोले | मसिक” है आज्य- | तू शुक्र-दीप्तिमान्‌ू अथवा वीय्ये रूप 
गेबर ओर छः तोले दूध लेना चाहिये। विष्णुधमम छिखा | है। आप विनाश रहित हो यानी जो आपका सेवन करता 
[भा है कि, गायत्री मंत्र बोंढडकर गोमून तथा न्धद्रान | है उसकौ शीघ्नही अरपधुमें मृत्यु नहीं होती। आप शीक्ष 











। न होनेवाली तथा सदा सब तरहसे पुष्ठ करनंवाली, 
| दानभ चित्तकरनेवाढी अथवा हाथियोंकी ईश्वरी हाथी 
| आदि उत्तम सवारी देनवाली संपूण जगतकी ईश्वरी श्रीको 
| बुला रहा हूँ । गोमयके विषयरमें विविध तरहको सुगन्धि 
| देनेबाले तथा क्रिसीसे न दबनेवाले, सदा ही पुष्टिक देने- 
| वाले एबम्‌ शुष्क गोमय रूपमें आजानेवाले सब आ्राणियोंसि 
अशसित तथा विविध शोभा संयुक्त गोमयको बुलाता हूँ । 
जिस मंत्रका जिस विषयमें प्रयोग हो उसका उसी विषयमें 
अथ होना चाहिये | “ऑआप्यायस्व समेतुते विश्ववः सोम- 
इष्ण्यम्‌ ॥ भवा वाजस्य सगथे ।” हे सोम | आपका बल- 


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४० 


च देवस्य त्वा कुशोदकम्‌॥एमिस्त पश्चश्नियुक्ते पश्वगव्य॑ प्रचक्षते॥पन्चाव्त तु ॥ हेमादों शिवधर्मे- 
पठ्चामृतं दूधि क्षीर॑ सिता मधु इत॑ स्प्तम्‌ ॥मदनरत्ते कात्यायनः--आउज्यं क्षीर॑ मधु तथा मधुर- 
त्रयमुच्यते ॥ पहुसाः ॥ तत्रेव मविष्ये-मथुरोःम्लश्व लकणः कपायस्तिक्त एवं च ॥ कटुकश्रेति 
राजेद्ध रसपटकमुदाहतम्‌ ॥ चहुःसम तु ॥ गारुडे-कस्तूरिकाया दो भागों चत्वारश्न्दनस्य च॥ 
कुकुमस्य त्रयश्रेकः शशिनः स्थाचतुःसमम्‌ ॥ कुंकुम॑ केशरम।शशी क पुर ॥ सर्वेगन्धम्‌ ॥ कपूर शअन्दन॑ 
दर्पः कुंकुम॑ च समांशकम्‌ ॥ सर्वगन्धामिति प्रोक्॑ समस्तसुरभूषणम्‌ ॥ दर्प! कस्तूरिका ॥ 
यक्षकर्दम: ॥ तथा-कह्तूरी हगुरुओ्षेव कर्प्रश्चटदनं तथा॥#ंकोले च भवेदेधिः पश्चप्रियक्षकर्दमः ॥ 
थथ सर्वोषषयः ॥ छन्दोगपरिशेष्ट-कुष्ठे मांसी हरिद्वे दे मरा शेलेयचन्दनम॥व्चा चम्पकमुस्त व 
सर्वोषध्यों दश स्घृताः ॥ तौम्राभ्याशक्म्‌ ॥ पाष्मे-इक्षवस्तृणराज॑ च निष्पावाजोजिधान्यकम्‌ ॥ 
विकारवच्च गोक्षीरं कुछुमं कुंकुम तथा॥लवणं चाष्टम तत्र सोौभाग्याष्रकम॒च्यते ॥तृणराजः ताल; | 
भजाजी जीरकम्‌ ॥ अर्थाशज्ञनि ॥ आप क्षीएं कुश/आाणि दुष्यक्षततिलास्तथा ॥ यवाःसिद्धार्थका 
श्वेति ह्ध्योउष्टाज़ः मकीर्तितः ॥ मण्डद्ार्थ पद्चव्णानि ॥ पथरात्रे-रजांसि पचवर्णानि मण्डलार्थ ९ ” 


कारयेत्‌ ॥ शालितण्डुलचूर्णन शुक्ल वा यवसंभवम्‌ ॥ रक्त कुछुभसिन्दूरगोरिकादिसमुद्धवम्‌ ॥ 
हरितालोद्गवं पीते रजनीसंभव॑ तथा ॥ कृष्ण दग्धयवेहेरित्पीतकृष्णावीमि भ्रितम्‌ ॥ रजनी 
हरिद्रा ॥ कोतुकंज्ञानि॥ भंविष्ये- दूब। यवाकुंराश्रेव वालकं चूतपह्लव॥॥ हरिद्वादयसिद्धार्थाशाते- 


विक्वव होगे हो आपका बामनाम है आप रोड थार तप. 77 77 होते हो आपका धामनाम है, आप इवोंके प्यारे | रत्ती बनाना होतो दो रत्ती कस्तूरी, ४ चदुन, ३ ६ कु 
की बा हो जब बा | चोर एक री का डेना चाहिये ।गन्‍्यहार एंड 
््‌ कक च कक | 
> ४ हे रका ओर शशि पूर न्थ-कर्षरः 
असवे5श्विनोबाहुम्यां पृष्णो हेस्ताभ्याम्‌ ॥” देव सविताकी कम र्‌ डा शर्स डक 2 हे । के के कपूर क्‍ 
आज्ञामें अवर्तेमान हुआ में अश्वित्रीकी बाहु तथा पूषाके | हक व लीकक कली बराबर छिये जॉय उस 
हाथों अहण करवा हूं। याज्ञिक विनियोगादिके आधारपर (मय इन्हें स्ंगन्ध कहते हैं। यह सब देवताओंका भूषण 
डिखे गये बेद आाष्योंमें इन मत्रोंका वही अथ है जो इनके | + ! मन्‍्थकार दर्पशब्दसे कस्तूरीका महण करते हैं। यक्ू 
विनियोगक हिसाबस होता है। एक काममें विनियोग | मे कस्तूरी, . अशुरु, कपूर, चन्दन, कैंकोल ये पांच 
किये गये मंत्रोंका यह नियम नहीं है हि, फिर दूसरे | भेलकर यक्षकर्देम कहाते हैँ । सर्वांषधी-छन्दोग प्ररिशिष्ठम 
कासमें उनका विनियाग ही न हो किन्तु दूसरमें भी उनके | ढिंखा हे कि- कट, ककोल, दोनों हछदी। मुरा, शैडेय' 
विनियोग होता हैं, यह हमें मीमांसाका ऐन्द्रीन्याय बता | पैन, बचा, चपक, मुस्त इन द्‌ श्रॉंको सवाषधि कहते ह। 
रहा हे । पर जहां ,विनियोग _होगा उसी विनियोगके सोौभाग्याष्टक-पह्मपुराणमें छिखा है कि, इंख, तृणराज, 
अडसार उनका अथ होना चाहिये, यही सोचकर हमनभी | 'ेंप्पाव, अजाजी, वन्य, दही, कुसुम, क्ेकुम, लवण ये 
इनका बैसाही अथ किया है, जहांतक हो सका हैं भाष्य- | आठ सोभाग्याष्टक ऊहाते है। तृणराज कारकों कहते हैं। 
कारोंके अथंकाभी ध्यान रखा है । या वैसा ही अथ | अजाजी जीरेका नाम है +आटांग अध्य-पानी, दूध, कुशाके 
गायत्री मेत्रके अथे करतीवार गोमूत्रमें वेसीही भावना - भाग, दृही, चावछ और तिछ जौ और सफेद सरसों 
करठेना चाहिये । | सष्टांग अध्य कहाते ह। पंचरात्र शास्त्र लिखा हुआ 
२ सके चर शक रे कि मृ0 हु शक र.. हि के पी ९ चूप ् 

पे दमा शिवधमोजें बताया है कि दही, दूध, करना नह आह _ ये रेधके पांच चूण तयार 
आढ) सहत ओर घी ये पांचो मिलकर पंचामत क्‌ ते हैं * 8 न हूँ, चावल तथा यवका चून 
सघुरत्य कि ७ ६ | बरतना चाहिये। कुसुम, . सिन्दूर और गेरुको ढाढके 
५. पनरत्नमन्थस कात्यायनका बचन हैँ कि, घी ० » व आ 
९ खहत इन तीनोंको मधुरत्रथ कहते हे । हु | , पथा हरताछके और हलदीक चूनका पीलेरेगके 
पस-सदत रल्‍्न बन्थम हो भविष्यका वचन हक खि न अनभ लेना चाहिये | जल हुये जोओंसे काढा तथा पीड़े : 
राजेन्द्र ! प्धुर, भम्ल छबयों , है कि, हैं | और काछेस हरा बना छेना चाहिये । क्योंकि इन दोनोंको 
८, गये ब-क ए $ कधाय, विक्त १ कठुक ये छः मिछा कर देनेंसे ह रे नल | ह 

रस कहे गये हैं। चतुःसम्-गरूह पैर 8 उस हरा रंग बन जाता है । ज्होकमें रजन 
अश कस्तूरी, चार अश चन्दन, तीन झऊ ८ भौ ररद्राक हो परय्योय आया है। कौतुकसेज्ञक-- 
झ ब 2 पते अश कुकुम और एक | भविष्य पुराणमे . ढिखा. है धि दूः भैके कक 

। श क्रपूर सर चारो मिछफर चतुर्संप्त कहाते हूँ ज्ञैस ब्द न हुआ हद कै; दोनों ज्‌, जे के अकुर, 
32 जसकी जह,' जाम्रकी छा८, दोसों दछदियोँ, . सफेद 


परैभाषा, | 


भांपाटीकासमेतः | 


20200 06/02/7020 :07 05000: 0702 
2 8-५ 4885 8 ४7 ० 2 3 पर! 


पत्रोर॒गत्वचः ॥ कड्रणोषधयश्रेताः कौतुकारूया नव स्मृताः॥ जथ्र पपतमृद: ॥| मात्स्थे-गजाश्वरथ- 


: वल्‍्मीकसंगमाद्धदगोकुलात॥ म्रदमानीय कुंभेष भक्षिपेश्वत्वरातथा ॥ गोकलावधि सप्त,चत्वरेण 
सहाष्टो मृदो भवन्ति ॥ सप्तवातवः ॥ हेमाद्रों भविष्ये--छुबवण रजत॑ ताम्रमारकूटं तथेव च॑ ॥ 
> लोहे बपु तथा सीस घातवः सप्त कीतिता/॥आरकूटं पित्तलम॥सप्तघान्यानि ॥ षदूत्रिंशान्मते तत्रेव-- 
यवगोधूम धान्यानि तिलाः कड्शुस्तथेव च॥ श्यामार्क॑ चीनक॑ चेव सप्तथान्यमदा हतम्‌ ॥ 
तप्तदशधान्यानि ॥ मार्कण्डेयपुराणे-ब्रीहयश्व यवाश्रेव गोधूमा अणवध्तिलाः ॥ भ्रिथ कोबि- 
दाराः कोरदूबाः सतीनकाः ॥ माषा मुद्रा मस्राश्व निष्पावाः सकुलित्थकाः ॥ आहढक्यश्रण- 
काश्वव शणाः सप्तदश स्मृता॥कोरदूषाः कोद्रवाः ॥ सतीनकाः काया? मठ।इ ते प्रतिद्धा: ॥ भष्टादश- 
पाम्यानि ॥ स्कानदे-ब्रीहियबास्तिलाशेव यावनालास्तथेव च ॥ सतीनकाः कुलित्थाश्र कड्गुकाः 
कोरदूषकाः ॥ माषमुहमस्राश्च निष्पावाः इयाम सर्षपाः ॥ गोधूमाश्णकाश्रैव नीवाराटक्य एव 
च॥एवं कऋमेण जानीयाद्धान्यान्यष्टादशेव तु ॥ शाकानि॥ हेमादों क्षीरस्वामी-मूलपत्रकरीराप्रफल- 
फाण्डाधिरूढकाः ॥ त्वक्‌ पुष्प कवर्क चोति शारक दशविध स्मृतम्‌ ॥करीर॑ वंशांकुरः॥अग्ग्रन॑ पछवः |। 
काण्ड नालम॥कवक छत्राकम्‌ । कर्शा उत्ताः विष्णुधर्मे-हेमराजतताम्राश् मृन्मया लक्षणान्विता:। 
यात्रोद्ठाहप्रतिष्ठादों कुम्माः स्प॒ुरभिषेचने ॥ तलरिमाणं च ॥ तत्रेव--पथ्च 'शाडइगुलेवपुल्या उत्सेषे 
पोडशाडइगुलाः ॥ द्वादशाड्गुलमूलाः स्पुसुंखमष्ठाइगुले भवेव॥पंचगुणिता भाशाश्व पंचाशा आश 
दृश । पंचाशदंगुलानि वेपुल्यमित्ययः । केचितु पशञ्चद्शांगुलवैपुल्या इत्याहुः ॥ प्रतिमादब्ययोंः परिमाणम्‌ ॥ 
हेमादों भविष्य-अलठक्तद्रव्यतत्संख्या देवता प्रतिमा तृप ॥ सौवर्णी राजती ताम्री वृक्षजा 


के कप हइकक ४०77 77070 04%? हज। 02707 7075 ए:/7 (५१४४7 ० प पक गत क शा, 




















सरसों, मोर पंख, सौपकी कौंचली ये कंकणकी औषधि हैं | 


इन्हें कोतुक कहते हैं। सप्तमृद्‌-मत्स्य पुराणमें छिखा है कि, 
होंकी धूल, रथकी रेत, बामीकी मिट्टी, नद्ियोंके संगमकी 


हेकी मिट्टी ये सात मृत्तिकाए हैं। इन्हें घटमें गेरे। जहां 
गेंरना कहा हो वहां; अन्यत्र नहीं । ज्छोकमें गोकुछतक 
साल तथा एक चौराहिकी इस तरह आठ मिट्टी होदीं हैं 

सप्तथातु-हेसाद्विग्रन्थमें भ॑विष्यका लिखा है कि, सुब०७ 
रजत, ताम्र, आरकूठ, छोह त्रपु और सीसा ये साब धातु 


हूँ । आरकूट पीवछको कहते हैं। वहां ही सप्तथान, षद्‌- 


त्रिंशद्‌ृ अन्थक मतसे-यकर गोधूम, त्रीहि, तिल, केंगु, 
इयामाक और चीनक इन सातोंकों सप्तधान्य कहते हैँ । 
सन्नहधान-मा्केण्डेय पुराणमें कहे है, कि ब्रीहि, यव, 
गोधूम, अणु, तिरछ; प्रियंगु, कोबिदार, कोरदूष, सतीनक, 
माष, मूंग, मसूर, निष्पाव, कुछित्थिका, आढकी, चणक 
और शण ये १७ धान्य कहाते हैं। कोरदूषका पर्य्याय 
कोद्रव हैं। तथा सतीनकका पर्य्याय कछाय हैँ जिसे छोग 
मटर कहते हैं। अठारह धान्य-स्कान्दपुराणमें फहे.हैं कि-- 
त्रीहि, यव, तिछ, यावनालर (रामदाना) सतीनक, कुलित्थ, 
केगु; कोरदूष, साष, मुद्ठ, मसूर, निष्पाव, श्याम, सर्षप, 


गोधूम, चणक, त्ीवार, आढकी, य क्रमसे गिननेंसे अठा* 


शाक-हंसाद्वि मन्थमे क्षी रस्वामीके मतसे शाकभी गिनाये 


ऋहत हैं । पुर | हैं कि. शाक दश तरहके होते हैं. सब शाक उन्हींके भीतर 
जिप स्थानमें घोडा बैंध ओर हाथी बैँधे उन दोनों जग- | 


आज्ञाते हैं । कोईं--जड, कोई पत्ते तथा कोई कुछा और 


| कोई पछव एवम्‌ कोई फलछ और कोई कोंपर, उपजे 
मिट्टी, ताछाबकी मिट्टी, गेडओंके खिरककी और चौरा- | रह डर्ड 


अंकुर, छाछ, फूल और कोई कवचके रूपमें होते हैं । करोर 


| बशाकुर यानी कुछेको कहते हैं । पल्व॒को अग्न तथा काण्ड- 
|: को नाल एवम्‌ कवचको छत्राक कहते हूँ । कलश-विष्णु, 
| धमम कहा हैं कि, कर॒श अपने लक्षणके अनुसार सोने, 


चांदी, तांबे और मिट्टीके होते हैं, ये यात्रा विवाह और 
प्रतिष्टादिक्म अभि्षिकके निमित्त होते हैं। कछशका परि- 
माणभी वहीं कहा हें कि; पंचाशांगुछ विपुलल। सोछह 


| अंगुल ऊंचा, १२ अंगुल जडवांछा और आठ अंगुलक़ा 


मुंह होता हे । दिशा दश ह इस लिये आशाशब्दसे दशका 
बोध होता है | पांचस दशकों गुणाकर देनेपर ५० होथे 


| ह, जिसका यह मतलब होता है कि पचास अंगुर विपुल 


हो | कोइ २ तो १५ अगुल ही विपुद मानते हैं, विपुुकः 
अथ चोडा होता है | - 


प्रतिता और उसके द्रव्यका परिमाण--जहां लिख दिया 
है वहां तो कोई बातही नहीं है. किन्तु जहां प्रतिमा और 
उसके द्रव्य तथा उनका परिमाण नहीं कहा गया है उसके 
लिये विचार करते ह-हेमादिन भविष्य पुराणको छेंकर 


द | लिखा है कि, हे राजन | जहां देवताकी प्रतिमाका द्रव्य 
रा यं। ॥ ३ धँंकुश। ॥ 549 ७ 


कब: जप < ७७० ०-८क, 77:20. |“ न्‍्थ- ०००. >ल्ज्वब्नन 3:५८ 7.५०: -ब- - वथ ०५-. 


कक 


| सामान्य 
व... हो था॥ वित्जा विडेंठयोत्या वजजित्ताहपारतः) ॥ आमाजात्लछगय॑न्‍ता कतेव्या 
शक्तिसमवे ॥ अंगुष्ठपर्वमारभ्य वितस्पवधिका स्थुता ॥ मात्स्ये तु विशेषः-अंग्ुष्ठ पर्वादारप्य 
वितल्तियावदेव तु ॥ गहे तु सतिमा कायो नाजिका शस्यते बुधैः ॥ अ (बीडशासु प्रासादे 
कर्तव्या नाधिका ततः ॥ इति॥ अधिक कल्पतरो मतिष्ठाकाण्डे ज्ञेयम्‌ ॥ अनादेशे होमसहया ॥ 
तथा--अठक्तसंख्याहोमे ठ॒ शतमष्टोत्तरं स्प्रतम्‌ ॥ मात्स्ये-होमो अहाजिवृजःरया शतमष्ोत्तर 
भवेव ॥ अष्टाविंशतिरष्टो वा यथाशक्ति विधीयते ॥ मदनरत्ने बाहे-यथोंक्तवस्त्वसंपत्तौ ग्रह 
तदठुकारि यत्‌॥ पान्यप्रतिनिधिः | यवाभावे च गोधूमा ब्रीक्ममावे बच तप्डुलाः ॥ भानादेश 
होमद्रव्यम्‌ ॥ आज्ये द्रव्यमनादेशे जुहुयात्व यथाविधि ॥ अवादेशे बन्त्रदैद॒तम्‌ ॥ मंत्रस्य देवतायाश्र 
प्रजापातारिति स्थिति॥/मेत्रस्प. देवतायाश्वाविधाने प्रजापतिदेवता समस्तव्याहतिर्धन्त्र॥ स्मृत्यन्तरेपि-न 
व्याहत्या सम॑ हुतः” इति ॥ गारुडे--प्रणवादिनमोन्‍्त च चतुथ्य॑नत॑ च सत्तम।देवतायाः स्वव॑ 
नाम मूलमंत्रः प्रकीतितः ॥ दवव्याभावे प्रतिनिधि! ॥ हेमाद्रों विष्णुधर्में-दृध्यलामे पयो गाहायं मध्य 
लामें तथा जुडः॥ चूते प्रतिनिधि: कार्य: पयो वा दि वा नूप ॥ तंब्रेव मेत्राय णीपरिशिप्टे- / 
#दर्मामावे काश: ।पिठीनसि)--“सर्वाभावे यवाः॥तत्रैव देवल:-आज्यहोमेष सर्वेष गव्यमेव॑ 
भवेद्वृतम्‌ ॥ तद्भावे महिष्यास्तु आजमाविकमेव तु ॥ तदभावेतु तेल स्यात्तदभाव तु जाति- 
लग ॥ तदभावे ठ कोछ॒म्म तदभावे तु सार्षपम््‌ ॥ अथ पवित्र ॥ हेमादो परिशिष्टे कात्यायन- 
अनंतगर्नितं साम कोश द्विदुलमेव च ॥ पादेशमात्र॑ विज्ञेय पवित्र यत्र कुत्रचित ॥ आज्य- 


जनम कम अल लक अजब ले जम ज सनसनी दब मन नकल जप लि कि तिलक एज कलश आ कि 
ओर उसका परिमाण तथा मूर्तिका परिमाण नहीं कहा 





40% 2०27 कर 44/70/7764 760 2/707///0/0 67 77007 00070: 


(१८ ) ... ब्रैंतेरीजे: । 









है १ अब 


लेकर पक तकको सोने, चांदी और तांबेकी बनवा छनी 


जमे कुछ विशेषता कही है कि अंगूठेके पोरुएस छेकर एक 


घरकी मूर्तिको विद्वान्‌ शुभ नहीं बताते । हवेलीमें १६ 
अगुलस बढी नगवानकी मूर्ति न होनी चाहिये | यदि इस 
विषयसें अधिक जाननेकी इच्छा हो तो कल्पतरू प्रन्थके 
प्रतिष्ठा काण्डको देखलेना चाहिये । 

'होम-जहां होमकी कोई संख्या न कही हो वहां १०८ 


चाहें उतनी आहुति दे । मदन रत्न ग्रन्थमें आह्म पुराणको 
हे न्‍र कह 
अस्त दूसरी बंम्तुकी लेलेना चाहिये। जैसे--जौ न हों तो 
भेहओंस दया ब्रीहि न हों तो तण्डुलों से काम कर छेते ह। 
दैवेन द्ृव्य न लिखा हो वहां विधिके साथ 


जह 
'मीकौही भाहुतिदेनी चाहिये । जहां कोई मंत्र देवता न 


ह्हँ 
| 


5 इसका ग्रन्थकार अर्थ करते है कि, मंत्र 
भावधामस प्रजापति देवता और 


समस्त व्याह्ृति ही मेत्र 


हैं कि; जो चीज कही गयी वो न मिले तो उस | 


केहमसया चह्ा पति हिय + है बे । धर । कक के है 
५. ही चहंअनापति समझना चार पर ढिखा है कि, जिनके बीचमे कुछ दर न हो तथा अग्र भाग 
र देवताके | ऋुशा छेनी वाहिय' 





| होगी 


सा कै श । होता है। दूसरी २ स्मृतियोंमें भी लिखा हुआ है कि, व्याह' 
गया हो वहां जेसी अपनी शक्ति हो उसके अनुसार मापसे | तियोंसे हवन करनके बराबर दूसरा कोई हवन नहीं है 
है के | अथवा व्याहृतियों के बराबर कोई हवन मंत्र नहीं ह। गरड़ 
चाहिये। यदि यहभी न हो सके तो मिट्टीकी ही बनवा | पुराणमें छिखा हुआ हें कि हे सत्तम ! जिस देवताका मूह 
ले; नहीं तो चित्रपठको ही पूज दे तथा पिष्ट लेपसे ही ।| _ 

काम चढाले । प्रतिमा अंगूठेकें पोरुएस लेकर चाहें | 


है कप षा्‌ हि है ष्थ ज्‌ आप है] 8. 
विछ॒सिति तक बड़ी हो। मत्स्य पुराणमें तो प्रतिमाके प्रमा | सब देवताओंके मूल मंत्र बन जाते ह । 


विलयद्‌ तककी मूर्ति घरमे पूजनी चाहिये. इससे अधिक | 


कह, 


मंत्र बनाना हो उस देवताके नामको चतुर्थीक एक वचना' 
नव क्रक उसके आदिसें जोमू और अन्तर्में नमः छगानेसे 


द्रव्याभावे प्रतिनिधि-हेमाद्रिमें विष्णुधभकों छेकर छिखा 


| हुआ हूं कि, हे राजन यदि दही न मिले तो दूध तथा मधुके . 
| अछाभरम गुडसे काम करना चाहिये। यदि घी न होते. 
| दही व दूधसे काम्त लेना चाहिये। उसी अन्य मैत्रायणीय 
| परिशिष्टका वचन है कि, दूबके अभाव काशको लेलेना . 
| चाहियें। पंठीनसिने कद्दा है कि, सबके बदले जौओसे 
सभझनी चाहिये। मात्स्य पुराणम कद है कि ग्रहादिकी | 
पूजामें १०८ आहुति होती है. २८, तथा ८ भरी हुआ करती | 
ह.यह करनेवालेकी शक्तिके ऊपर निर्भर हैं, वो जितनी 


काम छेना चाहिये । इस विषयमें वहां देवठका भी वाक्य 
हैं कि जहां कहीं आज्यका होम है वहां सब जगह, गौका 
ही घृतलेना चाहिये। यदि गौका ने मिले तो भप्का, 
यदि भैंसका भी न मिले तो बकरी और बद्ूरीका भी न 
हो तो भेडका व्तेतवा चाहिये। यदि यह भी न हो तो 
तिहछका ते तथा तिछतेलभी न हो तो 'जातिंलका तेल तथा | 
इसके सी अभावमें कौसुभका तेछ तथा इसकेसी अभा: 
व सरसोंका तेल लेना चाहिये। 
पवित्र-हेमाद्रिपन्थमें कात्यायन परिशिष्टक मतको लेकर 
साबित हो ऐसी द्विदछ कुशा लेनी वाहिये-बो प्रादेश' माय 
चाहिय। जहां भी कहीँ पत्रिश्राका प्रकरण आये बह 


भाषा, ] भाषाटीकासमेतः । ( १९ ) 


(26 46 कह 22८5 260. कह सकी कि व 20002 0 एफ शा 22600 ५८ 80:207660 60070 ५५ 





४७७७४::--:2::2०4- ना ०३७०० अकतलकनन. वफननन जनक “क 








स्पोत्पवनाथ यत्तदप्येतावदेव तु॥ अयथेष्माः ॥ पलाशाश्वत्थखद्रिवटोहुम्बराणाम्‌। तदमभाघे 
कण्टकवर्जसवंवनस्पतीनाम्‌ ॥ बथ घूथाः ॥ अगुरुश्वन्दनं मुस्ता सिहक वृषण्ण तथा॥समनभागेस्तु 
कतव्यों धूषोष्यममृताहयः ॥ पिह॒क पिह्ठाद इति प्रतिद्धम॒ ॥ वृषण कस्तूरी ॥ पड़भागकुष्ठ दिगणो 
शुडश्व लाक्षात्रय पंच नखस्य भागाः ॥ हरीतकौसजरसःसमांसी भागकमेक त्रिलवं शिलाजम।॥ 
'धनस्य चत्वारि पुर॒स्य चैको धूपों दशाड्र8 कथितो मुनीन्द्रेः ॥ सर्जरतो राल इति प्रसिद्ध/॥ मांसी 
जदामासाी ॥ ।ब्रंछव ।ज्रिमागस ॥ घना कपूर) ॥ पुरो सुग्युछश ॥ सुबणभानमाह है > “जालसूथ- 
मरीचिस्थ॑ चसरेणू रजः स्मृतम्‌॥ तेष्ष्टों लिक्षासतु तास्तिस्लो राजसर्षपप उच्यते॥ गौरस्तु ते 
त्रयः घट ते यवों मध्यस्तु ते त्रयः ॥ क्ृष्णलः पंच ते माषस्ते खुबर्णस्तु षोडश ॥ पल खुबर्णो- 

श्वत्वारः पश्च वापि प्रकीरतितम्‌ ॥ रजतमानमाइ--दे कष्णले रुप्यमाषों धरणं षोडशेव ते ॥ शत- 
मान तु दशभिधरणेः पलमेव ठ॒॥ निष्कः सुवर्णाश्रत्वार॥॥इति ॥ तात्रमानमाह--“कार्षिकस्तासिकः 
पणः '” इति पलचतुथोशेन कर्षेणोन्मितः कार्षिकस्ताम्रसम्बन्धी पणो भवति॥ कर्षसंज्ञा च 
निधण्टो- ते षोडशाक्षः कर्षोरस्त्री पल कषेचतुष्टयम हाति ॥ ते षोडश माषा अक्षहरसच 
कष इत्यथेः ॥ धरणस्यथेव पुराण इति संज्ञान्तरम्‌ ॥ ते षोडश स्थाद्धरणं पुराणश्रैव राजतम्‌ ॥ 
इति मिताक्षरायाँ स्मृतेश। शतमानपले पर्याये ॥ सुवर्णचतुष्ठयसमतोलित॑ रूप्यं राजतो निष्क- 








तथा जहां कहीं शतकी गुद्धिके ढिये पविन्न आया हे वहां भी | 
ऐसा ही समझना चाहिये ॥इपध्स-पलछाश, अश्वत्थ, खद्रि, | 


सिह्ार कहते हैं, वृषण कस्तूरीको कहते हैं । 
दशांगधूप-$ भाग कुष्ठ, १३ भाग “गुड़, हे भाग छाक्षाः 
पांच भाग नख, हरीतकी, सजरस और मांसी ये तीनों एक 


एक भाग, तथा त्रिह॒ब, सिलाजीत चार भाग; वन एक | 
भाग पुर इन सबको मिलाकर दशांग धूप बनता है। ऐसा | 


बड़े २ मुनि कहते हैं। सर्जरस रालका नाम है, मांसी जटा- 


कपूरका नाम है । गूगलको पुर कहा है । 


लिक्षा होता है | तीन लिक्षाओंका एक राजसघप ( राई ) 
होता हैं । तीन राज सर्षपोंका एक गौर ( सफेद सरसों ) 
होता है । छः गौरोंका एक मध्य यव होता है | तीन तीन 
जौओंका या तीन विचले जौ भर एक कृष्णछ होता है । 
पांच कृष्णठका एक सासा होता है ! सोलह.सार्षोका एक 
सुवर्ण होता है । पांच या चार सुवर्णौंका एक पल होता है | 
यह तो कोशकारोंने भी माना है कि चार सुवणाका एक 
पल होता है पर याज्ञवरक्‍य स्मृतिमें जो पांच सुबणोंसे भो 
पछ कहा गया हे इस पर विचार होता हे कि कौनसे पांच 
सुवर्णोका एक पक होता है इस पर याज्ञवक्‍यकी मिताक्षरा 





मिताक्षराने कहा हे कि मध्यम यवादिसे मान करतीवार तो 


| चार सुवर्णौका एक पल होता है, पर यह मध्यम, साधार- 
बट, उदुम्बरये समिध हैं।इनके अभावमें कांटेदारोंको छोड | णस सवाया होनां चाहिये तबही बसे चार सुवर्णोका एक 
कर सब वनस्पतियाँ छेलेनी चाहिये। धूप-भगुरु, चन्दन, | पछ होजायगा जैसा कि साधारण यवादिके पांच सुवर्णोका 
मुस्ता, सिद्धक; वृषण इन पांचों बस्‍्तुओंको रबर लेकर | पल होता है, यह जो पांच सुवर्णका भी पल याज्ञवरक्यः 
जो धूप बनाया जाताहे उस अमृत कहते हैं। सिहकको | जीने लिखा हैं वो नारदादिकॉके मतकी ओर ध्यान देकर 
| छिखा है, यदि उनका यह मत होता तो जेस उन्होंने चारकी 


| भूमिका बाँघी हे वेसीही पांचकी भूमिका बाँधते, यह 


| तोछका विषय है इसमें बिना व्यवस्थाके व्यवहार नहीं चह् 
। सकता । हे 

0 
रजत मान-दो कृष्णछोांका एक रूप्यसाष होता हें । 


कै हा सा जटा- | सोलह मासोंका एक धरण होता है; दश घरणोंका" एक 
मांसीकों कहते हैं। त्रिडवका मत्छब तीन भागोंसे है, घन | शतमान पछ होता है; याज्वसक्यजीके कहे हुए चार सुब- 
हे ० | णौंकाही एक निष्क होता हैं। 

सुबणमान-याज्ञवस्क्यन कहा हैँ कि, जाढसें सूयकी | 
किरणोंमें जो कण उड़ते, चलते दीखते हैँ; इनमेंसे एकका | है उससे तोछा हुआ कार्षिक बनता है यह तांबेका पण 
नाम त्सरेणु हे । आठ त्रसरेणुओंको मिल जानेपर एक 


ताम्रमान-चांदीके मानक परूका चौथाहिस्सा जो कर्ष 


होता है । यह याज्ञवक्‍्ल्य, स्मृतिसे ,ही लिखा गया है । 
वेद्यकके निधण्टुमें करषंका अथ किया ह्‌ कि-सोलह साषोंका' 
एक कष तथा चार कर्षोका एक पल होता हैँ । सोलह 


माषोंका एक अक्ष होला हैं, उतनाही कर्ष होता है, ऐसा 


अन्थकार कहते हैं घरणका दूसरा नाम पुराण भी हे-कक्‍्यों 
कि, मिताक्षरामें लिखा हे कि,सोलहका धरण होता हे ज़िसे 
चांदीके लोलमें पुराण भी कहते ह। शतमान यह पछफाही 
पर्य्याय है । चार राजबसुबर्णाक बराबर तुला हुआ रूप्य 
यानी राजत निष्क होता हे एवम्‌ चार सोनेके सुबर्णक 


१ ज्ोट-पूर्व व्यवस्थाके अनुसार तारदादिके पांच घुवणोंका भी 


टीकामें जो विचार किया हे उसे हम यहां उद्धल करते हैं | | एक निष्क होना चाहिय । 


30:02 2587 05203 हुक 7:०४ 





४ | 


इत्यर्थः | खुवर्णनिष्कस्त--चत॒ःसोवर्णिको निष्को विशेयस्त प्रमाणतः॥ इतिमनूक्तेःःस च पल 
पमान णएवाकोइत्र कार्षांपण इत्यपेक्षायां देश भेदेन कार्षापणो भिन्न इत्याहहेमादरो नारदः- का्ौ- 
पणो दक्षिणस्यां दिशि रौप्यः भवतंते ॥ पणेनिबद्धः पूवेस्यां घोडशव पणाः स ठ ॥ घोडशपणाः 
अष्टो ढब्बूका कार्षापणः प्र्वस्यामित्यर्थ:॥ तावता लभ्यं रूप्ये दाक्षेणस्यां स इंते द्वेतनिर्णये॥ क्‍ 
हीलावत्याम-वराटकानां दशकद्य यत्सा काकिणी ताश्व पणश्वलख्शाते षोडश द्वम्म इहाव- 
गम्यो द्रम्मेस्तथा षोडशमिश्व निष्कः ॥ इते ॥ 
अथ धान्यमानम्‌ ॥ ह 
भविष्ये--पलद्वर्य तु भ्सत दिगुण्ण कुडव मतम॥चतुर्निः कुडवेः प्रस्थः मस्थाश्वत्वार आठक॥ 
आदढकेस्तेश्वतुर्मिश्व द्रोणस्त कथितो बुधे॥ कुंभो द्रोणद्वर्य शपः खारी द्रोणास्तु षोडश ॥ द्रोण- 
द्यसस्‍्य वे शर्प इते संज्ञा।वर्ल च कुडवः प्रस्थ आठको द्रोण एव च ॥ धान्यमानेषु बोद्धव्या 
क्रमशोष्मी चतुग्रणाः ॥ द्रोणः षोडशलत्निः खारी वेंशत्या कुंभ उच्यते ॥ क्लुमेस्तु दशनिवांहो 
धान्यसंख्याः प्रकीतिताः ॥ विशत्येत्यत्रापि द्रोणेरिति संबद्धबते ॥ तथाच--कुम्भो द्रोणद्रय- 
मिति पक्षाद्विशतिद्रोणमितः कुम्भ इंते पक्षान्तरमद्रोणाटकयो!पारिमाणान्तर सुक्त॑ पराशरेण- 
वेदवेदाड़विद्विप्रधमशासखाठुपालकेः ॥ पस्था द्वात्रिंशातिद्रोंणः स्मृतो द्विभस्थ आठकः ॥ इति॥ 
एतेषां न्यूनाधिकपक्षाणां शक्तिदेशकालाद्यपेक्ष या व्यवस्था सेया ॥ 
। अथ होमद्गव्यमानम ॥ 
सिद्धान्तशेंखरे-होमद्र॒व्यप्रमाणानि वक्ष्यम्ते तु यथाक्रमम्‌ ॥ कषेप्रमाणमाज्य॑ स्यान्मधु 
क्षीर॑ च तत्समम्‌ ॥ तण्डुलानां शुक्तिमात्र पायसं प्र्तेः समम्‌ ॥ कर्षमात्राणि भक्ष्याणि लछाजा 


बराबर सुवर्ण निष्क होता हे ऐसा मनुने कहा हे वो पलके 


३ 2 47/8//4605:6०/6०470//77 //%/ ८8/7५/0४35 %2222220:702020200:%2:0%::24 





॥ सामाल्य-« 
22270:5::.. 








समान होता हे । अब यहां यह जाननेकी अपेक्षा होती ह 
कि; यहां कार्षापण क्‍या है ? देशभेद्स कार्पापण भिन्न हे | 
इसी विषयम हंमाद्रिमें नारद्जीका वाक्य हे कि, दक्षिण 
देशमें रोप्य कार्षापणही प्रचलित है । पूरबमें सोलह परोंस 
कार्षापण निदद्ध है। सोछह पण या आठ दब्बूका पूरवमे 
कार्षापण होता है। दक्षिणदिशासें उतनेहीमें रूप्य मिल- 
जाता हें, यह द्वेननिणयमें लिखा हुआ है| छीछावतीमें तो 
यह पक हे कि, २० कोडियोंकी 3५ हक तथा 
चार काकिणोका एक पण होता है सोलह पर्णोका ए 
द्रम्म तथा सोलह द्रम्मोंका एक निप्क होता है। ॥ यदद 
पहिले समयकी तोल है तथा सिक्काओंमें भी यही व्यवहार 
होता था. वेधकशासत्रमें भी कहीं २ इसका व्यवहार देखा 
जाता है पर व्यापक रुपमें नहीं हैं 
« पनमान-भविष्य पुराणक अनुसार धनका मान कहते 
है कि दो पलको प्रद्धतत कहते हैं, दो प्रतोंका एक कुडव 
होता है, चार कुडवोंका एक प्रस्थ होता है। चार प्रस्थोंका 
एक आदक होता है। चार आढकोंका एक द्रोण होता हैँ 
खारी दोंणका एक कुंभ तथा शूरप होता है सोलह द्रोणोंकी एक 
अब डलर ' नन्‍्थ हार लिखते ह्‌ कि कुंभ और शूर्प दोनों 
बेबाक बी 5 द। पल कुडव प्रस्थ आढक और द्रोण 
के पहका रह इनसे एकस एक चौगुना होता है।यानी 


केक अ8 ऊँडेद चार कुडबका एक प्रस्थ, चार 
मेस्थका एक आढ़क तथा चार भाढ़कका एक द्वोण द्ोता 


हैं। सोलह द्रोणोंकी एक खारी वथा वीस द्रोणका एक 
कुभ होता है दशा कुंभोंका एक बाँट होता है । यह घानकी 
संख्या होती है| प्न्थकार कहते हैं कि, श्लोकमें जो* विंश- 
त्या? पद हे इसका सम्बन्ध 'द्ोणे:' इस पदक साथ हें,इससे 
हमने वीस द्रोण लिये हैं न कि वीस खारी। दो द्रोणोंका 
एक कुंभ होता हे इस पक्षसे भिन्न वीस द्रोणके बराबर 
कुंभ होता है यह भी किसीका पक्ष हैं। पराशरजीन द्रोण' 
ओर आढकका कुछ और ही परिमाण कहा है कि, धर्म 
शा्खोंके अनुपाकक बेद तथा बेदांगोंके जाननेवाले आक्षण 
३३ प्रस्थोंका द्रोण और दो प्रस्थका आढक मानते हैं । यह 
जो कहीं छोटा और कहीं उसके अधिकका जो द्रोण तथा 
आाढक तथा अन्य मान कहा हे उसकी देंशा और काढके 
अनुसार व्यवस्था जाननी चाहिये कि; उस समय उस 
दृशमें यह व्यवस्था थी तथा उस देश उस समय वह्द थी 
आज इनका व्यवहार नहींके बराबर है । 

होम द्रव्यमान-सिद्धान्त शेखरमें कहा है कि, एक करे 
आज्य हो तथा मधु और दूधभी उसीक बराबर हों, चावढ 
शुक्ति भर तथा खीर प्रसृतिके बराबर छनी चाहिये जितने 
यमन के बाहिया लीक मदाभा: 


१ सेदिती आदि कोशकारोंने चार कुडव (प/व ) की एक प्रस्थ 
(१ सेर ) तथा ४ प्रस्थका एक आढक एवम आठ आदढकका एक 
द्रीण माना हे इस तरह ३३ प्रस्थका एक द्रोण होजाता है पर आढ- 
कके परिमाणमें कोशकार और पराशरजीका अन्तर रहही जाता है। ' 
पहिले समयमें यह तोल प्रचालित थी 


जब कि भारतथी मातृभाषा 
सेरछृत थी,पर इस समसमें तो सेर मन श्ादिका ही सर्वत्र स्यवद्दार है। 











६५ 


स्थात्कन्दानामष्टमोंशकः ॥ इक्षु! प्रवभ्रभाणः स्थादडूशुलद्वितयं छता ॥ पभादेशमात्राः समिथो 
बीहीणां चाज़ालि!ः समः ॥ तिलसकतुकणादीनां शृगीसुद्राप्रभाणतः ॥ तत्र पुष्पफलादीनां प्रमा- 
. णाहुतिरिष्यते ॥ चन्द्रश्रीेसण्डकस्त्रीकुंकुमाशरुूकदमाः ॥ हरिमस्थसभाः भोक्ता गग्शलुबंदरो- 
पमः ॥ हरिमन्‍्यः चणकःर ॥ आहुतीनामिदं मान कथित वेदवदिलिः ॥ स्याजिशुद्रा मगीस॒द्रा 
सबवफलप्दा ॥ मानान्तरं शारदातिलकटीकायां पदाथांदरों कर्षप्रमाणमाज्य स्याच्छत्ति 
पयः स्मृतम्‌ ॥ उक्तानि पश्चगव्यानि शुक्तिमात्राणि साधुन्नि॥ तत्समं मधु दृग्धान्न॑ आसम 
दाहतम्‌ ॥ दधि प्रसतिमात्र स्थाछाजाः स्युमुष्टिसंम्रिताः ॥ पृथुकास्तत्ममाणाः स्थुः सक्तवोषि 
तथाविधाः ॥ पलाड्/ गुडमानं च शकंरापि तथाविधा ॥ ग्रासाद्धमात्रमन्नानामिक्षु) पर्वेपश्माणतः ॥ 
एक स्यात्पत्रपुष्प॑ च तथा धूपादि कल्पयेत।मातुलिड़ चतुः खण्ड पनर्स दशधा कृतम्‌ ॥ अष्ठधा 
नारिकेलं च चत॒धो कदलीफलम्‌ ॥ त्रिधा कृतं फल बेल्व॑ कापित्थ॑ खण्डितं द्विधा॥ ब्रीहयो 
मुष्टिमानाः स्युसद्रा माषा यवास्तथा॥ तण्डुलाः स्युस्तदर्धाशाः कोद्रवा सुष्टिसंमिताः ॥ लवण 
शुक्तिमात्र स्यान्मरीचान्येकाविशतिः ॥ घृतस्य कार्षेको होमः क्षीरस्थ मधुनस्तथा॥ शुक्तिमा- 
त्राहुतिदेध्ः प्रर्तिः पायसस्यथ च ॥ खण्डत्रयं तु मूलानां फलानां स्वप्तमाणतः ॥ आसमात्र ठु 
होतव्या इतरेषां च तप्डुलाः ॥ अक्षतास्तु यवाः भोक्ता अभावे ब्रीहयः स्मृताः ॥ तदभावे च 
गोधूमा न तु खण्डिततण्डुलाः ॥ येषां केषांचिदन्येषां द्रव्याणामप्यसम्भवे ॥ सर्वत्राज्यम्ुपादेय॑ 
भरद्ाजसुनेमंतात्‌ ॥ सर्वप्रमाणमाहुत्या पतच्चाडइगुलगृहीतया ॥ इति ॥ संपूर्णानि च सर्वत्र 
सूक्ष्माणि पच्च पञ्च च।इश्नूणां पक मान लतानामड-गुलद्रयम॥चन्द्रचनदनकाइमीर क स्त्री यक्ष- 
कदंमान्‌ ॥ कलायसंमितानतान्‌ ग॒ग्गुरुं बदरास्थिवत्‌ ॥ द्ववः ख्ुवेण होतव्यः पाणिना कठिन 


४३5 इक क 
































दोनी चाहिय | ग्रासके बराबर अज्न तथा आधे प्रासके 
बराबर शाक होना चाहिये, मूहका तीसरा और कन्दका 
आठवां हिस्सा एवम्‌ इंख पोरुएके बराबर एवम्‌ दो अंगुल 
छूता तथा प्रादेश मात्रकी समिध और ब्रीहियोंकी अंजलि, 
तिछ और सत्तकण आदिकोंको मगीमुद्राके बराबर छेना 
चाहिये। पुष्प और फलकी जहां जेसी आहुति छिखी 
हो वहां वैसी होनी चाहिये । चंद्र, श्रीखण्ड, कस्तूरी, 
ऊुकुस, अगुरु, कदंस थे चनके बराबर तथा गूगल बेरक 
बराबर होना चाहिये। हरिमन्थ चनाको कहते हैं, वेद 


जानन वालॉन आहुतियोंका यह मान कहा है। मध्यमा, 


अनामिका और अंगुष्ठको मिलाकर किसी वस्तुके उठानमें 
मृगीमुद्रा होजाती है, यह होममें सब फर्लोंको देनेवाली है। 
मानान्वर-शार दातिटककी पदाथादश टीकामें लिखा हुआ 
है कि, कषेके बराबर घृत तथा शुक्तिके बराबर दूध तथा 
. शुक्तिमान्न ही पंचगव्य लेना चाहिये ऐसा श्रेष्ठ पुरुषोंका 
मत है | दूध और मधु भी शुक्तिसात्र ही छेना “चाहिये, 
. दूधका अन्न भासके बराबर छना चाहिये। प्रस्रतिके बराबर 
दृही एवम्‌ खीलछ, प्रथुक और सक्त मुप्टिके बराबर लेने 
चाहिये । गुड़ और शकरा आधे पछ होने चाहिये। भाघे 
पग्रासके बराबर अन्न और पोरुएके बराबर इंख होनी 

चादिये। पत्ता या फूछ एक होना चाहिये ऐसे दी बूपकी 


भी कल्पना होनी चाहिये । बिजोरेके चार टुकड़े तथां 
कटहरके १०,नारियछ॒के ८,केलाकी गिरहके चार, बढलके 
तीन ओर केथके दो टुकड़े करना चाहिये । ब्रीहि। मूंग। 
उड़द और जौ सदट्टीभर भाधी मुट्ठी तंदुल और कोदव एक 
मुद्दी होने चाहिय, २१ मिरच, एक शुक्तिभर नमक, घी 
दूध ओर सहत एक कषभर हवनमें आने चाहिये । दहीकी 
शक्तिभर आहुति तथा खीरकी प्रस्तिभर होनी चाहिये। 
मूलके तीन टुकड़े तथा फ्ोंके प्रमाणके अनुसार डुकडे हो 
जाने चाहिये । दूसरी चीजें तथा बन्दुढ ग्रासके बराबर 
होने चाहिय | साबित चावढोंको अक्षत कहते हैं, इन 
भक्षतोंके अभावमे यव, तथा यवोंके अभावम ब्रीहि लेने 
चाहिये । यदि त्रीहि भी न हों तो गेहूं छेलेना चाहिये पर 
टूट अक्षत (चावकछ ) कभी न लेने चाहिये | भारद्वाजमुनि 
का तो यह मत है कि. जिस किसी भी द्रव्यका अभाव हो 
उसके बदलेम सब जगह घी वर्ना चाहिये, सब. जगह 
पांच पांच सूक्ष्म तत्व होते हैं इस कारण चारोअंगुरियाँ 
ओर अंगूठाकों मिछाकर आहुति देनी चाहिय एक पोरुवेके 
बराबर इख, दो अंगुलॉके बराबर छता तथा चंद्र, चद॒न्त 
केशर, कस्तूरी और यक्षकरद्म ये मटरके बराबर तथा गूग- 
छको बेरके बराबर छेना चाहिये । द्रव दृव्यका खुबसे तथा 
कठिन हृव्य दृव्यका हाथसे हवन कऋरणा चाहिये । स्रवां 





अत _ 62५37 37470 पी 
00420 पक 


हविः ॥ स्रवपू्णा द्रवाः प्रोक्ताः कठिना म्रासम 
स्वरूपेणेव होतव्या इतरेषां च तप्डुलाः ॥ 
भथ ऋत्किबरणम्‌ । क्‍ 

हेमाद्रो पाह्मे-बालाप्रिहोत्रिण बिम॑ सुरूप॑ व गुणान्वितम्‌ ॥ सपत्नीक॑ च संपूज्य भूषयित्वा 
च भूषणे॥पुरोहित सुख्यतमं कृत्वान्याँश्व तर्थात्विज३ ॥ चताबशदगणोपेतान्‌ सपत्नीका त्रिमंत्रि- 
तावू ॥ अहताम्बरसंछत्नान्‌ ल्लग्विणः शुचिभूषितान्‌ ॥ आचार्यादेशृषणानि ॥ अडगुलीयकानि 
(व)तथा कणवेष्टान प्रदापयेत ॥ तत्रेव लेड्रें-वस्ययुग्म॑ तथोष्णीषे कु डले कण्ठभूषणम्‌ ॥ अड्गु- 
लीभूषण चेव मणिवन्धस्यथ भूषणम्‌ ॥ एतानि चेव सवाणे प्रारम्भे धर्मकर्मणाम्‌ ॥ पुरीहिताय 
दुत्वाथ ऋत्विग्थ्यः संप्रदापयेद॥पूर्वोक्त भूषणं सर्वे सोष्णीष वख्नसंयुतम्‌॥ दद्यादेतत्मयोक्तश्य 
आच्छादनपर्ट तथा ॥ अताहमधुफक्माह विश्वामित्रः-संपूज्य मधुपर्केण ऋत्विजः कर्म कारयेत | 
अपूज्य कारयन्‌ कर्म किल्बिषेणेव युज्यते॥ऋत्जां #ंस्यामाह। तत्रेव मात्स्ये- हेमालड्भरारिणः कार्य: 


(3 बट ऐप ३३ दा ५ 
ता 222 22720 
बे 


2.25 पदक १नपरमकनक मान पक 4 ७०-इुतान्‍र-; #ननक+*पननछर+ "०2 आम क़त ल्‍॥११+०ममअनकनना 


त्रीहयो 








27226 0720 6 88 8:4700 ४:47 २:20 /7% 07 गिल 40768 0005८, 
यवगोधृमप्रिय इगातिलशालयः ॥ 


पंचविंशति ऋत्विजः ॥ तो येज्च सम॑ सर्वानाचार्यें द्विगुण भवेत ॥ दक्षिणया तोषयेदित्य्थः ॥ 
अथ सर्वेतोभद्रमण्डलम । 


हेमादों स्कान्दे-प्रागुदीच्यायता रेखाः कुर्यादेकोनबिंशतिम्‌ [॥ खण्डन्डख्रिपद्‌ः कोणे शरद्डला 
प्रधमिः पढें! ॥ एकादशपदा बलीमद्वं तु नवत्िः पढेः ॥ चतुर्विशत्पदा वापी विशत्या परिषे: 


पदें!॥ मध्ये षोडशन्निः कोष्ठेः पद्ममण्ठद्ल स्मृतम्‌ ॥ श्रेतेन्डुः 


भरकर द्रवद्र्य तथा 3 द्रव्य ग्रासके बराबर छेने 
चाहिये । ब्रीहि, यव, गोधूम, प्रियंगु, तिछृ, शाली, ये 


कि 
नहीं हुआ करते पर दूसरोंके बदलूमें तंदुल आते हैं। 


ऋत्विकू संवरण-हेमाद्रिमें पद्मपुराणका वचन कहा है 
कि-अनेक सदगुणोंसे युक्त परम सुन्दर छोटी उम्रसे अध्नि 


होन्न करनेवाले सपत्नीक विद्वान ब्राह्मणकी भरी भांति 
पूजा कर फिर अनेक तरहके आभूषणोंसे अछंकृत करके| 
मुख्य पुरोहित बच्तवे, पीड़े दूसर ऋत्विजोंका वरण करे || ५ 


किक 


वे त्राह्मण भी सपत्नीक तथा चौबीस गुणोंसि युक्त, भहत 


स्वर्यभूने कहा है कि कोरे वस्रको 


ै वहां ही छिंग पुराणका 
न्ाह्णोंक वरण किया हो उनमें सबसे पहिर पुरोहितको 
जेख्े, पाग, कानोंके दो 
है) भणि बन्धका भूषण और आच्छादन पट 
सब कममोके प्रारंभसे ह 
जॉंको भी ये ही सब चीजे 
तजेजीन कहा हे किः 


करनेके पीछे उनसे कर सधुपकसे ऋत्विजोंकी पूजा 


अराना चाहिये, दिला: पूल के 


कुण्ड छ, केठका भूषण, अंगुलि- | 


| ही देना च (हिये | पीछे अन्य ऋत्वि- | 
'दूत्ती चाहियें। ब्र॒लांग मधुपकं- 





श्रद्चलाः कृष्णा वल्लीनीलिन 


| करानसे करानेबालकों पाप छगता दे।ऋत्विजोंकी संख्या- 
| हेमादिमें ही मत्स्यपुराणस लिखी है कि, सोनेके अछंकार , 
जेसक तेसे ही हृव्यके रूपमें छेने चाहिये, इन) प्रतिनिधि 


पहिने हुए पच्चीस ऋत्विज वरण करने चाहिये । उन 


| सबको बराबर और आचाय्येको इनसे दूना प्रसन्न करना 
| चाहिये , प्रन्थकार कहते हैं कि, द्विगुण तोषयेत्‌ का मतलब 


है कि दूनी दक्षिणास तुष्ट करें । 


सर्वतोभद्र मण्डल -हमाद्रिमें स्कान्दपुराणसे कहा गया 
हू कि, पूरबंस ओर उत्तरसे रबी लंबी उन्नीस उन्नीस 
रखाए बनानी चाहियें. भद्रके चारों कोनोंमें खण्ड चन्द्र" 


न | माका त्रिपदाकार तथा उसके आए चारों ओर पांच पदोंसे 

व्च [ अहत वद्बका क्षण-४ अहत यन्त्रनिमुक्तमुक्ते वास: | 

ध्वयस्भुवा | तच्छर्त साजलिक्येंषु तावत्कालं न सेदा | बनाना चाहिये। चौबीस पदोंसे वापी तथा २० पदोंकी 

अहत वस्त्र कहते हैँ वही | द 

माइक काय्योमे श्रेष्ठ नियतसमयको है | और साहा | 
पहिन हुए एवम्‌ अनेक प्रकारके पवित्र भूषणोंसे विभूषित | 
इंए हो उन्हें अपनी ओरसे छाप, छल्ले और छुंडछ देने | 


्‌ | बन जाते है । सो केसे बनते हैं? इसीपर लिखते हैं: कि 
वचन रखा है कि जिन 2 पक कक 


गड्डुछा बनावे, एकादश पदोंसे वल्ली तथा नौ पदोंसे भद्गन 
परिधि होनी चाहिये, बीचमें सोलह कोष्ठोंसे अष्टदल 
कमल बनाना चाहिये। उन्नीस उन्नीस आड़ी सीधी छकी- 
रोंक बनेहुए इन कोठोंमें रंग भरनेसे खण्ड चन्द्रमा आदि 


चन्द्रमामें श्वेत तथा शंखछाओंमें काछा, सब वल्षिओंमें 


| नीला रंग भरना चाौहिये। 
कम 22 ले जज शक मल जल लक लल मर कमीशन की लिन 


१ बृहज्ज्योतिषाणवके छठे स्कन्धके सत्रहव अध्यायमें अनेक तरह ह 
के भद्र बताये हैं तथा यह श्री वेंकदेश्वर प्रेसमें भद्रोंके चिन्रोंके साथ 
प्रकाशित भी होगय। है | जिस किन्‍्ही रे हाशयोंको भद्रोंके विषयकी । 


| विशेष जिद्बांसा हो उन्हें देखलेना चाहिये |. 


परिभाष! ] भाषादीकासमेत; | क्‍ ३३ ' 


प्रयेव ॥ भद्द रक्त सिता वापी परिधिः पीतवर्णकः ॥ बाह्यान्तरदलाः शखेताः कर्णिका पी 
णिक्वा ॥ परिध्या वेष्टित पद्म बाह्य सत्व॑ रजस्तमः ॥ तन्मध्ये स्थापयदेवान्जहाद्रांश झुरे- 
चरान्‌ ॥ इति सवतोभद्रपीठम्‌ ॥ 








अथ हछिड्गतोभद्रम । 
चतुर्विशातिरालेख्या रेखाः पराग्दक्षिणायताः ॥ कोणेषु श्रद्ध॒लाः पश्च पद वल्ल्यस्तु पाश्वतः ॥ 
परदेनवभिरालेख्याश्वतु भिलेघ॒श्ड्डला: ॥ लघुबलल्यः पद; पड्मिस्ततोषष्टादशन्निः पढेः ॥ कृत्वा 
लिड्रानि वाप्यः स्युस्रयोदशभिरन्तर॥ ॥ ततो वीथीदयेनेव पीठं कुर्याद्विचक्षणः ॥ तस्य पादा: 
पथ्वपदा द्वाराण्यपि तंथेव च ॥ एकाशीतिपदं मध्ये पद्म॑ स्वस्तिकझुच्यते ॥ कोणेषु श्वद्डलाः 
कार्या। पदेख्चिभिस्तत) परम ॥ परदेश्वतुमिरदिक्ष स्थुभद्राण्येषां समम्ततः ॥ एकादशपदा वल्टयों 
मध्येष्टदलमालिखेत्‌ ॥ पद्म॑ नवपद होव लिड्गतोमद्रमुच्यते ॥ श्वद्डलाः कृष्णवर्णन वह्ली 
नलिन प्रयेत ॥ रक्तेन शब्ला लघ्वीबंहीः पीतेन प्रयेत॥ लिड्ल्‍रानि कृष्णवणानि शखेतेनाप्यथ 
वापिकाः ॥ पीठे सपाद श्वतेंन पीतेन द्वारप्रणम्‌ ॥ मध्ये स्थ॒ु। शृंखला रक्ता वल्लीनीलेन पूर- 
येत्‌॥ भद्राणि पीतवर्णानि पीता पड़ुजकणिका ॥ दलानि खेतवण[नि यद्वा चित्राणि कल्पयेत्‌ ॥ 
तिस्नो रेखा बहिः कार्याः सि कफासिताः क्रमात्‌ ॥ 
अथ चतुलिड्ोद्धवम | 
लेड़े-रेखास्त्वष्टादश प्रोक्ताश्वतुलिड्गनसमुद्धवे॥को गरदुद्धिपदः शवेताख्रिपदेः कष्णःंखला;॥बल्ली 
सत्तपदा नीला भद्रं रक्त चतुष्पदम्‌॥ भद्रपार्थे महारुद्र कृष्णमष्टादशेः पढें! ॥ शिवस्थ पाश्वतो 
वापीं कुर्यात्पंचपदां सिताम्‌ ॥ पदमेक तथा पीतं भद्गवाप्योस्तु मध्यतः ॥ शिरसि शंखलायाकश्र 
कुर्यात्पीत पदत्रयम्‌ ॥ लिड्भाननां ध्कन्धतः कोष्ठा विशती रक्तवर्णकाः ॥ परिधि: पीतवर्णस्तु 


पढें) षोडशलन्निः स्मृतः ॥ पदेस्तु नवन्निः पश्चाद्॒क्ते पद्म सकर्णिकम्‌ ॥ 





भ्रम छाल, वापीम श्वेव, परिधिमें पीला, दढॉमें सफेद 
और कर्णिकाके कोष्ठकोंमं पीछा रंग भरना चाहिये । मध्य 
कमलछको परिधिसे पतिविष्टित करके बाहिर सत्व-रज-तम्त 
समझने चाहिये । इसके मंडलमें त्ह्मादि देवॉकी स्थापना 
: करके उनका वैध पूजन करना चाहिये । 


हिंगतोभद्र-पूरबस और दक्षिणसे लम्बी छम्बी चोवीस 
चौवीस रेखाएँ खींचनी चाहिये। कोनॉमें पाँच पद्की 
खट्डा बनानी चाहिये, पाश्चम नो पदोंसे वद्ली बनानी 
चाहिये | चारपदोंसे छोटी शट्ठछा बनानी चाहिये, छ: 
पदोंस लघुवबल्ली बनानी चाहिये, फिर अठारह पदोंसे छिग 
बनाना चाहिये, उसके भीतर तेरह पदोंसे वापी बनाना 
चाहिये, दो वीथियों से पीठकी रच ता होनी चाहिये । इसके 
पाद और द्वार पंचपदके होते हैं । मध्यम इक्यासी पदोंका 
पद्म होता हे जिंस स्वस्तिक भी कहते हैं| इसके बाद 
कोंनॉमे तीन पदकी झड्छछा करनी चाहिये । सब दिशा- 


जमे चार चार पदोके भद्र होते हैं, ग्यारह पद्लेंकी, वल्ली 


होती हैं ।-उन्तके बीचम अष्टद्छ कमछ होता है; इस प्रकार 


नौपद पद्मयका छिट्ठडतोभद्र होता: है; अड्डा कृष्णबरणशेस, 
व्डी'नीलसे, लघु शछूला छांखसें, बंदी पीठेस/“कृपणसे 


लिक् ओर श्ेतंसभी वापी तथा श्रेतस पादपीठ ओर पीतसे 
द्वारको भरना चाहिये । मध्यमें शझ्कछा छाछ हो और 
बल्लीको नीलेसे भरना घ्वाहिये, भद्र पीत वणके और कम- 
लकी कर्णिकार्म पीछा रंग तथा दढॉमें श्ववत अथवा चितक- 
बरा भरना चाहिये। बाहिर तीन रेखा होनी चाहिये, 
उनमें ऋमसे सफेद छारू ओर काछा भरना चाहिये | 


चतुलिद्ञतोभद्र-चतुलिद्गञ भद्र्में पूवकी तरह अठारह २ 


-रेखाय होती ह उनके कोणोंमें सफेद रंगका तीन पद्का 


चन्द्रमा बनावे; काछे रंगस त्रिपद्‌की बनी झखछाकों 
भरना चाहिय, सप्त पदुकी वल्ली नीले रंगसे भरना एवम 
चार पदका भद्र छाल र॑ंगस भरना चाहिये | अठारहपदोके 
भद्रणारवेन कृष्णमहारुद्र तथा उनके पाश्वमें पांच पदकी 
वापी बनानी चाहिये । जिसमे श्वत रंग भरना चाहिये भद्र 
और वापीके बीचका पाद पीछे रंगका होना चाहिये तथा 
श्खलाके शिरेक तीन पादभी पीछे रंगके होने चाहिये । 
लिड्ञोंके स्कन्धरमें आये -.हुए बीस कोष्ठ छाऊ रह्धके होने 

हिय, सोलह पदोंकी परिधि पीछे रज्ञकी होनी चाहिये | 
पीछे को पदोंस कर्णिका सब्चित क्वाल ग्डप्का-कमल:बंनालां 
चाहिय'। ... 


अथ द्वादशलिगोड्भवम्‌ । 

तत्रेव--प्रागदीच्यायता रेखाः षट्जिंशद्धि प्रकल्पयेत्‌ / पदालनि द्वा 
च्‌॥ खण्डेन्दरद्विपदः कोणे शृंखला; पट्पदें! स्मृताः ॥ त्रयोदशपदा वह 
त्रयोदशपदा वापी लिड्रमष्टादश स्मृतम्‌ ॥ «लिड्भत्रयस्य_पेक्तों ठुं शोभाकोष्ठ श्रत॒देश ॥. 
तेषामुपरि पंक्तो तु कोष्ठा! सत्तदशेव तु ॥ पूजापक्तिस्तु विज्ञया परितः पंरिकीर्तिता ॥ पूजा- 
पेक्तयन्तरा पेक्तों कोष्ठा द्यशीतिसंख्यया ॥ परिधि! स च विक्षेयो मण्डले ह्ान्तरा द्वयोः॥ 
परिध्यन्तरकोष्ठेषु सबतोभद्रमालिखेत्‌ ॥ विशेषश्वात्र वित्षयः श्रृंखला ष पदा भंवेत्‌ ॥ चयोदश* 
पदा वल्ली भद्दे तु नवनिः पद! ॥ पश्वविंशत्णदा वापी परिधि! षोडशात्माकः ॥ मध्ये नवपद॑ 
प्म॑ कणिकाकेसरान्वितम ॥ सत्तं रजस्तमोवर्णाः परितो मण्डलस्य तु॥त्रयः परिधयःकायो स्तत् 
द्वाराणे कारयेत्‌ ॥ सितेरदुः श्रेंखला कृष्णा वल्ली नीला प्रकीतिता ॥ भद्दे चेवारूणं क्षेयं वापी 
स्याच्छवेतवणिका ॥ लिड्रानि कृष्णवर्णानि पाश्वतो द्वादशेव तु ॥ परिधिः पीतवण्णेः स्यात्कमहं 















द्रादंशश्त पश्चविंशतिरेद 
| भद्रं तु नवन्निः पदे।॥ 


पश्चवणकम्‌ ॥ इति सर्वेतोभद्रलिड्गतोभद्वारिमण्डछानि।मय स्वेतोभद्रंडिंगतोभद्रमंडलविभाग:॥उच्यते- 

शिवत्रतं विना सर्वत्रतोद्यापनेषु सर्वतोभ्द्रमण्डल॑ कारयेच्छिवत्रते तु लिड्गतोमद्रमालिखेत | 

तत्र कारिका ॥ बाहुमात्रायतां वेदीं रुर्याच्छुद्धम॒दा बुध! ॥ तद्वेयां सर्वतोभद्रं मण्डल विलि' 

वेत्तत;।शिवत्रते,, तत्रेव लिड्गतोभद्रमालिखेत्‌ ॥ तन्मध्ये स्थापयेदेवान बअह्मायांश्र सुरेश्वरांव॥ 
अथ मण्डलदेवता; | 

तन्मध्यें बह्माणम्‌ ॥ बहाजज्ञानं गौतमो वामदेवो बहा त्रिष्टुप॥मध्ये बह्मावाहने विनिग्ोग॥ 


>अहाजत्ञानं प्रथम पुरस्ताद्विसीम तः सुरुचो वेन आव१सबु नया उपना अघ्य विष्ठाःसतश्चयोति 


मसतश्व विवः ॥ भो ब्रह्मद इद्दगच्छ इह तिष्ठ पूजा गहाण मम संमुखः सुप्रसन्नो वरदो भव ॥ 
कक न तप कम न मम आम शी 


 द्वादशढिज्लोडव-पूरव ओर उत्तरस छत्तीस छत्तीस 
रेखायें बनानी चाहिये। सबमे बारह सौ पश्चीस पद होंगे, 
कोणपमें तीन पदोंका खण्ड चन्द्र, छःपदोंकी श्रृखछा, तेरह 
पदोंकी वही एवं नौ पदोंका भद्र, तरह पदोंकी वापी तथा 
अठारह पदोंका छिड्ढ होना चाहिये | तीन छिल्गॉकी 
पक्तिमं--चौद॒ह शोभा कोष्ठ होने चाहिये उनकी ऊपरकी 
पांतम सत्रह कोठोंकी पूजा पंक्ति चारों ओर होती है। पूजा 
पंक्तिक भीतरवाली पंक्तिम बियासी कोठोंकी परिधि होती 
हैं; यह दोनों सण्डलॉके बीचसें होती है। परिधिके भीत- 
रके कोठोमें सवेतोभद्र लिखना चाहिये। इसमें विशेषता 
यह है कि छपदोंकी शंखलछा, तेरह पदकी वही, नौपदका 
भद्ठ, पच्चीस पदुकी परिधि होती है। बीचसे नौ पदका 
पद्म होता है । सत्तोगुणके इवेल, रजोगुणके छाछ, तथा वमो- 
शुणके काले रज्ञको संडलके चारों ओर परिधि बनानी 
चाहिये। इनमे द्वारभी बनाने चाहिये। भ्रेतरड्का चन्द्रमा, 
फाकरइकी शड्भेा, नीलेरइुकी बही बनानी चाहिय । 
डे हक भद्र तथा स्वेतवणकी वापी बनानी चाहिये। 
बेटी परिचि हे बा लि बनाने चाहिये । पीत- 
कई के कप पचरंगा कमछ बनाना चाहिये। 
तोसद मण्डड बनादा खार 
(जिकप ७ $....... 'पादिये। पर शिवत्रतोंके उद्यापनोंमें 





अतोंके उद्यापनोंमें सवे- | विस 


वेदी बनानी चाहिये उस वेदीपर सर्वेतोभद्र मंडल लिखना 
चाहिये ओर शिवन्नतोंमें लिंगतो भद्र मेडल बनाना चाहिये; 


'उसके बीचमें जअद्यादिक देवता तथा इन्द्रादि देवोंको 


स्थापित करना चाहिये ! 


मण्डल देवता-सबसे पहिले मण्डलक मध्यमें अद्माजीको 
स्थापित करना चाहिये, “त्ह्म जज्ञानम्‌”? इस संत्रका गौतम 
वामदेव ऋषि हे । अद्य[दिवता है त्रिष्ठुपू छ्न्द हे मध्यमें 
ब्रद्मके आवाहनकें इसका विनियोग होता है। जिस 


वाक्यके अन्तमें विनियोग आबे वहां स्रीधे हाथमें पानी 


लेकर विनियोगान्त पद्‌ समुदायको बोछकर पानी भूमि 
पर छोड देना चाहिये | यह सब जगह समझना चाहिये। 
न्रह्म ज्ञान प्रथमम्‌ इस मंत्रको बोककर ब्रह्माकी स्थापना 
करनी चाहिये मंत्रका अथे-(१) पहिछ सर्व प्रथम त्रद्बाजी 
>त्पन्न हुए थे जब इन्होंने वपस्यासे भगवानके दशन करके 
वन पद्‌ पालिया उस समयमें कान्तदर्शी दोगये, पढ़े 
उन्होंने नियमित रूपस सुन्दर प्रकाश शीछ देवता रवें 
तथा जो वस्तु हम देख रहे हैं एवम्‌ हमारे जो दृष्टि गोचर 
नहीं हैं उन सब वस्तुओंको और उनके कारणोंका इसीने 


फ्रेहस चाहिये, इस विषय इसकी बराषरीका गा नहीं है ॥ दे अक्षान्‌ ! यहां 
इसाण है कि,विंदाक्को बाछुके धरावर कब गज िगक लक कु यहां बेठो, भरी पूजाको अहण करो, मेरे सन्मुख 


!ी 


तार दिया था। ऊपरके भ्री लोक इसीने रखे हैं। 


! अंकी भाँति एसस होकर परदान देसेसषटे, हो ।। 


परिभाषा, | 


भाषाटीकासमेतः 


न्‍अशकलनथ& 5०2नलाला पक पक डक न_ कान न_- नल न. 





वाय्वन्ता अष्टो लोकपालाः स्थापनीय॥३ ॥१॥ तत्र आप्पायस्व राहुगणों गौतम; सोमो गायच्री 
सोमावाहने विनियोगा+ ॥ ओम्‌ आप्यायस्व समेत ते विश्वतः सोम दृष्ण्यम्‌ ॥ भवा वाजघ्य 
संगथ ॥ २॥ अभि त्वाइजीगर्ति। शुनः शंप इशानो गायत्री ॥ ऐशान्यामीशानावाहने वि० 
ओम अभि त्वा देव सवितरीशानं वायाणाम॥।सदावन्भागमीमहे ॥३॥ इंद्र वो मधुच्छन्दा इन्द्रो 
गायत्री॥ पूर्वे इन्द्रावाण॥ ऑइन्द्रं वो विश्वतस्पीरे हवामहे जनेम्य॥अस्माकमस्तु केबलशा ४ ॥ 
अग्ने दूतं काण्वो मघातिथिरमप्रिगायत्री आम्रेय्यामग्न्यावा० ॥ ओम अश्रि दूल॑ इजीमहे हो 
विश्ववेद्सम्‌ ॥ अस्य यज्ञस्थ सुक्रतुम ॥ ५ ॥ यमाय सोम॑ वेवस्वतो यमोइउलुष्ठप ॥ दक्षिणे 
यमावा० ॥ ओम यमाय सोम सुठुत यमाय जुहुता हविः ॥ यम ह यज्ञो गच्छत्यप्रिदूतो अरे 
कृतः ॥ ६॥ मोषणों घोरः काण्वों निक्रुतिमोयत्री/निक्रेत्या निक्रत्यावा०॥ ओम सोषणः परापरा 
निऋतिदुहेणावधीत ॥ पदीड़ तष्णया सह ॥७॥ तत्वायामि शुनःशेपो वरुणश्चिष्ठप्‌ ॥ पदश्चिमे 
वरूणावा० ॥ ३*तस्वा यामि बहाणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानों हविभिः ॥ अहेव्यमानों 
वरुणेह बोध्युरुशंस मा न आयुः प्रमोषी३ ॥ ८ ॥ वायो झार्त वामदेवों वायुरलुछ॒प्‌ । वायव्याँ 
वाय्वाबाहने विनि० ॥ वायो शत हरीणां सवस्व पोष्याणाम्‌ । उत वा ते सहझ्िणोरथ आयात 
पाजसा ॥ ९॥ वायुसोमयोम॑ध्ये अष्टो वसव:॥ ज्मया अन्र मेत्रावरुणों बसवस्थिष्टप वायुसोम 
यांमध्ये वस्थावाहने वि० ॥ ज्मया अत्र वसवो रन्त देवा उरावन्तरिक्षे मर्जयन्त शुश्रा३॥ 











श्रीत्रद्माजीकी तरह और भी सब देववाओंका आवाइन 


कप्स उत्तर, इशान कोण, 


उत्तरमें सोमके आवाहनम इपत मंत्रका विनियोग किया है 


जो अनेक कामनाओंका देनेवाला भाव है वो सब ओरस 
प्राप्त हो, हमें अन्नके साथ संगम करानेके डछिये यहां प्रति 


हो पर यहां इसका अर्थ चन्द्रमाके पक्षम होना चाहिये 
जिसके कि उत्तर स्थापनमें इसका प्रयोग किया जा रहा 


हैँ । इसके बाद वही पूवकी विधि होती है कि हे सोम यहां | 
आओ) यहां बैठो, पूजा ग्रहण करो, हमारे सामने होवो | 
ओर प्रसन्न हो वर दो | यही बात हर एक देवताके विष- | 


यमें समझनी चाहिय ।॥| “ अमित्वा ” इत्यादि जो मंत्र हे; 


वाले देव तुम वरॉके इशानको तुम्हारा भाग देते हो, आप 


हमारी सदा रक्षा करे।। “४ इन्द्रेवो” इस मंत्रके मधुच्छन्दा' 
ऋषि है, इन्द्र देवता है; गायत्री छन्द्‌ हैं, पूवर्म इन्द्रके | 


आवाहनमें इनका विनियोग होता हे (४७) हमारे हिंये 


वो हमारे लिये केवछ हों। “अश्निंदुत'' इस संत्रका काण्व 
५ 


| देवता हैं, 
इन्द्र ही सब जनोंसे बडा है, हम इन्द्रको ही बुढाते हैं, | 





| मधातिथि ऋषि है, अप्नि देवता हे, गायत्री छन्‍्द है, अप्नि 
करना चाहिये, इसके पीछे आठों छोकपालोंको शाल्योक्त | 
पूरव, वहि कोण; दक्षिण, | 
नेऋत्यकोण, पश्चिम, वायव्य कोग: इन आठों दिशाओंमें | 


स्थापित कर देना चाहिय “आप्यायरव” इस मंत्रका | इस यज्ञके अच्छे करनवाड है, उन्हें हम वरण करते हैं।। 


राहुगण गौतम ऋषि है, सोम देवता है, गायत्री छन्द्‌ हैं, | “यमाय सोसम्‌ ”! इस मंत्रका वैवस्वत यम देवता हैं, तथा 


| वही ऋषि भी है, अनुष्टुप्‌ छल्द है, दक्षिण दिशामें यमके 
(२) मंत्राथ-हे सोम | हमें बढाओ आप भी बढो, आपका | 


कोणर अग्निके आवाहन करनेमें इसका विनियोग करते हैं, 
( ५) सबको जाननंगाले अथवा अखिल धनवाले देवदूल 
तथा सब देवताओंके बुलानेंवाले अप्नि देवको जो कि हमारे 


आवाहनस इस्तका विनियोग होता है ( ६) यमके लिये 


| सोमका हवन करो, यमके छिये हविका हवन करो, क्‍यों 
| कि परिद्प्त अग्नि, अलंकृत होकर उन्हें बुलाने चछ दिया 
छ्वित हो जाओ ! चाहें कहीं इसका कुछ अथ किया गया | 


है॥ “' मोबुणो ” इस संत्रका घोरका पुत्र काण्व ऋषि है, 


| निऋति देवता है, गायत्री छन्‍्द है, नेऋत्यकोणमें निकऋ- 


तिक आवाहनमें इसका विनियोग होता हे ॥ ( ७) दुह्ेणा 
निऋति अपने तृष्णाक॑ साथ हमसे सदा दूर रहे, हमें 
कभी न मारे, यहां अपनी जगह बेठ जाय ॥ “तत्त्वायाप्मि” 
इस संत्रका शुनशिप ऋषि है, वरुण देवता हे त्रिष्डुपू छन्‍्द 


| है पश्चिममें वरुणके आवाहनम इसका विनियोग होता 
इसका अजीगतका छडका शुनःशप ऋषि हैं, इशान देवता | 


हैं, गायत्री छन्द्‌ है, इंशान कोणमें ईशके आवाहनमें इसका | 
विनियोग होता है (३ ) हे सबके सविता-उत्पादन करने- | 


है (८ ) यजम्तान हवि आदि पूजनके द्वारा आपसे ही सब 
अशाएं किया करते हैं, में भी आपको यहां आवाहन 
करनेक लिये तथा अपनी रक्षाके लिये प्राप्त हुआ हैँ, हे 
वरुण देव , आप श्ञान्त चित्तसे मरी प्रार्थनाएँ झुनिये॥ 
मेरी आयुको नष्ट मत्र कीजिये यानी मेरी आयुको बढाइये ॥ 
“ ओमू वायो शतम्‌ ” इस मंत्रक[ वाम्देव ऋषि है वायु 
नुष्टुपू छन्द हैं; वायव्यर्मं वायुके आवाहनमे 
इसका विनियोग होता है (९) में आपको यहां पूजना- 


| दिके छिय बुला रहा हूँ, है वायो | आप अपने पछे पता 





ब्रतराज$ । | ध्षामान्य- 














धका 22552 क72/7%१ है 2६ कक प्ररीलत 4: 0) कक रत 700 ७ ८2% 7: ५4: 
487/78578%ए:८72777 6:75 22/#%/:/% 77776 8 एक: ६ 


अवोक्पथ उशूजयः कृणुध्व श्रोता दूतस्यष जग्जुषो नो अध्य ॥१०॥ आरद्ासः 
दश रुद्रा जगती ॥ सोमे शानयोम ध्ये पकादुर उदय ॥ ओम आरुद्रास 
हिए्ण्प्थः खुविताय गन्तनाइये वो अस्मत्नति हथते मतिस्तृष्ण बच 
त्यां ठ मत्स्य! सामदो दादशादित्या गायत्री ॥ गोमध्ये दर (दशा दित्यावा०॥ ओम त्षां 
न क्षत्रियों अब आदित्यान्याविषामहे ॥ सुधुब्यीकोँ अभिष्ठये ॥ १२ ॥ 


०५) 


। 
गोतमो5खिनावुण्णिक्‌ | इन्ड्राग्ग्योमध्ये अश्वयावा[० ।। ओम 2 खिनावारतिर स्मद 





22:22 222 शा 8 8 32200 50200 260 72/05/6770: (24000, "०५ 
3- #>ककर पाम्पभाकाक... कक हू सजा... मा उसआआ भरमणमाभावताभीमानाका ७०३ /०५००ककाक८क, लि दशा 


20008 20 0/4270 0 80 23000, 02002, 62% 000 2॥2/0 70600 80 2 
७७७७७ ७७७७॥एएरथांजाआआाणणणणाणणानशााााााभ 





च्छ् 


श्यावाश्व॒ एक 











ब॒त्‌ ॥ अवार्श्थ समवस्ता नियच्छतम्‌ ॥ १३ ॥ ओमासो मधुच्छः्दा विशेदेया गायत्री ॥ अग्न 


यमयोमेध्ये विवेदुवावा० ॥ ओम ओमासश्रैणीषृतो विश्वेदेवास आगल ॥ दाइवांसो दाशुप 


इन्द्रवन्त सजोषसो क्‍ 
जैन दिव डत्सा उदन्यवे॥! 


अश्विनावार्ति राहूगणो 
मदख्ाहिरष्य 


सुतम्‌ ॥१४॥ अने त्य देव गोतमों बामदेवः सप्तयक्षा अष्ठी। यमनिक्रेत्योर्मध्ये सत्तयक्षाबाण। . 


ओम अछि त्ये देव सवितारभोण्योः कविक्रतुमचामे सत्यसव रत्नधोमन्नि जिये मारते कविम| 
उध्वां यस्थामातिभों अदिद्ुतत्लविमनि हिरण्यपाणिरमिमीत सुक्रतुः कृपास्वः ॥ १५॥ 


आयंगोः सापराज्ञी सपी गायत्री ॥ निर्दतिवरुणयोम॑ध्ये सपीवा० ॥ ओम आयंगौः पृश्चिरक्रमी । 


दुसद॒न्मातर पुरः ॥ पितरं च प्रयन्त्मः ॥ १६ ॥ अप्सरसामेतश ऋष्यश्वक्गो गन्धर्वाप्सा: 
सोःतुष्ट्यू ॥ वरुणवाय्वोमेध्ये गन्धर्वाप्शरलामाबा० ॥ ऊ अप्सरसा गन्धर्वाणां भुगाणां चरणे 
चरन्‌ ॥ केशी केतसर्थ विद्वाग्सखा स्वाइर्मदिन्तमः ॥२७॥ यदुऋंद ओचथ्यो दीवेतमा स्कन्‍द 








हजार घोडोंको रथमें जोडदो, आपको लिये हुएः अनंकों | हे. एक मनवार देखने योग्य अश्वितरी कुमारों ! 
घोडोंका जुता जुताया रथ वेगके साथ यहां आजाय ! वायु | सोनेके झिलमिछाट करनेवाछे रथको सामने छे आभो ॥ 
और सोम दोनोंके मध्यमें अष्टावसु स्थापित करने चाहिये।। | ओमास ” इस संत्रके मधुच्छन्दा ऋषि हैं, अग्नि और 
ब्सया अन्न” इस मंत्रके मेत्रावरुण षि हैं, ऋत्िष्टुपू | अ्के बीचमें विश्वेदवाओंके आबाहनर्थ इसका जिनियोग 
उन्द है, वसुदेवता हैं, वायु और सोमके बीचर्से वघुओंके | होता है (१४ ) हे विश्वे दवाओ ' तुप सबके रक्षक हो 
आवाहनमें इसका विनियोग होता है ( १० ) यह आपके | मल॒ष्योंके धारण करनेवाले हो आप यजमानों क्र पुत्र दिया 
विराजनेकी जगह है। हे भूमिपर विचस्नेत्राले बसु देवो ! | े 
यहाँ स्मण करो। है उंद्रो : इस विस्तृत अन्तरिक्षमें आप | सोपको पीनेके छिये यहां आओ और अपने स्थानपरविरा- 
बिचरते हो । मर भर देततग बुछावा, सुन लिया | जमान होजाओ ॥| ' ओमू अधित्ये देवे ” का गौतस वाम' 
खाबाश्व॒ ऋषि है, ग्यारह रुद्र देवता हैं, जगती छन्द है, |. "मे साव यक्षोके आवाहनमें इसका विनियोग 
सोम और ईशानके बीचमें एकादश रुद्रॉंके आवाइनसे होता है ( १५ ) से उस सामनेवाले पूयका पूजन करता 
इसका विनियोग होता है ( ११ ) इन्द्रवाढे परस्पर प्रेत ्क 
रखनेवाल, सोनेक रथवाढे ग्यारहों रुद्र इस मेरे यज्ञप | भीतर प्रकाश शील हैं वो भेरे मनोरथोंका पूरा कर॥ “आये 
आजाओ, यह भेरी स्तुति आपको चाहती है, जैसे कि, | गो ” इस संत्रकी सापराज्ञी ऋषिका है, सर्व देवता हैं। 
पानी चाहनेवाढे, गौतमके छिय आपसे मेघ भेजे थे उसी | 





35833 गे । कि 2 इस क्‍ लि होता है (१६) जो कि अपनी शीघ्र 
है १२) सुख देनेबारे हा इतका विभियोग होता रप चलजाते है एसे अ 

६ (१२) मुख आल पतनस रक्षा करनेवाके जो आदिस्य | अपने 

दल व अको चाचता हूं कि वो मे रक्षा करें त्रथा | 
यह. कसर गत सुनते, सरी सनोकाननाको पूरा | 
अ “अनोजात ! इस संन्नके राहुगण गौतम ऋषि 


दे । अश्विदी इबताहें 5 क ऋट्छ ेे | 
नम उनके पी उन्दू हूँ, इन्द्र और अप्निके 
. 7+न इसका विनियोग होता हे (१३) 


| योग होता है । ( १७ ) अप्सरा ओर गंधर्वोंके विचरनेके 


हक 
स्थान ७ ६ सि ६28 हो. ब्श्ाछ क सनषकन लत ०... 


| रत हो सकलप करके देनेवाले यजमानक्के सबन किये हुए. 


| 4 । इसमे कान्त दृ्शित्व आदि अनेक गुण हैं, जिसकी कि. 
मे छ्ु 22 3 प्र ९ ५ मी दूं: हैः 
| प्री छन्‍्द ह।निऋति और बरुणके बी चमे सर्प देवताक 


का अनेक तरह सप देव मेरे साममें । 
|. आानपर पूजाके छिये विशजमान होजाओ।॥ “अप्स- 


| कप एम ” इस मंत्रके ऋष्यश्ज्ञ ऋषि हूँ, गंध 
। है हे को. द्वंता हअलुष्ठु प्‌ छन्द्‌ है,वरुण और वायुके 
| थोग ह. ओर जप्सराओंक आवाहनमें इसका विनि, 


20254 अप पिकन क कम ध>483202 200:572/: 24:42 220 22000. 202 02% 30022: 50% 232: 2 ४ का 770 कक 7७ 8:२००००7०४:: ०,८20 277 27 2%(४०72:7 04/72/2725 70022:0 003 77427: क2277000, 2 077782/ 72777: 630 2:0फ:%0077 7:23 3 02:07 02026: 





छ्िष्टप॥बहासोम य स्कम्दाबा०। कलह यदऋः्दः प्रथम जायमान उद्यचुसहझद्रादुत वा पुरी- 
षात ॥ इयेनस्यथ पक्षा हरिणस्थ बाहू-उपस्तुत्यं महि जाते ते अबन हे १८ ॥ तज्रंब ऋषभ्म । 
ऋषल मां वेराजों नन्दीखरोपुफ़प्‌ ॥ उहासोमणय अध्ये नन्‍्दीशराबाण/ओब कषम भा समानानां 
_ सपत्नानाँ विषासहिम्‌ ॥ हन्तार शत्रूणं कृापे दिरज गोपलिं गवामू॥२०शकडुद्ाय घोरः क्ाण्वः 
शूलो गायत्री ॥ तत्रेव शूलाबाण'ौआओम कटु॒द्राय घचेतले मीब्हुष्टमाय नव्यसे ॥ बोचेम शंतमं 
हे ॥९०॥ कुमार कुमारों महाकालखिटष्टप्‌ ॥ तत्रेव महाकालाबा०्पेओम्‌ कुमार माता शुवतिः 
समुब्ध॑ गृहा बिनति न ददाति पित्रे ॥ अनीकमस्य नमिनलनासः पुरः पश्यान्त निहितम- 
रतों ॥ २१॥ अद्तिलोक्यो दृहस्पतिदक्षोग्लुष्टपए ॥ बल्लेशानयोन॑ध्ये दशादिसत्तरणाला० ॥ 
आदितिहाॉजानिष्ट दक्ष या हृहिता तब॥ ताह्देवा अन्वजायन्त नद्रा अक्यृुतबन्धबेश हे २२ ॥ 
तामग्रिवर्णा सौभारिहेर्गां जिष्ट प्‌ ।बह्चेन्द्रयोर्म ध्ये दुगो .॥ओस्‌ तामप्रिवणों तपला ज्वलस्तीं वेरो- 
चनीं करमफलेष जझ्ुष्ठाम ॥ ढुगा देवीं शरणमह म्पदे! सुतरासितरसे नमः ॥ २३॥ इद विष्णु 
काण्वो मेघातिथिविष्णुगायत्री ॥ बहोन्द्रयोम॑व्ये विष्ण्वादा० ॥ ओम इब विष्णुविचक्रमे त्रेधा 
निदधे पदम्‌ ॥ समूब्हमस्य पांसुरे ॥ २० ॥ उदीरतां शेखः स्वधा तिष्टप्‌ ! बह्ाग्न्योमेध्ये 








स्चावा० ॥ ओम उदीरतामबर उत्परास उस्मध्यमाः पितरः सोम्यासः 





शेसोंका आस्वाद करलेनेवाला हे, अत्यंत तृप्त हे वो अप 
रायें और गन्धर्वोको यहां लाकर विठादें “ओम यद्ऋन्‍्द?! 





॥ उस थे इंयुर 


जन सामने देखते है ॥। ' आदिति' इस मन्त्रका छोक्य 
बहस्पति ऋ"षि 


दक्ष देवता है,अनुष्टुपू छन्द हैं,त्रह्मा ओर 


इस मन्त्रका औदश्य दीघंतमा ऋषि है, स्कन्द देवता तथा | शिवके बीचमे दक्षादि सप्त॒ गणोंके आवाहनमे.. इसको 


'त्रिष्टुपू छंद हे, ब्रह्मा और सोमके बीचसे स्कन्दके आवा- 
हसम इसका विनियोग होता है ( १८) है अत्यन्त बेग 
वान स्कन्द | आपके जन्‍्मकी सबको प्रशशा करनी 
चाहिये । सबकामोंक पूरक शिवजी मह।राजसे पेदा होते 
ही तारककों छछकारते हुए चनघोर गजना की थी | युद्धके 
समय जो तेजी वाजके पंखोंमें होती है दो आपके हाथोंमें 
है। जसे हिरण चॉकडी साग्ता हे ऐसे ही आप बेरीपर 
झपटते थे ।| “ऋषभेजा” इस मन्त्रका वेराज ऋबभ ऋषि 
है, नंदीश्वर देवता है, अनुप्टुपू छन्‍्द है, ब्रह्मा और सोम 
के बीचमें नन्दीश्वरकें आवाहनमें इसका विनियोग होता! 
है ( १९) हे नन्दीश्वर | जसे आप हैं उसी तरह मुझे भी 
यहां आकर बराबरवाछोॉमें सबसे श्रेष्ठ ब्रथा बेरियोका 
असझह्य तथा मुझे मारनेकी चेष्ट। करनेवाढॉका मारनेवाढा 
एवं. गझओंका बड़ा गोस्वा मी बनादें | ''कड्द्राय'” इस 
मन्त्रका घोर काण्व ऋषि है, ( ये शकुन्तछाके पोषक- 
पितासे भिन्न हैं) शूछ देवता है, गायत्री छन्द हें, वहां 
शूलके आवाहनम इसका विनियोग होता हैं (१० ) सबके 
जाननेवाले; दष्ठोंकी भगानवारू, भक्तोकोीं सींचनंवाले 
पापके नाश करनंवाके अत्यन्त सुखरूप शिवके छि 
इयसे अनक बार कहते है कि यहां आइय ॥ “कुमारम्‌ ' 
इस मंत्रका आज्रेय कुमार ऋषि हैं. सहाकाछ देवता हूं 
आ्रिष्टप्‌ छंद है | वहाँ ही महाकाछफके आवाहनसे इसका! 
विनियोग होता।हैं (२१ ) युवती माता भल्ठी भांति छिपा 
कर रख हुए जिस कुमारको गुहासें धारण करती हू 
पिताक लिये नहीं देती जिसकी युद्धमें बढी हुईं सेनाको 


विनियोग- होता हे (२२ ) हे दक्ष | भापकी दुहिता जो 
अदिति उत्पन्न हुई थी उसको सम्वन्धस ही अम्नत पीने- 
वाल भद्रदेव आदित्य उत्पन्न हुए थे अथवा हे दक्ष - 

आपकी छड़की अदितिने जो आदित्य पेंदा किये उन्होींके 
पीछे अमृत पीनवाछ सब देव पंदा हुए हैं ॥ “तामम्ि- 

वर्णाम्‌” इसका सोभरि ऋषि है, € यह गोत्रकार अगि- 
राकी परंपरामें हे, आदिस्रने इनके वशोपवंशको भी 
बुलाया था; इनका ऋग्वेदर्म इतिहास हैं, ये एक विशिष्ट 
गौडवशके प्रधान हैं, ) इस मंत्रकी ढुर्गा देवता है; त्रिष्टुप्‌ 
छन्द है; ऋह्मा और इन्द्रक बीचमें दुर्गके आवाहनसे इसका 
विनियोग होता है ( २३ ) कर्म पछोंके निश्चित्त पूजीजाने 
वाली अग्िके वणकी तश्श तपसे देदीप्यसान हुई बेरोचनी 
दुर्गा देवीके शरणको में प्राप्त हुआ हूँ, अच्छे वेगवाल्ी 
देवि ! तेरे बेगके छिय नमस्कार है; आप हमें अच्छीतरह 
पार लगा दे ॥ “इद विष्णु” इस मन्त्रका काण्व मेधातिथि 
ऋषि है, विष्णु देवता है, गायत्री छन्द्‌ है; ब्रह्मा और 
इन्द्रके बीचमे विप्णु भगवानके आवाहनमें इसका विनि 

योग होता है ( २४ ) इन श्री विष्णु भगवान्‌ महाराजने 
वासनावतार छूकर बिक दान छनके लिए तीन डैंग भरे 
थे, तीसरा डैंग घूरि घूषित वल्िक शिरपर रखा था, ऐसे 
ये बिष्णु भगवान हैं। “उदीरताम! इस मन्त्रका शांख ऋषि 


है। स्वधा देवता है त्रिष्टुप्‌ छन्द हैं पितृओंके आवाहनमें 


इसका विनियोग होता है (२०) इस लोकमें परलोकम्त 
ओएर मध्य छोकमें जो पिन्रेश्वर स्थित स्वधा तथा सोम 
संपादक हैं वे ऊँचेके छोकोंमेँं चछ जाय । जो, 
निःसपत्न सध्यके जाननेवाले हैं, जिन्होंने असुको प्राप्त 


(२८ ) 


ब्रतराजः । सामान्य- 


५; असम रकम ा€ १कठ कप 6३४ हट टिएआए कं अ कर 2:27 टेट 7क्‍:677:04/ 27677 
(४८ 


वुका ऋतत्ञास्तें नोःवन्ठ॒ पितरों हवेइ ॥२५॥ पई मृत्योः सकुंखकों मृत्युरोगास्त्रिष्दुप्‌ । 
बरह्ययमयोग॑ ध्ये मृत्युरोगाव[० ॥, पर ६९ अहछु परेहि पथाँ यस्‍्ते स्व इतरो देवयानाद्‌॥ 
चक्षुप्मते धष्वते ते बवीमि मा नः प्रजा रीरिषों मोत वीरानू ॥ २६॥ गणानों त्वा शोनको 
गत्समदो गणपतिजंगती ॥ बहानिकत्योमेध्ये गणपत्यावाणाओम गणानां त्वा गणपातिं हवा- 
महे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम्‌ ॥ ज्येष्टराज बह्मणां ब्रह्मणस्पत आनः #ण्वन्नातिमिः सीद 
सादनम्‌ ॥२७॥ शत्नोदेवीराम्बरीषः सिन्धुद्वीप आपो गायत्री ॥ ब्रह्मवरुणयोम॑ध्ये अबावा० ॥ 
ऊ हां नो देवीरभिष्टय आपो भवन्‍्तु पीतये। श॑ योरभिल्लवन्तु न: ॥२८॥ मरुतों यस्य राहगणो 
गोतमो मरूतो गायत्री ॥ बहायवाय्वोर्मध्ये महदावा० ॥ ७ मझतो यस्य हि क्षये पाथा दिवो 
'वेमहसः।स सुगोपातमोजनः ॥ २९ ॥ स्थोनाप्राथेवी काण्वों मेधातिथिभूमिगांयत्री ॥ ब्ह्मण' 
पादमूले कर्णिकाघः परथिव्यावां० ॥ ऊँ स्पोना एथिवि भवानृक्षरा निविशनी ॥ यच्छा नः शर्म 
सम्रथ॥३१०॥३म मे गड्ढे सिंघक्षितेयमेघों गंगादिनद्यों जगती॥तत्रेव गंगादिनग्यावा० ॥ ओम मं 
मे गड्ढे यमने सरस्वाति शुठ॒द्वि स्‍्तोम॑ सचता परुष्ण्या॥ आसिकत्या मरूटब॒धे वितस्तयाजीकीो , 
श्रण हवा सुषोमया ॥३१॥ धाम्नों गोतमों वामदेवः सप्त सागरा अष्टी ॥ तत्रेव सप्तसागरावा० ॥ 
> धाम्नो धाम्नो राजब्रितों वरुण नो सुथ्वायदापो अध्य्या इते वरुणेति शपामहे ततो वरुण 
नो मुझ्या। मयि वापोमोषधीहिं सरितो विश्वव्यचाभूस्त्वेतो वरूणो मुझ्च ॥ ३२ ॥ तद॒परे मेरू 
नाममंत्रेण पूजपेत ॥ मरवे नमः | मेरमावा० ॥ ततो मण्डलाइहिः सोमादिसात्रियों तत्क्रमेणा- 


कर लिया है; वे हवॉमे मेरी रक्षा करें। अथवा उत्तम 
मध्यम और अधम जितने भी पिन्रेश्वर हैं, वे सब हमारी 
ह॒विको ग्रहण कर हमसे अनुकूछ रहें। जो £सत्यक जान- 
नेवाले हैं वो हमारे प्राणोंके रक्षक हों ॥ “पर॑ मृत्यो” इस 
मन्त्रका संकुसुक ऋषि है, मृत्यु और रोग देवता हैं । बहा 
और यमके बीचमें स॒त्यु और रोग बिठानेम इसका विनि- 
योग होता है। (२६ ) हे मृत्यु और रोगो ! आपका जो 
रास्ता देवयान पथस भिन्न पितृयान है, उसपर आप जायें 
कान ओर जांखोंवाले आपके छिए में कह रहा हूँ, आप 
मेरी प्रजाको और वीरोंको मारने की इच्छा मत करना ॥ 
धणानान्त्वा” इस मन्त्रके गृत्समद शौनक ऋषि हैं, गण, 
पति देवता हैं, जगती छन्द हैं, ब्रह्म और निऋ तिंके 
बीचसें गणपतिके आवाहनमें इसका विनियोग है ( २७ ) 
अपने गणोंके पति तथा कवियोंके कवि एवम्‌ जिसका यश 
मात्रही सबकी उपमा हो सऋता है| वे जो राजनवाडोंमें 
सब अ्रष्ठ तथा प्रशंसनीयोंकों भी प्रशसनीय हैं। उन्हें में 
यहां बुलाता हूँ, हे ब्रह्मणस्पते हमारी प्रार्थनाको सुनते हुए 
एक्षाक साथ इस अपने बेठनेकी जगह आ बैठिय॥ 
| झन्नो देवी” इस मन्त्रके अस्बरीषके पुत्र सिन्धुद्दीप ऋषि 
६, आपो देवता हैं, गायत्री उन्द्‌ है, ब्रह्मा और वरुणकं 
बौचसें आप देवताके आवाहनमें इसका विनियोग होता 
है ६ २८) देवी आप हमारे यज्ञ, अभिषेक और पीजेके 
उखकारी हों तथा हमारे हुए रोगोंको श्ान्त करने 

ओर होनेवाडोंको दूर करनेके लिय वहें ॥ “मरुतो यत्य ! 
“ज मत्रको राहुगण गौलस ऋषि है, परुत देवता हैं, गायत्री 
४न्द्‌ है, तह्य और वायुके बीचसे 


सरुतोंके आवाहनमें 
इसका विनियोग होता है । (२९) हे द्वके अस्त तेज- 


सस्‍्वी मरुत दृबताओ ! जिस यज्ञमानके घरमें आप सोम 
पीते हैं अथवा अन्यवस्तु पान करते हैं, वो. जन आपसे 
अत्यन्त रक्षित होता है ॥ “स्योना प्रथिवी” इस मंत्रका 
काण्व मेघातिथि ऋषि हे, भूमि देवता है, गायज्री छेद है; 
अह्यके पादमूछमें कर्णिकाके दीचे प्रथ्वीदेवीके आवाहन 
में इसका विनियोंग होता हे (३०) है भूमि! आप - 
हमारे छिये कंटक कांकडियोंस हीन सुविस्तृत निवेश 
देनेवाली सुखरूप हो जाओ और खूब आनन्ददायी हो ॥ 
“इसे में गंगे यमुने” इस संत्रका प्रियमेघाका पुत्र सिन्धु- 
क्षित्‌ ऋषि है, गंगादि नदी देवता हैं। जगती छन्‍्द है 
वहांही गंगादि नदियोंके आवाहनमें इसका विनियो॥ 
होता है । ( ३१ ) हे बायुके वेगस बढनेवाली ! गेगे यमुने| 
सरस्वति भरे रतोत्रका भलीभांति सेवन करो, तथा है 
वायुस तरंगित होनेबाली विपाट्‌ ! आपभी इरावती वित" 
सता ओर सिन्धुनद्क साथ सामने होकर सुने॥। “धाम्नो- 
धान्न” इस मंत्रका गोतम वासदेव ऋषि है, सप्त सागर 
देवता हैं, अष्टी छंद है, तहांही सातों समुद्रोंक आवाहनमें 
इखका विनियोग होता है।। ( ३२) है राजन बरुण | जो 
जो आपकी भयकी जगह हों उन सबसे हमें छुटादो, जैसे 
गो हिंसाके योग्य नहीं है उसी तरह वश पड़ते दूसरॉकी 
भी हत्या न करनी चाहिये पर हमने की है । हे वरुण | 
उस पापसे भी हमें छुटा दीजिये, आपकी औषधि और 
पानी भौ हसें कोई नुकसान न पहुँचाबे तथा व्याप रू भूके 
भी विन्नोंस मुझ वचाछों॥ इसके पीछे भेरुका मेरुके 
नाम सन्‍्त्रसे पूजन करना चाहिये, ( ओमू- 
मेरवे नमः 2 मेरुके किये नमस्कार है । मेंहका 


परिभाषा, ] 


| कप: /5 77%, 0-20 कक 777८5) ;6 8840४ ४24 


भाषाटीकासमेतः । (२९ ) 








02744 27 ८ एड? परी! की: 78007 2४/८5/0773 


2502:50:032.4%:% 22 कु 7० 2५ ०85- 04:79 ::26४/क6:07:0 5:2९ कटालनआ कक 2278,8 7 5 भ ७ 2820:0५७५/५८आ ४१३१ /४२०९, 
पर " च+नवधवदाक+००-० तप डम८काबबाड वक्त. 


३ ७ 


युधान्यावाहयेत)/सोमसमीपे पाशम्‌॥ इशानसमीपे त्रिश्वुलम ॥इन्द्रसमीपे वज्चधम 
शक्तिम्‌ ॥ यमसमीपे दण्डम।निक्रातिसमीपे खड़म्‌ ॥ वरूणसमीपे पाशम्‌ ॥ वायुसमीपे अडकु 
शम्‌ ॥८॥ तद्ाह्ये उत्तर गोतमाय नमः गोौतममा०। एवमेशान्याँ भरद्ाजमा पूर्व विश्वामित्रम)। 
आम्नेय्यां कश्यपम्‌ ॥ दक्षिणे जमदगम़िम्‌ ॥ नेकंत्यां वसिष्ठम्‌ ॥ पश्चिम अविम्‌ ॥ वायव्यामरू- 
न्धतीम॥तद्वाह् पूर्वांदिक्रमेण ऐर्द्री०कोमार्री०बाह्ी० वाराहीं० चासुण्डां०बेष्णबीं० माहेश्वरीं० 
बनायकीमावाहयामि इत्यष्टो शक्तीः प्रतिष्ठाप्य प्रत्येक॑ सह वा पूजयेत्‌॥ इति मण्डलदेवताश॥ 
ह अथ छक्षपूजनोद्यापनविधिरुच्यते ॥ 

अद्य पूर्वोचरितेवंगुणावेशेषणावाशेष्टायां पुण्यातिथों मया कृतस्यापमुकदवताभीत्यर्थमस॒क- 
लक्षपूजनकर्म णःसाडतासिद्धचथ तह॒द्यापनं करिष्ये॥तदंगत्वेन पश्चवाक्येंः पुग्याहवाचनमाचा- 
यांदिवरंण च करिष्ये॥ ततबादों निविश्नतासिद्धयंथ गणपतिपूजन करिष्येशषततो गणपति संपूज्य 
पुण्याहं वाचयेत्‌ ॥ तदित्थमू--अस्य लक्षपूजनोद्यापनकर्मणः पुण्याह भवन्तो अबन्त्वित्युक्ते 
अस्त पृण्याहमिति विप्रा वदेशुः । एवं स्वस्ति भवन्तों हुवन्त।आयुष्मते स्वस्ति।ऋद्धि भवन्तों 
बुबन्तु ॥ कम ऋष्यताम्‌ ॥ श्रीरस्त्विति भवन्तो झुवन्तुअध्तु श्री.॥ कंल्याणं मवन्‍्तों बवन्तु॥ 
अस्त कल्यणम्‌॥ कमांड्रदेवता भीयताम्‌ ॥ सतो गोचनामोच्चारणपूर्वकमसुकमगोत्रोईमुक- 
शर्माह यजमानोउसुकगोत्रममुकशर्माणं स्वशाखाध्यायिन॑ व्राह्मणरश्मिलक्षरजनोद्यापनाख्ये 
कमण्याचार्य त्वां बुणे ॥ आचारयत्वेन बुतोस्मि । यथाज्ञानं कर्म करिष्यामि ॥ आचार्यस्त 
यथा स्वर्ग शक्रादीनां बृहस्पतिः ॥ तथा त्व॑ मम च्ञेस्मिन्नाचायों भव सुब्रत ॥ इति 
संप्राथ्य गन्धादिना आचार्यपूजनं कुर्यात्‌ ॥ तथैव बच्माणं वृणयात। यथा च तझखो बह्या स्वगें- 


आवाहन करता हूं। इसके पीछे संडलस बाहिए सोमादिके | ताका मतलब है कि,जो देवता हो उसका नाम लेना चाहिये 
पास उनके आयुधोंकी स्थापना ऋमसे करनाचाहिये।सोमके | इसी तरह और भी समझता) इसके पीछे गणपतिका पूजन 
पास पाश,शिवके पास त्रिशूछ/इंद्रके पास वज्ञ,अग्निक्े पा । | करके पुण्याह वाचन कराना चाहिये, वो उम्याहवा तन 
शक्ति, यम पास दण्ड, निरतिके समीप तछवार, वरुणके लि कक ५४ वन ००३० + के फोलआ 
कि के ग आ 3० नके उद्यापन । 

पास पाश, बायुके समीप अकुश स्थापित करना चाहिये को कम ब्राह्मगोंको कहना चाहिये कि पुण्याह हो । 
इसक पीछे इनक बाहिर ऋषियोंको स्थापित करना चाहिये | यज्ञमान-आप कहें कि, ऋद्धि हो । पीछे आह्मण-"कम्से 
जैसे कि,देवताओंको स्थापित किया करते है| उत्तरमें गौतम: | ऋद्धिको प्राप्त हो।यजमान-ओऔ हो ऐसा आप कहैं,आराह्मण- 
इशानमें भरद्वाज, पूव्मे विश्वासित्र, अभिकोणमें कश्यप, | थ्री हो | यजमान-कल्याण हो ऐसा आप कहैँ, ब्राह्मण- 
दक्षिणमे जमदप्रि, नेऋत्यम वसिष्ठ, पश्चिममें अत्रि ओर हो कल्याण । , संस्कृतमें जो वाक्य जिस बोछने कहे है वे 
वायव्यकोणमें अरुन्धतीको स्थापित करना चाहिये। इसके | उस संस्कृतमें ही बोलने चाहिये । ) कर्मके अगभूत देवता 
बाहिर इसी क्रमसे ऐन्द्री,कौमारी,आाह्मी,वाराही, चामुण्डा, | रसन्न हो जाओ ॥ 

वैष्णवी, माहेश्वरी और वेनायकी इन आठों ४ कर आचाय्य वरण-यजमान आचाय वरण करती वार 
देवताओंकी तरह आवाहन प्रतिष्ठा करके चाहें तो एक | #हता है कि, इस गोतन्रका इस नामका में, इस गोत्र 
एकका, चाहे सबका एक साथ पूजन करना चाहिये ॥ ओर इस नामके इस शाखाके इस त्राह्मगको, इस छक्ष 
अथ छक्ष पूजा ओर उद्यापनविधि-स्नानादिस निषृत्त | पूजनके उद्यापनमें आच!यके रूपमें वरण करता हूँ। वरण 
होकर हाथमें पानी लेकर संकल्प बोलना चाहिये कि,आज | होनक पीछे आचाय कहता है कि, में आचार्यक रूपसले 
ऐसी २ पुण्य लिथिसें इस महीनाके इस पच्से इस संवस्स- | वरण क्रियागया हूं, जेसा मुझे ज्ञान हैं उसके अनुसार 
रमें इस देवलाके प्रसन्न करनके लिय इस छक्ष"कप्तकी | कम कराऊंगा। पीछे यजमाव आचायेकी प्राथना करता हैं 
सांगता सिद्धिक लिय यानी यह रक्ष कम अंगोंसहित पूरा | कि, जैसे स्व इन्द्रादिकोंका आचाये बृहस्पति है, उसी 
हो जाय इसके छिये उसका उद्यापन करता हूँ एवम्‌ तरंग | तरह सुब्रत आप इस कमस मेरे आचाय होजाबो । पीछे 
होनेसे पुण्याहवाचन और आचाय्यवरण भी करता हूँ, ।| यजमान अपने आचायका पूजन किया करतेहैं। इसके बाद 
उसमें सबसे पहिले गणपलिपूजन करता हूं (इस इस की | अन्य बाह्मणोंका चरण करना चाहिये। हे ह्विजोत्तम ! जेंसे 
जगह करती बार जो तिथि हो कहना चाहिये तथा इस देव- | स्वगंमें 'चतुसुंख पिलामह ब्रह्मा होते-हैँ उसी तरह आप मेरे 





करे 











(३० ) बतराजः । [ सामाय- 
लोके पितामहः ॥ तथा त्व॑ मम यश्लेषस्मिन्‌ बह्मा भव द्विजोसतम ॥ इतिबद्यार्ण संप्रार्ध्य ॥ आण 


यागस्थ निष्प्तों भवश्तोध्थ्यथिता मया॥ सुभसत्नैश्व कं्तव्यं कमे दे ब्ि धिप्वकम ॥ इति सर्वाह 
त्विजः आरथयेद॥आचायः आचम्य प्राणानायम्य यजमानेन व्रतो5हमसु के कम करिप्ये॥ कर्म 
धिकाराथमात्मनः शुद्धचर्थ च॒ पुरुषसूक्तजप महं करिष्ये ॥ पृथिवीत्यस्य मंत्रश्य मेरुप्रष्ठ ऋषि | 
कर्मों देवता।खुतल छन्द॥ आसनोपवेशने विनियोग३॥ >पृथ्चि त्वया धृता लोक 7०॥ पुरुषसूतत 
जपान्ते--यदत्र संस्थितमिति मंत्रद्रयेन सर्वतः सपपान्विकिरेत्‌॥ततःशुची थो हव्यत्यापोहिष्ो 
आ्यूचेन साधितपंचगव्येन कुद्दीः प्रोक्षणं कायम्‌ ॥ ततः कृताश्रलिः स्वस्त्ययन ताह्ष्य्॑निी 
मंत्रद्यय॑ पठेत ॥ देवा आपान्त । अठ॒धाना अपयान्तु ॥ विष्णोदेवयजन रक्षस्वेति बदेत्‌ ॥ तह 
कलशपूजनं कृत्वा स्वंतोभद्रे लिड्तोभद़रे वा ्रह्मदीनावाहयेत्पूजयेज ॥ 








इस कमेमें जह्मा वन जावो । इसके बाद यजमानको | तन महे रणाय चक्षसे |? हूँ आप ! मुझ सुख देनेवार ! 
-अत्विजोंसे आर्थंता करनी चाहिये कि, पैसे इस, यागकी | ओ, तथा बडे भारी स्मणी: दृशनके निममित्त तथा भा 
सिद्धिके लिये आपका परण कियाहै,आप भी भाँति प्रसन्न | रसके अनुभव करनेके लिये मुझ धारण करो। “ओम | 
-दोकर इस कर के हल के 3 लि िवतगी रंस वर भाजयतैह नः उशतीरिव मात 
अच्छी वरह वर लिया है मे बह वा, तने | तमहारा जो सु ३ ला रस है यहाँ उसका रह 
अधिकारक लिये आत्मशुद्धवर्थ पुरुषसूक्तका जपभी करूंगा | 2 कराओ जैसे ५.3५ ५ फरनवाली वेटकी मां अप 
.पथ्वी” इस मंत्रका मेरुपष्ठकषि है, सुतरू छन्द है, कूमे | जंटोकों करती है। “ओम तस्मा भरंगमाम दो यस्य क्षया। 
” 


हर मा ः है। जन्वथ आपो जनयथा च नः॥ हे आप! तुम जिस पाएं 
वताहे, आसनपर बैठने । विनियोग होता है। न लीरल के कं हक जद 
तरल 2५... वेठेनेमें इसका विनियोग होता है नाझ करनेके लिय हमें प्रसन्न करते हो उस पापके नह क 


“पृथ्वित्वया धृता लोका देवि हे प्णुना धृता।हवं च धारय | है हे न के 
हि कि पविर 3 प्‌ का वि [आप नके लिये आपको हम अपने शिरपर रखते है। आप ह॑ 
लोकोंको धारण कर रखा है। है देवि ! आपको विष्णु भग- | उत्र पौत्रादि पा करनेमें समग्र बनादें।अथवा आपके एए 
९ ६+ज यु हे जिसमे हि कि भर 
वाबूने धारण किया है भे आओ ७... दम दप्त हो जायें जिसके निवासके लछिय आप प्रस्त 
लिया मा 05 30 धारण करें और ५ हैं, आप सका स्वासी हमें बनादें। इन मंत्रोंसे कुगा 
आसनकी अवैत्र करे। यजुरवेदकी इक तीसवां. न जन से पंचगव्यसे प्रोक्षण करना चाहिये | प्रोक्षण हींग 
ह, जकर सोलह मंत्रोंकों पुरुषसूक्त८ कहा है उसका | .. से प्रौक्षण कर ि 
जपकर लेनके पीछे हाथगें सफेद सरसों लेकर“ओम्‌ यदत्र | की कहते हैं। इसके पीछे हाथ जोडकर आओमू सस्त 
संस्थित भूत॑ स्थानमाश्रित्य सर्वर । की तत्स4 | ने वाह्यमरिए्टनेमिम, महंजुध व्यचस देवतानाम्‌ | आए... 
-2 रथ तत्रयाच्छतु ॥ ... भन्‍्दु भूतानि पिशाचाः सबेतो | समर्थ जो नाव है उसकी ता जिसके अत हि व पपोई 
द्शिम्‌ | सर्वेषामविरोधेन छक्षपूर्जा समारसे |" जिही सकता मी कक या 2 हक 
जो यहां दृष्टसत्त्व सदाही इस स्थानका लेकर | हैं, संग्राभमें हमारे वी कप पं 
३ के हैं. तहां ही चढ़े 3 लेकर | होता है, संग्राम हमार वीरोंको न नष्ट होने देनेवाले के 
22 हैंतें है वे सब जहांक ह वहां ही जाय । भूत और | ताओंके सबसे बडे, अग्रणी प्रमी यशस्वी इन्द्रका आश्रय हि 
पिश्ाच चारों ओर भाग जायें,में किसीफे बिना विरोधक | छेता है॥ “ओमू अहो मुच्च मां गिरसो संग च लाश 
हे 3९ ९ ५ , 
हज न ५ 5 वेय सनसा च वाक्ष्यमू, प्रयतपाणि: शरणे प्रपयये खत 
के अभिमत्रित करक चारों ओर बखेर देना चाहिये । सम्बाधे अभय नो कु |” है पापसे छुटानेबाले ! मर 
। 22५४:मह 5४५ #फ0: सपा मम पापोंस छुा ९, में वाणीसे अग्निकी स्वस्ति और मन 
हि वि मे ध्ष्य * | 
न्मोनः शुचयः पावका:[” हे मा बमिज बा पीक्यको स्वस्ति प्राप्त हो गया हू । में हाथ जोडकर आपकी 
पविश्नोंके पवित्र यज्ञको आप) हियि ही अ ५ | शरण ग्रप्त 37 हूँ | विवादके कार्य्यम हमारा कल्याण ही 
पा पक हक ..। रहा ह।क्योंकि | तथा किसी प्रकारका सय न प्रतीत हो। इन दोनोंको - 
४०४७.» परप्यको प्राप्ति होती है देखो,ये शुचिजन्मा तथा < 


र न्‍ बछतना चाहिये । दे जायें दो शहाएे. 
. शरचि सत्यदायक पविश्रताके उत्पादक आगये। इस | उ५ है | इवता आजायें और राक्षस छोग यहा 
मत्रस तथा "शेप 


आ हे ५ आय है विष्णु भगवन्‌देव यजन भूमिकी रक्षा करो। 
शक हि करता नली प लक _पो हि छा सयोखुवस्ता न ऊें 5ता । ऐसा ६ हरा पूजन करना चाहिये ॥ ढिंगतोमा | 
स्का बनाया पे ः के 
। हि शक आगाडीी पूरा भफण शयेगा बहों हम इसके अधैको तो स्व ता हिल, 
. चिडेंगे घोर कही नहीं, वहीँ सब जगह यही अथे सम्भना चाहिये। 












प्र 


परिभाषा, | 





ततो मूर्तावम्ग्युत्तारणम्‌ | 
प्रतिष्ठां च करिष्ये॥ अश्निः 


मअन्नप्निनारी बीरकुक्षि पुरण्चिम्‌ ॥१॥ 








बपरिहाराधमसः 
सतिमिति सूक्तमप्निपद्रहित सहित च पठन्परतिमायां जल पातयेव॥ 
सूक्त यथा--३ अग्नि: सते बाज भर ददात्यप्िर्ीरे श्र॒त्यं कमनिष्ठाम॥ अम्मी रोदसीई 

अग्ने रजसः समिदस्ठु भद्राइ्निनही रोदसी 


तो मू्तवग्ुतारणम्‌ ॥ अस्यां मू्तों अवधातादिदोवपरिदापवम जप 7५] [7 अस्यां मूर्तों अवधातादिद 


। (३१ ) 


20% ३३ ७४/६८ का ६2% ३५५७४ 4420 





न्युत्तार्॒ण देवतासात्रिध्याथ प्राण- 





व चरत्स- 
आविवेश॥ 








अग्निरेक चोद्यत्समत्प्वग्निजत्राणि दयते पृषणि॥र॥अग्विह त्थं जरतःकणेमावाग्निस्ो निरद 
हज्जरूथम्‌ ॥ अग्निरत्रि धम उसष्यद्न्तरग्नितमेध प्रजया सजत्सम] ३ अग्निदा द्रबिणं वीरपेशा 


अग्निऋषियः 
मुक्थेऋषयो 
परियाति गोनाम्‌ ॥५॥ अग्ति विश्य 


सहल्यासनोति॥ अग्निर्दिवि हृव्यमालततानाग्नेधांमानि बिधता पुरुचा।श॥। अग्नि- 
विहयन्तेईरिंन नरोयामनि बाधितालः ॥ आग्वि बयो अम्तरिक्षे पतमन्तो४गिहःसहस्ा 
इव्यते मालुषीरयां अनि मलबो नहुबे विज्ञाता॥ अग्निर्गा- 


न्जवा पथ्यामृतस्याग्नेगव्यूतिद्त आनिलता।दाअशनये अर नल दस्ततक्षरार्त महामवोचामा 
छुद॒क्तिम्‌॥ अग्ने प्रावजरितरं यविष्ठाग्ने महि द्राविगनायजल्द॥० (इत्यग्स्जुत्तारणम्‌॥प्राणप्रतिष्ठा॥ 
ततो देवे आणप्रतिष्ठां कुर्यात्‌॥ अस्य औीमागप्रातिष्ठामंत्रस्य वहाविष्णुमहेशवरा ऋषय ऋग्यज्ञः 


ः 


है 
| 
० 


अ्स्यां मू्तों आणप्रतिष्ठापने विनि०्॥ ऊँआंद्ठी को अंयंरं लंव॑शं 
सोहम्‌ ॥ अस्यां मूर्तों माणा इह प्राणाः । न 
जीव इह् स्थितः ॥ पुनः आं ह्ीमित्यादि पठित्वा अध्याँ छूलों 


हेसः 


तामाथवाणे च्छन्दांसि।क्रियामयबपु: प्राणाख्या देवता।आं बीजम्‌ ॥ हीं शक्तिथाक्ों कीलकृम्‌ । 


अंयर ल॑ वश पेहक क्षे अगकों द्ीआं 

ऊ आर्य द्ीमित्यादि पुनः पठित्वा अस्यां मूर्तों 
कक 2 १20) लत न नल 

ज्ञान्ड्रथाज वाहमनस्त्वकूचक्षु 


हि 8. ध्यिफ-उान्ण लत पाफबल8 चकृष्प्छ + ध् कक] ब्ूत द. १3742७० 5.8 २४ श्छ्ू थे दिन ८ हि ही द८ नो आज रु की 
श्रोत्जि्राप्राणपाणियद्दायूरस्थ पी इह्मत्य सुर्ख चिर॑ तिछन्तु स्वाहा ॥ ऊँ अखुनीते प०्य। न्‌ः 


छू 5 





लउत्तारण-इसके पीछे मूर्तिमं अग्न्युत्तारण करना 
बाहिये, संकस्पमें जेसे तिथिवार आदि बोछे ज्ञाते हैं. उन्हें 


गीछे “ ओम अप्निः सप्तिम्‌ू ” इस सूक्तको अभिपद्रहित 


प्र्मिपदकें बिना पढना चाहिये (१) अप्नि देव, वेगको 
गरण करनेवाले अन्न संपादक शीघ्ष गामी धोड़ोंकों देते 
[) वेद्रोंके पढनेबाले पुत्नको तथा कस निष्ठाको कर देते हैं, 
सीन आसमानमें विचरते हुए अग्नि देव, सुन्दरी खीको 


गिर पुत्रोंकी जननी बना देते हैं (२) करमेबान्‌ अभिकी | 
प्रसित्‌ सुन्दर हो, अग्नि ही इन बड़े भारी जमीन आस- | 


।नॉमें व्याप रहा है, वो अपने भक्तोंकी आय .ही रक्षा 


गै मार ढाहृता है। (३ ) अम्निने ही जरत्कण नामक 


तै को थी, अभ्निन ही नृमेघका परिवार बढाया था ४) 
रक ज्वाल्य रूप अप्नि घनको देता है, इसीने इस मंत्र द्रष्ट 
एषिको पुत्र दिया है तथा एक हजार गऊएँ दक्षिणामें दी 


बराजमान् हैं; (५) अभिको ही | ऋषि लोग सरतुतियोंते 





अनेक भांति बुलाते हैं. मजुप्योंको जब युद्धमें कष्ट होता हे 


' तो अप्निकी ही शरण जाते हैं, आकाशमे डड़नेवाले पक्षी 
ग्रोछ करके पीछे सकरपमें यह जोड देना चाहिये कि, | 
अवधातादि दोषोंकी निवृत्तिके छिय अग्न्युत्तारण तथा 
(बताकी सनिधिके छिये ग्राणप्रतिष्ता भी करता हूं. इसके | 


अ्निको ही देखते हैं,अपभि ही गझओंकी रक्षक लिये जाता 
ज्ञ॒ ८ भ्छै्‌ । 

ह्‌। (६) सालुषी प्रजा अग्निक्की ही प्राथना करती है, नहु- 

पके वेशज भी अशभ॒िको ही उपत्यना करप हैं) अप्नि ही 


| यक्षकी गान्धर्वी ( बाणीरूपी ) पथ्या है, अप्ि ही घीका क्‍ 
शरीर सहित पढ़ता हुआ तप्त प्रतिमापर पानी छोड़ना | 
आहिये। इस सूक्तके प्रत्येक मंत्र अभ्िपद्‌ आया हे यहां | 
(र<क मंत्रकों एक बार तो जेसेका पेसा एवम्‌ एक बार | 


भरा हुआ रासता है। (७) ऋभुओंने अप्निके छिये ही 
वेदेक स्तुतियोंका अन्वेषण किया था, हम शीघ्र ही मतों. 
रथोंको पूराकर देनेवाले अग्निकी स्तुति बोढ रहे हैं, अग्नि 
स्तुति करनेबालेका रक्षण करता हुआ बडा भारी धन देता 
है ॥ आ्राणप्रतिष्ठा--इसके पीछे देवतामें शरण श्रतिष्ठा करनी 
चाहिये इस आणदतेछ मंत्रके ब्रह्मा विष्णु और महेश ऋषि 
हैं, ऋयु , यजु सान और अथवेछन्द हैं, क्रियामय शरीर- 
बाछा आण नायक देवता है, आ बीज हैं; हीं शक्ति है; 
फ्ों कीछक है,इस मूर्पिम प्राणप्रतिष्ठा करनेसे इसका विनि- 


ह कं | योग होता हैं | पीछे डछटा हाथ मूतिपर रखकर-ओमू 
भला हैं, यहांतक कि उस अकेलेक भ्कों बेरियोंको आप | 


आंह्ींक़ोंअयर॑लेवेशेपष॑ सह लेक्ष अःक्रों हीं आं 


नासक | ई सः सोहमू इन बीजोंका उच्चारण करते हुए यह भावना 
ईिषिको रक्षाक्ी थी, अप्निनि ही जरूथ नामके देत्य का 
छा डाछा था; धसक बीचमें बेठे हुए अन्रिकी रक्षा अभ्निने | 


करते रहना चाहिये कि इस मूर्तिमं प्राण आगये थे यहां हैं। 


किर दुबारा इस बीजोंकों बोछकर यह भावना करनी 
घःि 


चाहिये कि, इस मूर्तिमें यहां जीव स्थित है फिर तिवारा 


| इन्ही बीजोंको बोलकर भावना करनी चाहिये कि इस 
| भूतिमें ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय छुल पूवेक रहेँ। ' ओपू 
7, अमन ही यजमानकी दी हुईं हृविको देवताओंमें | ५ 
हुचाता हे; यही अपने अनेक रूप करके अनेक जगह | ८-९-२३ का सत्र है। यह पूरा-ओम अछुनीते पुनरस्मा- 
| सुचझ्षुः पुत्र: प्राणसिह नो घेहि भोगम्‌। ब्योकू पर्वेम 


असुनीते ? यहांस लेकर, ' यान: ध्वस्ति ” तक एक ऋणगू 


( ३२ ) 





स्वस्ति॥ 


जे 
थे हे 
कक बे ही *१॥/ ५ 
एप क4# ९" रे 
कक 802 प्‌ ५92 का ध््ा 
जज हू) ह। के आओ) कक ध््ा 
हक एलन त३ शक तिएफ. ही पा/ १४०१ ्जऋएछएछाएातनलनणन्््््छ मं डा 478 2 ए%+६ 62 277५ 22 ६५४ 8280 ४ 2065८ 20205 कट 07229, 70020 ॥80000 20300 8 72280 0/60/00000 000 /808 है 080/ 00008 ४025 शा ! 


गर्भाधानादि पश्द्शसंस्कारासिद्धचरथ पश्चद्श प्रणवात्रात्तिं करिष्ये ॥ अणव पश्चदश- 








वारं जपित्वा ॥ रक्ताम्नोविस्थपोतोछलसदरुणसरोज धिरूढ़ा कराब्जेः पाशं कोदण्डमिक्षूद्धवम! 
गुणमप्यकुश पथ्च बाणान्‌ ॥ विश्वाणासकपाले त्रिनयनलासिता पीनवक्षोरुहाव्या देवी बालाओं॑- 
वर्णा भवत्‌ छुखकरी प्राणशक्तिः परा नः |ततो मण्डलोपरि व्रीह्मादिधान्ययवातिलेख्िकूटं कृत 


तत्र महीद्योरित्यादिना अब्रणं कलश संस्थाप्य कलशोपरि पूर्णपात्र 


संस्थाप्य तस्योपरि उ्यंकः 


कमंत्रेणोमया सह ज्यम्बक वा,विष्णुमंत्रेण लक्ष्म्या सह विष्णुं,सिद्धिब॒द्धिसहितं गणेश वा पदया 


सहित सूर्य वा भवानीं तत्तन्मंत्रेणावाह्म शिवस्य दक्षिणे लक्ष्म्या सह 


विष्णुमावाहयेत॥ शिव- 


स्पोत्तरे साविच्या सह बह्माणम्‌।एवं विष्ण्वादीनामपि ॥ अथ पोडशोपचार एजा ॥ ततः सहमस्रशीर 
त्यावाहनम्‌ ॥ पुरुष एवेदमित्यासनम्‌ ॥ एतावानस्पेति पाद्यम्‌ ॥ त्रिपादूध्व॑मित्यध्यम्‌ ॥ 





स्‍र्॑गुबचरनाम्‌, बहुमोे व बृढया न लव ॥| यहा विद कै, (77: ' अनुमते न मड़या नः स्यस्ति ॥ यहांवक | सिद्धि और बुद्धिसहित गगेश भगवामकों अथवा पत्नीगे 
घुय्य 


है । हे अधुनीते ! यहां हमारे इन देवोंमे फिर ज्ञानेन्द्रिय 
और कर्मेनिद्रय प्राण और भोगको स्थापित कर, हम रोज़ 
ऊपर चढते हुए सूय्यको चिर काछुतक देखें, इन मूर्तियोंमें 
ये सथ सदा बना रहे. हे अनुमते ! हमें सुखीकर हमारा 
कल्याण हो [ गोविन्दाचन चंद्रिक्ामें तथा सर्वदेवग्रतिष्ठा 
प्रकाश आदि गअन्धोंमें आ्राण प्रतिष्ठाके विषयमें इस मंत्रको 
नहीं रखा है तथा श्रीमान्‌ चौबे बनवारीछाढूजीने तो इसी 
मेत्रकी प्रतीकको प्रणवाबृत्तिके संकल्पमें ही सामिल कर 
दिया है न उक्त विषयमे प॑. चतुर्थीछालजीनेही उक्त संत्रका 
उलेख किया है ] पृर्वोक्त ऋचाक़ा पाठ करके गर्भावान 
आदि पन्द्रहों संस्कारोंकी सिद्धीके छिये पन्‍्द्रहवार प्रण- 
बका जप करता हूं इस प्रकार संकल्प करके पन्‍्द्रह बार 
भणवका जप करना चाहिये। पीछे प्राणशक्तिका ध्यान 
करना चाहिये कि, छालरंगके समुद्र सुन्दर जहाजपर 
छालकमलके आसनपर विराजमान हुईं है, तथा हा्थोंम 
पाश, इंखका धनुष प्रत्येचा अछुश और पांच बाणोंको 
धारण किले हुए हैं तथा छोहस भरा हुआ कपाछ भी 
हाथोंमें लिये हुए हे, तीन नेत्र हैं, बड़े बड़े वक्ष्यस्थल हैं. तथा 
बालूस्यके सप्तान अरुण रंगकी “पराप्राण गक्तिद्‌वी हमें 
सुखकरी होवे । पीछे बनाये हुए सर्वतोभद्र या लिंगतोभद्र 
दोनोंके ही ऊपर ब्रीहि आदिके तथा धान्य यव और तिलसे 
तीनकूटवाढा पर्वत बनाकर उसपर “ ओम मही दो: 
प्रथिवी च न इम यज्ञम्मिसिक्षताम पिप्तान्नो भरीमसि ” 
महती भू हमारे यज्ञको पूणे कर तथा जो आवश्यकीय वस्तु 
।त हमारे घरको भर दे । इस मंत्रसे बिना फूटे घड़ेको 
शह स  उपर पू्णपात्र रखकर पीछे “ ओम उ्यम्वक 
बेस सुरध्ि पृष्टिवर्धनम्‌ । उर्वास्कमिव बन्धवानमृत्यो- 


$) 5२३ ३ 
पुषिके आदेदात ! हमारे यशकों बढानेवाले तथा हमारी 
पुष्टिक बदानेचले व्यस्बकका य॒ कह 


_अन्घनकी दरह सुझे सौतसे मुक्त करें पर, अमरत्वसे कभी 
 गुक्त न करें, विषयक मेत्रस उप्तासहित अ्यंबक भगवानको 
जयथबा नैंस उक्ष्मीसहित विए 


| 


' चाहिये शिवके उत्तर 


जन करता हू,वो ककडीके | 


+ जे. भगवानको अथवा | है 


सहित सूर्य भगवानको अथवा भवानीको मंत्रोंसे बुढाक 
शिवके दाँय हाथमें छक्ष्मीसहित विष्णु भगवानकों बुढा॥ 
र् सावित्रीसहित बअल्याको बुह्ार 
चाहिये ) यही हिसाब विष्णु आदिकी प्रधानतामें भी होगे 
चाहिये कि, प्रधानके दोये बाँये दूसरे बठने चाहिये। 
सहस्वशीष। पुरुषः सहस्लाक्षः सदस््पाद। 
सभूमि९५सर्वतस्प॒त्वात्यतिष्ठदशाडुलम | 


तह परत्रह्म परमात्मा श्री विष्णु भगवान अनेकों शिर 
आदि अग तथा अनेकों ही ज्ञानेन्द्रिय और कर्म निद्रयवाढ! 
है वो इस सष्टिम सब ओरसे ओत प्रोत होकर नाभिरे 
ढाद्श अगुल जो हृदय है उपमें विराजमान होता है । इप 
मेत्रस भगवान का आबाहन कर ना चाहिय । 

३ पुरुष एवेद?9सर्व यद्भूत यज्य माव्यम्‌। 


उतामृतत्वस्थेशानो यदन्नेनाति रोहति॥ « 
जो कुछ अलुभवमें आ रहा है तथा जो हो चुका और 
होगा वह सब पुरुष ही है वो मसोक्षका अधिपति है तथा 
जीवोंको कमेफल देनेके लछिय कारणावस्थासे कार्य्योव्था 
स्थूड जगत्‌के रूपमें आता है। इस मंत्रस आसन देना 
चाहिये । _य 
३४ एतावानस्य महिमातो ज्यायॉश्व पुरुषः। 
पादो5स्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृत दिवि॥ 
इसको इतनी तो महिमाहै, इससे पुरुष बडा है, सबजीव 
के जरा मात्र ह और अंशी वो नित्यधाम नेकुण्ठमें विरा- क्‍ 
है ! इस मेत्रसे पाद्यका प्रतिपादन करना चाहिये। 
३“जिपादूर््व5उदेत्पुरुषः पादोषस्येहाउसवत्पुनः। | 
ततो विष्वडः व्यक्रामत्साशनानशनेडअभि ॥ 
वो तिपाद पुरुष ऊध्वे उद्ति है,इसका अंश जीव हिंग- 
५ चबार आवागमन करता है । वो अंश, देव मनु 
ध्यादि अनेक रूपमें होकर संसारमे भ्रमता फिरता है तथा : 
3... पादि व्यवहारभाकू एवम्‌ बद्ध मुक्त होता रहवा 
' इस मत्रस अध्य देता चाहिये। मर 


परिभाषा. ) 





तस्माद्विराडित्याचम न 
तम्‌॥ तस्माय्ज्ञार 





भाषादीकासमेतः |... 


यम्‌ ॥ यत्पुरुषेणेति ल्ञानमू॥ ते यज्ञानेति वख्यम्‌ ॥तस्म 
प्वबहुत ऋच इते गन्धमतस्मादशेति पुष्पम ॥ यत्पुरुष व्यदधरिति धूपम्‌ ॥ 


तक 


( शे३ ) 


! अत 50 072 ष्य यश तहत 0227:0:07 880 क00065 2067 0 आ//27/:प7 27 
8.5 2020 07:26 70 कक 720 सिल्क 2220 227 कक 00688 2 2 60% 7 


हम 6 


द्यज्ञादित्युपवी- 





आह्मणोस्थेति दीपम्‌ ॥चन्द्रमा मनस इति नेवेधरमनाब्या आशलीदिति प्रदक्षिणा॥ सप्तास्येति 
& रु ७३३ 
'नमस्कारान ॥ यज्ञेन यज्ञमिति मंत्रपुष्पाअलिम ॥ इति षोडशोपचारे! पश्चाम्॒तेश्व वैदिकमन्नेः 


करे 


पुराणोक्तमंत्रेश्व स्थापितदेवताः संपूज्य रात्रो जागरण कुघोत ॥- प्रातनित्यक्ृत्यं विधाय तस्य 


लक्षपुजनश्य वा आचरितत्रतस्य साइलासिदबथ पूजनदर्शांशेन लिलयवत्रीहिशि 
दोक्तेन मूलनन्त्रेण पुराणोक्तेन वा कार्यः ॥ 


दिनिवां होम॑ करिष्ये ॥ होमस्त दे 





3०5 ततो विरशाडजायत विराजोी अधि युझूषः। | 


स जातो अत्यरिव्यत पश्चाद्धनिमथों पुरः ॥ 


७ यत्युरुषेण हविषा देवा यज्ञमतत्वत । 


% त यज्ञ बहिंषि प्रौक्षन्पुरुष जातमम्नतः । 
तेन देवा अजयन्त साध्या ऋषयश्व ये ॥। 


अगाडीके ऋषि मुनियोंने उस यज्ञ पुरुषको प्राणायामोंस | 


साक्षात्‌ किया तथा जो भी साध्य और ऋषि हुए उन 
पी वह छ. 

' सबॉने उसीसे उसका यजन भी किया। इस मँत्रस वस्त्र 

समपेण करना चाहिये। 


उससे ऋचायें और सामर प्रकट हुए, छन्द भी उससे प्रादु- 
भूत एवम्‌ यजु भी उसीसे प्रकट हुआ । इस मंत्रस गंध 
द्रव्य समपेण करना चाहिये । 
रे कै 
तस्माग्यज्ञात्सवेहुतः सम्भल पषदाज्यम्‌ । 


पशुस्तॉश्रके वायव्या नारण्या ग्राम्याश्व ये ॥ | विस्तार करके पुरुष पशुको बाधा | इससे नमस्कार करना 
उसी परमात्मास प्रषत और आज्य दोचों प्रकट हुए तथा | 


उसीने वायव्य एवम्‌ आमीण ओर वन्य पशुओंको उप- | 


जाया । इस मंत्रस उपवीतका समपंण करना चाहिये । 


[हिये। हु 











६ वायसा- 





3० यत्पुद्द्ष व्यद्धुः कतिथा व्यकल्पयन्‌ । 


े | घु् किमस्यासीत किम्बाहकिमुरूपादा उच्येते 

इसके पीछे इससे विरादू उत्पन्न हुआ एवं उस विरादसें | 
विराद्का अभिमानी पुरुष हुआ वो देव मनुप्यादिभावसे | 
भिन्न भिन्न अनेक पअकारका हो गया इसके पीछे ऋष॒शञः पुर | 
ओर नगर रचेगये।इसमंत्रसे आचमनसमर्पणक एनाचाहिये! | 


जब विराट उत्पन्न हुआ था उस समय उसमें अनेक 
प्रकारकी कसपनाएँ की गयीं वोही प्रश्नोत्तरके रूपमें भग- 
वती ऋचा कहती है कि, उसका मुख बाहु उरू और पाद 
कौन कहे जाते हैं ! इस मंत्र धूप देनी चाहिये । 


| ३* ब्राह्मणो5स्थ मुखमासीद्‌ बाहू राजन्य+क्रतः। 
वसम्तोःस्थासीदाज्य द औष्म:इध्मःशरद्धवि:॥ | 

जिस समय दुवगण पुरुष रूपी हविसे यज्ञ करने छगे | 
उस समय वसन्त आज्य, भ्रीषप्स इच्प और शरद द्विके | शृद्र उत्पन्न हुए । इस संत्रस दीप देना चाहिये। 
स्थानमें हुआ। इस मेत्रसे स्नानका समपेण करना चाहिये। | ३५ उल्द्धमा मरसोजतश्क्षोः सथ्योप्जजायत। 
| बाद बायुश्व म्राणश्व लुखादग्निरजायत ॥ 


ऊरू तद॒स्य यदवेश्यःपदभ्या?9शद्रोपजायत ॥ 
मुखसे ब्राह्मण, बाहुसे क्षत्रिय, उरूस वेश्य और पदोंसे 


22 


० की ए हक 
मलसे चन्द्रमा, नेत्रोंस सूये, ओजसे वायु ओर प्राण तथा 
मुखस अप्नि उत्पन्न हुआ । इस मंत्नसे नेवेद्यका निवेदन 
करना चाहिये । 


| अताभ्याआखीदुन्तरिक्षए 9शीष्णों द्योः समव- 


3 ००. | लत । दष्यां समिदिश: आत्तथा न 
ओं तस्मादज्ञात्सवहुतप्कतचः सामानि जक्षिरे। | ये गा भूमिदिशः श्रो लोकों 
श 8 ः ९ 

न्दा *सि जज्षिरे तस्माद्रजुस्तमादजायत ॥ | 


. सब यज्ञोंमं जिसके लिये जिसका ही हवन होता है । 


नाभीसे अन्तरिक्ष, शिरसे दिव, चरणोंसे भूमि, श्रोत्रस 
दिशा उत्पन्न हुई । इसी प्रकार अन्य छोकोंकी भी कल्पना 


| की गयी । इस मंत्रसे प्रदक्षिणा करनी चाहिये | 
| * सतास्यासव्‌ परिषयास्रिः्सत्त सामिषः कृता॥ 
| "+। थद्यज्ञ तब्वाना अबन्नन्‌ पुरुष पशुम्‌ 


सात परिधि और इक्कीस समिध्रकी देवताओं ने यज्ञका 


चाहिय। 
ऊ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्ताने धर्मोणि प्रथ- 


ह कक | मान्यासना लेहइनाक॑ महिमानः सचन्त यत्र पूर्व 
३४ ब्स्मादशवा अजायन्त ये के चोमयादतः | | 
गावो द जज्षिरे तस्मात्तस्माज्ञाता अजाबयश। | 
उसीने अश्व तथा अश्व सरीखे आणी एवम्‌ जिनके ऊपर | 
नीचे दोनों ओर दांत हैं उनको उत्पन्न किया; उसीने गऊ | 
और भेड बकरी आदि बनाये । इससे पुष्प समर्पित करने | 
_  [ लिका समपंण करना चाहिय | इस प्रकार षोडशोपचारस 
१ ततो व्राडिति वाजसनेयपाठः । 


साध्याः सन्ति देवाः ॥ 

देवॉने यज्ञस यज्ञ पुरुषका ही यजन किया। वे यज्ञ 
पुरुष पूजनसबन्धी घमे सुख्य थे। वे स्वमगेमें पूजित हुए जो 
कोई अब भी वसा करेंगे वे वहीं जाकर पूजेंगे जहां कि 
पह्िर साध्य दव पूज रहे ह इससे पृब्यदेवको पुष्पांज- 





मार जी 
प् 2 ,५2/007//072///007 ५ // 0, नी 
हर 04 थी 267/25- ८5% ट043 0% ४2,420 77:7३ 00526: 42740 ३0:४/204/77 764 020 //7 7778: 27 7६६00. 22220, 


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5 क्ः 28072 200 % 


अथाभिमुखम्‌ । 


पा ती 


आचम्य त्राणानायम्य तिथ्यादिसंकीत्य एबंजुणविश्ेषविशिड ःय पृण्यतिथावमुककमाई- 
तया विहितासुकह॒बनमहं करिष्ये इलि संकल्प्य गोमयादिलिते श॒द्धे देशे श॒द्धमृदा इशानी- 
मारभ्य उदक्संस्थं चतुरडःणलोन्नतं वा चतुर्दिक्ष मिलित्वा द्विसप्तत्यंगुलपारिपिकं ह फलितमष्ठा: 
दशांगुलविस्तृतं होमाल॒सारेण तद्धिकं वा न तु ततो न्यून॑ मध्योन्नतं स्थण्डिल कुर्यात ॥ 
तहोमयेन प्रदक्षिणमुपलिप्य दक्षिणेषष्टावुदीच्यां द्वे प्रतीच्यां चत्वारि प्राच्य (मधमित्यंगुलानि 
ःक्क्तवा दक्षिणोपक्रमामुदक्संस्थां प्रादेशमात्रामेकां लेखां (लिखित्वा ) तस्या दक्षिणोत्तरयो 
तगायते पूर्वरेखयउसंछटे प्रादेशसंमिते द्वे लेखे लिखित्वा तयोम॑ध्ये परस्परमसप्तष्णा 
उद्कूघस्था:प्रागायताः प्रादेशसंभिताध्तिस्त इति षढड़ लेखा यक्षिवशकलमूलेन दक्षिणहस्ते- 
नोछिख्य लेखासु तच्छकलमुद्॒गग्न॑ निधाय स्थण्डिलमद्विरव्युक्ष्य शकलमाश्रिय्यां निरस्य पार्षि 
पक्षाल्य वाग्यतों भवेत्‌ ॥ तेजसपात्रयुग्मेन संपुटीकृत्य सुवासिन्या ओजियागारात्घ्वगृहाद्र 
पमृद्धं निर्धूममाहतमाप्नें स्थण्डिलादाश्रेय्यां दिशि 


निधाय | जुष्टोदमूना आत्रेयो वसुश्रुतोः 
्रिख्रिषठप्‌ ॥ अग्न्यावा० ॥ ऊ जुष्ठोदमूना अतिथिदरोण इम॑ं नो यज्षमुपयाहि विद्वान ॥ विश्व 

अप्ने अभियुजों विहत्या शबरूयतामाभरा भोजनानि॥२॥ एह्मम्न इत्यस्यथ मंत्रस्य राहूगणो गौतम 
#षिः ॥ अम्नि्देवता॥ त्रिष्ठपछन्दः॥ अग्न्यावाणा। हे एह्मम्न इह होता निषीदादब्धः खुपर एता 
वा न: ॥ अवतां त्वा रोदसी विश्वमिन्वे यजामहे सौमनसाय देवान्‌ ॥ २॥ इत्यक्ष तरावाह्म 


अल कर कप पक न सकल न अत + लक की सरल ३० पल जज लक ( । ९ ७७ ४. ५ २ 
[जन करना चाहिये। पंचामृतसे पुराणोंके ऐसेही 'छोकोंस | हुईं हों रेखाएं और खींचनी चाहिय । इस तरह तीव 
'थापित दूसरे देवताओंका भी पूजन करना चाहिये तथा | उत्तरकी रेखाएं तथा तीन पूरबकी रेखाएं कुछ मिलाकर ह: 
प्तको जागरण करना चाहिये ॥ 


५ | रेखाएँ होनी चाहिये | उस शकूको उत्तरकी ओर अगर 
आतःकाछ नित्य कमसे निवृत्त होते ही रक्ष त्रत अथवा | 





ब्रीहियोंसे अथवा खीर आदिसे पूजनका दशवों हिस्सा 
हवन करूँगा, इस अ्कारका संकल्प करना चाहिये वेदोक्त 


चाहिये, इंशान कोणसे ले 
करना चाहिये, 
चाहिये चारों दिशाओंमें मिलकर 
होनी चाहिये, 
यदि होम अधिक कर 
करना हो तो छोटा 
ऊँचा अवचर्य 
भद्क्षिणाके ऊमसे लीप देना चाहिरे 

अपुलछ तथा उत्तरी तरफ दो अ 


बहत्तर अंगुछुकी परिधि 


प्रादेशस्ात्र एक छकीर 
उस उकीर) बिक है 
श्स उकीर% वक्षिणोत्तर में बैसीही मध्यरेखासे 


; 
इं4७22........... 


हे | भाग करके रख देना, पीछे पानीसे प्रोक्षण करके उस शक. 
केये हुए ब्रतकी साह्॒ता सिद्धिके लिये तिछ, जौ और | 


| छको अग्निकोणमें पटककर हाथ घो,मौनी हो जानाचाहिये। 
। फिर किसी सौभाग्यवती सुवासिनी ख्रीके हाथसे, किसी 
मूछ मंत्रस, या पुराणोक्त मूल मेत्रसे हवन करना चाहिये। । हुईं इतनी अभ्नि धंगवाडेनी चाहिये जो कि कुछ देरतक बुर 

अथ्‌ अभिसुखम्‌-आचमन, आणायाम॒ करके संकरप | नहीं तथा बेदी कमेमें सौम्य हो । यह अभप्नि या तो किसो 
ना चाहिय कि,आज ऐसे ऐसे पवित्र दिनमें इस कामके | चेद पाठीके घरकी होनी चाहिये। अथवा अपने ही घरकी 
उस हीपे शक हवनकों करता हूं। पीछे गोब- | होती चाहिये।जैसी आये, वेसी ही स्थण्डिकस अग्निकरोग्म 
रसे छीपे हुए शुद्ध स्थल में शुद्ध मिट्टीस एक स्थण्डिल बनाना | रखदे । इसके पीछेका जो कम हैं सो अगाडो कहते हैं । 

कर उत्तरकी तरफ बनाना प्रार॑स | 


| ओं जुष्टो दमूना” इस संत्रका आज्रेय 
यह स्थण्डिल चार अंगुरु ऊंचा होना फ 


भी धातुद्चे बने हुए कटोरेम, कटोरेस ढकी हुईं दधकती 


वसुश्न॒ल ऋषि हैं, 


। अप्नि देवता है, ज़िष्डुपू उन्द्‌ हैं, अप्रिके आवाहनमें इसका 
> (व | विनियोग होता 
अठारह हो बा होना चाहिये | | दमन करनेवाले 
ना ह तो बड़ा हो सकता हे पर कमर | 

५ * अतिथि अ ज 
नहीं हो सकता किन्तु स्थण्डिल मध्यम | ज्ि.यजमा 


_ | जाननेवाले अग्नि देव! 
होना चाहिये। उस स्थण्डिल्को गोबरस | कैरे 0828 


हे। परम प्रसन्न द्याशील तथा वैरियोंके 
एवम्‌ जिसकी हम सेवा करते हैं ऐसे 

नके घर आ उपस्थित हों,हे सब कुछके 

हम परआरोप करनेवाढेसबको मार, 


द | वरियोंकी शक्ति तथा धनका हरण में दे दीजिय। 
ये । पीछे दक्षिणमें आठ | पर पक निक पर कह 


४ + ५ 3७ 
कै ०... पे एल्यन्न! इस सत्रका राहगण गौतम ऋषि है, अग्नि 
गुर, पश्चिममें चार अंगुल | देवता है, तरिष्ठप्‌ छन्द है हू हे) 
| योग होता है। हे दे 
' छफर उच्रक्षी पक यह्चिय शकरुद्वारा दक्षिण दिशासे | यहां निभ्य होकर 
हे सोंचकर, | प्रथिवी तेरी 
न छिपी। यजन 


द्‌ है,अग्निके आवाहनमें इसका विनि- 
वॉको बुछाकर छा देनेवाले अग्नि देव! 
अविराजो, इस यज्ञको पूरा करो,द्यावा 
रक्षा करें, मे अ्रसन्नताके छिय सब देवताओंका 
करता हूँ । इन दोनों मंत्रोंस अक्षतोंसि आबोः 


परिभाषा, | भाषाटीकासमेतः । (३५ ) 





जम 40776 277 74074 0:4४ 72:02 40५$82/76: 20040 40%: 2080600006:/4:6706 07077 7#९४//०३४३०5५:2727: ्््यश्शा्यभ चमक :फ्रच ्ट्:् )्ओिि़्कि या प्रज्धात 


आच्छादन दूरीकृत्य समसस्‍्तव्याहतीरनां प प्रजापति! भ्रजापातिब्रहती ॥ अश्निप्नतिष्ठ 
वि०॥ ३ भूऊेंवः स्वरित्यात्मामिसुख पाणिभ्यां पडलेखासु तचत्कमबिहितनामकमझकनामान 
मा प्रतिष्ठापयामीत्यम्रे म्रतिष्ठाप्य ॥ चत्वारि श्वद्धा गोतमो वामदेवोइप्रेद्निष्दुप ॥ अश्निमृत्ति 
ध्याने वि० ऊँ चत्वारि शड़ा चयो अस्य पादा दे शीर्ष सप्त हस्तासो अस्य॥ जिधा बचद्धो 
वृषभो रोरवीति महोदेवों मत्या' आदेवश ॥ सप्तहस्तश्रतुःशड्र४ सतजिहो द्विशीषेकः ॥ त्रिपात 
प्रसन्नवदनः सुखासीनः शुचिस्मितः ॥ स्वाहाँ 6 दाक्षिणे पा्खे देवी वामे श्वां तथा॥ बिश्- 
दक्षिणहस्तेस्त शक्तिमन्न॑ खच॑ ख्ुवम्‌॥ तोमर व्यजनं वामेध्तपात्र च धारयन ॥ आत्मामिष्ठख 
मासीन एव॑ंरूपो हुताशनः ॥ ऐष हि देवः भदिशो तु सवा$ पूवों हि जातः स उ गर्भे अन्तभासे 
विजायमानः स जनिष्यमाणः पत्यड्सखस्तिष्ठति विश्वतोमुखः॥ अस्ने वेश्वानर शाण्डिल्य- 
गोत्रज़ मेषध्वज प्राड्एख मम संसुंखो वरदों भव ॥ ततोषन्वाधानं कुर्याव्‌ ॥ तत्चेत्थम--आचम्य 
प्राणानायम्य देशकालों संकीत्ये श्रीपरमेश्वरभीत्यथ क्रियमाणेफ्सुकब्र॒तोद्यापनहोमे देवता- 
परिमहार्थमन्वाधानं करिष्यें॥ अस्मिन्नन्वाहितः्नों जातवेद्समश्रिमिध्मेन प्रजापातें, अजापातिं 
चाघारदेवते आज्येनात्र प्रधानदेवताः अमुकहोम्यद्॒व्येण मत्येकमसुकसंख्याकामिराहुतिमि- 
बेह्माद्यावाहितदेवताश्व नाममंत्रेण प्रत्येकमेके कयाःज्याहुत्या यक्ष्ये। शेषेण .स्विष्टकतमपश्नि- 
मिध्मसन्नहनेन रुद्रमयासमाप्रदेवा-विष्णुममिं वायुं सूचे प्रजापति चेताः आ्यश्वित्देवता आज्य- 
द्रव्येण ज्ञाताज्ञातदोषानिबेहणाथ विवास्मभि मरुतश्वाज्येन विश्वान्देवान्त्संत्ावेणाड्रदेवताः 
प्रधानदेवताः सर्वाः सब्रिह्ठिताः सम्तु । णवं साड्रोपाड्रेन कमणा सद्यो यक्ष्ये॥व्याहतीनां परमेष्ठी 








हन करके, ढकनेकी हठाकर-पीछे संपुर्ण व्याहृतियोंका | 
प्रर्मेष्ठी प्रजापति ऋषि है; बृहती छन्द है! प्रजापति देवता | 


है, अभिकी प्रतिष्ठामें इसका बिनियोग होता है। ओ सूझुवः 


तीन तरहसे अथवा तीन जगह बँधा हुआ है, बडा भारी 


कक हि 


प्रसन्न भुख हैं, सुखसे बेठ सुन्दर स्मित कर रहे हैं; दाईं | 
ओर स्वाहा और बाई ओर स्वधा बेठी हुई हैं, दाये हाथ | 
में शक्ति, अन्न, खुक ओर स्रुवा तथा वायें हाथम तोमर | 
व्यजन और घीका पात्र हैं; ऐसे भव्य अप्नि देव मेरे | 
सामने विराज रहे हैं। हे मनुष्यो ! सब प्रदिशाओंस यही | 


+व्याकरण महाभाष्यकारने इसका शब्दपरक अथ्थैकियाहे। भागवतने 


इसीके भावका ऐसाही एक इलोकरखकर भगवान्‌ विष्णुजीकी ओर | 


बढाया हे) ह 





अभ्नि दृव हैं, सबसे पहिल यही हुआ है, यही गर्भेके बीच 
मे हैं, यही विशेषरूपसे हो रहा है और यही होगा; हे 


| मनुष्यों ! यद्यपि सवेतो सुख है पर तो भी आपके सामने 
स्व: । इससे अपने सामने दोनों हाथोंसे, छः रेखाओंके | 
बीचर्म जिस कामके लिये जो अग्नि स्वरूप,नाम कहागया | 
है, उस रूप नामकों कहकर अप्निकी स्थापना कर देनी | 
चाहिये, कि ऐसे २ अग्निको इस २ काममें में स्थापित | 
करता है। ओमू “+चत्वारि श्ज्ञा:” मन्त्रका गोंतस वास- | 
देव' ऋषि हैं, अग्नि देवता हैं, त्रिष्दुप छन्द है, अग्निकी | 
मूर्तिके ध्यानमें इसका विनियोग होता है। इस अग्नि 
देवके चार शज्ण, तीन पाद, दो शिर ओर सात हाथ हूं, | 


विराजमान हो रहा है । हे शण्डिल्य गोत्री मेषकी ध्वज!- 
वाले एवम्‌ पूरवकी ओर मुख करके बेठे हुए आप मेरे सामन 
मुझ वर देनवाल हजिये। अन्वाधान-आचमन प्राणायाम 
करके, देशकाछ॒का कीत्तन करके, करनेवाढेको कहना 
चाहिय कि परसेश्वरकी प्रसन्नताके लिये किये इस ब्रढके 
उद्यापनके होममें, दववाक परिग्रहके लिये, अन्वाधान कर्म 
करता हूं । इस अन्वाहित अश्निम जातबेदा अग्निको तथा 
प्रजापतिको इध्मसे, प्रजापति आधार देवता तथा अग्नि 


हे रे 5 । और सोम इन दोनोंको एवम्‌ नेत्रोंको आज्यसे इसकर्मके 
देव है, सब काम्मोंका पूरा करनवाहा हैं, वो यहां मनुष्यों | 
के वीच आविराजा है | भगवान्‌ अप्नमि देवक साथ हाथ; | 
चार आड़, सात जिहा दो शिर और तीम पाद हैं, सदाही | 


प्रधान देवताओंको इस हृव्य द्र॒व्यसे इतनी आहुतियोसे 
तथा त्रह्मादिक आहत देवताओं को नामसनन्‍्त्रसे एक एक 
आज्यकी आहुतिसे यजन करूँगा, बाकी बचे शाकल्यसे 
स्विष्टकृत्‌ अग्निको तथा समिधाके वन्धनसे रुद्रको; एवम्‌ 
अयासअग्निदेव विष्णु अग्नि वायु सूर्य और प्रजापति 


ये जो प्रायश्चित्तक देवता हैं इन सबको आज्यसे तथा जाने 


और वे जाने हुए दोषोंके निवारणके छिय॑ अग्नि और 
मरुतको तीनवार आज्यसें, विश्वेदवाओंको संस्नावसे 
एवम्‌ जो अज्भदेवता वा प्रधान देवता उपस्थित हों में 
सबका सांगोपांग कर्म विधिसहित यजन करूँगा। व्याहः 


| तियोंके परमेष्ठी प्रजापति ऋषि हैं। प्रजापति देवता हैं 
....३ एपोइ देव: । २ सएवजातः ४ इति साध्यन्दिनीयपाठः । 


( ३६ ) ब्रतराज: । 


[ सामान्य 





2७७७ न मम 


अजापतिः प्रजापतिबृंहती । अन्वाधानसभिद्धोमि विनियोगः॥ ऊँ चभूर्भवः स्व: सवा 


पअजापतय इढं० ॥ तत इध्माबाहिषोः सन्नहन कृत्वाएग्नि परिसम॒ह्य परिस्तणीयात्‌ ॥ तज्चेः | 
अग्न्यायतनादष्टाइगुलमिते देशे ऐशानी दिशमारण्य प्रदक्षिणं स मन्तात्सोद्केन पाणिना हर 
परिमृज्य पोडशदमें: परिस्तृणीयात्‌ । तत्र आच्यां अतीच्यां चोदगग्ना दर्भाः ॥ अवाच्यामुदीन 
च मागआः ॥ पूर्वपश्चात्परिस्तरणसूलयोरूपरि दक्षिणपरिश्त रणमूं ॥ उत्तरपरिस्तरणं तु तदस्रगो 
रधस्ताव्‌॥ ततोग्नेदक्षणतों बह्मासनार्थमुत्तरतश्व पात्रासादनाथ कांखिदभोन्प्रागग्रानास्तणीया 
अग्नेरीशानश्विरभ्मसा परिषिच्य उत्तरास्तीर्णेषु दर्भेष दक्षिणसव्यपाणिश्यां क्रमेंण चरुस्थाही- 
_ मोक्षण्यों दर्वीज्चुवों मणीताउज्यपात्रे इध्मावहिंषी इते द्ंद्रश उदगपवर्ग आक्संस्थं च स्युब्जाति 

पात्राण्यासादयेत्‌ । ततः प्रोक्षणीपात्रजुत्तान॑ कृत्वा प्र द्शमात्रकुशद्रयरूपे पवित्र निधाय 






हु 


अद्विस्तत्पाबं प्रयित्वा गन्धउष्पाक्षतात्रिक्षिप्याड्गछ्रीपकनिष्ठिकास्यासुदगमे प्रथक्पवित्रे पृतव 
अपश्िरूत्पूय पात्राप्युत्तानानि कृत्वा इध्मं च विस्नस्य सर्वांणि पात्राणि ले: प्रोक्नेत। ता आप 
चित्कमण्डलो क्षिपेदित्येके । प्रणीतापात्रमश्े: अत्यडूनिधाय तत्र ते पवित्रे निधाय उदकेन पू; 
यित्वा गन्धपृष्पाक्ष ताब्निक्षिप्य। बहामपक्षे--अध्मिन्कमाणि बह्माणं त्वाईई ब्रणे इंते पाणिना पा 
सटरट्ठा इतो बच्मा बृतोस्मीत्युक्त्या माइमुखो यज्ञोपवीत्याचम्थ समस्तपाण्यड्ज॒प्ठो भृत्वाग्रेणाए 
परीत्य दक्षिणत उदड्सुखः स्थित्वाउसनार्थ दर्भेषु दक्षिणभागस्थमेक दर्भम इग्गष्ठानामिकाध 
गहीत्वा निरस्तः परावसुरिति नेकत्यां निरस्यापः ध्पृ ट्ेदमहमवांवसोः सदने सीदामी त्युक्त्वोद " 
सुख एव वामोरूपरि दक्षिणाडिंख्र संस्थाप्पोपविश्य गन्धाक्षतादिभिरचितः सन्‌, बृहस्पतिय््ा 


3 १..>०->क०न+, 


आर छू छ कै हे पे श न 
शिष्य ते चहस्पते यज्ञ गोपाय सयश पाहि स यज्ञपाति पाहि स मां पाहीति जपिल 
ध्यै्‌ रे 5 
विनियोग होता है । फिर भूमुवः स्वः हो 4 जापतय इद | कर, अँगूठे और कनिप्चिकासे उ दूश प्रथक्‌ू पवित्र रखकर 
5 अहकर अपभ्निमें समिध हवन कर देनी चाहिये। | तीनवार पानीका उत्पवन्न करके, इध्मको टीक करके, सब 
इसके पीछे समिध और कुशाओंको सन्नहनकर अम्निके पात्रोंको पानीसे तीनवार प्रोक्षण लवालिथि गंदी 
परिसमूहन करना चाहिये। इसके बाद अग्निको चेताकर पक या बाहिक जी, 
चारों ओर कुशके विछानेकों कहते हैं । उसका क्रम यह है | देना चाहिये । प्रणीतापात्रको अग्लिके पूवर्म रखकर उस 
कि, वेदीके चारों ओर इशान कोणसे लेकर प्रदक्षिणक | पर दोनों पविच्ना रखकर पानी भरकर, सुग न्धित पु 
फमसे तीनवार ने करके पीछे सोलह कुशाओंको | तथा अक्षत डाल दे । पीछे कहे कि, में इस काममें आपको 
बिछाना चाहिये। पूरव और पश्चिममें उद्गग्म दस / तथा ] 
है ्‌ न कं] 
बी कि वो हाथ पकड़कर कहे कि में तेरा ब्रह्मा बन गया; पीछे 
की परिस्तरणके भूछक अं दृक्षिण परिस्तरण होना | ब्ह्माजी परबकी ओर मुख करके यज्ञका उपवीत पहिन 
चाहिए। तथा उनके गाडीक नीचे उत्तर परिस्तरण होना | आचमन कर, हाथ परोंको इकट्ठा करके आगाडीसे अग्नि 
न हैये । इसके पीछे अग्निसे दक्षिण अह्माऊ आसनके | को घे 
हक ७ 
असनक लिए कुछ एक | दर्भामेंसे एकद+ अंगूठा और अनामिकासे केकर “निए 
3. वभोकों बिछाना चाहिये, पीछे अग्निसे लेकर | स्तःपरावसु"' परावसु निरस्तकर दिया शीघ्र यह मुख्ये 
इशासकोण तक तीनवार पात्ती छिडक कर उत्तर दिश,की 
4६ रे हा चल ९ ! 
शद्सहमवावसो:सदने सीदापि” मैं अवांबसुके सदन पर 
दर दर गं।पडिओ * रे क्‍ 
चरुस्थाली प्रोक्ष जम बाबर एड देनी चाहिय। पहिले बैठता हू यहे कहता हुआ उत्तरकी ओर मुह रखता हुआ 
प्रणोता आव्यपात्र, इध्प बह, हैवे तथा फिर ही बायें घोंट्के 
तरफ्से स्थापि कं जिस पमय यजमान्त उत्तका गध अक्षत्‌ आदिसे पूजन क्‍ 
रख दे । पीछे शोक्षणी पातनदो बीयर 3 उल्टा | करता है उस समय ज्ह्मा कहता हे कि “इन्द्रके घरपर वह 
दो इसको पवित्रीके हपने इखकर, | ' णी अद्या बनते हैं वो ही 


शक हे ७ धर ञ, ५, । 
इहती उन्द है अन्वाधानकी सप्तिधाओंके होमसें ईनका | पानीसे भर, उसमें सुगन्धित फूल और अक्षतोंक्रो डर 
० ३ कर ९ 
उसका चारों ओरसे परिस्तरण करना चाहिये। परिस्तरण | » ऐसा कहते हैं कि, वो थोडासा पानी क सण्डलमे मर. 
२ 
५ हे त्रह्माके रूपमें वरण करता हूं, बननेवाल द्विंजको भी चाहिये 
दक्षिण उत्तरमे प्राग्ग्न दे होनी चाहिये । पूर्व. और 
+। परकर, दक्षिणसे उत्तर मुख करके बैठे, आसनके हि 
लिये तथा अग्निसे उत्तर पात्रोंके 
कहते हुए कुशाको नैकत्य कोणमें फ्रेंककर आचमन करे 
ओर बि्ी हुईं कुशाओंपर दोनों हाथोंस ऋफ्से च्चे 
यें घोंदूके ऊपर दायें पैर रखता हुआ बैठ जाता ै। . 
बी ५... ईंग सबोंको उत्तरकी तरफ. हा ह 
हमे उंलबा 
क्‌ ». ' उसे | यज्ञपतिकी रक्षा करें, भेरी रक्षा 


बृहस्पति इस यज्ञकी रक्षा, ु 
करे, इस प्रकार ज़पता हक .'. 


परिभाषा, ] 


यज्ञमना एवं वर्तेत ॥ ततः कर्ता बहान्नपः 
स्युपांधॉपमणयेत्युश्ेरझक्त्वातिसजेत ॥ ततः 


नासिकासमीरं नीत्वोत्तरतोग्नेनिंधायास्येदर्मरा 
उरतःसंस्थाप्य तस्मिन्नाज्यमासिच्य परिस्तरण 


का 


सेप्य पुनस्तनंवोह्मुकेन प्रधानदव्वध्यसहितमाउय 


ज्वलता दर्भोल्मुकेनावज्यस्य दर्भाअद्वयं नि! 


भाषाटीकासमेतः । 


प्रणेष्यामीत्युक्ते--- झँ भूश्ेवः स्वर्वृहस्पातिप्रसूलते- 
कतों तत्मणीतापात्न दक्षिणोत्तराश्यां पाणिल्‍यां 
च्छादयत ॥ ते पवित्र आज्यपात्रे निधाय तत्पात्नं 
द्रहिरुत्तरतोड्ारानपोह्य तदु॒पर्याज्यपात्र निधाय 


त्रिःपयग्निकृत्वा तदुल्मुक निरस्यापः स्पृष्ठाड्ारानग्नों क्षिपेत्‌ ॥ अंगष्ठोपकनिष्ठिकाम्यां पावत्रे 
गृहीत्वा । सविठ्॒देति मन्त्रस्य हिरिण्यस्यस्तूप ऋषि॥सविता देवता।पुर उष्णिक छन्दः। आउय- 
स्योत्पवनेविनि० ॥ ७ सवितुष्ठा मसव उत्पन्नाम्याच्छिद्रेण पवित्रिण बसोः सूथस्य राश्मानिः ॥ 


इति मंत्रेण प्राजुत्पुनाति सकृह्विस्तृष्णीम्‌॥ते पविश्रे अद्धिः 


प्रोक्ष्याग्नो पहरेत ॥ स्कन्दाय स्वाहा 


स्कन्दायेद्‌ नममेति ।| तत आत्मनोगतो भार पोक्ष्य । तन्न बहिंःसन्नहनीं रज्जुमुदगम्ां मसारये 
तस्थां बहिरास्तीर्य तदुपारे आज्यपात्र निधाय कुशान वामहस्तेन स्जुकूस्त॒ुवो च दक्षिणहस्तेन 


ग्रहीत्वाओऋ प्रताप्य दवा निधाय स्॒॒व॑ वामहस्ते गृहीत्वा 


दक्षिणहस्तेन स्लुवबिल दर्भाग्रश्निः 


संमृज्य तथव खुबपृष्ठ दर्भाग्रेरात्मामिसुखं त्रिः संमज्य कुश मूलेदण्डस्थाधस्ताद्विलपृष्ठादारभ्य 
यावहपरिष्टाद्विल तावत्‌ त्रिः संमृज्याहरिः प्रोक्ष्य म्ताप्य घृताइुत्तरतः स्थाप येत्पुनस्तथेव स््र॒ुच॑ 


संमृज्य मोक्ष्य प्रताप्य ख़॒वोत्तरतः स्थापयेदभोानद्धिः 


क्षालथित्वाइश्नो प्रहरत ॥ स्नरुवेणाज्य॑ 


गहीत्वा होमद्व्यमभिधाये उदग॒द्रास्य अग्स्याज्ययोम॑ध्येन नत्वाध्ज्याइक्षिणतों बाहिषि 
सान्तरमासाद्य ततो, विश्वानि न इति तिरझूणां वसुश्नतोप्रिख्चिष्टप ॥ द्ाभ्यामचनेष्न्त्यथोपस्था- 
नेवि० ॥ ऊँ विश्वानि नो इुर्गहा जातवेदः ॥ सिन्ध न नावा दुरितातिपषि ॥ अम्ने अधविवन्नमसा 
टणानः ॥ अस्माक बोध्याविता तनूनाम्‌। यधत्वा हदा कीरणा मन्यमानः ॥ अमर्त्य मत्यों जोह- 


यज्ञम् मन लगाकर बेठ जाय । यजमान त्रह्मासे पूछता | 


है कि ब्रह्मन्‌ जलका प्रणयन करूंगा | यह झुनकर ब्रह्मा, 


“ओमू भू: शुवः स्वः बृहस्पति प्रसूता ता नो मुआवन्तु | 
अंहसः।” बृहस्पतिजीसे आज्ञा पाये हुए बे पानी तुमे | 
पापसे छुडादें यह मंत्र धीरे तथा पानीका प्रणयन करो यह | 
ऊँचे स्वरसे कहकर पीछे मौन छोड दे, इसके पीछे कर्ता | 


दोनों ह/थोंसे प्रणीता प/त्र॒को नाकके समीप छाकर अप्निके 


त्रोंको आज्य पात्र पर रखकर उस पात्रकों सामने स्थापित 


करे। फिर उसमें घी करके उसे परिस्तरणके बाहिर उत्त- | 
रकी ओर अंगारोंपर रखकर जछते हुए कुशोंको आज्य- | 
पात्रके चारों ओर घुमाकर आगपे पटक दे, पीछे दो | 
उल्कोंसे प्रधान द्रव्य सहित तीन वार पर्य्याप्नि कर उल्कको | 
फेंक आचमन करके अंगारोंको अम्निमें छोड दे। अंगुष्ठ | 


ओर उपकनिष्ठिकोंसे दो पवित्र छेकर, “ओप सवितुट्ठा” 
इस मत्रका हिरण्यस्तूप ऋषि है, सूर्य देवता है, पुर उप्णिक्‌ 
हन्द है, आज्यके उत्पवनमें इसक्रा विनियोग होता है। 


सविताको आज्ञामें चलता हुआ में निर्दोष पविश्रें और | 


सबके बसानेवाले सूय्ये देवकी किरणोंसे तेरा उत्पवन 


चाप घीका उत्पवन करना चाहिये। उन दोनों पवित्रोंका 
पाणीसे प्रोक्षण करके अग्निमं डा देना चाहिये। उस 


इस अथंके ऊपर लिखे हुए मंत्रको मुखस कहना वेध है 


| इसके पीछ अपने सामनकी भूमिका प्रोक्षण करके वहां ही 


उत्तरकी तरफ अग्रभाग करके वहां बहिंके बॉधनेकी र5जुको 
बिछाकर उसपर आज्य पात्र रखकर बाँये हाथमें कुशा 
और दायें हाथमें खकू के अभ्निसे तपा दर्वीको रखकर 
पीछे बायें हाथमें खुवा छे और दाये हाथमें कुश लेकर उस 


0 | खबके बिलको तीनवार शुद्ध करे | इसी तरह अपने सामने 
उत्तर रखकर दूसरी कुशाओंस ढक्क दे, उन दोनों पवि- | 


तीन वार छबकी पीठको शुद्ध करें, पीछे कुशोंकी जडोंसे 
सुवोके बिछकी पीठस छेकर ऊपरके बिछतक तीनवार 
शुद्ध करके फिर पानीसे उनका प्रोक्षण करके पीछे उन्हें 
अभ्निसे तपाकर घृतके उत्तरमें रख देना चाहिये, फिर इसी 
तरह स्रचको शुद्ध करके पीछे उसका प्रोक्षण करके ख्वासे 
उत्तरकी ओर रखदे। दर्मोका पानीसे प्रश्षाढन करके उन्हें- 
भो आगमे पटक दे । जख़वसे घी लेकर ट्ोमकी चीजोंमें 


| भिल्य दे, पीछे उसे उत्तरकी ओर उद्दासन करके घी और 
| आगके बीचमें छेजाकर घीसे दक्षिणकी ओर कुशासनके 
| कुशाओंपर रखदे । “ओपमू विश्वानि न? इत्यादि तीन ऋचा - 


ओका वसुश्र॒ुव ' ऋषि है, अग्नि देवता हें, तिष्ठुप्‌ छन्द है। 


बसानेवा | दोका पूजनर्म तथा एकका उपस्थानमें विनियोग होता है। हे 
करता हूँ। इस संत्रको एकवार बोछ कर तथा दोवार चुप- | 


जात वेद!आपहमारे सब कटष्टोंको नष्ट करते हैं आप हमें ऐस 


| पार छगा देते हैं जेस कि योग्य जहाजी समुद्रसे पार कर 


कक हर 


ली उस | देता हे। हे अम्ने जेस आपने अज्िकी नमसस्‍्कारें सुन दुःखों 
अमर यह ,स्कनदुके लिय स्वाहा हैं। यह मेरा नहीं है।' 


पार क्रिया.था इसी तरह हमारी भी सुनो एवम्‌ हम 





(३८ ) 4 ) . नााननननमनकननननं,ाे-भ मनन न नान «मनन मय न ++म मम कल 


बीमि ॥ जातवेदों यशो अस्मासु घेहि प्रजाभिरत्रे अम्नतत्वमस्थाम्‌॥ २॥ यस्मे त्व * सुकते 
जातवेद उ लोकमप्ने क्रष्णवस्योनम|॥अखिन सखपुत्रिणं वीरवन्त गोमन्ल रथिन॑ शते स्वस्ति 
॥३॥ इ्ति अष्टदिक्ष॒ गन्धपृष्पादिशिरभ्िमभ्यच्यें आत्मान चालकुत्य घ्कय। परस्थाय ततः पाणि- 
नेध्ममादाय मूलमध्याग्रेष ख्वेण त्रिरभिषार्य मूलमध्ययोमध्यमागे गहीत्वा। अयंत इध्म इत्यस्प 
मंत्रस्य वामदेव ऋषिः ॥ जातवेदोप्रिंदेवता ॥ तिष्टपूछन्दः ॥ इध्महवने विनियोगः ॥ ऊ अये त 
इृध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वरद्ध॑स्व चेद्धवर्चच चास्माव्‌ प्रजया पशुभिबंहमवचसेनान्नाश्े 
समेधय स्वाहा ॥ इतीध्ममग्नावाधाय अम्नय जातवेद्स इदं न ममति त्यक्त्वा । स्त॒वंणाब्य॑ 
गहीत्वा वायवा दिशमारभ्य आम्नेयीपर्यन्तमाज्यधारां ज्हुयात्‌--प्रजापतय इति मनसा ध्यायर्‌ 
स्वाहेति लुहुयाव।तथेव निर्नतिदिशमारभ्य इेशानदिक्पयेन्त जहुयात्‌। उमयत्र भजापतय इद 
न ममेति त्यजेव ॥ तत उत्तरे। अग्नये स्वाहा ॥ अग्नय इदं०॥दक्षिणे सोमाय स्वाहा । सोमा' 
येदं न ममेत्येतावाज्यभागो हुत्वा प्रधानहोम कुर्यात्‌ ॥ ततो बह्यादिदेवतानां मंत्रेणकेकया 
आहुत्या जहुयात्‌ | बह्मणे स्वाहा ॥ सोमाय स्वाहा ॥ इंशानाय स्वाहा॥इन्द्राय स्वाह।अग्नो 
स्वाहा ॥ यमाय स्वाहा ॥ निऋतये स्वाहा ॥ वरुणाय स्वाहा ॥ वायवेस्वाहा ॥ अष्टवर्सुन्य 
स्वाहा ॥ एकादशरूद्रेभ्यः स्वाहा ॥ द्वादशादि यः स्वाहा ॥ अश्विभ्यां स्वाहा ॥ विश्वेभ्यों 
देवेभ्यः स्वाह्।सप्तयक्षेम्यः स्वाहा ॥ भूतनागेभयः स्वाहा ॥ गंधवाप्सरोभ्यः स्वाहा ॥ स्कंदाय 
स्वाहनन्दीश्वराय स्वाहा ॥ शुलाय स्वाहा ॥ महाकालायस्वाहा ॥ दक्षादिसप्तगणेभ्य स्वाहा॥ 
दुर्गायेसस्‍्वाहा ॥ विष्णवे स्वाहा ॥ स्वधायेस्वाहा ॥ मृत्युरोगेम्यः स्वाहा ॥ गणपतये स्वाहा॥ 
अद्यस्वाहा॥ मरुद्ः स्वाहापृथिय्ये स्वाहतागंगादिनदीभ्यः स्वाह्।सप्तसागरे भ्यः स्वाहा ॥मेरदे 
स्वाहा ॥ 5 ये स्वाहा ॥ त्रिशूछाय स्वाहा ॥ वज्ञाय स्वाहा ॥ शक्तये स्वाहा ॥ दण्डाय स्वाहा॥ 
खड़ायसरवाहा ॥ पाशायस्वा०।अडकुशाप स्वा० ॥ गोतमायस्वा० ॥ भरद्राजाय स्वा० ॥ विश्वा- 
मित्राय स्वाहा ॥ कश्यपायस्वाह।जमदग्नये स्वाहा ।| वसिष्ठाय स्वाहा । अच्रये स्वाहा।अरु- 
न्धत्ये स्वाहा ॥ ऐड स्वाहा ॥ कोमायें स्वह्ा।बाम्हो स्वाह॥ वाराह्मे स्वाहा चासंडाये स्वाहा॥ , 
पी मम मम मे और, मिल: श, आम, कज 
हमारॉकी रक्षा करो| | है अग्ने जो मरणशी&छ मनुष्य आपकी | नहीं है । इस प्रकार आहुति छोड़ते हुए कहना चाहिये 
२००४ नक अली ++ न 3 किलर हे इसके बाद ख्ब॒स आज्य छेकर वायुकोणसे लेकर अभ्निको: 
पूरे करते हो, हे जातबेद ! हमें बुत दो, मैं हपती हि आज जि वा 
साथ अमृतत्वको भोगू। हे जात्वेद ! जिस सुझृदीके छिये | ये स्वाहा” यह मनसे ध्यान करता हुआ ही आहतिको 
आप सुख छोक करते हैं उसे घोड़े, बेटे, बीर बहादुर पुत्र | छोडे | इसी तरह नेऋत्य कोणसे लेकर इंशान कोण तक 
पैथा अनेक तरहक घनका छाभ होता हैं जो सदा ही बना | मनसे “प्रजापतये स्वाहा” इस प्रकार कहता हुआ धीढी 
लक 30 सकि कृप। है, आठों दिशाओोमें गन्ध, पुष्प, | धारका हवन करना चाहिये कि, यह प्रजापतिका है मेरा 
से अग्निको पूजकर अपनको वस्खाभूषणोंस | नहीं है) उसके बाद उत्तरमें भी इसी तरह- हवन करनों 
व बस उपस्थानकर पीछे हाथस समिध छेढे | चाहिये। “अग्नये स्वाहा” इद्मप्ये न मम, यह मैंने अग्नि 
भी पके पे “अत इम” इस मतकों बोठकर | सोगाय साहा कह यो पल तो शिव इस, 
३ सत्तव नहीं है, इन दोनों आहुतियोंके पीछे 


* ऋषि है, जालडे बा के ९ *५ े 
० जातवंदा अप्नि देवता है. त्रिष्टुपू छन्द है, इध्मके | प्रधान होम करना चाहिये | इसके पीछे बिना मंत्रके 
हक 
है इससे आप प्रकाशित हूजिये और बढिये 
'ऋरिये। थे जि जात आहुतियाँ हैं एक एक पर एक एक आहुलिदनी चाहिंये। 


हेवनसें इसका विनियो 
ही त्द्मादिक देवताओंको एक एक आहुति दे “ओम त्रह्मण 
तथा हमे प्रजा पद्ु 
जात है. इससे मेरा | 
ब्रेंदा अश्निकी हे; इससे कुछ सी. सरा | अथ स्विष्ठक्ृद्भो मु 'ओमूयद्स्प कर्मण द्र्स मैत्रका ह्व्रिः द 


तराजः । | सामान्य 















000 नम 0727 20000 72200 60700 






किक कट 0/00/ 8708 9 





ग॒ होता है । है जातवे है 
आपकी आस्मा है इससे २०५ ७ पिच यह इध्म ४३३32 पक पल | 
पक यहास लकर ' अ बता ह १) थ तक 
< अर प्रद्मतेजेस बढाकर प्रकाज्ित म्‌ वेनायक्ये स्वाहा ” यह 


परिषाभा, ] भाषाटीकासमेतः । 






ः 5 की !कद्धोम विनियोगः ॥ 
७ यदस्य कर्मणोत्यरीरियं यद्दा न्यूनमिहाकरम॥अ प्रिष्टात्स्विष्टऋद्धिदान परव स्वि्टं खुहुतं करोतु 
मे ॥ अम्नये स्विष्टकृते सुहुतहुत सर्वभायश्रित्ताहुतीनां कामानां समद्धथित्रे सर्वान्न कामान्‌ 
समधेयस्वाहा॥अगम्नयं स्विष्टकुत इद न०।त्रिसन्धानेन रूद्र४*हद्राय पशुपतये स्वा०। रूद्राय पशु- 
पतय इदनमम ॥ अप उप्पृरय । खुबवेण प्रायश्वित्ताज्याहुतीः सप्त ज्ुहुयाव॥तत्र मंत्रा॥ अया- 
शेत्यस्य मंत्रस्य विमद ऋषिभाअयाव्भिदेवता ॥ पेक्तिदछन्दः ॥ प्रायश्चित्ताज्यहोम विभियोगः ॥ 
अ अयाश्राभ्स्यनमिशस्तीश्र सत्यमि त्वमया असि॥ अयसा वयसा कृतो यासव हव्यमृहिषे 
अयानो थेहि भेषजं स्वाहा । अयसेषग्नयइद्‌० । अतो देवा इति द्योः काण्वों मेघातिथिऋंषिः । 
आय्याया देवा देवताः ॥ द्वितीयाया विष्णुदेवता ॥ गायत्रीछन्दः ॥ प्रायश्रित्ताज्यहोमेबि० ॥ 
३० अतो देवा अवन्ठ नो यतो विष्णुविचक्रमे ॥ प्रथिव्याः सत्धामानिः स्वाह॥देवेन्य इद न० ॥ 
४ इद विष्णावचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्‌ ॥ समूठ्हमस्यपांखुरे स्वाहा । विष्णव इढं० ॥ व्यस्त- 
समस्तव्याहतीनां विश्वामित्रजमद्प्रिभरद्राजप्रजापतय ऋषयश।अशिवायुसू यैप्रजापतयो देवताः। 
गायच्युष्णिगलुएवब्बू हत्यश्छन्दांसि ॥ मायश्रित्ताज्यहो मे बि० ॥ ऊँ भूःस्वाहा अग्नयइदं० ॥ ऊँ 
झुबः० वायवइद्‌ ॥ ३ स्व: स्वा९ सूयोय्रेदं> ॥ % नभूसुवः स्वःस्वाहा अजापतयइदं ॥ ततो 
ब्रह्मा कतार परीत्याग्नेबायव्यदेशे तिछन्रेता एब सताहुतीज्ञेहुयादात्यागं यजमानोषत्र कुर्याव ॥ 
अनाज्ञातमिति मंत्रदयस्य हेरण्यगल ऋषिः ॥ अग्नि्दवता! विश्प्छन्दः ॥ ज्ञाताज्ञातदोषर्पारे- 
हाराथ पायश्रिताज्यहोम वि० ॥ ७ अनाज्ञातं यदाज्ञातं यज्ञस्य क्रियत मिथ ॥ अग्ने तदस्य 
कल्पय त्व* है वेत्थ यथातथन्‍्स्वाहा ॥ अग्नयइ० ॥ ऊयुरुवसंमितों यज्ञो यज्ञ: पुरषसंमितः ॥ 


( है९ ) 
. मंत्रस्य हिरण्यगर्न ऋषिः।। अग्नि: स्विष्ठटकदेवबता ॥ अति पतिइछन्द ॥ रि प्रच्धकः 


ण्यगभ ऋषि हे, स्विष्टक्त्‌ अप्नि देव है, अतिधृतिछन्द हे, 
स्विष्टक्तत्‌ होममें इसका विनियोग होता है। इस कम्मका 
मुझसे कुछ बाकी रहगया हो या उसमें मुझस कुछ न्यूनता 
आगयी हो तो उस संभालनेवारूा ज्ञाता स्विष्टकत्‌ अग्नि- 
देव, सबको अच्छा कर दे | यह विधिके साथ किये गये 
हवनको ग्रहण करनेवाले सबी प्रायश्रित्तकी आहुरतियोंके 
कार्मोंका समर्थन करनेवाले एवम्‌ अच्छी इष्टी करनेवाले 
अग्नि देवके लिये है। हे अग्ने |! हमारी सब कामनाओंको 
पूर है. ३ जप  ध 
रा करिये.यह अच्छी इष्टी करनेवाले अग्निक छिय हैँ । 
मेरे लिये नहीं हैं । इससे तीन बार सन्धान करके पीछे 
पशुपति रुद्रके लिये स्वाहा है यह पशुपति रुद्रके छिय हैं 
मेरा नहीं हे इससे एक आहुति देकर पीछे हाथ पैर धो 
डाले । पीछे खुवेसे सात प्रायश्चित्तकी आहुतियों दे | इन 
सातों आहुतियोंके भिन्न भिन्न मंत्र हैं। उन्हें यहीं मूलमे 
लिंखा हे । उनके अर्थ यहां लिखते हैं । “ओम अयाश्थ” इस 
मेत्रका विमद ऋषि है, अया अग्नि देवता है, पेक्ति छन्द्‌ 
है, प्रायश्चित्तके आज्य होममें इसका विनियोग होता है। 
हे अयास्‌ अग्ने, आप हमारी बुराईको दूर करना; क्योंकि 
आप वास्तवर्म अयास हो तथा आप वयससेभी अग्यास हो 
परिपृूण हविको देवोंमें पहुँचाते हो । हे अयास्‌ ! 
हमारे लिये भषजकों धारण करो। “ओमू अतो देवा 
लथा ओम इद विष्णुविचऋमे' ? इन दोनों मंत्रोंके काण्व 
संधातिथि ऋषि हैँ, पहिलेके देव तथा दूसरके विष्णु देव 
देवता, हैं, गायन्नी छन्द है; प्रायश्वित्तके आज्य होममें इनका 
विनियोग होता है। हे देवताओं | आप हमारी उससे रक्षा 


कर जिसस विष्णु भगवान्‌ प्रथिवीके सातों थासों 
पर चल्लेथ । यह दवोकी है ॥मेरी नहीं है, श्री विष्णु भग- 
वान्‌ अपने छोकसे चले ओर आहवनीय आदि तीनों 
कुण्डोंम अशसे आ विराजे, बाकी निद्य धाममे रहे ॥ यह 
विष्णु भगवानकी हैं मेरी नही है। भू। भुव+ स्वः इन 
तीनों व्याह्ृतियेमिंस एक एकके ऋषशः विश्ाम्ित्र, जस- 
दग्नि और भरद्वाज ऋषि हैं, अग्नि वायु और सूर्य देवता 
हैं, गायत्री उष्णियू और अनुष्टुप्‌ छन्द हैं तथा तीनोंके एक 
साथ रहने पर प्रजापति ऋषि, प्रजापति देवता और बृहती 
छन्द है, प्रायश्रित्तके आज्य होममें इनका विनियोग होता 
हे । ओम भू: स्वाहा अम्नये इंद न मम-यह अग्निके छिय 
है मेरी नहीं हे। भोम्‌ भुवः स्वाहय वायवे इदे न मम-यह 
बायुके लिये हे यह मेरी नहीं है । स्वः स्वाहा, सू््योय इद्‌ं 
न मम-यह्‌ सूय्यके लिये हैं मेरी नहीं हे। ओम्‌ भूभुवः 
स्व: स्वाहा प्रजापतय इद न मम-यह' प्रजापतिके लिये ह 
मेरी नहीं हे। इसके पीछे, ब्रह्मा कर्ताकी प्रदरश्षिणाकर 
अग्निंसे वायव्य देशमें बेठकर इन सातों आहुतियोंको हवन 
करें और यहां आहुति-तद्याग थजमानही करें। “ओम 
अताज्ञावम्‌” इन दोनों मंत्रोके हिरण्यगभ ऋषि हअ ग्निः 
देवता है, त्रिष्टुप्‌ छन्द है, जाने और बे जाने दोषके निवा- 
रणके लिये प्रायश्रित्तके आज्यहोममें इनका विनियोग होता 
है। हे अग्ने | इस यज्ञमें जो जानुके विनाजाने दोष हुआ 
हो आप सबको यथावत्‌ जानते हैं; इस कारण आप उसका 
निवारण करदे । यह अग्निके छिये हैं) भरी नहों है, पुरु- 
हा कप बे अम्ने | ज्ञकी ह. री 
घषस यज्ञ तथा यज्ञस पुरुष होता हैँ । हे अग्न  यज्ञका सर 





(० पत्र ककवण 767 ६: जैव र० पाए 


श््ल्ाम््थध्प्थ्पप्थ््य्य्््य्थथ्ल्््मार आई 5 








अग्ने तदस्थ कल्पय॑ त्वश्हि वेत्थ यथातथश्स्वाह्माअग्नयइ०॥ यत्पाक्रेत्यस्य मंत्रस्य आप्त्या- 


$ ०, 


ख्वित ऋषिः ॥ 


बलतराज: | 


कद ३ ् श 
तक) धमच्य, गा 22002: ० 9७9७3333 29 03,30%94200550333:-++ 2-35  - न ० ००५७-५४ ५५2८८ ५५.५3 मनन आह ५9 शक पद 22% ७ ४ 


है बला ड्ल्यय ष्न्फु 
आगिदवता ॥ तिष्दुप्छदः ॥ मात! ्ञातदश्यप 





22244 १8 22 8:70 कटी ० शत (०2002: 2:क्‍ चैक जी न श्र 


आप के 
ब्््त व बड़ झा छ ँ 
हा 


5! मल 8 शा 
शा बंद ४ पक आह ॥ हा कद] दी ह कार धह ए धा २५१०५ ;९" फोर 
हशुथ अआायबचाज्यट्रारायिण | 


 यत्पाकत्रा मनसा दीनदक्षा न यज्ञस्य मचवते मर्तास:॥अग्निष्ठद्धो ता ऋत॒विद्विजानन्यजिष्ठ 
देवा: ऋतुशो यजाति स्वाह्ा।अग्नयइढं॥यद्दों देवा इत्यस्यथ अभितपा ऋषिः॥ मरूतो देवताः॥ 


जिटृप्छल्दः ॥ मंत्रतेत्रविषयोखादिनिमित्तकप्राय श्वित्ताज्य हो मेजि० ।। ऊँ यद्दो 


देवा अतिपातयातनि 


वाचा च प्रयुती देवहेव्यनम्‌ू ॥ अरायो अस्मों! अन्निदच्छ तायतेन्थत्राल्मिन्म रूतस्तत्रिधेतत 


स्वाहा ॥ मछरुझय इद न ममेति त्यजेत ॥ ततः 


कता पूणाहुर्ति जुहुयात्‌ ॥ 


तद्यथा--स््रुवेणाज्य 


गहीत्वा खच॑ द्ादशवारं चतुवारं वा प्रयित्वा तस्यां खबमूध्यबिल निधाय पुनरधोविह 


निक्षिप्य ख्॒वाग्रे पुष्पाक्षषफलसदितं तांबे 


कर 


तय सत्यपाणिना ख्क्स्म॒वमूले ध्षत्वा दक्षिण 


पाणिना खुक्स्॒व॑ शंखमुद्र॒या ग़हीत्वा तिष्ठन॥ झुवाग्रन्यस्तदाष्टि, धाम ते वामदेंव आपोजगती। 
पूर्णाहुतिहोमेवि०॥#धाम॑ ते विश्व॑ शुवनम विश्वितमन्तश्समुद्रे हृद्यस्तरायथषि । अपामनीके समि 
थे आध्तस्तमइ्याम मडुमन्त त ऊमि<स्वाहेति पठन्यवपरिमितां धारां ख्रुगप्रेण सनन्‍्ततां सश्ें . 


हुत्वा अद्य इृद न ममेति त्यकत्वा विश्वेश्यों देवेश्यः 


स्वाहेति संज्लाव हुत्वा विश्वेभ्यों देवेभय 


इदू न ममेत्युकत्वा वहिंदि पूर्णपात्र निधाय दक्षिणपाणिना स्पृशन्‌॥ ऊँ पूर्णमस्ति पूर्ण मे भूया 


सुपू्णमसि खुपूर्ण मे भूथाः ॥ सदसि सम्मे भूयाः 


मा मेक्षे्ठा॥। इति जपित्वा कुशाओ: 


की कि. हि 


 सर्वेमासे सब में भूयाः ॥ आश्षितिराप 


भागादिजु दिक्ष मंत्रेजलश यथालिड्ं सिश्वेत ॥ ते च मंत्रा।- 


ई प्राच्यां दिशे देवा ऋतिजो मार्जयन्ताम्‌ ॥ दक्षिणस्यां दिशि मासाः पितरों मार्जयर्ताम । 


अप उपस्पृश्य ॥ प्रतीच्यां दिरी ग्रह: 


पशवो मार्जयन्ताम ॥ 


हट 


उदीच्यां दिश्याप ओषधयो मार्ज॑ 


यन्ताम्‌॥ उध्वायां दिरी यज्ञः संवत्सरः भजापतिमाज॑यतामिति-तत ----- लि तत एकथुत्या पठन कुशाग्र 
जगत फू 777 न नियत 


तुटियोंकों अप जानते हो आप यज्ञक्रों निर्देव करदे | यह 
ञ ये ४५ धर ब्ड 
अग्निक लिय है मेरी नहीं है || ८ ओमू यत्पाकत्रा ” इस 
मत्रके आप्त्य त्रिव ऋषि हैं,अग्नि देवता है, त्रिष्टुपू छन्द है, 
ज्ञात ओर अज्ञातः दोषके परिहारके किये प्रायश्रित्तके 
आज्यहोमर्म इसका विनियोग होता है। जो विशिष्ट ज्ञान 
रहित मनसे दीन दक्ष भनुष्य यह समझते हैं कि, हमने 
पह्का सब ठीक कर दिया हें पर यज्ञके जाननेवाले देव- 
ताओंके यजन्‌ करनेवाले अग्निदिव उसकी सब घ्ुटियोंको 
जीनत ६, ऐस अग्नि देव ही देवताओंका यतन ऋतु ऋतु 
0५ करते हैं। यह आहुति अग्निके छिये है 
“ओम  यद्वो देवा? इस मंत्रका असितपा ऋषि है, मरुत 
देवता है, त्रिष्डुपू टून्द हैं; अशुद्ध मेत्रक बोनस जो प्राय- 
शित्त होता है उसके हॉममें इसका विनियोग होता है । ह 
दवो । मैंने जो पाणीस संत्र बोलनेमे गलती की हैं उससे 
हनवाल पापने जो हमारा अनिष्ट शोच रखा है, है सरुतो ! 
3 इससे दूर कर दो । यह मरुतोंके छिए हे मेरी नहीं है। 
ह का भ् यों को दनेके वाद पूणाहुति दे । पृर्णाहुति कस 
द्‌ बे सो खिखते ह“जुवास बारह वार या चारवार 
सीधा स्रदा 2 पी रे 

जग आर फिर उसे ओंधा रखदे, पीछ खस्कूके 
५ अक्षेत्र और ताम्वूल रखकर सत्य हाथस 

2 और खूपके मूक, रखंकर दाथे ५ ताप 
पूडंक लुत्र खकूको रे इसी पे के दायें हाथसे शेखमुद्रा 
४ 75 5 पर्रर हाई जमाकर बेठ जाय, 


ह मेरी नहीं हे । | वि 


खकूके ऊपर | दि 


आम पास ते” इस संत्रका वामदेव ऋषि हे,आप देवता है 
जंगती छन्द्‌ है, पूर्णाहुतिके होममें विंनियोग होता है। हे 
जल देव | तेरा तेज अबत्रिढ्व विश्व फैला हुआ है, समुद्रक 
हेदयक भीतर आपका आयु है मीठी जो तेरी ऊर्मि पानी 
समुदायमे है, में उसीका भोग करता हैँ | इस मंत्रको 
अहता हुआ जोक बराबर धारा तब तक अश्निमें पड़ती 
रहे जबतक्‌ कि थोड़ासा बाकी न रह जाय, जर देवके 
लिय यह हूँ भेरा नहीं है, यह कहकर आहुति दे दे-“ओम्‌ 
श्भ्यो देवेभ्य: स्वाहा” इस मंत्रसे संखावका हवन कर्‌ 
है यह बिश्वे देवाओंके लिये है। पीछे कुशाओं पर पूरे 
प्राजरकी रखकर, उसे दाँये हाथसे छूते हुए कहना चाहिं 
कि, तू पूर्ण है मेरा भी पूरा हो, तू सुपर्ण हें मेरा भी सुपण 
व पदू हैं, मेरा भी सदू हो, तू सब है, मेरा भी सब 
है) दे अक्षिति हे, मुझे भी अक्षय करदे, इस प्रकार जपकर 
:प दिशाओंमे उनके मत्रोंसे कुश जछू छिडकना चाहिये। 
वे भन्न ये हं-ग्राची दिशामें सुयोग्य ऋत्विजों मार्जनकरें। 
दक्षिण दिश्ञाें मास और पितर म्ाजन करें। पश्चिम 
शाम अह और पशु माजेन करें। उत्तर दिशामे आप 


अपषिधि ओर वनस्पति प्ाजेन करें। ऊध्वे दिशामें यह्ञ 
संवत्सर 


+* बाद एक स्व॒रस लीच छिखे हुए “४ आपो अस्माव 
मात्र: ” इत्यादि भन्नोंद 


९ सजापति ज्ाजेन करें। दिशाओंक मार्ज- 


श्र ५  ' 
रा कछुशजछसे अपना माजने 


परिमापा, | भाषादाकासमंत्र: । ९ ढेर) 


स्वशिरसि मार्जयेत्‌ ॥ तंत्र मन्ता+--आपो अस्मानित्यस्य देवश्रवा आपशब्िष्टुप्‌॥ माजेने वि०॥ 
४ आपो अस्मान्मातरः शुन्धयन्तु घुतेन नो वृतप्वः पुनर्तु ॥ विश्व हि रिम्रे भ्वहत्ित देवी 
रादिदाभ्यः शुविरापूत एमि | इदमापः सिन्धुद्वीप आपोषलुष्टुपू॥ माजेने बिं० ।| ऊ इृदमापः 
प्रवहत यत्किच दुरितं मयि ॥ यद्राहमामिदुद्रोह यहा शोप उतानूतम्‌ ॥ झुमित्या न आप 
आओबषधयः सनन्‍्तु ॥| दुर्मिच्यास्तस्मे सन्तु॥योस्‍्मान्द्रिष्टि य॑ च व द्विष्मस्तं हनमीति निऋतिदेशे 
कुशाम्रेरपः सिश्वेव। ततो ब्रह्मा कर्वृवामपाश्वस्थितपतत्यजलों पूर्णपात्रस्थं जलमू--७४ माहं प्जां 
परासिय या न। सयावरीम्थ नः ॥ समुद्रे वो निनयानि सवे पाथो अपीथ॥ इति मंत्रमेकश्र॒त्या 
पत्न्या वाचयन्‌ स्वयं वा पठन्‌ प्रत्यद्सुख॑ निषिच्याजअलिस्थजलेः पापापनोदनारथ मात्मान 
यजमान पत्नी च मोक्षेत्‌ ॥ पत्नी तज्जलं बहिंषि निषिच्चेत ॥ अथवा यजमान एव बर्िष्युत्तानं 
स्ववामपाणें निधाय दक्षिणपाणिना पूर्णपात्रमादाय माह प्रजामिति तज्जलं तस्मिन्प्रत्यड्मुखं 
निषिच्य ता आपः समुद्र गच्छनतीति ध्यात्वा पाणिस्थजलेरात्मान पत्नी च श्रोक्षेव ॥ ततः 
कर्ता वायव्यदेशे तिष्ठन्नश्निम पतिष्ठव ॥ तद्यथा-अम्ने त्व॑ न इति चतछणां गौपायना लोपायना 
वा बन्धु) सुबर्धुः श्रतवन्धुवित्रबन्धुश्रेकेकचा ऋषयः ॥ अग्निर्देवता ॥ द्विपदा- विराट्छन्दः ॥ 
अग्य्युपस्थाने बि० ॥ ऊँ अग्ने त्व॑ नो अंतम उत चाता शिवों मवावरूथ्यः ॥वसुरग्निर्वसुश्रवा 
अच्छानक्षिद्यमत्तमं राये दा॥॥ स नो बोधि श्रधी हवमुरुष्या णो अधायतः । समस्मातद। त॑ त्वा 
शोचिष्ठ दीदिवः सुझक्षाय नूनमीमहें सखिल्‍्यः || ऊ च मे स्व॒रश्व मे यज्ञोप च ते नमश्व ॥ यत्ते 
न्यूनं तसमे त उप यत्तेईतिरिक्त तस्मे ते नमः ॥ ३४ स्वस्िति श्रद्धा मेधां यशः भज्ञां विद्या बुद्धें 
शिय बलमाआयुष्य॑ तेज आरोग्य द॒ृहि में हृव्यवाहन॥ मा नस्तोक इति मंत्रस्य कुत्स ऋषिश॥ 








करना चाहिये। “ओम आपो' अस्मान्‌” इस मेत्रका दवश्रवा 
भ्के ्छ_ कर ४९३ 
ऋषि है, आप देवता है त्रिष्टप्‌ छन्‍्द्‌ है, साजनम विनियोंग 
होता है । संसारकी माकीसी पाछत करनेवारके आप हमें 
प्रोक्षणसे शुद्ध करें। जलसे पवित्र करनेवार्लीं जलूस पवित्र 
करें, देवी आप, मेरे सब अनिष्टोंको दूर कर रही हैं, में पा- 
नीसे पवित्र होकर ही खग जाऊंगा। “ओम इृद्माप/? इस 
मेत्रका सिन्धुद्वीप ऋषि है, आप देवता हैं, अनुष्डपू छन्द 
है, माजनमें इसका विनियोग होता हे। हे जछो | गे भी 
कुछ भेरेमें दुरित हैं उन्हें बहा छजाओ, जो मन कि से 
झूठा बर किया है, तथा किसीको झूठी गाली दी है अथ व 
जो मुझसे करते हों, इस पापसे मुझे छुटादें, हमें आप और 
ओषधियां अच्छे मित्रवाली हों; दुखदायी उसे हों जो 
चर ्शै्‌ दो ७ $ ब्क 
हमस बंर करता है या जिससे सबेर करता हूं। व उसे 
मारता हूँं। यह मंत्र कह कर नऋ्यकोणम कुशाओं पानी 
छिड़क दे. इसके पीछे त्रह्माजी यजमानके बाये पाश्चम् बैठी 
हुई यजमानपुत्नीकी अजहछिमें पूणपात्रके पानीको “ओमू 
माह प्रजाम्‌” इत्यादि मंत्रको पूरवको ओर मुखऋरके कहता 
हुआया ऋहछातहुआ भरदे । मत्राथ-मे अपनी उस प्रजाको 
परे न फेंकू जो कि, मुझे प्राप्त हो रही हे, हम तुम्हें समुद्रमें 
छेजायेगे वहां आप अपना पीना । इसके पीछे ब्रह्म/को 
चाहिये कि, उस जछसे पाप निवारणकेलिय अपना;और 
यजमानपत्नीका प्रोक्षण करदे, पीछे यजमानपत्नी उस 
पानीको कुशाओंपर छोड दें। अथवा यजमान ही पूर्वा- 
६ . 


भिमुख अपना बाँया हाथ सीधा कुशाओंपर रखकर सीधे 
हाथम पूण पात्र छेकर “ ओम ्‌ माहं प्रजां परासिच या नः 
सयावरीस्थनः सपद्रे वो निनयामि स्व पाथो पीथ ” इस 
मेत्रको बोछता हुआ पत्नोकी अजलीमें पानी छोडता 
हुआ पानी सपुद्रको जारहे हैं. ऐसा ध्यान करके अपना 
और पत्नीका दोनोंका प्रोक्षण करना चाहिय | इसके पीछे 
कर्ता वायब्यमें बैठा हुआ उपस्थान करे । “ ओमू अम्ने 
त्वनो इत्यादे चार सेत्रोंक ऋमते गौपायन, छोौपायन अथ- 
वा-बन्धु, सुबन्धु, श्रतचन्धु और विप्रबन्धु ऋषि हैं । अग्नि 
देवता है, द्वियदा विराट छन्द हैं, अभ्िके उपस्थानमें इसका 
विनियोग होता हैं । है' अग्नेदिव ! आप हमारे त्राता तथा 
निवान्त रक्षक हैं आप सप्न॒दायके रक्षक हैं घनकीकीर्ति 
वाले तथा घन ह आप हमें ब॒क्षाइये आपही हमें देवताओंके 
उत्तम धनके देनवाले हैं।हमारे बेरी हमें चारों ओरस 
दवाना चाहते ह, आप उन्हें देखें, एवम्‌ हमारे आह्वानको 
सुने॥हे प्रकाशशील ! ऐसे तुझे स्वर्गीय सुखकेडिय बुला रहे 
हैं कि, हमें और हमारे साथियोंको अद्भुत सुख हो। च ओर 
स्वर मेरे लिये हों। हे यज्ञ | तेरे छिय नम £कार है,जो तेरे- 
लिये कम है उस तेरे तथा जो तेरे छिये ज्यादा हे उस, 
तेरे लिय नमस्‍्कार हे। हे हव्यवाहन ! स्वरि त, श्रद्धा, 
मेधा, यश, प्रज्ञा, विदा बुद्धि, श्रीबछ, आयुष्य, तेज और 
अरोग्य मुझे दे  सानः स्तोक्े ” इस मंत्रके कुत्सऋषि हैं 


चुत न्यंबधरधया -4>-० 3 2०५७००2:०००००--० ४ “मनन ये पं 








१ ही 5११22 72% /77227: “677 अकटम ६872 “7775207/% 77१४० ५४४ बरुर4 [सर न 


4५ 4 
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रुद्रों देवता ॥ जगतीछन्द्‌॥ विभूतिग्रहणे वि०॥ मा नस्तोके तनये मा न आयो मा नो गे! 
मा नो अश्वेषु रीरिषः ॥ वीरान्मा नो रुद्र भामितोवधीहेविष्मन्तः | सदमि त्वा हवामह्दे । 
ज्यायुष॑ जमदसमेरिति ललाटे ॥ कश्य पस्यत्यायुषमिति कण्ठे ॥ अध्स्त्यस्य ज्यायुषमिति 
नामों ॥ यदेवानां ध्यायुषमिति दक्षिणस्क हु । तन्‍्मे अच्तु व्यायुषमिति वामस्‍्कन्धे ॥ सई॑ 
मस्तु शतायुषामेति शिरासि ॥ इति विभूति धृत्वा परिस्तरणान्युत्तरे विछ॒ज्य परिसमुद्य ३ 
पयुक्ष्य रे; पुष्पादिनिरलंकृत्य नेवेधं वाम्बूल॑ च निवेध्य-यरु्य स्मृत्या च 'नामोत्तय 
तपोयज्ञक्रियादियु ॥ न्यून संपूर्णां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम ॥ प्रम दात्कुवतां कम 
प्रच्यवेताध्वरेषु यत्‌ ॥ स्मरणादेंव तद्ठिष्णोः सम्पूर्ण स्यादिति श्रातिः ॥ इते विष्यु: नर 
स्मृत्वाचानेन कमणा श्रीपरमेश्वरः प्रीयतामित्युक्त्वा-गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ स्वस्थाने परमेश्वर। 
यत्र बह्मादयों दवास्तत्र ग़च्छ हुताशन ॥ हृत्यश्रि विखुजेत्‌ ॥ एवं होम॑ संपाद्य उत्तरपूत 
कृत्वा आचाये संपून्ष्य गां दद्यात--यत्नसाधनभूता या विश्वस्याधौधनाशिनी ॥ विश्वरूपषो 
देवः प्रीयतामनया गवा ॥ इति ॥ ततो ब्राह्मगभोजन संकरुप्य ॥ यान्तु देवगणाः से क्‍ 
पूजामादाय पायिवीम्‌॥ इष्टकामप्रसिद्धयथ पुनरागमनाय च ॥ इति स्थापितदेवतां विसत 
पीठमाचायाय दद्यात्‌ ॥ इत्यनिमुखम ॥ 
अथ घुद्रालक्षणम्‌ || 














हेमाद्ौ--संमुखी कृत्य हस्तो दो किंचित्संकुचितांगुली॥ म॒कुली तु समाख्याता पड़ज॑प्रसतो 


सा॥ पवॉक्ता मुकुली या व पादेशे निःछतांगुलि॥ 


व्याकोशमुद्रा मुकुला पद्ममुद्रा प्रकीतिता। 


अंगुष्ठो कुश्चितान्तो तु स्वकीयांगुलिवेष्टितो ॥ उच्चावभिप्ठुतरो हस्तो योजयित्वा त निष्ठरा | 


तजंन्यों कुचिते कृत्वा तथेव च कनीयसी 


विनियोग होता है । हे रुद्र, हमारे तोक, तनय आयु 
गो ओर अश्वोर्तें मारनेका भाव न करियेगा न हमारे 
क्रोधी बीरोंकोही मारियेगा, क्यों कि हम आपको सदा ही 
अपने घरपर बुढाते रहते हैं “ ओमू ज्यायुष॑ जमदसे: '! 
इस मंत्रस छलादर्म “ ओम कद्यपस्य ज्यायुषमू ” इस 
मंत्रस केठमें * ओम अगस्यस्य ज्यायुषम्‌ू ”” इस मंत्रसे 
नाभिसें  ओमू यंहेवानां अ्यायुषम्‌ ” इस मंत्रसे दाँये 
कन्घेपर “ ओमू लनन्‍्में अस्तु ज्यायुबम्‌ ”? इस मंत्रस बांये 
कन्धेपर एवम्‌ “ ओम स्वेभस्तु शतायुबम्‌ ” इस मंत्रसे 
शिरपर विभूति रूगाना चाहिये । अथे-जमदप्नि, कश्यप, 
अगस्त्य ओर देबोंके तीनों आयुष्य हैं वे सब मेरे आयुष्य 
हों सब शतायु हों। विभूति घारणरे बाद उत्तरमे परि 
स्तमोंकों छोडकर तीनवार परिसमूहन और प्रोक्षण करके 
पीछे फूलोसि अलूंकृत करि, नेदेय और पानका निवेदन 
करके भगवानदी प्राथेना करनी चाहिये कि, जिपके 
 स्मरणसही यज्ञ दान तप आदिकी न्यूनता शीघ्र पूरी हो 
जाहीं है, के उस अच्युतक लिय नमस्कार क्रता हूं । यज्ञ 
ऊमे इरवे हुए हमसे प्रसादक वश होकर कोई गछतीहो तो 
हा केक स्तररणसे पूरी हो जाय। पीछे विष्णु 
दि बाज पल कहना 'चाहिय कि इस कसंसे 
'ओ॥ है परमश्वर | हे सुरश्रेष्ठ ! 


हा अपने घामको पधारिये। हे हुताशन ! जह| ब्रह्मार्दिक 


॥ अधोमुखी दृष्ठमखा स्थिता मध्ये करस्य तु। 
रद देबतादे। जगती छन्द है, विभूतिक प्रहणते इसका कण 7 [7777 देवताहे) जगती छन्द हैं, विभूतिके प्रहणमें इसका | 


देवता गयेंहों वहांही आप भी पघार जाइये । इस 
आकार अभिक्ा विसजन करना चाहिये । इस प्रका 
होपका संवादून करके उत्तर पूजा कर तथा आवचार्य्य॑त्षा 
पूजन करके उन्हें गाय देनी चाहिये, “ यज्ञसाधनभू' 
ताया:!” यह गों दानका मंत्र हे कि, जो यज्ञकी साधन गे 
हैं, सारे पापों का नाश करनवाली है, ऐसी गऊके दान 
विश्वहपघारी भगवान्‌ प्रध्नन् होजायँ । इसके बाद जा्षग 
भोजनका संकल्प करके “यान्तु देवगणा:?? इससे दवोंढा 
विसजत करना चाहिये कि, सब देवगण मेरे इष्ट कार्मोको 
सिद्ध करनेके ढिय तथा फिर आनेके छिये मेरी पाशिबी 
पूजा छेकर अपने अपने छोऋको जाये ) [ केवछ गणप्‌. 
तिजी ओर छक्ष्मीजी रह जाये] देवविसर्जन करनेके पीढे 
पीठ आचायके छिये दे देना चाहिये। यह, अम्निमुखका 
विधान पूरा हुआ | 

मुद्राओंका रश्नण हेपाद्विसे कहते ह--जिध्षम दोनो 
ह।थोंको सममने करके अंगुडियॉको कुछ संकुचित करते 
रखते ह उस“मुकुलीमुद्र। कहते ह “ पैकजप्रसता ” भोः 
इसीका नाम है ।जिस मुऊुछीमुद्रामें प्रदेशर्म अगुलिय 
निकलने हुई हों तो “व्याकोशमुद्रा तथा कलीकीतरहखिली 
हुई हो, तो “पद्ममुद्र।” कहते हू । जिसमें अंगूठ कुछ सिकुई 
हुए हों तथा अपनी अगुल्सिवष्टित हों, दोनो हाथ सामने 
ऊँचे जुड़े हों, उस “निष्ठरा” मुद्रा कह। हैं। जिसमें दोनों क्‍ 
तजनी तथा कन्रीयसी अगुढी सकुचित हो, जिनके कि न. 
दीख रहे हों वो हाथक मध्यम, हो, इसे “ अधीमु्ी 


परिभाषा, | भाषाटीकासमेतः । 











चतस्रश्वोत्यिताः पृष्ठे अंग्रष्ठाबेकतः कुर ॥ नाल व्यवस्थितों हो तु व्योमझुद्रा परकीर 

न्त्राज्तरे सर्वदेवतापूज़नसाधारण्थेन षण्सुद्रा डच्यन्ते।देवताननसलंतुष्ठा सर्वदा संसुर्ख 
अंगृष्ठो निश्षिपेत्सेयं मुद्रा त्वावाहनी मता ॥ संग्रथ्य निक्षिपेत्सेयं झुद्रा त्वासनसंस्ति धो 
मुखी त्वियं चेत्स्यात्स्थापनीछुद्रिका मता ॥ उच्छितावाच्छितों कुर्यात्संसुखीकरणी भवेत्‌ ॥ 
प्रख्तांगलिकों हस्तों मिथःछिष्टो ठ संगुखों ॥ कुर्योत्स्वहृदये सेय॑ झुद्ठा भ्ाथनसंज्ञिका॥ इत्यव॑ 
सर्वेदेवानां पूजने षट प्रदर्शयेत।शिवपूजने लिड्रमुद्रा।उच्छित दाक्षि णांगुप्ठ वार्मांगज्ेन बन्धयेत॥ 
वामांगुलीदंक्षिणानिरगुलीमिश्व वेष्टयेत्‌ ॥ लिट्ल्‍डसुद्रोति विख्याता शिवसात्रिध्यकारिणी ॥ 
श्रीकामः शीरष्णि कुरवीत राज्यकामस्तु नंत्रयोः॥मुखे त्वन्नादिकामस्तु औआीवायां रोगशाग्तिकृता 
हृदये स्बकामी च ज्ञानार्थी नामिमण्डले ॥ राज्यकामस्तु ग॒ुह्ये च राष्ट्रकामस्तु पादयोः ॥ 
रामपूजने सप्तदशमुद्राः ॥ तथा च्‌ रामाचनचन-्द्रिकायामगस्त्यः-आवाहनी स्थापनी च 
सन्निधीकरणी तथा ॥ छुसानिरोधिनी मुद्रा संमुखीकरणी तथा ॥ संकलीकरणी चेव महाऊ॒द्रा 
तथव च ॥ शाइ्डचक्रगदाप्रपत॒कोस्तुभगारुडाः ॥ श्रीवत्सवनमाले लव योनिसुद्राः भ्रकी- 
तिता ॥ एतानिः सप्तदशमिसंद्राभिस्तु विचक्षण:॥ यो राममर्चयेन्नित्य॑ मोदयत्स छझुरे- 
वरम्‌ ॥ द्रावयेदषि विभेन्द्र ततः प्राथितमाप्लयात ॥ मूलाधाराहादशान्तमानीतः ढुरुमा- 
अालिः ॥ तिस्थानगलसेजोमिविनीतः प्रतिमादिषु ॥ आवाहनी च मुद्रा स्थादेवार्चनविधों 
मुने ॥ ए्पेवाधोसुखी मुद्रा स्थापने शस्यते पुनः ॥ जउन्नतांगछयोगेन सुप्ठीकृतकरदया ॥ 
सत्निधीकरणी मुद्रा देवाचनविधों सुने ॥ अंगुष्ठगालिणी सेव झुद्रा स्यात्सब्रिरोधिनी ॥ उत्तान- 
मुहियुगला संमुखीकरणी मता ॥ अड्लेरेवाड्रविन्यासः संकलीकरणी भबेत ॥ अभ्योग्याँगछ- 








संलग्रविस्तारितकरद्॒या ॥ महाम॒द्रेषमारुपाता न्यूनाधिकसमापनी ॥ 


मुद्रा ” कहते हैं । चारों अगुलियाँ पीठकी तरफ उठी हुई 


हों, दोनों अगूठे एक तरफ हों,पर दोनों अच्छीतरह व्यब- | 
स्थित न हों, इसे ४ व्योम मुद्रा ” कहते हैं। अन्य त्न्त्र | 
अन्थोंमें सब देवताओंके पूजन करनेकी छः मुद्राएँ कही ह, | 
उन्हें हम यहां ही कहते हैं। देवताके आननसे जो सदा | न्‍ हू 
सन्तुष्ट रहै वो “ संमुखी मुद्रा ” कहाती हे । जिसमें अगूठे | उड50 शवत्सम॒द्रा, वनमाछा सुद्र' और वरनिर 
। पा पा सन्रहसुद्रायें हैं । जो बुद्धिमान इन सत्रहों मुद्राओंसे देदाधि* 
निकाछे जाय वो “ आवाहनी मुद्रा ” हें) जिसमें इकठठी। - ९ नह है 
करके तो करे तो असिन शदा कहाती हयात हवा रामका अचन करता है, एवम्‌ उन्हें प्रसन्न 
है लि अलओ | करता है, वो उनके हृदयकों अपनेपर दयाछु बना जो 

आसन मुद्राको अधोमुखी कर दियाजाय तो यह “ स्थापनी | 

१ क्र ९: चः रे ४ रे । ५ ९ छ  उ 

मुद्रा ” कही शक, । यदि ऊँच ऊूच कर तो ास सुखी | छाई हुईं जो छुसुमांजलि है, उससे अतिमाके वेजकी वृद्धि 
करणी मुद्रा ” होगी। दोनों हाथोंकी अगुंलियाँ फेलाकर 


फिर उन्र दोनोंको मिलाकर हृद्यपर करनेस “ ग्राथना | 


मुद्रा ” होजाती है । इन छओ मुद्राओंको सब देवताओंक 
पूजनमें दिखावे । शिवपूजनम छिंगमुद्रा करनी चाहिये। 
उठ हुए दाये अगूठेको बांये अगूठसे बांध दे तथा बाय 


द्‌, उस समय “िंगमुद्रा” होती है । यह शिवका सान्निष्य 


देनेवाी होती है| श्रीकामवाल्ञा इस सुद्राको शिरपर तथा | 
राज्यकामी नेन्रॉपर, अन्नादि चाहनेवारा मुखपर, रोग- | 


शान्ति चाहनेवाला ग्रीवापर,. सब चाहनेवाका हृदयपर, 
ज्ञान चाहनेवा नासिमण्डलपर, राज्यकामी गुछ_पर और 





कानिश्ठानामिका- 
राष्ट्रकामी प्रोपर इस मुद्रासे स्पशे करै। रामपूजनमें १७ 
मुद्राएं होती हैं, ऐसाही रामाचन चन्द्रिकार्मं अगस्त्यजीने 
कहा है कि-आवाहनी, स्थापनी, सन्निधीकरणी, 'सुसे- 
निरोधिनी, सन्मुखीकरणी, संकलीकरणी, महामुद्रा, शख- 


मुद्रा, चक्रमुद्रा, गदामुद्रा, पद्ममुद्रा, धेतुस॒द्रा,कौस्तुभसुद्रा, 
योनिमुद्रा ये 


। रे 4 
चाहता है सो ले छेता है | मूछाधारस लेझर द्वादृशांततक 


होती हे, हे मुने | देवाचेनविधिम “ आवाहनीमुद्रा ” ही 
कप भ्छै अप | 
श्रष्ठ है, फिर इसी मुद्राको स्थापनके समयमें अधोममुखी 


| मुद्रा कहते हैं । दोनों अगूठोंको ऊपर उठाकर सुठ्टी कर 
| लनेस “ सन्निधीकरणी मुद्रा ” बन जाती हैं जो कि देवाचे- 
| नमें उपयुक्त है। उन्नत- किये हुए अगूठोंके साथ दोनों 
हाथकी अगुहियोंकों दांये हाथकी अगुल्योंसे बेष्टित कर | 


वि 


हाथोंकी मुठी करनेसे “ सैनिरोधिनी मुद्रा ” बन जायगी, 
मुट्ठी ऊंचको दोनों मुट्ठी करनेपर “ सम्झुखी करणी ” बन 
जायगी,अगोंस - गोंका विन्‍्यास करनेस “'संक ली करणी” 
मुद्रा बनती है, अगूठोंको आपसमें छगे रहते हुए भी 
हाथको फेला देनस “ महामुद्रा ” बन जाती है। वह कम 
बेशकी पूर्ति करनेबाली होती है। कनिश्चिका और अत्ता- 


ग 
॥ 20806 6 का ४ करत 26008: 26060 070 0 07400 
र्जशा कि नपान+» > जम ५५+ ०५०4 न >नधनाअ५ सम कक म मन जनक कम जनक नमन मम कम भक अनबन कन०क भाप कना मामा ००० ००००० ०० ]।-7०-ँ्‌ँ:,्‌.,[ृण ्गणा्ाकऊकछामककक कभ्््क्नकभेेू्क ध्ध्धध्ध््य/ ४2४26 74/00077527/] 


0778 


[ ५ 
420: ३2/80/7860: 2/00.0000 27776: 40020% 220 20 60770 7 





मध्यान्तःस्थांगृष्टासद्मतः ॥ गोपितांगुष्ठमूलेन सब्रिधों मुकुली ऋला।क रहयेन सुद्रा स्पाक्ष- 
ड्ारुयेयं सुराचने । अन्योग्यामिसुसस्पशेव्यत्ययेन तु वेडयेत्‌ ॥ अंगुलीभिः प्रयलेग 
मण्डलीकरणं भुने ॥ चक्रमद्रेयमारख्याता गद्ाञद्ा ततः परम्‌ ॥| अन्योन्यामिसुखाहिश 
ततः कौस्तुभसंज्ञिका ॥ कनिष्ठेन्योग्यसंलग्रेमिमुख (हि परस्परम्‌ ॥ वामस्य तजनीमधे 
मध्यानामिकयोरपि ॥ वामानामिकर्संसष्टा त्जनीमध्यशोमिता ॥ पयायेणानतांगष्ठद् 
कोस्तुमलक्षणा ॥ कनिष्ठान्योन्यसंलग्नविपरीत॑ तु योजिता ॥ अधस्तात्मापितांगष्ठा मु 
गरुडसंज्ञिता ॥ तजन्यंगुष्ठमध्यस्था मध्यमानामिकादहयी ॥ कानिप्ठाइनामिकामध्यतर्जम्यप्र 
करद्दयी ॥ मुद्रा श्रीवत्समुद्रेय वनमाला भवेत्ततः ॥ कनिष्ठानामिकामध्या सड्ठिरुन्नततर्जनी॥ 
परिन्रान्ताशिरस्पुच्चेस्तजनीभयाँ द्वौकसः ॥ योनिमुद्रा समाख्याता द्योतत्करद्रयाश्रिता। 
तजन्याकृष्टमध्यान्तोत्थितानामिकयुग्मिका ॥ मध्यस्थलास्थितांगुष्ठा सेयं॑ शस्ता म॒नेषचेने। 
इति मुद्रालक्ष णम्‌ ॥ क्‍ 

अथोपचारा; ॥ । 

पदार्थादशें ज्ञानमालायाम--अष्टत्रिशव्‌ षोडश वा दश पश्चोप्चारकाः ॥ तान्विभज्य प्र॥ 
श्यामि के ते तेश्व कृतेश्व किम्‌ ॥ अध्य पाद्यममाचमन मधुपर्कमुपस्पृशम ॥ स्मानं नीराजा 
वद्धरमाचाम चोपवीतकम) पुनशचमभूषे च दपषणालोकनं ततः ॥ गन्धपुष्पे धूपदीपौ नेवेद्य॑५ 
ततः क्रमात्‌ ॥ पानीयं तोयमाचार्म हस्तवासस्ततः परम्‌ ॥ हस्तवासः करोद्रतनम ॥ ताम्ब॒ल 
मल॒लेप॑ च पुष्पदानं ततः पुन३॥ गीत॑ वाद्य॑ तथा नृत्य स्तुतिश्रेव प्रदक्षिणाः ॥ पुष्पाअहि 
नमस्कारावष्टन्रिंशत्समीरिताः ॥ इत्यप्टजिंशदुप्चाराः ॥ अन्यज्ञ--आसन॑ स्वागत चार 
पाद्यमाचमनीयकम्‌ ॥ मधुपकॉसनस्थानवसनाभरणानि च ।। सुगन्धः सुमनो धूपो दीपमत्नेन 
भोजनम्‌ ॥ माल्याठुलेपने चेव नमस्कारविसर्जने ॥ इति षोडशोपचाराः ॥ अध्ये पार्य चाव- 
मन स्नान वस्थनिवेदनम्‌ ॥ गन्धादयों नेवेद्यान्ता उपचारा दर ऋमात्‌ ॥ शारदातिलके पोह-. 
उपस्थित हुए अग्रभागमे छिपी हुईं हों ऐसा ही जिसका | 


च्कै 





जाती है। दोनों हाथोंकी अनामिका दोनों हाथोंकी तजनी' 


आपससे वेष्टित कर दे। अंगुल्योंको 
कर तुपर, ४ "पकऋमुद्रा ? 


कनिध्चिकाएँ आमने सामने 
बाय हाथकी तजनीके बी 
ऋम दूसर हाथकी मध्या और अनासिका 
वजनी भध्यमें शोमित हो, ऋमसे दो 


नों अगूठ जिसमें नमते 
मुद्रा ” कहते 
भाजानी चाहिये कनिश्िका और अ | 
बकरे ना- 
मिका तजलीके सध्य आनी 


सै 
कहावंगी, कतिष्ा 


ने आपससें मिलगयी हों तथा | 
चस एवम्‌ सध्य और अनामि 


मिल गयी हों) | टन, स्नान, आरती,वस्र,आचमन,उपवी त,पुनराचसन,अहं- 


भूः पे ९ ५ ५ 
| (५ भूसंचन, दुषणाछ्ो कन, गैध, पुष्प, धूप, दीप, नेवेदय 
'उसे “ कौस्तुभ मुद्रा / क हते हैं। कनिष्ठिका आपसमें | कि 


९ $। ५ 
विपरीत ले दो मा चढे हो तो इसे / गरुड- | गीत, बाद्य, नृत्य, स्तुति, प्रदक्षिणा, पुष्पांजलि, नमस्कार 
अनामिका दोनों जा ५ + पष्ठक बीचमें मध्यमा और | ये हे 
चाहिये, यह * श्रीबत्समुद्रा” 
बा का और मध्याकी एकसूठि | 
पजनी उठी हुईं होनी चाहिये इसे 
क्‍ ९ रखनेसे “ बनमाहिका मुद्रा ” बन |: 





| पर रखी हुईं हों, दोनों: अनामिकाएं खडी हों, मध्यस्थहमे 
संस्थापन हो तथा, अँगूठेका अग्रभाग उनमें छिपा हुआ हो | अँगूठे हों तो “ योनिमुद्रा ” बनती है, यह पूजनमें अहिः 
इसे मुकुछीकरण मुद्रा ” कहते हैं । देवपूजामें दोनों | 

हाथोंमे “ शखसुद्रा ” बनती है,इसमें अगुलियॉकी नोकोंको | दिखाकर उनकी संख्या लिखी है,उसमें ज्यादा कम हो जाते 
प्रयस्नके साथ गोल | हैं तथा कहीं कुछ, और कहीं कुछ होता है ] 

| . बन जाती हैं। एक एकके सामने 
सामने करके सिलानेसे “ गदा मुद्रा ” होती है। दोलों' 


श्रेष्ठ है। ये सुद्राओंके लक्षण समाप्त हुए ॥ [अन्थमें उपचार 


अथ उपचार-पदार्थादशमें ज्ञानमाछासे लेकर ढिखा।ै. 
कि३८,१६, १० और पांच (५) ये उपचार हैं इन्हें यहांगे 
अलग अछग दिखाऊंगा तथा इनक करनसे क्या फल होता 
है सो भी छिखूँगा । अध्ये, पाय, आचमन, मधुपक, उप क्‍ 


पानीय, तोय,आचमन, करोद्ट्तन, पान,अनुलेप, पुष्पदान। 


अडतीस उपचार हैं। अथ षोडश उपचार-आसन, 

स्वागत, अध्यं, पा, आचमन, मधुपकांसन, स्नान, वसन, 

५. भरण सुगन्ध, फूछ, धूप, दीप, अन्नभो जन, म'ल्यअनु- 
श ञु 

लपन, नमस्कार और विसजन ये ( सोलह ) षोडश उप क्‍ 

चार कहाते हैं। दशोपचार- अध्य, पाद्य, आचमन) स्नान. 

और वस्चलिवेद्न तथा गंधसे लेकर नेबे्यतक ऋमसे द्श 





परिभाषा, ] भाषाटीकासमेतः । ( ४५ ) 
शोपचारा उक्ता॥ते च--आसनल्लानवशस्खाणि भूषणं च विवर्जयेवारात्रों देवाचने तेश्व पदार्थ 
द्वादशः ऋ्रमात्‌ ॥ पूजन॑ कपिलंनोक्त तत्सवे च विसरजयेत्‌ ॥ गन्धतेलमथो दद्यादवस्याप्रातिर्म 
ततः ॥ अध्यांदिदव्याणि ॥ दूवां च विष्णुऋान्ता च स्यामाक पद्ममेव च॥ पाद्याड़ानि च चत्वारि 
कथितानि समासतः॥ कपूरमशुरू पुष्प द्रव्याण्याचमनीयके॥ सिद्धार्थमक्ष ते चे बदूबां च तिल- 
मेव च ।। यवगन्धफल पृष्पमष्ठाड़ं त्वप्यम्ुच्यते । खाने दख्े तथा भध्ये दह्मादधचमनीयव म्‌ । 
उद्बतनपदाथों: ॥ उद्वतिनमपि तत्रव--रजनी सहदवी च शिरीष लक्ष्मणाप्रि व ॥ सदाभद्रा 
कुशग्राणि उद्बतनमिहोच्यते ॥ मन्चतन्त्रमकाशे--अक्षता गन्धपृष्पाणि स्नानपात्रे तथा त्यम्‌ ॥ 
उपचारद्रव्यभावे मतिनिधिः ॥ लत्रेब--द्रव्याभावे प्रदातव्याः क्षालितास्‍्तण्डुछाः झुभाः ॥ तत्रेबोक्त- 
मगस्त्यसंहितायामू--तथाचमनपात्रेषपि दद्याज्ञातीफले झुने ॥ लवड्रमपि कड़ोले शस्तमाचम- 
नीयके ॥ द्रव्याभावे ॥ तन्त्रान्तरे उक्तम-तण्डुलान्मक्षिपेत्तेबु द्रव्याभावे तु तत्स्मरन ॥ मृत्यौदिस्दांन- 
निणयः ॥प्रयोगपारिजाते व्यास+-प्रतिमापट्यन्चाणाँ नित्यं स्नान न कारयगेत ॥ कारयेत्पवे- 
दिवसे यदा वा मलधारणम्‌ ॥ विष्ण्वादिदेवपृजने वर्ज्याजि ॥ ज्ञानमालायाम-नाक्षतेरचेयेद्धिष्णु न 
तुलस्था गणाधथिपम्‌ ॥ न दूवेया यजेदेवीं बिल्वपत्रेश्व भास्करम्‌ ॥ उन्मत्तमकंपुष्ण च विष्णो 
वेज्य सदा बुधेः॥“अक्षतास्त यवाः प्रोक्ता इति पदाथादरशों उक्तात्वाद्यवानामेवायं प्रतिषधो न 
तण्डुलानाम्‌॥ तन्ब्ान्तरे-महाभिषेक॑ सर्वत्र शड्ढेनेव म्रकल्पयेत्‌ ॥ सर्वत्रेव प्रशस्तोषजः शिव- 
खूयार्चन विना॥ जिस्तरस्त्वाचारमयूखे द्रष्टव्यः ॥ अथ अतोद्यापनानुक्ती ॥ पृथ्वीचन्द्रोदये नत्दि- 
पुराणे--कुर्योइद्यापन तसय समात्तों यहुदीरितम॥उद्यापन विना यत्त तद्गबतं निष्फलं भवेत॥ यत्र 
चोद्यापन नोक्त ब्रतालुगुणतश्वरेव ॥ वित्तालुसारतो दद्यादतुक्तोद्यापने ब्रते ॥ गां चेब काथ्वन॑ 








दद्याद्डतस्य परिपूतये ॥ इति ॥ समात्तावुद्यापनमल॒क्तोद्यापनविषयम्‌ ॥ 


ह4७७७७७७७0. .. 
उपचार होते ह | शारदातिछकमें सोछह उपचार कहे हैं। 
्, ९ गने ्ै्‌ 
रातके पूजनमें अनुपयुक्त उडपचार-कपिलजीने कहा है कि, 
जब रातवको देववृजन करना हो तो आसन; स्नान, वस्त्र 
ओर भूषण इन उपचारोंकों न करे, बाकी बारह उपचा- 
रोंको करना चाहिये | इसके बाद परम सुगन्धित अतर 
देना चाहिय। पाद्यांग-दूवां विप्णुक्रान्ता, श्यामक और 
पद्म ये संक्षेपसे पायके अग कहे है। आचमनांग-कपूर, 
अगुर और पुष्प इनको आधभमनीमें डाहकर, आचमन 
करना चाहिये | अध्योग-सिद्धाथ, अक्षतःदूवा, तिछ, यव, 
गनध, फछ और पुष्प इन सबको अध्यें पान्रसं डाढकर. 
अध्य देना चाहिये। स्लानके पीछ बस्र और भोगक पीछे 
आचमन कराना चाहिये । उद्दतंनभी--शारदा तिलक में 
बताया है कि; हछदी, सहृदेवी, शिरीष, लक्ष्मणा, सदा- 
भद्रा और कुशाप्र ये सब वस्तु उद्तेनमें प्रहणकी जाती है। 
स्‍्नानपात्रके द्व्य-मत्रतैत्रप्रकाशमें लिखा हे कि, द्वव्यके 
अभावम साफ किय हुए तंडुझ छून चाहिये। वहीं ही 
अगस्व्यसंहितामें कहा है कि, हे मुन ! आचमन -पात्रमें 
जातीफछ, छवंग और कैकोछ डालना अत्यन्त उत्तम है। 
उपचारद्रव्यके सबका प्रतिनिधि-द्रव्यके अभावमें तन्नान्त- 
रमें कहा है कि, द्रव्यके अभावमें भी उस द्रव्यको स्मरण 
करके धुले चावछ वरतने चाहिये। मूर्ति आदिके स्लान- 
निणेय-पर प्रयोगपारिजातमं व्यासजीका. बचत है कि, 





प्रतिमाक बस्र ओर यन्त्रोंको रोज स्नान न कराना चाहिये, 
जिस दिन कोई पर्व हो उस दिन अथवा मेले होगये हों 
तो धो दे नहीं तो न धोना चाहिये। ज्ञानमाल्यमें, विष्ण्वा- 
दि देवपूजनमे के हेयपदार्थ लिखे हुए हैं कि, अक्षतॉसे 
विष्णुका तथा तुझूसीदुहोंसे गणपतिका, दूवांसे देबीका 
तथा बेलूपत्रॉस सूथ्येका कभी भी पूजन न करना चाहिये। 
धतूरे आर आकके फूलछ कभी भी विष्णु भगवानपर न 
चढाने चाहिये । पदार्थादशमें छिखा हुआ है कि, यवोंको 
अक्षत कहते हैं, फिर यह अक्षतोंका निषध यवॉका ही 
होगा न कि चाबलोंका | तंत्रान्तरमे लिखा हुआ हैं कि, 
सब जगह शंखसे ही मह!/भिषेक होना चाहिये, क्योंकि 
शिव और सथ्यांचनको छोडक र, सब जगह शंख प्रशस्त 
हैं। [ द्रविडद्शमें श्रीवेष्णवोंके यहां विष्णु पूजनमें भी 
शंखका व्यवहार नहींके बराबर हैं] यदि अधिक देखना 
हो तो आचारमयूख नामके अन्थमें देखछो । जिस बन्नतका 
उद्यापन न कहा हो उसका उद्यापन; पृथ्वीचन्द्रोदयनामके 
प्रन्थमें नन्दि पुराणसे केकर कहाहे कि-ब्रतकी समाप्ति 
पर जो कहा गया है वो उद्यापन अवश्य करना चाहिये । 
क्यों कि, बिना उद्यापनके त्रत्‌ निष्फछ होजाता है । जिस 
ब्रतका उद्यापन न्‌ कहा गया हो उसका उद्यापन उस ब्रतके 
अनुसार ही करल तथा अपनी श्रद्धाक अनुसार दान भी 
कर दे। गझऊ और सोना भी त्रतकी पूर्तिक रिय दान करे। 
जिस ब्तमें उद्यापन नहीं कहा गया है उसके अन्त्म उच्या* 
| 





([ है. द ) हे 
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उक्तोच्पनेहु-आदों मध्यें तथा चान्‍्ते ब्रतध्योद्यापन भवेत्‌! द्याप व 
अथ अतमभज्ठे संपूर्णतावा विषि:- हेमाद्रों भविष्ये-युधिष्ठिर उवाच ॥ संपूर्णतामलुष्ठाने ब्रतानां 





् [ सामाशे- 





कक 2206 00804 00676 00276 77८7: 
288 23400: 0१७४2 06200 4004 20270 60767 












तद्गतोद्यापनं कार्य संपर्णफलमाशुयात। 
न्द्‌- 


नन्‍्दन॥कुरु मसादं गह्यार्थमेतन्मे वक्तमहेसि॥ श्रीकृष्ण उवाचा॥ साधु साथ महाबाहो कुरुरात 
युधिष्ठिर॥रहस्यानां रहस्थ॑ ते कथयामि ब्रते तबा।संपूर्णता कता यत्र तत्र सम्यकू फलप्रदम्‌॥ 
यज्चीर्ण नरनारीभि्म॑वेत्संपूर्णारकम्‌ ॥ अवश्य तत्व कर्तव्यं सपूर्णफलका लिमिः ॥ किविद्धा 
प्रमादेन यद्वतं ब्रतिना स्थितम॥तत्सपर्ण भवेत्सव त्रतेनानेन पाण्ड व॥उपद्रवेबहुविये मे हामोहाइ 
पाण्डवायद्भम किंचिदेव स्याद्गतं विप्तविनाशनम॥तत्संपूर्ण भवेत्पार्थ सत्य सत्ये न सशयः॥ 


काश्वन रूप्यक रूप शिल्पिना तु घटापयेत॥ भम्नश्नतस्य यो देवस्तस्य 


रूप विनिर्दिशेत्‌ ॥ व्रत 


हैं“ ५७५ दल क क्षा $ 
ह्रीपुंसयोः पार्थ प्रारव्ध यद्वतं किल ॥ न च निष्पादित॑ किंचिदेवात्सर्थ ता स्थितम्‌॥ द्विम्ुरं 
पडुजारूढ सोम्यं प्रहसिताननम्‌ ॥ निष्पादित शिल्पिना च तस्मिन्नेव दिने उनः ॥ तन्मानंवु 
मन/आात्ते बराह्मणेबिंधिना गृहे ॥ स्तापयेत्पयसा द्ना पृतक्षौद्ररसाम्बुभिः ॥ व खचन्दनपुष्प 


पूर्जा कुयात्समाहितः 


डुमकारकेः ॥ अध्य प्रदद्यात्त्नाम्ता मन्त्रेणानेन पाण्डव ॥ डपवासस्य दानस्य 


॥ तोयपूणस्य कुम्भस्य सुने विन्यस्थ देवताम्‌ ॥ घूपदीपाक्षतर्वस्त्रे रत. 


प्रायश्रित्त कृत 


भया। शरण च॒ प्रपन्नोईस्मि कुरुष्वाद्य दर्यां मम ॥ ब्रतच्छिद्र त्तपरिछद्वें यच्छिद्रं त्रतकर्मणि। 


भत्सवें त्वत्मसादेन संपूर्ण जायता मम 
सपण ब्रत सजायतां मम ॥ 
दिक्पालेभ्यो नमो नमः 
चेद कटी शीषेकवक्ष सी 
स्ललन्नल्ल्फ्ंं ि++......... 


2रकला५क नाक, 





पत्र करना चाहिय। उद्यापत्र कह गया हो तो-उन ब्रतोंके 
. आदि मध्य और अन्तमें उद्यापन होता है। उद्यापन कर- 
नस हो ब्रतका संपूर्ण फछ पाता है, अन्यथा नहीं पाता। 
मम संपूर्ण करनेकी विधि-हेमाद्विन भविष्य पुरा- 
णको लेकर कही है । युधिष्ठिर महाराज श्रीकृ.ण परमा- 
पास पूछने ढगे कि, ब्रत कैसे पूरे होते हैं? इस गुप्त 
विषयको मुझे बतलाइये । श्रीकृष्णजी बोले कि, हे महा. 
का कप न विश ! बद रहस्योंका और दृश्य है, मैं 
ि जहा ब्रतको संपूर्णता करदी वहां 
अच्छे फलोंका देनेवाला होजाता है कस 
५ कर्क हो। जाता हे, सम्पृणताकोचाहमेवाडे खीपुरुषोंको 
चाहिय उसे अवश्य करें । ब्रत करनेवालोंके प्रमादसे जो 
अत भ्न हुआ पडा हो वो ब्रत, हे पाण्डब | इसके कर- 
नस पूरा हो जायगा। अनेक तरहके उपद्रवोसे तथा अज्ञा- 
नके कारण, जो विश्ननाइक ब्रत भजन होगया हो, 
दो! इसके किये पूरा होजायगा, इसमें को इ भी सन्दे 
५५५ गस देवताका ब्रत किया हों उसी देवताकी सोने 
कप किसी कारीगरसे बनवा लेनी चाहिये, 
पीने इस ब्रदको किया हो पर दो पूरा न कर 
सका हो देवात्‌ विश्व उपस्थित हो गये 


इसीको करना च्‌ 
सीक . पटर_- पर पे पक इक, हक पए वाझ, चक, मो करना चाहिये ! इसी दिन किसी शिस्पीसे ऐसी 


उमेश 








5 
छः 


. - 4 नासाचंशुशिरोरहानिति पाठान्तरम्‌। 


॥ प्रसन्नो भव भीतस्य भिन्नचर्यव्रतस्य च 
पूवदक्षिणयोः पश्चाइत्ते च बलिं हरेत ॥ 
॥ इद्मध्यमिद पाद्य॑ तेम्यस्तेश्यो नमो नमः ॥ पाद 


। जिसके कियेसे संपू- 


हों तो समाधानभी | हि 


॥ कुछ प्रसाद 
उपयधस्तात्सवेंग्यो 
च जातुनी 


॥ कुक्षि तु हृदय पृष्ठ वाक॑ चश्षुश्व शिरोरहान्‌ ॥ पूजयित्वा तु देवस्प 


| कप माइक १3:40 का -3 ०५२५५ >फतारी 400॥0॥0॥॥७॥॥७७एए9 काका >> नमन 


मूति बनवानी चाहिये, जो कमछासनपर विराजमान हो 
उसके दो भुजाएं हों, सुन्दर हसता हुआ मुख हो, जितने 
प्रमाणकी मन चाहे उतने ही बनवाना चाहिय. फिर पर 
पर उसे ब्राह्मणोंसे स्नान कराना चाहिये । स्नानक पानीमे 
दही, दूध, घृत और सहद मिला रहना चाहिय, स्तानक 
पीछे वल्र' चन्दन और फूलोंसे देवताकी पूजा करनी 
चाहिये, हे पाण्डव ! जिसका उद्यापन किया जारहा हो 
पहिल पूण्कुम्भके ऊपर उस देवताको स्थापित करे 


उसी देवताक नाममंत्रसे धूप, दीप, अक्षत और अनेढ 


तरहके र॒त्नोंसे अध्य देना चाहिय, उपवास और दानका 
भायश्रित्त मेने कर दिया है, में आपके शरण हैं, अब आए 
3, पर दया करें| ब्रतका छिद्र, तपका छिद्र एवम्‌ जो 
3.5 कम छिद्र हों, वो सब आपकी कृपासे पूरे होजाएँ 
मे अ्तकी गछतीसे बडा डरा हूं,मैने त्रद्मश्व्यका भी पाहन 
नहीं किया है, आप मुझपर कृपा करें जो मेरा अत पूरा 


हू | होजाय । पूष और दक्षिणके पीछे उत्तरमें बलि दे, पढ़े 


6 


ऊपर और नीचे बलिदान करे, सब दिक्पाढोंकी बह. 
हा डँगी उन्हें नमस्कार करके कहे कि, लीजिये यह 
लक अध्य है, यह आपका पाद्य है, आप सबोगे 

+. ५ रिवार नमस्कार हे। देवताके चरण, जातु, 
कटी, शीर्षक, वक्ष, कुक्षि, हृदय, पृष्ठ बाकू, चह्छु, और 






(४७) 





परिभावा; | भाषाटीकासमेंत: । 
| 


ततः पश्चात्ल्षमापयेव्‌ ॥ पूजितस्त्व॑ यथाशक्त्या नमस्तेःस्तु घुरोत्तम ॥ ऐहिकामुष्मिकी 
देव कार्यल्िद्धि दिशस्व मे ॥ एवं क्षमापचित्वा तु प्रणमेच्च प्रयत्नतः ॥ तम्मूर्ति च द्विजातिश्यो 
विधिवत्मतिपादयेत्‌ ॥ स्थित्वा पूवमुखों विप्रो गद्दीयादर्भपाणिना । विभहस्ते प्रयच्छेच्च दाता 
चेवोत्तरामुखः ॥ मन्त्रेणानेन कौनतेय सोपवासः प्रयत्नतः। इद ब्रतं मयाखण्ड कृतमासीत्पुरा 
द्विज ॥ तत्सब पूर्णमेबास्तु तब सूर्तिप्रदानतः ॥ ब्राह्मणोउपि प्रतीच्छेत मन्त्रेणनेन तबन्नप ।। 
ब्रतखण्डकृतं पूजाब्रतिनानेन .ते पुरा ॥ सम्पूर्ण स्यात्मदानन' तब पूर्णा मनोरथाः ॥ बराह्मणा 
यत्मभाषन्ते तन्मन्यन्ते दिवोकसः ॥ सर्वदेवमया विप्ता न तहचनमन्यथा ॥ जलांधेः शक्षारतां 
नीतः पांवकः सर्वेभक्षताम्‌ ॥ सहर्नेत्र! शक्रोषपि कतो विभमहात्मप्िभाब्राह्मणानां तु बचना- 
द्रह्महत्या विनश्यति ॥ अश्वमेघफल साम्न॑ लग्तले नात्र संशय: ।॥ व्यासवाल्मीकिवचनात्परा- 
शरवलिष्ठयो;॥ गगंगोतमथौम्यात्रिवासिष्ठाडिरसां तथा ॥ वचनातन्नारदादीनां पृ भवत॒ ते 
अतम्‌॥ एवं विविविधानेन गहीत्वा बाह्यणो ब्रजेत्‌ ॥ दाता तत्मरेष्येत्सव बाह्मणस्य शहे स्वयम॥ 
ततः पश्चमहायज्ञान्कृत्वा वे भोजनादिकम्‌ ॥ एवं यः कुरुते भकक्‍त्या ब्रतमेतन्नरोत्तम ॥ तस्य 
संपूर्णतां याति तद्गतं य॒त्पुरा कृतम्‌ ॥ खण्ड संपूर्णतां याति पसज्ने ब्रतदेवते ॥ भग्नानि यानि 
मदमोहबशादूगहीत्वा जन्मान्तरेष्वापि नरेण समत्सरेण ॥ संपूर्णपूजनपर स्य पुरो भवन्ति सरब्ब- 
ब्रतानि परिपृणफलपदानि ॥ 
अथ सबेत्रतेषु सामान्यतः पूजाबिधि: || 

सहल्लशीरेत्यावाहनम्‌ ॥ आगच्छागष्छ देवेश तेजोराशे जगत्पते॥ क्रियमाणां मया पूर्जा 
टहाण खुरखत्तम ॥ पुरुष एवद्मित्यासनम्‌ ॥ नानारत्नसमायुक्त कातंस्वरविभूषि तम्‌ ॥ 
आसन देवदवेश भीत्यथं मतिगशहायताम्‌ ॥ एतावानस्थेति पाद्यम ॥ गड्भादिसवतीर्थेभ्यो मया 
ब्रत पूरा हो जाय, इस विधिविधानसे ब्राह्मण मूर्ति छेकर 


अपने घरको चला जाय । तथा देनेवाला स्वयं ही इस सब 
स/मानको ब्राह्मणके घर पहुंचा दे | पंचपहायज्ञोंकों करके 


वालॉको पूजकर क्षप्रापन करना चाहिये । हे सुरोत्तम ! | 
जेसी मेरी शक्ति थी, उसके अनुसार मेने आपका पूजन | 
कर दिया, अब आप इस छोक और परढोक दोवोंकी | 
काय्येसिद्धि करो। इस प्रकार क्षम्ापन कराके प्रयत्नके | भोजन करना चाहिये । हे नरश्रेष्ठ ! इस प्रकार जो भक्तिके 
प्ताथ प्रणास करे एवम्‌ उस सूतिको विधिक साथ जाह्मणको | साथ बत करता हैं उसका पहिल किया हुआ अत पूर्णताको 
रेदे, झ्राह्मण भी पूर्व मुख करक कुशयुक्त हाथसे छे। तथा | प्राप्त हो जाता है, जब ब्रत देवता ही प्रसन्न हो गया तो 
ति बार दाताको' उत्तराभिमुख होना चाहिये । मूर्तिदान | ततके पूरे होनेम क्या कभी रह जाती है ? हे युधिष्ठिर ! इस 
#रनतक यजसानको निशह्ार करना चाहिये तथा मंत्र | जन्मकी तो बात ही क्या है, जो दूसरे जन्मोंमें मी मदसो- 
हहते हुए मूिद्दान देना वाहिये कि, हे द्विज ! मेन पहल | हके बशमें होकर बत भंग हो गया हो, वह भी इस अकार 
'स ब्र॒तकों खण्डित किया था ब्यो सब आपको मूर्ति दनस | पूजन करनेबालेका पूरा हो जाद्य है और पूरा फल देता 


डि पे प रे 


पे हो जाय) हे युधिप्ठिर | मूर्ति छनेवाढे आह्यण भी मूतति | है ॥ 


थे छूकर व्रत्॒डक्न्त पूजा” इस मंत्रको कदता हुआ | अ कर बे व्रतोंशी सामान्यपुजा विधि-“ओम्‌ सहख- 
' कि, जो तुमने अपने व्रत झ्नो खण्डित किया था सो इस्र | शी ” इस मंत्रस आा वाहन करना चाहिय और कहता 
तिंके दानसे पूरा हो गया, तुम्दरे मनोरथ पूरे होंगे । | चाहिये कि;हे सुर सत्तम,हे देवेश[हे' तेजके खजाने!हे संसा- 
गस बालको ब्राह्मण कहते हैँ, देवता उप्त बातको मानते | रक़े स्वामी | आजाओ आजाओ,की हुईं मेरी पुजाको ग्रहण 
| यह जो कहा जाता हे कि, सब देवमय बाह्यग हैं यह | करो। “ ओम्‌ पुरुष ऐवद्म ? इस मंत्रस आसन देना 
व झूठी नहीं है। इन महात्म! ब्राह्मणों ते समुद्रको खारा, | चाहिये, कहना चाहिये कि, हे देवदेवेश | आपकी प्रसन्न- 
वकको सर्वभक्षी और शक्रको सहखनेत्र कर डाछा ।| ताके छिये अनेक रव्नोंसे जडा हुआ सोनेका सुन्द्र सिंहा- 
झर्मोंके आशीर्वादस अद्मह॒द्या नष्ट होजाती है, समग्र सन रखा हुआ है, आप इसे अहण करें । “ओम एतावान- 
श्रमेधका फछ प्रिछ जाता है, इसमें सन्देह नहीं है व्यास, | स्थ” इस संत्रस पाद्य अपेंग करना चाहिये कि, मैंने गंगा 
स्मीकि, पराशर, वसिष्ठ, गर्ग, गौतम, धौम्य, अन्रि, | आदिक सब तीथासे प्राथना करके यह शीवछ पानी छिया 
सिष्ठ, अगिरस और नारदादिकोंके बचनोंसे आपका | है, आप पाश्के डिये इस भ्रदण करें “ओमू त्रिपादुध्व!'इस 





























(४८ ) बहार) | | धामान्य- 

विश की मिकी न लिन कक मल 6,030/7 ंग्ययायाए गा अध्यापक एस ननननननीगतगग तक गदएावएफाए/22ह उध्रपरता शत ा्यवाच्वता 2 दा 52 0:7%: 0०3 244804-»7 46 400:५५५००-७४००७०० ४००2० +०क+ ८०५०५ ७५००५० नकल भा ० पक ०४५५६ २७७ 2700 84 20700 002 00000 770  # कक 

र ॒ थे अतिमहाताओ ॥ त्रिपादूध्व इत्पष्यंम्‌ ॥ नमस्ते 
प्रार्थनय। हतव्‌ ॥ तोयमेतत्खुखस्पदश पाद्याथ आतेगहाताओ ॥ त्रिपा त्पष्यंम ॥। नम 


देवदेंबश नमस्ते धरणीधर ॥ नमस्ते कमलाकान्त गहाणापय उमो5स्तु ते ॥ तस्मादिराकेत्या 
चमनीयम ॥ कर्प्रवासितं तोय॑ मर्दाकिन्याः समाहतम्‌ ॥ आचम्यतां जगन्नाथ मयादत्त 
मक्तितः ॥ यत्पुरुषेणेति स्वानम्‌ ॥ गड़ा च यमुना चेव नमेंदा च सरस्वती ॥ कृष्णा च गौतम 
बेणी जिता विन्वुस्तवेव च॥ तापी पयोष्णी रेवा च ताभ्यः स्लानाथमाहतम्‌।तो यमे तत्सु खस्पर 
ल्ानाथे प्रतिगह्यताम्‌ ॥ पश्चामृतस्लान॑ पन्‍्मन्त्रेः एथक्वारयेत ॥ त॑ यत्ञमिति वद्थम्‌। 
सर्वभूषायिके सौम्पे लोकलजानिवारणे॥ मयोपपादिते तुभ्यं वाससी प्रतिगह्मताम्‌ ॥बद्चे 
च्‌ सोमदेवत्ये लाया सुनिवारणे॥मयोपपादिति तुर्यं वाससी प्रतिगह्मताम्‌॥ तस्मायतज्ञादिति 
यज्ोपवीतम।दामो रर नमस्ते एतु त्राहि मां भवसागरात/बह्मसूत्र सोत्तरीयं गृहाण पुरुषोत्तम। 
तस्मावज्ञात्सबेहुत इति गन्धम्‌ ॥ श्री्वण्ड चन्दन दिव्य गन्धाव्य॑ मुमनोहरम्‌ ॥ विलेपन छुएः 
अष्ठ चन्दन मतिगहामताम्‌ | अक्षतास्तडुलाः शुश्राः कुकुमाक्ताः सुशोभनाः ॥ मया निवेदिता, 
, भक्त्या मूहाण परमेश्वर ॥ तध्मादश्वेति पुष्पम्‌ ॥ माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि+ 
प्रभो ॥ मयाहतानि पुष्पाणि पूजार्थ प्रतिगह्मयताम्‌ ॥ यत्पुरुष व्यदयुरिति धूपम्‌ ॥ वनस्फी 
रसोदूतो गन्धाव्यों गन्ध उत्तमः ॥ आव्रेयः सर्वदेवानां धूपो5यं प्तिगह्मताम ॥ बाह्मणो स्येति 
दीपम्‌ ॥ साज्यं च वर्तिसंयुक्त वद्धिना योजित मया॥ दीप झहाण देवेश ब्रेलोक्यतिमिराप' 
हम्‌ ॥ चर्द्रमा मनस इति नेवद्यम्‌ ॥ अन्न चतुविर्ध स्वादु रसेः षढ़ामिः समन्वितम्‌ ॥ भक्ष्य 
भोज्यसमायुक्तं नवेद्य म्रतिगह्मताम्‌ ॥ इदं फर्ले मया देव स्थापितं पुरतस्तव ॥ तेन मे सफल 
वातिभवेजन्मनिजन्मनि ॥ फलम्‌ ॥ नाभ्या आसीदिति ताम्बूलप्।पूगीफल महद्दिव्यं नागवही' 





खकफ मन पााए. 


के चर ््‌ 
मेत्रसे अध्य देना चाहिये कि, हे धरणीघर | है कमठाकान्त 





हे देवरेवेश ! आपके छिये बारंबार नमस्कार हे, आप 
इस अध्यको ग्रहण करें, आपके ढिये नमस्कार करता हूँ। 
“ओमू तस्माद्विराडू” इस संत्रस आचमन कराबे कि, यह 
कर्पूरस सुगन्धित 8 पानी मंदाकिनीस छाया हूं, हे 
गगज्ञाथ: मे भक्तिक साथ दे रहा हूं आप आचमन करें. 
“ओम यट्युरुषेण”' इस संत्रस स्नान. कराना चाहिये कि हे 
दूव ; यह ठण्डा पानी, गंगा, यमुना, नर्मदा, सरस्वती हे 


कृण्णा, गौतमी, बेणी, क्षित्रा; सिन्‍्धु, लापी, पयोष्णी और 
रवा इन 5 


रिव्य नरियोंसे छाया हूँ, आप स्नानके लिय इसे 
पभहण कर, पचामृतसे स्नान तो पांच मंत्रोरे 

हि ९० पचाद्नतसे स्नान तो पां व्‌ संत्रोंसि प्थकू कराना 
कै भोम्‌ ते यज्ञम” इस सेत्रसे वस्र समर्पण कराना 
कि क्रि, में आप शी दो बल्ब देवा हूं, आप इन्हें प्रहण 
हे कप  भूरणों ते उतर (सुर्द ह,लो ऋछाजको निवा- 
पं गबाद्ध हैं, मत्त आपकही डिये तैयार किये हैं। इन 
सा का इपत है लज्ञके भड्डे नित्रारक है मे इन्हे 
'पजीव देवा राह कि आयात, इस मंत्रसे ल्‍ 
७ ० जप कि, हैं दापोरर | ते? डछिरे 

है ४6 भवसगरप दमोरर ! ते छिये नप्तस्कार 


रे ते रक्षा करिये, हे | 
सदित जझ पूत्रकों प्रदण करिये| ४ है पुरुषोतन | उत्तरीय 


के नर हा दि |] 
इस मत्रत गन्ध निवेदन करना 






चाहिये कि,हे सुसअ्ठ | यह 


ओपू तस्मायज्ञास्सबहुतः 


घिसा हुआ गन्धसे परिपुर्ण मनोहारी दिव्य->श्रीख् 
चन्दन) आपको प्रसन्नताके ढिये तयार है, आप इसे ग्रह 
कर | हे परमेश्वर|कुंकुपसे सने हुए सुन्दर अक्षत मेने भत्ति 
आपको निवेदन कर दिये हैं आप इन्हें अहण करें| 
“ओम तस्मादश्वा” इस मंत्रस पुष्प निवेदन करने चाहिये! 
हे प्रभो ! से आपकी पूजाके लिये मालाएँ और माहती+े 
घुगन्धित पुष्प छाया हूँ आप उन्हें ग्रहण कर । रे ओ। ५ 
यत्‌ पुरुष व्यदृधु.” इस मंत्रसे धूप दनी चाहिये, है धूप! . 
तू बनस्पतिक रससे बना हैं, गन्वोंसे भरा पडा है, उत्ता 
गन्ध है, सभी देवोंके सूघने छायक हैं, हे परमेश्वर : रे 
ग्रहण करिये । “ ओम ब्राह्मगोडस्य ” इस मंत्रस दीप देन 
चाहिये । घीस भरा हुआ हे, सुन्दर बत्ती पडी हुई है जग 
दिया, यह तीनों छोकोंके अन्धकारका नाशक हे, हें देविश' 
ग्रहण करिये।“चन्द्रमा मनस”इस मंत्रस तथा छओ रखेंगे 
युक्त भक्ष्य और भोज्यसे सयुत,चारों प्रकारका अज्नउपरियं! 
है।इस नेतेद्यकों आप ग्रहण करें। ' ओम इद फर्क मया देव 
इस मेत्रस फल निवेदन करना चाहिये कि, हे देव भाप 
सामने जो फल रखा हुआ है, मैं इस छाया हूँ. इसपे 
मुझे प्रत्येक जन्ममें फलकी प्राप्ति होगे । ४ ओम नाश 
आसीपू" इस मंत्रस ताम्बूछ निवेदन :करना चाहिये किं।. 
है परमेध्र| जिसमें सु-दर सुपारी पड्ी हुई है, नागवल्लीश 


। 
| 
| 
+ ) (था 
है] | 


परि | प्रति ७त्र ० ] भाषाटीकासमेलः | ( ४९ ) 













५५ बकबअप नाथ सता 


25220 72%: 70 70%. 2 5027: 07722:% 
करमपमाओ'.. अग्ाक पहना अप. फल, 





दुलेयुतम्‌ ॥ कर्प्रादिसमायुक्त ताम्दूल प्रतिगृह्यताम्‌ ॥ सत्तास्येति दक्षिणा ॥ हिरण्यशलीर 
देमबीज॑ विभावसोंः ॥ अनन्तपुण्यफलदमतः शारित प्रयच्छमे ॥ चन्द्र दित्यों च॒ घश्णी विद्यद्‌- 
प्रिस्तथेव च ॥ त्वमेव सर्वेज्योतीषि आर्तेक्य मतिणादाज ॥ नीराजनम ॥ यज्ञेन यजत्रित्रि- 
मन्त्रपुष्पाखलिः ॥ नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते हामरपतिः ॥ नमस्ले रमलाकाह्ल हछुदेद 
नमो5स्तठु ते॥ यानि कानि च पापानि ह्माह्हः्ज्लारि च॥ तानि जाबि विशध्यत्लि प्रदक्षि- | 
णपदेपदे ॥ इति प्रदक्षिणा: ॥ नमः सर्वहितार्थाथ जनदाधारहेलवे ॥ साष्ठाड़ोई्यं 5 जामोःस्तु 
प्रणयेन मया कृतः ॥ इति नमस्कारः ॥ इति सामान्यपूजाबिधिः ॥ 


इति श्रीत्रतराजे परिभाषा समात्ता॥ 
अथ प्रतिपदादितिथिबतानि लिख्यन्ते ॥ 


" ७४-४० 8 (५८८ ७ ०<:+»»+०«-- 
९* रे न ५ ०३, 
मात्स्ये--वजेयित्वा मधों यह्ठ द्च्षिक्षीरघृतेक्षयम्‌ ॥ दद्यादख्राणि सूक्ष्मणि रघपाश्रशेतानि 


च ॥ रसपात्र--द्ध्यादिपात्रे॥।सपूज्य विप्रमिथुन गोरी मे भीयतामिति ॥ हेमादों पाये च-वर्ज ये- 
चैत्रमासे तु यस्तु गन्धाठलेपनम।शुक्ति गन्धश्तां दष्याद्विप्राय श्रेववाससी॥। मक्त्या तु दक्षिणां 
दब्यात्सवकामार्थसिद्धये ॥ गन्धवस्रदानमंत्रौ-नन्दनावासमन्दारसखे वृन्दारकालचित ॥ चन्दन 
_त्वें मसादेन सानद्राननदप्दों भव ॥ शरण्य सर्वलोकानां लज्ञाया रक्षणं पश्म ॥ सुवेशघारित्य 
यस्माद्वासः शान्ति श्यच्छ में ॥ इति मंत्राभ्यां गन्धवाससी दद्याव ॥ 
न्‍ : अथ चेन्नशुक्क॒प्रतिपदि संवत्सरास्म्भविधि: ॥ 
आहो- अत मतिपत्लूयोंद्यव्यापिनी आह्या ॥ चेत्रे मासि जगद्गझ ससर्ज मथमेहनि ॥ छुकू- 
पक्षे समभे ठु तदा सूर्योदय सति॥ इतिबचनादा अवृत्ते मशमाले तु मतिइ्यद्ति रबौं ॥ इति 


दुलभी है; कपूंरादिक भी पढ़े हुये हैं. ऐसे पानको ग्रहण | बच्न देता है | रस पात्रका भय दही आदिके पात्र यह होता 
करो। “ओमू सप्तास्य” इस मन्द्रसे दृक्षिणा देनी चाहिये | | है । एवं देतीवार आ्ाक्षण ब्राह्मणीका पूजन करके यह कहता 
-हिरण्य गभके ग्भमें स्थितःजो अग्निका हेस बीज, हैं; वो | है कि, गौरी मुझ पर प्रसन्न हो जाय तो वो ब्रतक्षरके 
अनन्त पुण्यका देनवाछा है. इससे आप मुझे शान्ति दें । | कल्याणको पादा है। हेसादिमें पद्म पुराणकों लेकर लिखा 
चांद, सूरज, जमीन ओर अरिन तुही सबज्योति हे, मेरी | है कि, जो वो चैन्रके. महीनेमें गंधका अनुरेपन छोड़ ऋर; 
इस आरतीको ग्रहण कर “ओम यज्ञन यज्ञगू” इस मंत्र | ब्राह्मणके लिये गंधसे भरी हुई सिपी ओर दो सफेद कप डा 
स पुष्पांजलि दनी चाहिय। है पुण्डरीकाक्ष ! तेरे लिये नम- | देता है, दथा सब कामोंकी अथसिद्धिके छिय भक्तिभावसे 
स्कार है| है अमर शिय | तेरे छिये नमस्कार है | हे कमछा- | दक्षिणा देता हे वो ब्रतको पूरा कर छेता हैं! गन्ध ऑर 
कान्त | तेरे लिये नमस्कार है । हे वासुदेव ! ऐरे छिये नम | वखदानके मंत्र-हे नन्‍्दन वनमें बासकरनेवाल्े सन्दारके 
स्कार है , ' ओम्‌ यानिकानि च पापानि ? इससे प्रदक्षिणा | मित्र तथा देवगणोंसि पूजित चन्दन | तुम आनन्दक साथ 
करनी चाहिये, प्रदृक्षिणके पद्‌ पद्‌ पर वे वे सब पाप नष्ट | सघन आनन्द देनेवाछे हो ओ | इस सनन्‍्जसे गन्ध समर्पित 
'दीते हैं, जो इस जन्म और अनेक जन्‍्समोंमें किये हैं. ' नमः | करनी चाहिये | सब छोकोंका शरण एवम्‌ छज्जाका परम 
'सवहितार्थाय ” इस मंत्रस भगल्ञानको साष्टाह्ञ प्रणाम करनी | रक्षण तथा जिसके धारण कर नेसे सुन्दर वेष बन जाता है 
चाहिये कि सबक हितकारीके लिय नमस्कार है एवम्‌ सारे | ऐसे ये वस्न मुझे शांति दें । इससे बस समर्पित करने 
:जगवके आधारभूव जो आप हैं के" छिये मेरी साष्टाह्न | चाहिये। 
प्रणास है। इसे से अपने नमते हुए शरीरसे करता है | यह | >> लि 
खासान्य पूजाविधि समाप्त हुई | तथा इसीके बा ब्रत- | अथ चेत्र शुक्ल परद्िपदाकों संवत्लरके 
आरभकी विधि । 


राजकी परिभाषा जी समाप्त हुई । इति परिभाषा प्रकरणम्‌ ५ 
।. अह्म पुराणमें लिखा है; इसमें सूर्याद्य व्यापिती प्रतिपह॒ 


समाप्तम्‌ ॥ क्‍ 
/: प्रतिपदा तिथिक व्रत लिखजाते हैं । | नी चाहिये। क्योंकि, इसी पुराणमें लिखा हुआ हे कि 
चत्रमासकी शुक्षह्लतिवदाकों अलह्याजीने सृष्टि रचनाका 


* भ्रत्स्य पुराणमे छिखा हे कि; जो चेत्रकें महीनेमे दही, र 
आरम्भ किया था, उस दिन प्रतिपदा उदय व्याधिनी थी 






















दूध, घृत्त और मीठेका त्याग करके रस पात्रोंस युक्त सूक्ष्म | 
*.. .- ऊही 


पी 


( ५० ) ब्रतंराज: । 





722//0//४:77%0/ 


दिनदये व्याताबब्यातों वा पू्बंब ॥ बत्सरादों वसन्‍्तादों बलिराज्य तथेव चे। 
पूर्वविद्धेव कर्तव्य अतिपत्लर्वंद! डुधेः ॥ इति बद्धवशिष्ठवचनादिति बहवः ॥ युक्त तु, दिन 
प्युदयसम्बन्धाभावे संवत्सरासम्भमप्क्तकाय लोपमसकाबिदं बचने पूलडधताम्राह्मताविधायका| 


9५. 


दिनद्॒ये तत्सम्बन्ध त॒॒संपूर्गत्वादेव पू्वाभातिः । कद! कायमित्याकां क्षाविरहातूई 
मृतत्वविरहा्व नेतद्वचन/त्पूर्वेति ॥ बह्े-मवर्तेयामास तथा कालस्य गणनामपि ॥ अहानब्दानू- 


है 


तृन्मासान्पक्षान्‌ संवत्सराधिपाव्‌ ॥ ददों स मगवाव्‌ बह्मा सर्वेदेवलमागमे । बाहयाँ सभा 
ब्रह्माण॑मानिर्देश्यततुं ततः ॥ यथ।क्तास्‍्ते नमस्यृन्तः स्त॒वन्तश्वाप्युपासते ॥ ततस्त कृतश॒श्र 


कि आह 


गत्वा चेव हिमालयम्‌ ॥ स्वानि स्वान्यथ कमाणि तेन युक्ताश्व चक्रिरे ॥ बाद्यी सभा कामरु 
विशेषण तदानव ॥ घारपनत्यम लं रूपमानिर्देदयं मनोहरम्‌ ॥ ततः्मभति यो घमः पूवः पूवेत 
कृतः ॥ अद्यापि रूढः खुतरां स कतव्यः प्रयत्ततः ॥ तत्र काया महाश[/न्तिः सर्वकल्मण्ता 
शिनी ॥ सर्वोत्पातम्शमनी कलिदुःखतगाशिनी ॥ आश्ु्मदा वृद्धिकरी धनसौभाग्यवधिनी | 
मड़ल्या च पवित्रा च लोकद्यछुखाबहा॥त ध्यामादो तु संपूज्यो बह्मा कमलसंभवः ॥ पाद्मा्न 
पुष्पधुवैश्च वख्ालंकारभूवणेः ॥ होमेबेल्यपहारश्व तथा बह्मणभोजनः॥ ततः क्रमेण देवेश' 
पूजा कार्या प्रथक्प्रथरू ॥ कृत्वोड्ड्रारनमस्कारों कुशोदकतिलाक्षतेः ॥ पुष्पवृपप्रदीपाणेमोंजमे 
यथाक्रमम।मंत्रं संपूजनाथें तु बहुरूप॑ परिस्पशेद॥ मेत्रमिति जातावेकवचनस्‌ ॥ बहुरूपं मंत्र नानाझा' 
समंत्रान्परिस्पृ शेर ग हो या दि; पथ। ॥ लेन" >नमो ब्रह्मण' 'इत्सादि 'विष्णवे परमात्मने नम$' द्त् 
न्‍्तमंत्रवाक्यवृन्दोपात्ता देवताशब्दाश्वतुर्थ्यन्ताः प्रणवादयों नमोहझता मंत्रत्वेन आशध्या।॥पार्थना' 


भविष्योत्तरपुराणमें छिखा हुआ है कि, मधुमासके गवृत्त | पहिछे और उनसे भी पहिलोंस जो घर्म पालन किया गय 
होने पर, उद्यव्यापिन्ी प्रतिपदाको ख॒ष्टि रचनेका प्रारम्भ | है अब भी वही धर्म चछाः आता है, उसे प्रयत्नकें सा 
किया था, यदि दोनों दिनोंकी प्रतिपदा उद्यव्यापिनी हो, | करना चाहिये। इस प्रतिपदृके दिल सब पापोंके ना 
अथवा दोनों दिनों उद्यव्यापिनी न हो तो पहिली लेनी | करनेवाली, सब उत्पातोंको शान्त करनेवाली, कहि 
चाहिय । एसा-सवत्छरक आरंभको प्रतिषदा. 30 अद दुःखोंको नाश करनेबाली,आयुको बढानेवाली, सौभाग्य 
आदिकी प्रतिपदा तथा कार्पिको शुद्ध प्रतिपदा सदा पूर्व | बर्धव करनंबाढी संगलकरनेबाली, दोनों छोकोंम मु 
विद्धा ही करनी चाहिये। वृद्धवसिष्ठधके वचनसे बहुतसे 


| धर ७ क् 
हा । ते | देनेबाी और परम पवित्र जो महाशान्ति है उसे कर देश 
कहते हूं, परन्तु दोनों दिन उद्यव्यपिनी न मिली तो संब- | चाहिये। चनत्रसुदी प्रतिपदाको पाद्य, अध्य; पुष्प, धूप,व। 


इस कारण 233 काय्यका विधान करनेवाढ्ा यह वचन | सबसे पहिंले कमरूसे उत्पन्न होनेवाले त्रह्म।जीकी पूजा होने 
युक्त ही है, दोनों दिन ही उद्यव्यापिनी होगी; तब तो | जाहिये। त्रह्माजीकी पूजाके प॑छे ऋमसे सब देवताओंकी 
पहिल दिन ही उद्यव्यापिन्ती मिल जानेके कारण पूर्बाका | जुदी जुदी पूजा होनी चाहिये । पूजनके मंत्रोमें आक्िं 
ही प्दण होगा क्योकि! इस समय कब करना चाहिये यह ओंकार और अन्त नमस्कार जोड़नी चाहिये। कुशोह 


आकांक्षा तो रहती ही नहीं तथा पक्षान्तरमे पूवयुतपनेरा | पि 
अभाव भी रहता ही है इस कारण, पूर्वाका ग्रहण होता है|? अत, पुष्प, धूप दीप, पाद्य ओर भो जनसे यथा 
यह बात नहीं है कि, इस बचनसे ही पूर्वाका प्रहण हो रहा | देवों का पूजन ऋरना चाहिये । पूजनके लिये मंत्रकोते 
हो । त्राह्म पुराणमें छिखा हुआ है कि, इसी दिनसे ब्रह्मा- | जप कर छेना चाहिये, मत्रम्‌ ? यह जातिमे एक वा 
जीने कालकी गणनाका प्रारंभ किया था | प्रह, अब्द, ऋतु, 6 ह. श्सका पेह्चनस तात्पये है, “ बहुरूपम यही मंत्र 
मास ओर पक्षोंकों सब द्वोंका समागम होनेपर सेवत्सर | विश्येषण है श्सका मिलकर यही मतलब होता हैं हि 
 भादिके अधिपोंकों दे दिया। ब्ह्माकी सभाझें अनिर्देश्य | ' ने देवोंके जुदे जुदे सत्र पडढकर उनका पूजन करे ।.' ओर 
कनुवाल अज्याजीकी सब देवता 


> और मुनि आदिकोंने नम- | "मो बह्मणे ” यहासे छेकर * ओमू विष्णवे परमास्मने नम! 
का स्तुति करते हुए उपासना की | इसके पीछे वे सब 
ऋषि मुत्ति आदि ब्रह्म 


का | अहनिक जो मुंत्र वाक्‍्योंके समुदायमें आये हुए चतु्थ्येन 
कल हक शुअप्रा कर हिमालय चछे गये, | ,वेंता शब्द ह; जिनके कि, आदनिसें ओमू और असम 

सकी पेत्त होकर अपन अपने काममे | क्षय 
हे निप्पाप ' उस सम कलह आर क 


हम | नमः छगा हुआ ड, ने सब मंत्ररूपस ग्रहण किये 
बे ह्ञाक इच्छ ; 

घारण करनवारी सभा ण्छानुसार रूप 

अनिदक्य 


भमविष्योत्तरात ॥। 










हे | जायेंगे यानी जिस देवताका पूजन करना हो ,उस 
हु बारण कप करके वो मनोहर निर्दोष | नामको चतुथ्येन्त करके उसके आदिम ओम ओ 
*...... ही थी- जस दिनसे रेकर | अत्तत नमः छगाकर उससे पूजन होता है। 


ज्रतानि | भाषाटीक 


ही 


मल! । (५9% ) 





# ७ ४. 


मंत्रा: नमो बहाणे तुभ्ये कामाय च महात्मने ॥ नमस्तेषस्तु निमेषाय चुटये च नमोस्त॒ ते ॥ 
लवाय च नमस्तुभ्यं नमस्तेइस्तु क्षणाय च ॥ नमो नमस्ते काष्ठाये कलाये ते नमोष्स्त ते॥ 
नाडिकाये सुसूक्ष्माय मुहतोय नमी नमः के नमो निशामभ्यः पृण्येब्यों दिवसेस्यश्व नित्यशः ॥ 
पक्षाभ्यां चाथ मासेभ्य ऋतुभ्यः षड़्भ्य एवं चाझयनाथ्यां च पथ्चभ्यों वत्सरेब्यश्व सर्वदा ॥ नमः 
कृतयुगादिभ्यों भहेभ्यश्व नमो नमः ॥ अष्टाविशतिसंस्येश्यों नक्षत्रेग्यो नमो नमः॥ राशिभ्यः 
करणेभ्यश्व व्यतीपातेभ्य एबं च॥ प्रतिवर्षाधिपेन्यश्व विज्ञातेश्यों नमः सदा ॥ नमो5स्त कुल- 
नागभ्यः सालयात्रेम्य एवं च॥ सातयात्रेभ्प:-सानुचरेस्यः । नमोस्तु सवदिश्य्यश्व दिकपा- 
लेभ्यो नमो नमः ॥ नमश्वतुदशभ्यश्व मल॒भ्यस्तु नमो नमः ॥ नमः पुरन्दरेश्यश्व तत्संख्येम्यों 
नमो नमः ॥ पश्चाशते नमो नित्य दक्षकस्याभ्य एव च ॥ नमोएईदित्ये सुभद्राये जयाये चाथ 
सदा ॥ सुशास्राय नमस्तुभ्य सवोश्यजनकाय च ॥ नमस्ते बहुपुत्राथ पत्नीभिः सहिताय 
च ॥ नमो बुद्धये तथा बृद्धचे निद्राये धनदाय च ॥ नमः कुबेरंपुत्राय गह्मकस्वामिने नमः ॥ 
नमो स्त शद्भपद्माभ्यां निदिभ्यामथ नित्यशः ॥ भद्रकाल्ये नमस्तुभ्यं सुरमब्ये च नमो नमः ॥ 
वेदवेदाड़वेदान्तविद्यासंस्थेभ्य एव च॥ नागयक्षसुपर्णेस्यो नमोःस्तु गरूढाय च॥ सप्तभ्यश्व 
समुद्रेभ्यः सागरेन्यश्र सवेदा ॥ उत्तरेभ्य:कुरुभ्यश्व नमो मेरूुगताय च ॥ भद्गाश्वकेतुमालाश््याँ 
नमः सबेत्र सबंदा ॥ इलावृत्ता(त')य च नमो हरिवर्षाय चेव हि॥ नमः फकिंपुरुषेब्यश्व मारताय 
नमो नम; नमोमारतमभदेभ्यों महत्यश्षाथ सबंदा ॥ पातालेब्यश्व सत्तभ्यों नरकेम्योःनमो नम9॥ 
कालाग्निरुद्रशेवाम्यां हरये कोडरूपिणे॥ सहस्यस्त्वथ लोकेभ्यो महाभूतेभ्य एवं च॥ 
नमः संबुद्धये चेब नमः पकृतये तथा॥ पुरुषायात्षिमानाय नमस्त्वव्यक्तमूर्तये ॥ हिमव- 
व्ममुखेभ्यश्र पर्वेतेभ्यो नमस्त्वथ ॥ पोराणीश्यश्व गड्भाभ्यः सप्तभ्यश्व नमो नमः ॥ नमोस्त्वादि- 
शत लकी लिन न लिन न नल मल जल कब तले जिल लश जिल मिल लीक लत जप सकल कक नर हल लि ललि न गजल पलक पत की; 


प्राथनाके मेत्र-अह्माजीको नमस्क्रार, महात्मा कामकों | नमस्कार हे | बुद्धिके छिये, वृद्धिक छिय, निद्राके लिये 
३ ० 0 कि ! 
नमस्कार, निमंषके छिय नमस्कार, तटिक छिय नमस्कार, 


| ओर घनदाके छिय नमस्कार है । कुबेर जिसका पुत्र है 


ल्वके लिय नमस्कार, तुझ क्षणके छिय नमस्कार, काष्ठाक | 
लिये नमो +मः, कलछाके लिये नमस्कार; सुसूक्ष्मा नाडिकाक | 
लिये नमस्कार, मुहतेक लिय नमोनमः, निशाक छिये. 

के, है पं । 
नमरक र, पुण्य दिवसोंक छिय नमस्कार हें। दोनोंपक्ष, | 


बारहों महीन,छओकऋतु,दोनों भयन और पांचो संबत्सरोंके 
लिये सदा नमस्कार है। कृत युगादिकोंके लिय नमस्कार 
है | ग्रहादिकोंके लिये नमस्कार है, अद्वाइसो नक्षत्रोंक्र 
लिये नमस्कार हैं| राशियोंके, करणोंके, व्यतीपातोंके, 


है; अनुचर सहित कुछ नागोंके छिये नमस्कार है, सात 
बरंबार नमरकार हैं। इन्द्रोंक लिय नमस्कार तथा उत्तकी 


है। तुझ सुशाखके लिये नमस्कार है,सब भद्योंके जनकक्े 


- १ नलकूबरयक्षाय | २ हेरण्वताय | ३ नवष्य इति च्‌ पाठ: । 
्य्ज 


7 0१ 


एस महापुरुषुके लिये नमस्कार हैं । गुझ्कोंके स्वामीके 
लिय नमस्कार हे । शख और पद्म इन दोनोंके खजानोंके 
लिय सदा नमस्कार है । है भद्रकाली तेरे छिय नमस्कारहे, 
है सुरभी ! तेरे लिय वारंवार नमस्कार है, बंद बेदांग और 
बद्ान्तकी विद्या संस्थाके छिय नमस्कार है । नाग, यक्ष) 


| सुपर्ण ओर गरुडक छिय नमस्कार है, सातों समुद्र और 
गेंवे लि पु 8 बज 38 ७. 
$ सागरोंके लिय नमस्कार है, उत्तर कुरुके लिय और मेरुके 


रहनेवालोंके लिय नमस्कार हैं। भद्राश्व॒ और केतुमाछके 


| लिय' सब जगह सदाही नमस्कार हैं, इलावृत्तक छिय; 
५ गोंव कि व 
अतिवरषक अधिपोंके और विज्ञानोंके लिय सदा नमस्कार | 


हरिवषके छिय और किंपुरुष वर्षक लिय नमस्कार है। 


लिये २ | भारतदशके बंड बडे भदोंके छिय नमस्कार है; सातों- 
यात्रका मतढब अनुचर सहितस है । दिशाओंक छिय | 

छ्‌ फ चर कर : 
ओर दिक्‍पाछोंके ल्यि नमस्कार है, चौदहों मनुओंके लिये | 


पाताल और सातों नरकोंके लिये नमस्कार हे, कालछाप़्नि- 
गेंके घट और, 
रुद्र और शिव दोनोंके लिये नमस्कार है, वाराहरूपधारी 


| ५ रु पु गेंक ५ पु 

नमक ६ | भगवानूके छिय नमस्कार हैं, सातों छोकोंक छिय और 
संख्याओंके लिय नमस्कार हैं, दक्षकी पचासों कन्क्षओंके 
लिय नमस्कार है द्वि सुभद्रा और जयाके छिये नमस्कार | 


महाभूरोॉंके छिय नमस्कार है,सबुद्धिक लिये और प्रकृतिक 
लिये नमस्कार है पुरषके लिये और अभिमानक्‌ लिये 


है | एवम्‌ अव्यक्त सूर्तिके लिये नमस्कार हैं; हिमवानसे छेकर 
॥। 3 अल | ऊ ७ 
लय नमस्कार हे, पत्नीयों करिके सहित बहु पुत्रवाछू तुझे 


जो मुख्य पवत हैं उनके लिये नमस्कार है, पुराणोंमें आईं 





रा 


















[ ७२ ) ब्रतराज* । हि 


>>. | [िौि गए णण आओओओ०िओओ ६,7५० अकबर 






7 00 2002४: //00/007 7:४0 0/00 








हा 


मुनिश्यत्ष सतम्यश्वाथ सर्वदा ॥ नमोषस्त॒ पृष्करादिभ्यस्तीर्थेभ्यश्ष पुनःछुनः पे । नम्नगाश्य 
नो लित्य॑ वितस्तादिभ्य एव च ॥ चतुर्देशभ्यो दीांभ्यो धरणीम्यों नमो की नमो पड़ 
विधाने च च्छन्दोभ्यश्व नमो नमः ॥ सुरभ्येरावणाभ्यां च नमो भूयों नमोनमः 0 नमस्तथोडे 
श्रवसे छुवाय च नमो नम/॥। नमोस्ठ धन्वन्तरथ शखाखाभ्यां नमो नमः । विनायककुमाराध्य 
विश्नेम्यश्य नमः सदा ॥ शाखांय च॑ विशाखाय नेगमेयाय वे नमः | ५ नमः स्कन्दमहेध्य 
स्कन्द्मादृम्य एव च॥! ज्वराय सेगपतये भस्मश्हरणाय थे ॥ ऋषिश्यों धालखिल्पेभ्यः केश 
धाय नमः सदा ॥ अगेस्तये नारदाय व्यासादिभ्यों नमो नमः ॥ अप्सरोभ्यः सोमपेम्यों दें 
ध्यश्व नमो नमः ॥ असोमपेम्यश्व नमस्तापितेभ्यों नमः सदा ॥ दिभ्येम्यो नमो नित्य दाद 
शब्यश्व सर्वदा ॥ एकादशब्यो सद्रेभ्यध्तपस्विभ्यों नमो नमः ॥ नमो नासत्यदश्लायामब्िम्य 
नित्यमेव हि॥ साध्येभ्यों द्रादशभ्यश्व पोराणेभ्यों नमः सदा ॥ एकोनपञ्थाशले च मरुद्धद् 
तप्तो नमः ॥ शिल्पाचार्याय देवाय नमस्ते विश्वकमणे ॥ अष्टभ्यों लोकपालेभ्यः सातगेश्यश 
सर्वदा ॥ आयुधभ्यों वाहनेंभ्यों वर्मभ्यश्व नमः सदा ॥। आसनभ्यो दः्दुलिभ्यों देवेम्थश्व नम 
सदा ॥ देत्यराक्षसगन्धवपिशाचेम्यश्व नित्यशः ॥ पिठ्भ्यः सप्तमदेभ्यः प्रतेभ्यश्व नमः सदा) 
सुसू्ष्मेभ्यश्व दवेम्यो भावगम्येम्थ एव च ॥ नमस्ते बहुरुपाय विष्णवे परमात्मने ॥ अथ कि 
बहुनोकेन मंत्रेणानेन वाचयेत्‌ ॥ प्राइनुखोदइमुखो (वेप्रान्‌ देवाल॒दिश्य प्वेबत्‌ ॥ अथवा 
'केमत्र विस्तरेण ब्राह्मणानेव देवतोदेशेन पूजयेदित्यथे! ॥ पूरवेवत्‌ मन्जोक्तकमेण ॥ अध्यः उप्प्य पे 
वद्धमाल्येः सुहष्टकम) सुहृषफम-सरोपा्ं हडरोमा सन्नचयेदित्यथ: 'धनवधाम्यालु विभवेदेक्षिणामि ' 
सदा ॥ इतिहासपुराणानां प्रवक्तृश्व द्विजोत्तमान्‌ ॥ कालज्ञान्वेदवेदज्ञान्‌ भृत्यान्‌ सम्बन्ध 
बान्यवान ॥ अनेनेवतु मंत्रेण स्वाहान्तेन प्रथकप्ृथक्‌॥ मविज्ञायाग्रये होमः कतेव्यः स्वेतृतये॥ 


हुईं सादों गेगाओंके लिये नमस्कार है । सातों आदि | शिल्पाचार्य्य देव विश्वकर्माके लिये नमस्कार हैं, अपने भहु 
पनियोंके लिये सवंदा नमस्कार है पुष्करादि तीथाके छिये | यायियों सहित आठदों छोकपालोंके लिये नमस्कार है 
वारंबार नमस्कार हैं, वितस्ता आदिक नदियोंके लिये | आयुध, वाहन और कवचोंके लिए सदा नमस्कार है। 
वारवार नमस्कार है, चौदहो बडी बडी धरणियोंके छिये।| आसन दुदुभि ओर देवोंके छिये नमस्कार हैं, देत्य, रास 
नमस्कार हैं, धाता विधाता और हन्दोंके छिय नमस्कार | गन्वर्/ पिशाच, पिठ और इनके सप्तभेदवाले प्रेत इ 
है, सुरभी और ऐरावणके लिये वारंवार नमस्कार है, | सबके लिए सदा नमस्कार हे | अत्यन्त सू क्ष्मोंके हिये. 
उच्चे:अवाके लिय और ध्बके लिये नमस्कार है, धन्वन्त | बैक फिय आर भव्य क लिये गा बहु 
रिजी एवम्‌ श्र अम्लोंके लय वारंबार नमस्कार है।। ले विष्णुके छिये नमस्क्रार ह.। अथवा बह 


विनायक कुमार और विप्नेशोंके लय सदा नमस्कार है. 














। 



















| कहनेसे क्‍या है, अपना पूरब सुख करक्रे वा उत्तर भू 
ला | करके.पहिलेकी तरह देवताओंके उद्देशसे ब्राह्मणोंका पूजा 
शाख विशाख और नेगमेयके लिय नमस्कार है, स्कन्द-| करदे। “अथ कि बहुना” इस खलोकका निबन्ध करे 
प्रहों और रकेन्द माठकोंके लिय नमस्कार है ज्वर रोगपति| स्वयम्‌ अथ करते हैं. कि, यहां विस्तारसे कया प्रयोजन 
, और भस्मप्रहरणके लिये नमस्कार है. वष्छखिल्य ऋषियों | देवताओंके उद्देशसे आाह्मणोंका ही पहिले की तरह महं 
और केशव भगवानके छिय सदा नमध्कार हे,अगस्थ्यजी, 


| ऋमसे पूजन करदेना चाहिए । अध्य, पुष्प, धूप - वस॑ ओोए 
नारद्जी और व्यासजीके लिय वारंबार नमस्कार है, | माल्यसे सुहृष् रोमा होकर पूज, रोमांच सहितको हुं 
अप्छराओंके ढिये और सोम पीनवाले देवोंके लिय वारंवार | ४क कहते हैं, हष्टरोमा होकर पूजन करे, यह सुहृष्टकर्क 
हक हे असोमपाओंके ड्यि एवम्‌ तुधित दवोंके ल्यि | अथे है । केवछ अर्ध्यादिकही नहीं किन्तु धन घान्य भा 
; हब ०35 आर पा कक । दा आम सदाही सं घुपणोक शा 
* नमस्कार ३, नासत्य, दस, अश्विनीकुमारोंके लिय हक कक रे वेद गे के डक ल् रे [ दा 
तमस्कार है, पुराणोंके कहे हुए बारहों साध्योंके लि तय | कर तथा कप और बान्धवोंकासी स्का: 
कमा कारे | ये सदा | करे इसी स्वाहान्त सन्त्रसे सबकी दृप्तिके आ४ 


 उन्चा के छिय हे ४ 
सरों सरूतोंके लिय नमस्कार हैं, | अलग अछग यविष्ठ अप्लिंम हवन करना चाहिए, 


ब्रतानि, ! धाषाटीकासमेत: ! 


( ड्टे-) 





वेदविश्वक्षपी दत्वा सथाने प्रधधानिके रूदा॥ य्विष्वाय श्रेष्ठाय । वेदबित बेदोक्त विधिज्ञः ॥ मद्ररत्ने तु 
वेदबादिति पठिता वेदोक्ताविधिनेति व्याख्यातम)। चक्लुपी आज्यमागोी ॥ आधानिके स्थाने प्रच्चाज्होग रम्मे॥ 
होमारम्भे ततः कुंयोन्मड्रलारम्भर्ण नरः दनरत्न--झालाहाऋा तता कुयोब्मड्रलालम्भन 
ततः३ ॥ इति पाठ:॥ भोजयित्वा द्विजास्सवान्सुहत्सम्बन्धिबान्यवान ॥ विशेषण च भोक्तव्य॑ 
कार्येश्रापि महोत्सवः ॥ नवसंवत्सरारम्भः सर्वेसिद्धिमवर्तकः ॥ इति संबत्छशरम्भविधिः 
आरोग्यप्रतिपढ़्तम्‌ | अथात्रेव विष्णुधमॉत्तरोक्तमारोग्यपरतिपद्गतमा। पुष्कर उबाच ॥ संबत्सराव- 
साने तु पश्चदश्यासुपोधितः ॥ प्रातः प्रतिपदि ह्लातः कुयोद्रतमनन्थधीः ॥ पूजयेद्धासकर देव 
वर्णकेः कमले कूते ॥ वर्णकेःरक्तनीलबेतपीवादिनः ॥ शुद्धेत गन्धमातल्येन चन्दनेब सिलेन च ॥ 
तथा कुम्दुरधूपन पघृतदीपेत भागव ॥ कुन्दुर। शहकीनेयासः '। अपूप:ः सकलदका परमान्नेन 
भूरिणा ॥ सेकतेः शकराविकारे॥ ओदनेन च शुक्केन, सता लवणसपिषा॥ ता उत्तग्रेव ॥ क्षीरेण च 
फलः शुक्लबहुबाह्मणतपंणः॥पूजगित्वा जगद्धाम दिनभागे-चतुर्थकेा! आहार प्रथम कुयोत्सपृत 
मन॒जोत्तमासवब च मतुजश्रेष्ठ पृतहीन विवजयेत॥ झुकवा च सकूदवान्नमाहार व समाचरेत्‌ ॥ 
पानीयपान कवीत ब्राह्मणालुमले पुनः ॥ प्रथममाहारस प्रथमग्रासय । सबसे -प्रथममप्रथम चाइरस ॥ 


 आक.] 


सकृददान्र भुक्वां इकमव आस भक्षायंताओाशहछमज्ञ स्यननत्‌ ।। आह्यणावुमत्या पुनराहारमवाशदान्नभाजन 


इक के की (0०, है 20% 2. 


पुनः पानीयपान व कुयोदित्यथे॥बाह्मणानुसत्या झुझ्जानोपि पृतदीन न सुझीत घृतहीन विवजघोदिते निषेधात्‌ 
हु 


संवत्सरामिद कृत्वा ततः साक्षात्रयोदशम्‌ ॥ पूजन देवदवस्थ तस्मितहलनि ७ 


॥ संदरक्लर 


प्रतिमास शुकहप्रतिपदि ॥ त्रयोइशमिति लिड्दशेनात ॥ सवबस्य सहिरण्यं च ततो द्याहिजतये॥पूजनम्‌ 


| आफ.  आक 


इुजापकरण बातपग्रार 





यह वेदविदक हाथसे होना चाहिये। दोसों प्रधान दवोंके 

लिय प्रधान आधब्य भागोंको प्रधान होंममें छसही देना 
कप २ 9 घ 

चाहिये, यव छिका मतलब श्रेश्डस है, बेद विदका सतलब 

क्र (९ गेंक कक कक. हे 

वेदकी कही हुई विधियोंको जाननवारूसे है | मदनरंत्न 

ग्रन्थोमें तो बेदविद्की जगह बदवत्‌ ऐसा पाठ रखकर 


इसका वेदोक्तविधि अथ्‌ किया हैं; चक्षुपीका मतछ॒व आज्य 


भागसे है; प्राधानिक स्थानका अथ॑े, प्रधान होमारंम है। 


मदनरत्नम लिखा हे कि, पीछे मंगलाचरण, शात्मको 


संवत्सरारभविधिः !। 


- अथ आरोग्यप्रतिपदूत्रतम्‌-विष्णुधमात्तर पुराणमें आरोग्य 
प्रतिपदूका ब्रत कहा है पुष्कर बोछे कि, संवत्स 


करना चाहिये | छाछ; नीछा। सफ़ेद और पीछे आदिको 
वणक कहते हैं, हे भागंव ! शुद्ध गन्धमाढास, सफेद्चन्द्‌ 





बलेनानेन धर्मन्ष रोगमे्व व्यपोहति।अरोध्यमाप्नोति गाते तथार्थांयशस्त 





कीके निर्यामकों कहते हैं । संकतके पूओंस, दृधिसे तथ 


4५ ३ अर 
 बहुल्सी खीरसे ( शकराके बने हुओंको सेकत कहते है 


सफद भाव्स भर स्तम्सम्क अर रुहघीक पदाथोसे 
सत्‌ छत्तमकों कहते हैं| क्षीरसे ओर उत्त सफेद फ्‌ठॉसें 
जिनसे बहुतसे ब्राह्मण तृप्त होसकें, इंस सबसे जगद्धास 
सूर्यका पूजन करके श्रेष्ठ मनुप्यको चाहिये कि दिनके चौथे 


| भागमें घृत सहित प्रथम आहार करे तथा कोई भी चीज हो 
इसकेबाद होमारंभके निमित्त, संगछारंभ करना चाहिये ।। पर बिना घीके होतो सबको छोड दे; एक श्रास ही उस 
' अन्नके आहारको करे; फिर ब्राह्मण आज्ञा दे तब पान्तीयका 
सजाकर चाहिये। सब ब्राह्मणोंको, मित्रोंकी, संबन्धियोंको | पात्त करे। प्रथम आहारका देतरूब पहिके म्राससे है, धरृत 
और बान्धवोंकों सानुरोध भोजन कराके पीछे आव भोजन | हीन चाहे पहिछा ग्रास हो, चाहें दूसरा हो, उस छोड दे । 
करना चाहिये, महोस्सव भी होना चाहिये, यह नये संब-| एकहीवार अन्नको खाकर यानी एकही ग्रासको खाकर, 
स्सरके आरंभकी विधि सब सिद्धियोंक्रे देनेवाल्ी है। इति। बाकीको छोडदे ब्राह्मणोंकी सछाहसे फिर बाकी आहारका 
| भोजन करके पानी पीना चाहिये, जाह्मणोंकी आज्ञासे 
| भोजन करता हुआ भी घृत हीन वस्तुका भोजन न करना 
| चाहिय | क्‍यों कि ध्ृृतहीनकों न खाय, यह' निषेध हे। हे. 
रकी समाप्तिमें पन्द्रसके दिन उपवास करके पग्रतिपदके | सागेव |! एक सारूतक इस ब्रतकों करते हुए तेरहों प्रतिप 


दिल, प्राबः काल स्नान करके अनन्य चित्त होकर ब्रत करे, | दाओंको देव देवका पूजन करना चाहिये! शुक्ला प्रतिप- 


वणकोॉस बनाये हुए कमलॉपर, सूर्य नारायणका पूजन | 


दका प्रतिमास संवध्सर ब्रत करना चाहिये। क्योंकि, त्यो 


| दश यह लिखा हुआ है । इसके वाद वस्मसहिल सोना और 
| पूजनके उपकरण अतिसा आदिकोंको ब्राह्मणको दे देन 
नसे; कुन्दुरूकी घूपसे तथा घुतसे दीपकस। कुन्दुरू-शछ- | 


चाहिये, इस ब्रतके प्रभावस ब्रती अपने सब रोगॉंको नष्ट- 





१ वज्नलि इति पाठान्तरम्‌ । 


(५७ रे 





० ०&9&9०» 99 9 न कि ललननमसम०७१3७७७भा०ा नव 





पाम्यावविपुलांश्व भोगाव । बतेन सम्यक्पुरुषो5ध नारी संपूजयेद्यः 


श्रतराज। | 


 प्रतिपद- 





तु जगत्मधानम्‌ ॥ जगत 


पानम्‌-' सूर्य ॥ इति चेत्रश॒क्कश्नतिपद्यारोग्यदायकत्रतम्‌ ॥ विदयाग्रतिपद्रतम्‌ ॥ अस्यामेवोक्त विद्या 
मदनरत्ने विष्णुधमें॥ मार्कण्डेय उबाच ॥ अष्टपत्न तु कमल॑ विन्यसेद्रणकेः जशुभेभातद्माणं कि. 


कायां तु स्यस्य संपूजयेद्रियम्‌ ॥ ऋग्वेद पूर्वपत्रे तु यजुर्वेद तु द| 


९+ 


चाथवर्ण तथा ॥ आम्रेये च तथाड्रानि धर्मशाखत्राणि नेकते ॥ 
सोपवासस्तु पूजयेत ॥ 


न्यायविस्तरम्‌ ॥ एवं विन्यस्थ धर्मज्ञः 


बा 


केणे ॥ पश्चिमे सामवेद॑ तु उदछ 
पुराण चेव वायव्यामीशापय्य 
चेजशुक्रमथार»य सोपवासो 


जितेन्द्रियः ॥ सदा प्रतिपदं पराप्य शुक्ृपक्ष स्थ यादव ॥ संवत्सरं महाराज शुक्कगन्धालुलेपने॥ 
भूषणेः परमान्नेन धूपदीपेरताद्धितः ॥ संवत्सरात्ते गां दद्याद्डते चीणे नरोत्तम ॥ इदं ब्रत यस्तु 


'करोति 


राजन्‌ स वेदवित्स्याद्धावि धर्मनिष्ठ॥कृत्वा सदा द्रादशवत्सराणि विरिश्विलोक॑ पुरुष 


प्रयाति ॥ इति विद्याप्रतिपद्गभतम्‌ ॥ तिएकअ्नम ॥ अथाज्रैव भविष्योक्त॑ तिलकब्रतम्‌ ॥ श्रीक्षष्ण 


उवाच ॥ वसन्ते किंशुकाशोकशोमिते प्रतिपत्तिथि: 


॥ शुक्का तस्यां पक्ुर्वीत सता निय- 


ममाश्रित;॥॥अनेन सामान्यतो वसन्तसम्बन्धिशुक्षप्रतिपल्लाभेषि तया ब्रतामेद चत्रे गहीत॑ द्वित- 


संनिधावित्यप्रिमवचनातरो धाज्चेजरशुक्षप्रतिपदेव ग्रह्मा 
वताः ॥ नद्यास्तीरे तडागे वा शहे वा तदलाभतः 


॥ नारी नरो वा राजेन्द्र संतर्प्य पिन 
॥ पिष्टातकेन विलिखेद्वत्सरं पुरुषाकृतिम ॥ 


पिशतकः एट्वासकों गन्षद्रव्यचूणविशेषः | ततश्रन्दनचूर्णन पुष्पधूपादिना।चयेत ॥ मासतेनामश्नि: 


_ पश्चान्नमस्कारान्तयोजिते: 


॥ मासतुनामामिः-चेत्रवततन्तादिनापानिः ॥ पूज़येद्राह्मणो 


विद्वान्‌ मंत्रेवेंदो- 


दितः शुन्ने।। संवत्सरोसीति पठल्मस्त्र वेदोदित॑ द्विज:॥ नमस्कारेण गण 77777 नमस्कारेण मंत्रण झद्रोपीत्थ मपूजयेद। श॒द्रोपीत्थं मपूजयेत॥ 


कर देता है, चाहें पुरुष हो चाहें ख्री हो इस ब्रतस क्‍ 
जगत अधानको पूजता है वो आरोग्य प्राप्त करता है तथा 
उत्तम गति यश और अनेरू भोग उसे प्राप्त होते हैं। यहां 
जगत्‌ प्रधान सूयेको कहते हैं । यह चैत्र शुक्ला प्रतिपदाका 
आरोग्य दायक ब्रत पूरा हुआ ॥ 


अथ विद्याप्नतिपद्रतम्‌ । 


इसी चेन्न शुद्भा प्रतिपदाको विद्यात्रत होता है । यह 

£ गरत्नसें विष्णुधर्ममें छिखा हुआ है। मार्कण्डेयजी बोले 

* कि, सुन्दर रंगोंस अष्टद्डकमलछ बन ,, अद्याजीको उसकी 
कणिकापर बिठाकर उन्तका पूजन करना चाहिये। पूर्व 
>तपर ऋखेद, दक्षिण पन्नपर यजुर्वेद, पश्चिम पत्रपर साम- 
| तथा उत्तर पत्रपर अथवबेद लिखना चाहिय । बेदा- 
जे की आउनंयमे तथा धम्ेशाश्रोंको नेऋत्य कोणके पत्रपर 
(या वायव्यकोणके पत्रपर पुराण और इंशानमें न्‍्यायका 
विग्तार लिख धर्म जाननेवाढोंकों चाहिये कि उपवास 
तक पूजन करें। हे यादव ! चैत्र शुक्का प्रतिपदास छकृर 
प्रत्यक मासकी 
' त्रतको करे, 
आह्स्यराहित भ्षणोंसे 
धूपरीपस ब्त मनाता रहे । सवत्सरक पीछे ब्रत ला 
बहुओे .ओ। गंक दान करे, हे राजन्‌ | जो पुरुष इस 
त्रतको करता हे वो बेदोंका के हर पतन करें कया शासमार भरोसे रह भी ह धामिक बनता है 









2 रू 
१ त्स्यति पाठ तस्य कम्रद्धस्य कार्णकायामित्यर्थ: | 


त्ररह वष इस ब्रतको करके ब्रह्म छोकमे चढहा जाता है। 
तिलकत्रत-भविष्यपुराणमें कहा है। श्री कृष्ण बोढेक़ि 
ढाक शुक ओर अशोकसे भोभित हुए वसन्तम शुब्ञप्रति 
पत्‌ तिथि आती है, उसमें नियम लेकर स्नान करना 
चाहिये। इस वाक्स सामान्य रूपसे वसन्‍्तकी शुद्डा प्रहि 
+२का छाभ होनेपर भी यह जो अगाड़ी छिखा हुआ है 
कि, उसने यह ज्व चेजरमय ब्राह्मणोंके सन्मुखत्र गहण किया 
॥/ इस वचनके अनुरोदस चेत्रशुर्ला प्रतिपदा ही हेगी 
चाहिये; हे राजेन्द्र ! श्ली हो वा पुरुष हो उसे नदींके 
किनारे अथवा)तडागपर यदि ये न मिल तो घरपर ही 
पितृ-दृवत्ताओंका भल्ती भांति तपंण करके पिष्टातकर 
भनुष्य जैसी आक्ृतिका संवत्सर लिखना चाहिये। पिष्ट 
तकको पटवासक कहते हैं; यह एक सुगन्धित वस्तु 
चूरण है । इसके बाद चन्द्नक चूणस और पुष्प धूपादि- 
कैसे उन्हें पूजे | पीछे नमस्कार छगाये हुए मास और ऋतु: 
ओके नामसे अथात्‌ मास चैत्र आदि और क्र्तु 
पसन्तादिके नामसे शुभ वैदिक अंत्रोंद्ारा, विद्धार, 
आ्ाह्षणको चाहिये कि, पूजन करे । द्विजोंको चाहिये 
कि ५ संबत्सरोडसि ” इस वेदके संत्रको बोहो 
हुए पूजन कर तथा नमस्कार | मरत्रोंसे शूद्र भी इसी 


ब्ताति भाषाटीकासमेतः | #.. हक) 






परिवत्सरोःसीत्यादियज्ञुवेदमसिद्धों मन्त्र: ॥ नमस्कारेण मन्तेण संवत्सराय ते नम इत्यादिना ॥ 
एवमभ्यच्य वासोष़िः पश्चात्तममिवेष्धयेत्‌ ॥ कालोड्वेमूलफलेनैंवेधमोंदकादिभिः ॥ ततस्वत॑ 
पूजयेत्पाथ पुरः स्थित्वा कृताअलिः ॥ भगवंस्त्वत्मसादेन बने क्षेममिहास्तु मे ॥ संबत्सरोप- 
सर्गा में विलय यान्त्वशेषतः | एवमुक्त्वा यथाशकक्‍त्या दत्वा प्राय दक्षिणाम्‌ ॥ ललाटपढ़े 
तिलक कुर्याचन्दनपड़जम्‌ ॥ ततः अमृत्यठ दिन तिलकालंकुतं मुखम॥घाये संवत्सर यावच्छ- 
शिनव नभस्तलम॥एव नसे वा नारी वा ब्रतमेतत्समाचरेव्‌ ॥ सदेव पुरुषव्याप्र सोगान खुधि 
झ्ुनक्त्यसों ॥ भूतभेतपिशाचा ये हुवोरा वरश्िणों अहाः ॥ निरथ्थका भवन्त्येते तिलक वीक्ष्य 
तत्क्षणात्‌ ॥ निरथेकाः प्रयोगनशझ्ूस्या। । अनिष्टकरणे अप्तमर्था इत्यर्थ। ।। पूर्वमासीममहीपालो नाम्ना 
शबुअयो जयी ॥ चित्रलेखेति तस्या$भूद्भाय्यो चारित्रभूषणा ॥ तया ब्रतमिद॑ चेत्रे ग़हीत॑ द्विज- 
सत्रिषों ॥ वत्सरं पूजयित्वा तु ध्यात्वा देव॑ जनाईनम्‌ ॥ हन्तुमाक्षेतुकामों वा समागच्छति यः 
पुनः ॥ प्रयाति भियकृत्तस्था दृष्ठा तु तिलक नरः ॥ सपत्नीदर्पापहरा वशीकृतमहीतला॥भर्ु- 
देद्ठा अहष्ठटा सा छुखमास्ते निराकुला ॥ यावद्जेनानिभूतो भर्ता पुत्रः सवेदनः॥ शिरोतिना 
संभ्यातः सुहृदां सुखदायकः ॥ शिरोतना संप्रयातः शिरोवेद्नय। युत ॥ घमराजपुरात्माताः सर्व- 
भूतापहारकाः ॥ तस्मिन्क्षणे महाराज धमेराजस्य किंकराशतस्या द्वार्मतु॒मापाः अविष्टा हे 
मखसा ॥ शबुखय समानेतु कालमृत्युयुर/सरा॥ पाये स्थितां चित्रलेखां तिलंकालकृताननाम ॥ 


शुद्रोपीत्यनेन तु ख्रीगों परिप्रह॥ तासां विशेषविध्यभावे वेद्किमन्त्रानधिकारात । 





तरह पूअ,वहां शूद्र शब्दसे ल्लियोंका भी ग्रहण होता हे कि, 


_अनननालक फकना भाकतशान नानना 





ननीनना जा 


हह निर्णय हुआ भा । 





थ प् के, । वर्ष भर क्षेम रहे, एवम्‌ इस सालूके भेरे जिन्न नाशको प्राप्त 
ख्ियां नमस्कार मंत्रस पूजत करे क्योंकि विशष # विधिक | 
विना लियोंको वेदिक मत्रोंका अधिकार नहीं ह । “'संव- | जैसे चन्द्रमासे वभस्तल सुशोभित रहता हैं उसी तरह उसी 
त्सरोर्शल”' परिवत्सरोडसि” यह यजुवेंदुका असिद्ध भत्र | दिनसे मुख भी चन्दनस अछक्षत रहना चादिय; प्रति दिन 
है) इस मंत्रको मय अथके यहीं लिखे देते हं-ओमू संवत्स- | म्राथपर चन्दनका तिछक करना चाहिये। हे पुरुषव्याप्र ' 
रोधंस, परिवत्सरोउसि, इद्ावत्सरोडसि, इंदूबत्सरोडंस | थ्ली हो अथवा पुरुष हो, जो इस त्रतको एक साहू तक 
उषसस्ते कल्पन्तामहारोत्रास्ते कल्पन्तामघमासास्व कल्प- | करता हे, वो भूमडछमें दिव्य भोगोंको भोगता है । भूत, 
न्ताम्मासास्‍्ते कल्पन्वामतव॒स्ते कल्पन्ताम्‌ संवत्सर॒स्ते कल्प- | सबे 

न्ताम्‌॥ प्रेट्याउएल्े सच्चात्व प्रच॑ सारय छुपण चिद॒सि । 
तया देवतयाउद्ञलिरस्वदू घवः सीद ॥ हैं. दव ! आप संब- | रथ न शूर कि >> 
अर बव्यर अलत्ल आ 6 त्स ही।।। रथंक यानी प्रयोजन शून्य, जो किसी तरह भी अनिष्ट 


ह । «७ | गे करसक | पहिझूे एक श्ेश्वय नामक जयी राजा था 
इुष, अहोरात्र, अधुंमास, मास, ऋतु ओर संवत्सर आपमें | हे 
ह। आप आन जानेके किये अपना संकोच आर विकाश | 
लेते त्य | ५ 
होते हैँ । हे 32330 कक ह इक पक | किया था बथा संवस्सरका पूजन करके भगवानका ध्यान 
वि क्र ७ ऐप ! कि ४ ज्स ने दिये द् 
यानी आम्‌ सवत्सराय ते नमः इद्यादि भेत्रोंस पूजन करना | “या । जो को३ उसे सारनेके डिये भी आता था वह चित्र 
चाहिय । फिर वस्थोंसे उसे वेष्टित कर देना चाहिये । फिर | लक कक ४ . 
मूछ फल नेवे्य और से संबत्सरका पूजन | "पा था.। इसके सामने सोौतोंका अमभरमान चूण होता था, 
सामयिक मूछ फल नेबेद्य और मोद्कोंसे सवसत्सरका पूजन | सब्र इसके बच्च थे, यह अपने पतिका मुख देखकर असन्न 
करना है को डक सामने 4538 हांथ जोड़कर | 
करना चाहिय कि, है भगवन, आपको क्ृपास यहां मेरा | :. _- पञ्ष सहदों रा 
हे हर बम | थीने इसके पतिकों मार डाछा उतनमें सुहृदोंका सुख देने- 
< विभिन्न जातिकीं बीक्षके लग भग,ल्रियां ऋगेदमें ऋषिका देखी | 
जाती हैं गागीं आदि अनेक बिहुषियोंका प्रसंग उपनिषदोंमे भी पाया | 
जाता है, इतिहास और पुराण भी इससे शुन्य नहीं हैं; काशीके | 
प्रसिद्द विद्वान न्‍्वाखाल दासजी न्‍्यायरत्न तथा आहिताभमि त्रिका- | 
लद॒शी पे, वेशीघरजी अभिहोत्रीका बरतों शाह्नार्थ।चला था, अमिद्दो- | 


श्रिथोंकी ल्लियोंको छोडकर किसीको भी वेदमत्रोंका अधिकार नहीं है | 


हो जाये, पीछे अपनी झक्तिके अनुसार दान देना चाहिये। 


प्रेत पिशाच और एस बरी तथा ग्रह जिनका निवारण ह्ठ 
न हो सके वे इस तिछऋको देखते ही निरथक हो जाते हैं, 


उसकी चित्रहुःखा नामकी ख्री थी, जो परम चरित्र शालि- 
नी थी । उसने यह ब्रत चेन्रम्तासमें जाह्मणोंके सामने १्रहण 


छखाके विछुककों देखकर उसका शुभ चिन्तक बनकर 


रहती थी इस कोई आकुछता नहीं थी, जितनेर्भ मत्त हा+ 


वाला पुत्र शिरकी पीडास मर गया, वहां सब भूवोंकों 
लेजानेवाले धमराजक पुरसे प्राप्त हुए। हे महाराज |! उसी 
क्षण धधराजके किंकर चित्रछेखाक द्वारपर भाये और झढ 
घर घुसगये ये काल मृत्युके अगाडी चलनेवाले थे, शब्वुज- 
यको छूनकलिय आये थ, पर उसके पाश्चवमें तिछक ढूगाये 
हुए चित्रलेखा बेठी- हुईं थी, उस देखकर उनका संकल्प 


नष्ट होगया और वापिस चढ़े गये । हे भारत | उन्तके चढ़े 


(५६) 


[ै.+०९-०-०++ ३९ १०-०००++/7-: न कीकीशा:4-२०० पक + 


+ 
+ | 
पिडप् पद का एड यशा 280920/58 22604 0 6470 00047 70 008 १२०३४ 278५ 
[वक उछरकाअटप कमा कम 5प 7 पकएदर १ मम 0 7 57220 67622 60020 थ 20047 60/20/2086 7४९80 5 20/00/5000 4 06004 % 6000 23007 20% 706, 32222 
८ सनक कि 22 काका क न पद प्यार पेट मल एप एस पा कक आइए फट एक 22777 22 22) 22960. 23.3; 









इृं्ठा एजट्ट अदएपःर पराक्त्यथ गताई$ युन३ ॥ गतेषु तबु स ठप पुश्रण सह भारतानीरुजो बुभुजे 
भोगान्‌ पूर्वकर्माजताज्छुमान्‌॥ अऋरेण समारूषातं मम पूव युधिष्ठिर ॥ एतब्रिलोकीतिलका- 


प्रतिपदे+ . 


८0१४0 2०३४४ 220 | क! ऐ 
| 


ख्पभूजर्ण पुण्यत्नत॑ सकलदुष्टहर॑ पर च॥ इत्थं समाचरति य। स सुख विहृत्य मत्यः प्रयाति 


हल प 


पद्मच्यतमिन्दमोले! ॥ इति तिलकब्तम्‌ ॥ अस्यामेव नवरात्रारम्भः ॥ तलत्र पराझुता आध्या॥ 
अमायुक्ता न कतेव्या प्रतिपच्चाण्डिकाचने ॥ अहूर्तमात्रा कतंव्या द्वितीयायाँ गुणार्विता | 
अन्रेव प्रगादानमुक्तम्‌ ॥ अतीत फाल्गुने मासि पाते चेव महोत्सवे । । पुण्येईह्चि वब्त कथित प्रपा- 
दान समारभेत्‌ ॥ ततश्रोत्सजयद्विदाव मन्जेणानेन मानवः ॥ प्रपेयं सर्वसामान्यभतेभ्यः पति: 
पादिता ॥ अस्याः प्रदानात्पितरस्तृप्यन्त हि पितामहाः ॥ आनिर्वाय ततो देय जले मासचतु- 


ट्टयम्‌॥ पपां दाठमशक्तेन विशेषाद्धममीप्छुना॥ प्रत्यह॑ घर्मघटको वस्थसंवेछिलाननः॥ 


बाह्मणस्प गहे देयः शीतामलजलः शुतिः॥ एप धर्मंघटो दत्तो अद्यापिष्णशिवात्मकः॥ 
अस्य भदानात्सकला मम सन्‍्त मनोरथाः॥ अनेन विथिना यस्तु धर्मकुम्भ॑ प्रयच्छति॥ 
प्रपधादानफर्ल सोएि आाप्नोतीह ने संशय: ॥ इ्ति अपादानम्‌ ॥ अथाचारपाप्त रोटकत्रतम्‌ ॥ तह 
आवणशुक्कप्रतिपत्सोमवारथुता यदा तदा श्रावणे प्रथमलोमवारें वा प्रारभ्य साद्धमासत्रग 
कार्यमू ॥ तिथ्यादि संकीर्त्याधिकसौमाग्यसंपूर्णलंपत्तिकामः श्रीसोमेश्वरप्रीत्यथ रोटकब्त॑ 
करिष्ये। इति संकरूप्य प्रत्यहं॑ कार्तिकशुक्लचतुर्दशीपर्य/ल 


सोमेश्वरं साम्बं॑ पूजग्रेत ॥ तत्र 


+ 
| 


पृजञाविधिः ॥ मासपक्षाइलिर्प श्रीसोमेश्वरतरीत्यथ गहीतरोटकद्गताडुत्वेन विहित॑ श्रीसोमे- 
.रएजर्न कारेध्ये इति संकल्प्य पूजां कुयोत्‌॥ एवं कार्तिकशक्नचत्॒दशीपर्यन्तं पक्‍्त्यहं कथा- 


अवणपूर्वक बिल्वदलेः 
दिल्लिः संपूज्य प्रातः 
स्वयं शुझीत ॥ 





'अ॥/* बे. उकताएच्टर, 


जानेपर राजा पुत्रके साथ रोगरहित होगया, तथा पूर्वक- 


मंस संग्रह किये हुए पवित्र भोभोंकों भो तने छगा, हे युधि- 


(८२ : पहिल यह मुझे अक्रजीने कहा था, यह पलक 
जिछोक्ी तिलक हैं, सकल दुष्टोंका हरनेबाढा परम पुण्यत्रत 
है) इस प्रकार जो कोई इस त्रतको करता है बह इस ढो- 
करें सुखभोगकर अन्तर न नष्ट होनेवाले इन्दुमौडिक 
पदको चढा ज्ञाता है, यह, तिरुकअतकी कथा पूरी हुईं ॥ 
घवराज्र-इसीमें ही नवरात्रका आरंभ होता हे, नवरात्रमें 
प्रतिपद्‌ द्वितीयासे युक्त प्रहण करनी चाहिये। चंडिकाके 


4. 


जन अप्तावस्था युक्त ध्तिपद्‌ न करनी चाहिये पर हि- 
दीया युक्त मुहूत मात्र भी हो तो उसमें प्रारंभ करना चा- 
डिये। प्याऊका दाव-भी इसीमें क हा है, कि, फार्गुनमा- 
सके व्यतीत होजानेपर तथा उत्सबके पुण्य दिन आजाले- 
', त्राह्मणोंके कथनानुसार प्याऊ दिछाना प्रारंभ क्रदे 
का विद्वान मनुष्य इस मंत्रस प्याऊदिलावे कि-यह प्याऊ सर्व 

| कक लिये बनाई है । इसके ग्रदानस पितर और 
पितामदद कप हो जाये।चार माहतक उसका पानी न टूटने 
गये, जी प्याऊ देनेकी शक्ति न रखता हो पर विशेष धर्म 
दवा ही हो तो, हरएक दिन मिट्टीके धेबटकों ऊपस्स 
भौर 34 5 पानीस भरकर, ब्ह्मणके घर दे आते 
और देतीवार कहे प त्रह्म[-विष्णु-शिव रूप 


>क हि क्कि ' यह घमेघट 
० इस | प्रदानस भरे संपूंे म्नोर्थ सफल हो ,जाओ | 


संपूज्य कातिकशुक्कचतुदश्यामुपोष्य 
४ इ5॥[हारसमित रोटकपश्ेक कृत्वा दो बाह्मणाय एक॑ देवाय दस्वा द्रौ 
एवं पश्चवष कृत्वाजते वक्ष्यमाणोश्यापनविधिना उद्यापन 


रात्रो 


कुृर्यां दिति ॥ 
७७४७७एणशशाणणााणणाााा 3 न मकान कलर नल 
जो इस +िधिसे धर्म घटका दान 
फल पालेता है इसमें कोई सन्देह नहीं है। यह प्रपा दाभ 
समाप्त हुआ।॥ अथ आचार प्राप्त रोटक ब्रत-जब श्रावण 
शुद्धा प्रतिषदा सोमवारी हो उसदिन, अथवा श्रावणके 
पहिले सोमवारस लेकर साढे तीन महीना तक इस ब्रतक्रो 





पश्चामृतपुर:सर नानापुष्पा 


करता है वो श्रपादानका 


करना चाहिये। तिथि आदि कहकर अधिक सौ भाग्य और 


परिपूण संपत्तिकी इच्छांवढा मैं, श्री सोमेश्वर्की पसन्न- 
दाके ढिये रोटक त्रत करता हूँ । ऐसा संकल्प कर इस 


है] 


रोजसे कार्तिक शुक्ष चतुरंशीतक साम्ब सोवेश्वर भगवान 


गे दूजन करना चाहिये । सोम्रेश्वरके पूजनकी विधि 
लिखते हैं- पूजनका संकल्प तो मास पक्ष आदिंका .उल्लेख 
करके कहें कि, श्रीसोम्ेश्वरकी प्रसन्नताके लिये; ग्रहण _ 
किये हुए रोटक ब्र॒तके अग रूपसे कहे गये, श्रो सोसे- ' 


श्वरके पूजनको करता 


हू.। पीछे पूजा करनी चाहिये। 


इसी तरह कार्तिककी शुक्ध चतुदशीतक हररोज कथा सुनता 


डेआ विल्थपतन्नोंस सोमेश्वरका पूजन करके, 


कार्तिक गुह्भ 


चतुद्शीको ब्त करके रातको पे चासतस लेकर जितनभी 


पुष्पादिक हैं उनसे शिवका पूजन करके पुरुषके भोज मक्े 
“अर पांच रोट करके दो बाह्षणके हिये तथा एक देवके 
लिये देकर दोनोंका स्वयम्‌ भोजन करके इस प्रकार पांच 
पररेकरक पीछे वक्ष्यमाण उद्यापन विधिसे उद्यापन. करन 
चाहिये | ञ है. 5 ० ही 


ही 


50% % 2 0 आय कं आ के, 


परिभाषा, | 








- अथ रूवेशिवब्नतेषु पूजा | | 
थाहि भगवज्छम्भो शव त्व॑ं मिरिजापते ॥ मसन्नो भव देवश नमस्तुब्भ॑ हि शंकर ॥ 


त्रिपुरान्तकरे देव चरद्रचूड महाद्यतिम्‌ ॥ गजचमपरीधानं सोममाबाहयाम्यहम्‌ ॥ आवाहनम 





कम कु पे के 


बन्धूकसन्निम देव॑ निनेत्र चन्द्रशवरम ।त्रिशूलवधारिणं देव॑ चाधहासं सुनिर्मेल व्‌ ।। कपालचारिणं 
देव॑ वरदाभयहस्तकम्‌ ।। उमया सहित॑ शम्सुं ध्यायेत्सोमेइवरर सदा ॥ ध्यानम्‌ ॥ विश्वेश्वर 
महादिव राजराजेश्वरपतिय ॥ आसन दिव्यमीशान द्ास्येःह तुबभ्यमीखर ॥ आखसनम्‌ ।। महादेव 
महेशान महादेव परात्पर ॥ पा गहाण मदत्त पार्वलीसहितेश्वर ॥ पाद्यम्‌ ॥ भ्येबकेश खदा- 
चार जगदादिविधायक ॥ अध्य गहाण देवेश साम्ब सर्वार्थथायक | अध्यम्‌ ॥ त्रिपुरान्लक 
दीनातिनाश श्रीकण्ठ शाश्वत ॥ गृहाणाचमनीय च पविद्वोदुककल्पितम्‌ ॥ आचमनीयम्‌ ॥ 
धक्षीरमाज्य दधि मु सिलेत्यमतपथ्धकम्‌ ॥ मकाल्पितं मयोमेश गृहाणेद जगत्पते ॥ पंचामुतम्‌ ॥ 
गड़ग गोदावरी रेवा पयोष्णी यमुना तथा ॥ सरस्वत्यादितीथानि स्वानाथे मतिगहाताम्‌ ॥ 
खानम्‌ ॥ वस्ताणि पद्धकूलानि विचित्रांणि नवानि च॥ मयातनीतानि देवेश गहाण जगदीश्वर ॥ 
बख्म्‌ ॥ सोवण राजतं ताम्न कापोस वा तथेव च ॥ उपवीत मया दत्त प्रीत्यंथ प्रतिगह्मताम ॥ 
उपवीतम्‌ ॥ सर्वेश्वर जगद्वन्य दिव्यासनसमास्थित॥। मलयाचलसम्भूत चन्दन भतिगहताम्‌ ॥ 
गन्धम्‌ ॥ गन्धोपरि शुक्काक्षताव ॥ अक्षताश्र सुरश्रेष्ठ श॒ुश्रा घोताश्व निर्मेला॥मया निवेदिता 
भक्‍त्या गहाण परमेश्वर ॥ अक्षतान्‌ ॥ माल्यादीनि झुगन्धीनि० ॥ पुष्पाणि ॥ वनस्पाले० इत्ति 
धूपम्‌ ॥ आज्य च इति दीपम ॥ आपूर्पानि च पक्कानि मण्डकावटकाने च ॥पायस सू पम॒त्न॑ च 
नवेद पमतिशहतामानेवेद्यम॥मध्ये पानीयम॥करोद्रतेनम्‌ ॥ कृष्माण्ड मातुलिड्रं च नालिकेरफ- 
लानि चारम्याणि पावेतीकान्त सोमेश भतिगहाताम्‌ ॥ फलम्‌ ॥ पूगीफलम्‌० इति ताब्बूलम ॥ 





अथ पूजा-है भगवन्‌ ! शभो | हे गिरिजापते । है शव ! . 
दव देवश | हे शकर | | आपके छिये:। 
नमस्कार है, आप प्रसन्न हजिये। त्रिपुरका अन्त करनेवाले | 
एजचमको पहिने हुए महाह्मति चन्द्रचूडदेव श्रीसोमेश्वरका | 


आप आशय, 


आवाहन-करता हूं । इस मत्रस आवाहन करना चाहिये || 
बंधूकके समान .कान्तिवाले तीन -नेत्रधारी जिसके कि, 


रजिश्वर | हे इंदवर | है प्रिय | इशान |! म॒ आपको दिव्य 
आसन दुता हूँ । इस मत्रस आसन दे है परस भी पर 


ह्‌ महादेव | है महेशान | है इच्चर | सेरे दिय हुए पायको | 


उसा सहित ग्रहण करिय । इससे पाद्यका प्रतिपादन कर 


अध्यको भ्रहण कारिय । इस मंत्रस अघ देना चाहिये || है 
त्रिपुरान्तक | हे दीनोंके दुःख नाशक | हे श्रीकंठ ! हे 


करिये। इससे आचसनीय देनी चाहिये ।॥ क्षीर, आज्य; 
दृधि, मधु; शकरा इन पांचों अम्ृतोंस पेंचासत बनाया हें; 


# ५ ७» न 


है जगवक माहचिक | आप-इसे ग्रहण करिये । इससे पंचा- 





मृतका निवेदन करना चाहिये ।॥ गंगा, गोदावरी, रेवा, 
पयोष्णी, यमुना और सरस्वती आदि तीथांके पानी उप- 
स्थित हैं, स्नानके छिय अ्रहण करिये । इससे स्लान कराना 
चाहिये।॥ है जगदीशइवर ! में आपके छिय' अनोखे नये यह' 


| बख्र छाया हूँ, प्रहण करिये। इससे वस्ध निवदून करना 
| चाहिये सोना; चांदी, ताँबा ओर कपासका डउपवीत 
शिखरमें चन्द्रमा है ऐसे जिशूलठ घारण करनेवाले, सुन्दर | 
हासवाले, अत्यन्त स्वच्छ वराभय सुद्रासे युक्त रहनेवाले, | 
कपाल्धारी जो उमासहित सोमश्वर शझिंव हैँ उनका में ध्यान | 
करता हूँ यह ध्यान हैं ॥ है महाराज ! विश्वेश्वर ! हे | 


आपकी प्रसंन्नताके लिय छाया हूँ म्रहण करिये।| इसस उप- 
बीत देना चाहिये ॥ है सर्वश्वर | हे ससारक वन्द्नीय 

हे बड़े दिव्य आसनपर बेठनेवाले ! इस सलयागिरिके चन्द्‌- 
नको ग्रहण करिये | इससे चन्दून चढाना चाहिये; चन्दन 
लगाकर उसपर सफेद्‌ अक्षत छगाने चाहिये। है सुरभश्रष्ठ ! 
धोयेहुए निर्मठ सफद अक्षत हैं में मक्तिके साथ निवेद्न 
करता हूँ, आप ग्रहण करें। इस मंत्रसे अक्षत | * साल्या- 


॥ | दीनि सुंगनन्‍्धीनि ' इस मंत्रस पुष्प चढाना चाहिय। पूरा 
ज्यबकेश | सदाचार | हे जगत॒के आदि विधायक | हे: 
देवेश ! हे शव ! है प्रयोजनके सिद्धकरनेबाले ! अबासहिल | 


मंत्र और अ्थ पीछे छिख चुके हैं ॥| * वनस्पति रसोडूल 
इस मंत्रस धूप और आज्य च'! इससे दीप देना चाहिये। 
इनका अथ पहिछे ही लिख चुके हैं । सिद्ध किय हुए पूरे, 


| मांडे, बटक, चाबछू और दाढछ आदि नेंवेद्य भ्रहण करिये । 
शाश्वत ! पवित्र पानीसे तग्रार की हुईं आचमनीयको प्रहंण | 


इससे नेवेद्य, बीचमें पानी और करोद्वर्तन करे । पेठा, 


| बिजोरा, नारियछ आदि सुन्द्र फछ उपस्थित हूँ, हे पावे- 
| तीके प्यार सोमेश ! आप ग्रहण करिये | इससे फल निवेदन 
| करना चाहिये! इसके पीछे सुपारी ओर पान निवेदन 


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( ५८ ) 








दिर्ण्यगर्भ० इति दक्षिणाम्‌ ॥ अग्निज्योतीरविज्येतिज्योतिनोरायणो विश्ठः ॥ नीराजयाि 
देवेश पशदीपेः छुरेश्वरम्‌ ॥ नीराजनम॥हेतवे जगतामेव संसाराणवसेतवे .॥ प्रभव सर्वविद्यान 
शम्भवे गुवे नमः॥नमस्‍्कारः॥ यानि कानि च०हति प्रदक्षिणा: ॥ हर विश्वाखिलाधार निया 
धार निराश्रय ॥ पृष्पाजलि ग़हाणेश सोमेश्वर नमोस्तु ते ॥ 'पष्पाअलिम्‌ ॥ सुनिभतं खुबेंत 
तिशूलाकारमेव च ॥ मयापिंत तु तख्छम्भो बिल्वपत्र॑ ग्रहाण में ॥ बिल्वपत्रा पणम्‌॥ इति पजा॥ 
अथ रोटकत्रतकथा ॥ युविष्ठिर उबाच ॥ हृषीकेश मयाकार ब्र्तं दानमनेकधा | ओतुमिच्छामि- 
देवश व्रत सम्पत्तिदायकम्‌ ॥ १॥ येन ब्रतेन देवेश पुना राज्य लमामदे ॥ तथा व्रत तु मे 
ब्रहि यादवानां कृपाकर ॥ २।. श्रीमगवालुवाच ॥ वदामि शुभदं पार्थ लक्ष्मीबृद्धिमदायकम्‌ । 
धरमार्थेकाममोक्षाणां निदान॑ परम व्रतम्‌ ॥ ३ ॥ युधििष्ठिर उवाच ॥ केन चादों पुराचीर्ण मत 
केन प्रकाशितम्‌ ॥ विधिना केन कतंव्य॑ तत्सव ब्राहि केशव ॥ ४ ॥ श्रीभगवान्वाच ॥। आसीद 
सोम्यपुर राजा सोमो नामेति विश्वुतः ॥ क्षात्रधमें;तिकुशइलः प्जापालनतत्परः ॥ ५! 
तस्य राज्ये प्रजाः सौम्याः सर्वधर्मपरायणाः ॥ तस्थ राक्षस चामात्यः सोषपि सौम्यशुपह 
बह! ॥ ६॥ तस्मिन्सरस्तु सोम्य॑ चे सदा साम्याम्बुना प्छुतम्‌ ॥ अभूत्सोमेश्वरों देवो ढोकान 
पालनाय च ॥ ७ ॥ तत्राभवत्सोमशमों ब्राह्मणों वेद॒पांरगः॥ वेदाथविच्छास्त्रविद्व शुद्धाचारो 
तिहुलेमः॥ ८॥ तस्थ भायां शुभाचास पुरन्धी चारुभाषिणी ॥ भर्तशुश्रषणरत्ता कल्याणी 
प्रियवादिनी ॥ ५ ॥ सो$करोच्च कुटम्बाथ कणयज्ञ दिनेदिने । ॥ न लेमे चाधिक तेन घनधास्य॑ 
तथंव च॥ १० ॥ अतीव खेद्सिन्नस्ठ विचार्य च पुनः पुनश॥ाकि करोमि कक गच्छान समारयाँ- 
हैं महीतले ॥ ११॥ केन कर्मविपाकेन इंदश लब््यते फलम्‌ ॥ अथवार्थकरं धर्म देवपूजा- 
दिके शुभम्‌ ॥ १२॥ स॒ सोमेशे5करोद्धक्तिं देन्यनाशाय पार्थिव ॥ कदाचिदातिखिन्नः सर 


विलल जलन पचराा मत गा भा आ आता जा 4 पा उककरुअ जा कसम सनक अिनलल कल न्‍ 0 0:9५ भू > के, >ु 
करना चाहिये। * ओम हिरण्यगर्भः समवतताभे भूतध्य हू, जो झुभका दनवाछा, रक्ष्मीकी वृद्धि करनवाछा एवम 


कै 
| 





जातः पतिरेक आसीतू । सदा घार पृथ्रिवीं द्यामुतेमां करे 
राय हविषा विधय ॥ संत्राथं-सबसे पहिढे प्रणिमात्रका 
पति हिरण्यगर्भ हुआ उसीतत जमीन आसभानको धारण 
किया, हम उसी प्रजापतिके लिये करते हैं ! इस ते दृक्षिणा 
देनी चाहियें।| अप्रि रवि और विश्वु नारायण ये तीनों 
ब्योति हैं । में इन पंच दीपोंसे सुरेंश्वर देवेशको नी पजन 
करता हूँ । इससे नीराजित, करना चाहिये ॥ जगतके हेतु 
एवम्‌ सेसारसमुद्रके सेतु लथा सब विद्याओंके प्रभव, गुरु 
बभुके लिये नमस्कार है, इस मंत्र नमस्कार ॥ “ याति 
के च | इससे प्रदक्षिण। करनी चाहिय।। इसका अगे 


पहिढ ही लिख चुके हैं ।हे हर | हे अखिक विश्यके 
आधार ! और स्वय निराधार निराश्रय ईंश सोमेश्वर ! 


पुष्यांत्र्ि प्रदणकर, तेरे छिये समस्कार है। इस मंन्त्रस 
पुष्णंजली निवेद्न करना चाहिये॥ सुबवणसे भी भांति 
हे त्रिशूछकेस आकारवाढा यह सेख बिल्वपत्र 
; कस ; इसे भ्रहण करिये; इप्त मंत्रस बेलपत्र चढावा 
: ७. 34 ॥ अथ कथा-औयुधिष्ठिर बोले हे हषी 

अ आ-अुधिष्ठिर बोले कि, हे हवीरेश | 


| अनेक तरहके ब्त अ ये हैं लेलेशा । अब 
र दान किये हें देवेश | मे आपसे 


। 2७५ सनेनो ऋएहता है जो संपत्ति देखे 
दे देवेश ! जिस ब्रते कर तर्पात्ति देनेबाछा हो ॥१॥ 


पा मुझ फिर राज्य मिछ ज 
“* वादतकि कृपाकर | उस झे कहिये. कर 
#भसव्रान्‌ बोल कि, है पाये ! मैं आपको एक ब्रत ह्र्ता 


धम्र, अथे; काम्म भौ 
प्टिर बोढे कि; पहिल्े इप्त ब्रतको किसने किया था, कौन 
उस अकाशम छाया था, एवम्‌ किसतरह इसे करना चाहिये, 
5 केशव ; सब कुछ मुझ कहिये ॥ ४ ॥ श्रीमगवान्‌ बोहे 
कि-पहिडि उक बडा अच्छा सोमनामका राजा था; वो 
शात्र धमस कुशछ था प्रजा पालनमें तत्पर था ॥५) उसके 
राज्यम उसको प्रजा घममं परायण तथा सज्जन थी, उस 


हे; 


राजाक जो 
तर थ ॥६॥ उसके नगरमें एक सुन्दर सरोवर था जिसमें 


र मोक्षका परम कारण हैं ॥३॥ युधि' 


मत्रीछोग थे वे भी सौम्य थे और सुख देने 


पडा स्वच्छ पानी रहा करता था, वहां छोकोंके पालनके - 


लिये सोभेश्वर शिव विराजा करते थे ॥७॥ वहां एक वेद- 
वेदान्तोंका जाननेवाढा, सककछ शास्त्रोंका वेत्ता अत्यन्त 
सदाचारी वैसा कि कहीं हूँढनेसे भो न मिल सके, ऐसा 
एक सोम्तशर्मा न्ामका ज्राह्मण रहता था। उसकी खत 
अल्न्त सदाचारिणी,मिष्ठ 


ओर प्रियरभ/बिणी परमसुन्दरी 


पतिकी सेवा करनव्रालो और कल्याणी थी॥ ९ ॥ उस : 


आह्यणके पास अधिक घन 


धान्‍्य तो था नहीं, इस कारण . 


“लह कुठुम्बक कण यज्ञ किया करता था ॥|१०ॉ एक, 


हक 


दिन अत्यन्त खिन्न होकर विचारने रूगा कि मेँ क्‍या कर! 


॥ 8 हक ५  । ््‌ ३ 
जे समत कहाँ चढा जाऊँ ॥ ११ | कौनसे केगे 


मुझ ऐसा फछ 'म्रिलें अथवा 
पं मकर धर्म है॥| १९ ॥ हे पाधिव | वो कंगा- 


_देबपूजादिक ही शुभ 


के 
+ 
+ 
श 
बे 







भाषाटीकासमेतः । 


46022: 807 आर क्-8/+ते उग्र ८१४ आण 4:27: 8] ॥# कट! 7:7/07%:7: 24776 :%008 87%: | 





4/0ब4:7 पाए 22 कताखाकाजा ५ "कद पाक 7 फइफ््यलफए पटचा: जलवा । जप्यधलपलप 


20220: 20. 5 





॥ ०-2 2३ पर कर का 6 पक :0 74८7: /प४:-५०५०/+६-०:४/:३९६ ४ हित क2ब 7 च 
जव्लनकलननालपकनीन परम रमकपर 54“ 


स जगाम सरोवरम ।! १३ ॥ अभूत्सोमेशः पत्यक्षस्तस्मिन्सोम्यसरोवरे 

कपया परया थुतः ॥ १४ ॥ तेनासों हुःखितों दृष्टः सोमशर्मा द्विजोत्तमः ॥ य्‌ 

दुःख त्वया विद्यावरेण च॥ १५ ॥ सोमशमॉबाच ॥ 'कैंचिद्त नास्ति पूल तदर्थभीदशी 
दशा! ।। तस्य तद॒चन श्रत्वा ब्राह्मणस्त्विदमबबीत्‌ ॥ १६॥ मो भो विभवरश्रेष्ठ ब्रतमेक 
वदामि ते ॥ श्रीमगवाल॒वाच ॥ तेनादिएं व्रत॑ चेदं पूणसंपत्तिदायकरम्‌ !! १७ ॥ सोमशरमोवाच!। 
भो भो बाह्मणशादल व्तं तद॒द मे प्भो ॥ यस्थालुष्ठानमात्रेण लक्ष्मीवद्धि! मजायते॥ १८ ॥। 
कस्मिन्मासे च कतेव्यं किं दानं कस्य मोजनम्‌ ॥ धनलछाभाय कतंव्यं कस्य देवस्यथ प्जनम्‌ 
। १९ ॥ केस्तु पुष्पेः प्रकतव्या पूजा चारुतरा शुभा | नेवेद्य कीदशं देयमध्य केस्त फले- 
भ॑वेत्‌ ॥ २० ॥ यदि तुष्ठोप्नस विभ्रेन्द्र तत्सव ब्रहि में मन्नो ॥ ब्राह्मण उवाच ॥ साधु त्वया विभ 
पृष्ठ ब्रतमद्धिभदायकम्‌ ॥ २१ ॥ विधान तस्य वक्ष्यामि सर्वर्सिद्धमदायकम्‌ ॥ श्रावणे च 'सेंते 
पक्षे प्रथमें सोमवासरे ॥२२५॥प्रकतेव्य॑ ब्तं विप् शुभ नियमशवेकम्‌ । साउ्टमासच्रयं विप्त क॒तंस्ये 
विधिपूर्वकम्‌ ।। २१।। बिल्वपत्ररेखण्डेश्व पूजनं च दिनेदिने | पश्वसत्तत्रैमिश्वेव पूजन विधि- 
पूवेकम्‌ ॥ २४॥ परिपूर्ण तु कतंव्यं चतुर्दश्यां ल॒ कार्तिकाब्रतारम्भे तु कतंव्यो नियमस्ठ विच- 
क्षणेः ॥ २॥ अद्यारथ्य ब्रतं देव रोटकारूय मनोहरम्‌ ॥ करोमि परया भव्त्या पाहि मां जगतां 
- शुरो ॥ २६॥ दिनेदिन प्रकतेव्या पूजा देवस्य शूलिनः । कथा बिना न भोक्तव्य॑ मत्यहं च पुनः 
पुनः ॥ २७॥ उपोषण चतुदरेयां कर्तव्यं विधिपूर्वकम्‌ ॥ छझुचिहुत्वा दिने तस्म्गि कतेव्य॑ 
रोटकब्रतम्‌॥ २८ ॥ अथ उपोषणम्रार्थनामन्न्रः--चतुर्दश्यां निराहारः स्थित्वा चेब परेडहानि ॥ 
भोक्ष्यामि पावतीनाथ सवघिद्धिभदायक ॥ २९ । कृत्वा माध्याद्िकं च्म्मं स्थापयेदत्रणं घटम ॥ 
पश्वरत्नसमाथुक्त पवित्रोदकपूरितम्‌ ॥ ३० ॥ सर्वोषधिसमाथुक्त॑ पृष्पादिभिरलइकृतम्‌ ॥ वेडित 
वेतवस्त्रेण सर्वाभरणभूषितम्‌ ॥ ३१ ॥ तस्योपरिन्यसेत्पात्र ताम्न चेवाथ वेणवम्‌ ॥विरच्याष्टद्ले 





लीके नाश करनेके छिय सोमेशमें भक्ति करनेलगा, कभी 
अत्यन्त खिन्न होकर सरोवर पर पहुंचा ॥१३॥ है सोस्य ! 
उस सुन्दर सरोवरपर परमकइपासे युक्त श्री सोमेश्वर भग- 
वान्‌ वृद्ध ब्राह्मणके रूपसे दसे ग्रत्यक्ष हुए । १४ ॥ उन्होंने 
वो उत्तम ब्राह्मण सोमशर्म्माकों अत्यन्त दुःखी देख बोले 
कि, आप इतने बडे विद्यावान्‌ होकर क्यों दुखी हो रहे हैं 
|| १५ ॥ सोमशर्मा बोला कि; मैंने पहिले कुछ दान नहीं 
किया था इस कारण मेरी यह दशा हो रही है। सोमश- 
म्मके वचन सुनकर वो बृद्ध ब्राह्मण बोछा कि १६॥ 
हे श्रेष्ठ विप्रवर | में तुम्हें एक ,त्तकहता हूं, उस ब्रतकों 
कर छोगे तो सब सम्पत्तियाँ मिल जायंगी ॥१९॥ सोम- 
शर्मा बोढा कि, है श्रष्ठ विप्रवय्य |! आप उस बतको मुझे 
कहिये | जिसके अनुष्लान मात्रस लक्ष्मीकी वृद्धि हो जाय 
॥१८॥ कौनसे महीनमें ब्रत करना चाहिये, क्या दान देना 
चाहिए, किस भोजन करना, धनके लछाभके ढछिये कोनसे 
पूजन करना चाहिये ॥ १९ ॥ वो शुभ सुन्द्र पूजा किसके 
फूलों ते की जाय, नेबेद्य और अध्य केसा दिया जाय तथा 
कौनसे फछ काममें आये || २० ॥ हू “विप्रेन्द्र | यदि आप 
प्रसन्न हैं तो प्रभो | सब कहिये, यह सुन ब्राह्मण कहने छगा 
कि, हें ब्राह्मण ! तुमने ऋद्धि देनवाले ब्तकों अच्छा पूछा 
॥ २१॥ में सवे सिद्धि दायक जब्त विधान कहता हूँ, 


श्रावण शुक्ठ पक्षमं जिस दिन प्रथम सोमवार हो ।॥ २३२ ॥| 
हे ब्राह्मण | उस दिन इस शुभ ब्तको नियम पूर्वक करना 
चाहिये, यह ब्रत विधिपूवक साढ़े तीन महीने होता है 
॥२३॥| अखण्ड पांच तीन व सात बिल्वपत्नोंसे हर रोज 
विधिपूवक पूजन करना चाहिय ॥ २४ । कातिककी शुद्ध 
चतुदंशीके दिन ब्रतकी पूर्ति करना चाहिये। बुद्धिमानोंको 
चाहिये कि; ब्रतके आरंभमें नियम कर हे ॥२५। हे देव ! 
आजसे लेकर रोटकनामके मनोहर ब्रतको परम अक्तिक 
साथ करता हैँ, सब प्राणिमात्रके गुरो! मेरी रक्षा करिये 
॥ २६ | प्रत्येक दिन शिवका पूजन करना चाहिये, कभी 
भी बिना कथा सुने भोजन न करना चाहिये ॥ २७ ॥ 
चतुदंशीको विधिपूवंक उपोषण करना चाहिये, उस दिन 
पवित्र होकर रोटक ब्रत करना चाहिये ॥२८॥ अथ डपो- 
पणकी प्रार्थनाके मन्त्र-हे सब सिद्धियोंके देने हारे पावती- 
नाथ ! चतुद्शीको' निराहार रहकर दूसरे दिन सोजन 
करूंगा ॥| २९ || मध्याह काछके सब कृत्य कश्के एक 
सावित घट स्थापन करना चाहिये, वो पेचरत्नोंस युक्तहो 
तथा पवित्र पानीसे भरा हुआ हो ॥| ३० ॥ वो सब औष- 
घियोंसे युक्त हो बथा फूलोंसे अलुकृत हो, श्वेत वखसे 
वेष्टित हो तथा सव आभूषणोंसें भूषित हो ॥॥ ३१ ॥ उस 
कलशके ऊूपर तांवेका अथवा बणुका पान्न हो रहां अष्ठ॒दृद् 


(६० ) ब्रतराज:। .: | प्रतिपदु- 









का ० कक: श् पट 20 चकित 24:70 000 75:00 ९८४2 बट उप हि 
माह पर 0 27/00/४067 40707776: 0 02072(6 ९2:22. 0 2022%440 ५:32: 8४29 
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तत्र पजयेदुमया शिवम्‌ ॥ ३२२ ॥ कृत्वा ल पा जे कर्म नित्यपूजादिव्द तथा ॥ तथयां रफ़े े 
त॒ कतंव्या पजा देवस्थ शझूलिनः ॥ ३२२॥ शुभे चंव भदेशे तु कतव्य। उष्दलण्डर ॥ पूज्यस्ता: 
शिवो देवो धर्मकामाथसिद्धये ॥ २४॥ क्षीरादिल्लापन कु्योचचन्दनादि वि लेपनम्‌ ॥ कृष्णागुर- 
सकपेरमगनाभिविभिश्रितम्‌ ॥ २५ ॥ पृष्पेनोनाविधे र्म्येः पूज्यों देवों महेश्वरः॥ धनकामो 
कर्तव्या पूजा देवस्य झूलिनः ॥ ३६॥ बिल्वपत्ररखण्डेश्व तुलसीपत्रकेस्तथा ॥| नीलोत्पलेश्राए- 
तरेः कतेव्या पुण्यवर्धिनी ॥ २७ ॥ कर्द्ारकमलेश्रेव कुसुदेश्ातिशोभनेः ॥ चम्परकमालतीपुषषे 
मुचुकुन्देः शुभावहेः ॥ ३८ ॥ मन्दारेश्वाकपुष्पश्च पञजाहिश्व शिव भ्रियः ॥ अन्यनानाविधेः पुष्प 
ऋतुकालोद्धवेस्तथा ॥ ३९॥ धूषनानाविषेः पाथ पृण्थवर्धनसाधकेः ॥। दीपास्तत्र प्रकतव्य 
बृतपूणां मनोरम£ ॥४०॥ लेहोः पेयस्तथा भोज्येः स्वादुभिश्व शिवप्रियेश।अन्येना नाविधे रम्ये- 
रूपचारवरंस्ततः ॥४१॥ नेवेद्य तःप्रकृबीत रोटकानां विशेषतः ॥ करतंव्या रोटकाः पद्च पुरुषा- 
हारमानतः ॥ ४२॥ शालितण्डुरूपिष्टन समभागेन वा पुनः ॥ द्वो त॒ विभाय दातव्यों द्वाभ्यां दे 
भोजन शुभम्‌ ।४३॥ एको देवाय दातव्यो नेबेद्याथ सदा बुधेः । महेशाय च दातव्यं तामूह 
खुमनोहरम्‌ ॥४४॥ अध्यंदानं प्रकतव्यं धनसंपत्तिदायकम्‌ ॥ जम्बीरं॑ नालिकेरं च ऋछुई हि 
बीजपूरकम्‌ ॥४५।॥ खज़ुंरी च्‌ शुन्ना दाक्षा मात॒लिडू मनोहरम्‌ ॥ अक्षोडानि नच दाडिम्बं नाएि 
ड्राणि शुभानि च ॥४३॥ ककेटी च शुभा प्रोक्ता अध्यदाने मनोहरा । अन्येनांनाबिणेः पाई 
॥ $ कै] 
ऋत॒कालोड्बः श॒भेः ॥४७॥ यः करोत्यध्येदानं च तस्य पुण्यं॑ वदाम्यहम्‌ | इलाँ च सागो- 
युरक्तां ५ किक 
युक्तां रत्नेश्वान्यमनोहरेः ॥४८॥ द्र्वा यत्फलमाप्रोति तेन तत्फलमाप्लुयात्‌ ॥ अनेनेब विधा- 
नन तत्काये ब्रतमुत्तमम्‌ ॥४९॥ पश्चचष त॒ क्तव्यमत्॒ल घनमीप्सुन्निः ॥ पश्चाइद्यापन॑ कुर्यो 
द्रोटकाख्यब्रतस्य च ॥५०॥ उद्यापने तु कर्तव्यों हेमरूप्यों तु रोटकौं॥ बिह्बपत्न सुवर्णश 
सोमेशभीतये शुभम्‌ ॥५१॥ रात्रौ जागरण क्ुर्यात्पृज्यों देवों महेम्वरः ॥ पूर्णन 'विधिन 
विम्त कतंव्य॑ च शिवप्रियम्‌ ॥५श। दारिद्रचनाशन पुण्य “अल मयम ५९ दारिद्रचनाशन पुण्य लक्ष्मीबद्धिमदायकम्‌ ॥ कर्तव्यं विधि 
कमलको बनाकर पावती सहित शिवजीका पूजन करना | और गेहँका आटा बराबर हो, दो लो आ्रह्मणको देंदे तथ 
33 38 । पा] (2 क तथा नित्यपूजा | दोका अपना भोजन हों ॥४३॥ समझदारको चाहिए कि. 
धर जगत शिवकी पूजा करें ॥ ३३॥ | सदा एक रोट देवके लिये, मैवेयमें देंदे फिर शिवके हिए. 
न्द्र जगहसें पुष्प भडप करना चा हिये | वहां धमं; काम सुन्दर ताम्बूल दे ॥४४॥ पीछे घनसंपत्ति देनेवाढा अब 
ओर अरथंकी सिद्धिके ढिये शिवका पूजन करना चाहिये | हिये। जा गीजपूस 
॥३४॥ क्षीरादिस स्लांन कराकर चन्दनादिका छेप करना | गे री 4 तक अं +४ नारियल) ऋसुक, ब॑ पनोह |; 
'चाहिये, उसमें कृष्ण अगर कपूर और कर्तूरी मिली रहनी | | अखरोट) खजूर अच्छी द्वाक्षाएं -और मनोहर, 
चाहिये ॥ ३५ ॥ तथा अनेक तरहके फूछोंस धनकी काम- | मातुछिज्ञ, अनार और सुन्दर नारंगियां ।।४६॥ तथा सुंदर 
नावालेको पूजा करनी चाहिये ॥ ३६ ।। अखण्ड विल्वपत्र | ककेटीभी अध्यदानमें अच्छी कहीं हे और भी अनेक तर 
तथा तुढसीदलोंसे तश नीले कमतोंसे की हुई पूजा | * ऋतुकालके सुन्दर फढोंस ॥४७॥ जो अधे दान कसा 
_नन्त पुण्य बढ़ाती है ॥॥ ३७) कर्हार, कम्तछ एवम्‌ | हैं मे उसके पुण्यकों कहता है ॥॥ ४८ ।। जो ससागररल' 
पे सुन्दर झुमुद और शुभावह , पंपक, चमेली और | गर्भा-मूमिको दकर जिस फलछको पाता है वही उससे 
हज फूलोंस ॥ ३८॥ मन्दारके: पुष्प तथा शिवजी | पाजाता है। इसी विधानसे इस उत्तम ब्रतको करा, 
० रं आकके फूलोंस तथा ऋतुकालके अनेक तरहक | चाहिय ॥४९॥ अतुछ घन चाहनेबाढेको यह व्रत पांचवर्ष 
जो पल है चाहिये | ३९ || पुण्य बढानेके | करना चाहिये, पीछे इस रोटकबतका उद्यापन करे ॥५० 
चाहिये तथा घीसे हक कह) ः 20५) लाना | उयापनमें एक रोट सोनेका और एक चांदीका बनाना 
|। ४५ ॥| शिवजीके तय जाया पेय ञ हब भी तथा सोमेशकी प्रसन्नताके लिये सोनेंका बिल्वपतर 
नेक तह ७ ये जेल) पेय. और भोष्यों | भी होना चाहिये।।५१॥ रातपें २ै.इसमें देव मर : 
छुन्दर अन्य उपचारोंस ॥४९॥ | हिये।।५१॥ रातमें जागरण करे,इसमें देव मह 


तथा अनक तरहके | श्वर पूज्य हैं,हे आह्मण ! पूरी विधि कि 

नतेद्य करना चाहि: रके तो रोटोंकाही नैये । हद | वेधिक साथ यह 'शि ' 
हो | पुरुषके बहार ०33: का कट ॉमेंचा नेवेद्य | प्यारात्रत करना चाहिये .५२। यह: दारिद्रथका नाशक है 
5: “7 गंध) इन रोटॉमेंचाबल | छक्ष्मीकी वृद्धिका करनेवाराओ भक्तिके साथकरना चाहिये, 









गन 
52754: 28 कर सकवव का 7 7:20: 06047 077 २४ /#2॥00 ली 47४९7): 742] 





द्धा$वत्या ओतव्यं तु कथानकम्‌ ॥५शेी गीतवाद्यादिसहित कु्योज्ञागरणं निशि |) ततः भभातें 
बेमले स्नात्वा पूर्जां समापयेत ।।५४॥ प्‌वाक्तेंविधिना तेन कतंस्य शिवपूजनम्‌ | सरसवे दापये- 
घ्त्या ब्राह्मगाय कुटुम्बिने ॥५५।॥ विपाय देदविदुषे दल्थालंकारभोजने!॥ सप्तल्नी्क शुर्रु 
ज्य ततो भकत्या क्षमापयेत्‌ ॥५६॥ यकल्‍्मयूनं कृतसंकल्पे ब्तेपस्मिन्‌ ब्राह्मण प्रभो॥ तत्सवे 
'णेताँ यातु युष्महाष्टिविलोकनात ॥ ५७ ॥ एवं य। कुरूते पार्थ शाख्रोक्तं रोट्कब्रतम ॥ अना- 
(सेन सिद्धचन्ति हक्याः सर्वे मनोरथा: । ५७ ॥ समदंका महानारी क्रोति विधिवद्गतम्‌॥ 
तिप्रता सा कल्याणी जायते नात्र संशयः ॥ ५९॥ इति शिवपुराणे रोव्कब्रतकथा ॥ 

दौद्ित्रपतिपत्‌ ॥ अथाखिनशुक्कप्नतिपदि दोहित्रेण मातामहश्रार्ध कार्यम ॥ तदुक्त हेमाद्रो-जात 
।त्रोएपि दोहित्रों जीवत्यंपि च मात॒ले ॥ कुर्पान्मातामहश्राद्ध प्रतिपद्याशिने सिते॥ इये च 
(ड्रवव्यापिनी ग्राह्मेति निर्णयदीपे उक्तम्‌ ॥ प्रतिपद्याथिने शुक्के दौहित्रस्त्वेकपावंणम्‌ ॥ श्राद्ध 
तामहं कुर्यात्‌ सपिता सड़वे साते ॥ जातमात्रोषि . दोहित्रो जीवत्यपि हि मातुले॥ प्रातः 
ड्रिवयोम॑ध्ये याउश्वयुक्प्रतिपद्धधेत्‌ ॥ अब सविता इति विशेषणाज्जीवत्पित्‌क ए्वाधिकारी 
पेण्डरहित॑ कुर्यात्‌ ॥ झुण्डन॑ पिण्डदानं च भेतकर्म च सर्वशः॥ न जीवत्पित॒कः रुर्यादरणविणी- 
(तिरेव च॥इति पिण्डनिषधात्‌ ॥ अच्रेव नवरात्रारम्भ। ॥तत्र परविद्धा श्राह्मा ॥ तदुत्त गोविन्दार्णवे 
ग्कंण्डेयदेवीपुराणयोः-प्॒वेविद्धा ठे या शुक्रा भरवेत्मतिपदाशिनी ॥ नवराज़तब्रतं तस्यां न 
हरये झशुभमिच्छता ॥ देशभड़ो भवेत्तत्र इलिक्ष चोपजायते॥ ननन्‍ंदायां दर्शायुक्तायां यत्र स्या- 
मम पूजनम्‌॥ तथा देवीपुराणे-न दशेकलया थुक्ता प्रतिपश्चाट्रिडकाचेने ॥ उदये द्विसुहृतोपि 
गह्या सोदयकारिणी॥ यदा पूर्वदिने संपर्णा शुद्धा भूत्वा परदिन वर्धते च तदा संपुणत्वादमा- 
ग़ेगाभावाच्च पूर्वेव ॥ यानि तु द्वितीयायोगनिषधपराणि वचनानि श्रुतानि तानि शुद्धाधिक- 


वुनने चाहिये ॥५१॥ जागरण गाने बजानेके साथ होंना 
रहिये, पीछे ग्रातःकारू स्नान करके पून्ाकी समाप्रि 
_रना चाहिये।॥ ५४ || पहिछे कहे हुए विधानसे शिव 
[जन करनी चाहिये, जो भी कुछ पूजनका सामान हो वह 
तब कुटस्वी त्राक्मणके लिये भक्तिपूवंक दिवा दे ।५०॥ वो 
प्रदुका जाननेंवाढा होना चाहिये, पीछे बस, अरंकार 
ओर भोजनसे सपत्नीक गुरुंका पूजन करके पीछे भक्तिक 
ताथ क्षमापन करना चाहिये ॥५६॥ ह ब्राह्मण | प्रभु ! इस 
तेकतिपत ब्रतमें जो भी कुछ नून्यता हुईं हो वो सब 
आपकी कृपा दृष्टिसे पूरी हो जाय ॥ ५७ ॥ हे पाथ ! जो 
गा्बोक्त रोटक ब्रत कस्ता है उसके चाहे हुए सब मनोरथ 
अनायास ही सफर होजाते हैं ।| ५८ ॥ जो सुहागिन स्त्री 
इसको विधिके साथ करती हैं वो कल्याणी पतित्रता बन- 
जाती है। इसमें सन्देह नहीं है ।।५९॥ यह शिवपुराणकी 
कही हुईं रॉटक ब्रत कथा पूरी हुईं ॥ अथ आश्विन्र शुद्ध प्रति- 

दाकों मातामहका श्राद्ध दोहित्रको करना चाहिये। यह 
इमाद्रिमं कहा हे कि; जन्म लेतेही दौहित्रको उचित है कि 


मामाके जिन्दें रहते हुए भी आश्रविन शुक्वा प्रतिपदाकों 


नानाका श्राद्ध करें । यह प्रतिपदा संगव काछुतक रहनेवाली 
ढेनी चाहिये; यह निणय दीपमें कहा है कि पिताके जि*दे 


रहते हुए दोहित्रको चाहिये; कि आश्विन शुद्ध प्रेतिपदाके 


संगव कालमें मतामहका आद करे । जातमात्र भी दोहिंत्र 


९ प्रातस्ततस्सज्ववनामधेयमध्याहमस्मात्परतो5पराहमू । सायाहमन्ते च भणन्ति भव्या व्यासानुसाराज्ज्वल्नेमुहूते: ॥| 





मामाके जीवित रहते हुए भी प्रात.काल और संगवर्क मध्यमें 
जो आश्रविनकी प्रतिपदा हो तो अबश्य श्राद्ध करे। यहां 
दौहित्रका जो “ सपिता ” यह विशषण किया हे; इससे 
पिताके जिन्दे रहते ही अधिकारी हैँ। आाद्धभी पिण्ड रहित 
करना चाहिये. क्‍यों कि, जिसका बाप जिन्दा हो; उसे 
मुण्डन, पिण्डदान और प्रेतकर्म न करना चाहिये न गर्सिणी 
सत्रीके पतिको ही ये काम करने चाहियें॥ इसमेही नवरात्रका 
आरंभ होता हे-इसमें ट्वितीयासविद्धा प्रतिपदालेनी चाहिये 
यही गोविंदाणवसे देवीपुराण और माकंण्डेय पुराणकेव चन्त 
कहे हैं कि पू्वंस विद्धा जो आश्विन प्रतिपदा हो तो, शुभ 
चाहनेबालेको उसमें नवरात्रका प्रारंभन करना चाहियेऐसा 
क्रनेस वहां देश भगभी होता हैं तथा अकाल पडता है, जो 
दर्शायुक्त नन्‍्दामें मेरा पूजन होयतो । ऐसे ही देवी पुराणमें 
भी लिखा है कि, जिस प्रतिपदामें अमावसकी एक कला भी 
मिलींगई हो वो चंडिकाके पूजनमें उपयुक्त नहीं हे।परा 


' उदय कालरूमें दो घडी भी प्रतिपदा हो तो वह उदय करने- 


वाली हैं उसमें दुर्गा पूजन करना चाहिये । जब प्रतिपद पूर्व 
दिनमें संपूर्ण शुद्ध होकर हवितीयामें बढती हो तो उस समय 
संपूर्ण होनिक कारण तथाअमावास्याका योग न होनेकेकारण 
पूबाही करनी चाहिये ।जो तो द्वितीयाके योगमें निषेध कर- 
नेवाले वाक्य सुनेगये हैं, व शुद्धस अधिकके विषयमें निषेध" 
पर है।पर दिन प्रतिपद्‌ न हो तो अमा युक्तका भी महण- कर 








( .। ब्‌ ) 
४७७७ माय 233 य  ज 33न जनम मिननन-निनन नितिन भितिनीतिनीन नियम नल नली नल धिनना न टधण ८270 06-45 क “22223 
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निवेधपराण्येव ॥ परदिने मतिपद्सत्वे ठ अमायुक्तापि ग्राह्य ॥ तदाह लल्ठः-तिथिः शी 
तिथिरेव कारण तिथिः प्रमाणं तिथिरेव साधनम्‌॥ इति ॥ यानि त्वमायुक्ता आल न्सिहः 
प्रसादोदाहतवचनानि तान्यप्येतद्विषयाण्येव ॥ अच देवीपूजा भ्धानम्‌ ॥ उपवासादि त्वड़म। 
अष्टम्यां च नवम्यां च जगन्मातरमम्बिकाम॥पूजयित्वाखिने मासि विशोकों जायते नरः॥ हर 
हेमादरो भाविष्ये तस्था एव फलसम्बन्धाद | चित्रावेश्ञतियोगनिषेधो देवीपुराणे- चित्रावेधति 
युक्ता चेत प्रतिपच्चण्डिकाचने ॥ तयोरन्ते विधातव्य॑ कलशस्थापन गृह ॥ दाति ॥ यदा त के; 
तव्यादिरहिता अतिपन्न लब्यते तदोक्ते कात्यायनेन- -मतिपद्याश्िने _मासि भरवेद्रधवतिचित्रयोः | 
आद्यपादो परित्यज्य प्रारमेन्नवरात्कम्‌ ॥ इति ॥ रुह्॒यामले--संपूर्णा भातिपदेव ०७५4५ यद्‌ 
भवेत्‌ ॥ वेधवत्या वापि युक्ता स्यात्तदा मध्यन्दिने र्वो ॥ भविष्येडपि--चित्रा वेधातिसंपूर्णा प्रति 
पच्चेद्धवेस्तूप ॥ त्याज्या अंशाखयस्त्वाद्यास्त॒रीयांशे तु पूजनम्‌ ॥ इद्‌ च रात्रो न कार्यम्‌ ॥+ 
रात्रो स्थापनं कार्य न च कुम्भामिषिचनम्‌॥ इति मात्स्योक्ते!॥ भास्करोदयमारभ्य यावस दश 
नाडिकाः ॥ प्रातःकाल इति प्रोक्तः स्थापनारोपणादिषु ।| आद्याः षोडशनाडीस्तु त्यक्त्वाय:, 
कुछते नर:॥ कलशस्थापन तत्र हारिष्टं जायते भुवम्‌॥ अब्र नवरात्रशब्दो नवाहोरात्रपरः॥ - 
बृद्धों समातिरष्टम्यां ह्ासेइमामतिपन्निशि ॥ भारम्भो नवचण्ड्यास्त नवरात्रमतोः्थवत्‌ ॥। इति 
वचनादिति केचित्‌। वस्त॒तस्त तिथिवाच्येवायम्‌ ॥ तदुक्तम-तिथिब्॒द्धों तिथिहासे नवराप 
मपाथेकम्‌ ॥ अष्टराते न दोषो5यं नवरात्रतिथिक्षये ॥ इति ॥ 
की अथ घटस्थापनविधि$ ॥ 
भातिषदि मातरभ्यड्रं कृत्वा देशकालौ संकीत्य ममेह जन्मनि ढुर्गाप्रीतिद्वारा स्वोपच्छात्ति 
पूवकदीधोयुर्विपुलधनपुत्रपौत्राग्विच्छिन्न सन्ततिवृद्धित्थिरल मोकीतिलाभशहुपराजयसदभीए- 
सिद्धयथ शारदनवरात्रे प्रतिपदि बिंहितं कलशस्थापन हुर्गापूजां कमारीपूजादि करिष्ये । 3 शारवनवरातरे मतिपादे बिंहित कलशास्थापन दुगगापूजा कुमारीपजादि करिष्पे। ही 


लेना | यही छल्ल कहते हैं कि-तिथि ही शरीर है, तिथि 





स्थापन औरर घटामिषचन न करना चाहिये। सूर्योदय 


कारण हे और तिथि ही प्रमाण है । जो नरसिंह प्रसादमे 
वचन उद्धृत किये हैं कि अमायुक्ता करनी चाहिये वे भी पर 
दिन प्रतिपदू न हो तो अमायुक्तमं ही करो; इस विषयके ही 
है। इससे देवी पूजन प्रधान है, उपवास आदिक उसके अग 
हैं । क्यों कि, हेमाद्रिसि भविष्यका बचन है कि, आश्रिन 
मासमे अष्टमी और नवसीके दिन जगन्मातर अग्बिकाका 

पूजन करके भनुष्य शोक रहित होजाता है इसमें विशोक 

आदि फछोंका पूजाके साथ ही संबन्ध दिखाया है। देवी 

उराणमें चित्रा और वेधृति योगका निषेध किया है कि, हे 

शह ४ चैडिकाके पूजनकी प्रतिपदू चित्रा और वैधृतिसे युक्त 
. हो तो उनके समाप्त होनेपरही कलश स्थापन करना चाहिय 
जो बधृत्यादि रहित प्रतिपदा न भिले तो कात्यायनने कहा 

प्वाघको छोडकर लवरात्रका आरंभ करना चाहियेरुद्रयाम 
उम भी छिखा है कि,जबसंपूर्ण प्रतिपदाही चित्रासे युक्त हो 
या वेधृतिसे युक्तहो तो मध्याह कारें पूजनकरना चाहिये। 
भवि:्य पुराणम भी कहाहे कि,चित्रा औरबेधृतिमें हीसारी 
प्रविपदा हो तो पहिछ तीन अशोको छोडकर, चौथे अंशर्मे 
पजनादिक करना चाहिये। पर रातकों यहनकरता चाहिये। 
बाकि, मत पुराणमें डिखा हुआ है कि, रास्मे दृवीका 


है कि, झाश्चिन मासमें वैधृति और चित्रा प्तिपद्‌ हो तो हो 


लेकर दश नाडी तक प्रातःकाल कहाहे उसमें स्थापन और 
आरोपण आदि करने चाहिये। यू्यांद्यस ढेकर जो सोह 
नाडियोंको छोड़कर कलश स्थापनकरता है उसमें निम्नय 
हीअरिष्ट पेदा होता है। यहां नवरात्र शब्द नौ भहोरात्रवो 
कहता है। यदि कोई तिथि बढजाय तो अष्टमीको ससाती 
करनी चाहिये यदि घट जाय तो अमावस्याकी रातको ही. 
प्रति4द्‌ मानी चाहिये। नौरात दुर्गाके पूजनमें आजादी हे 

इस कारण, नवरात्र शब्द सार्थकहोजाता हैं, ऐसाभी कोई 

कहते है, वास्तवर्स नवरात्र शब्द्‌ तिथिवाची ही हे ऐसा ही * 
कहा भी है कि, तिथिकेबढ घट जानेपर यह नवत्ररात्रशन 
साथक नहीं होता, पर नवराजमे तिथिक्षय होनेसे अष्टराः 
होनेपर भी दोष नहीं है,इससे नवराजशब्द तिथिवाची है. 


'माछ्महोता है ॥ अथ नौराज्रके घट स्थापनकी विधि-प्रेति, 


पदाके दिन प्रातःकाछू उबटना करके देश काछूकों कहकर 
मेरे इसी जन्ममें दुर्गोके पूजनके प्रभावसे से पूर्ण आपत्ति- 
योक शान्तिक साथ, दौघोयु, विपुल धन और पुत्र पुत्र 

दिकोंकी अविच्छन्न संसविबृद्धि स्थिरत्रक्ष्मी, कीर्ति ढाभ | 
शहुपराजय . आदि अच्छी अभीष्टसिद्धिके लिये शारद 
नवराज्म प्रतिपदाें कहा हुआ कढश स्थापर: 


जल कहर पा 2-१ २++कतनआ पी ग्कश्ल “4 


22000 था टक द पद 32:/ ४:57: कल> २८ ३०? फप जिकारेइ२ १४८2: हा 2 अं (पीशरप2ह 25 श ऐ 






खसकलूप्य तदड़ं गणपतिपूजन पुण्याहवाचन मात॒कापूजन नान्दीश्रारं च करेष्ये इति संफलप्य 
गणपतिपूजादि कृत्वा ततो महीद्योरिति भूमिें स्पृष्ठा ओषधयः संवर्दत इति यवाक्निक्षिप्प 
आकलशेष्विति कुम्म॑ संस्थाप्य इम में गड़े इति जलेनापूर्य गन्धद्वारामिति गन्धमओषधघयइति 
सर्वोषधीः ॥ काण्डात्काण्डादिति दूवा: ॥ अश्वत्थे व इति पश्चपक्वान्‌॥ स्थोनाप्थिवीति सप्त- 
मूंदः ॥ याः फलिनीरिति फलम्‌॥ स हि रत्नानीनि पेचरत्नानि ॥ हिरण्यरूप इति हिरण्य 
क्षिप्वा।य॒वा छुवासा इति वस््रेण सूअेण वा5वेष्टय पूर्णादवीति पू्णपात्र कलशोपरि निधायतत्र 
वरूण संपूज्य जीणायां नूतनायां वा प्रतिमायां दुगामावाह्य पूजयेत॥ नूतनमूलिकरणहग्स्युत्ता- 
रणं कुर्यात्‌ ॥अथ पूजा! आगच्छ वरदे देवि देत्यदुपनिषदुनी॥ पूर्जा गहाण सुमुखि नमस्ते शकर- 
प्रिय ॥ सबतीर्थमय बारि स्वदेवसमन्वितम्‌ ॥ इम घट समागच्छ तिष्ठ दवि गणेः सह ॥ दुर्ग 
देवि समागच्छ सातब्रिध्यमिह कल्पय ॥ बलिपूजां गहाण त्वमष्टत्रिः शक्तिमिः सह ॥ शंख- 








दुर्गपूजा और कुमारीपूजा भादिक अनेक कृत्य कहूंगा 
ऐसा संकल्प करिके पीछे उसक्के अग जो गणपत्िपूजन 
पुण्याहवाचन और मातृकापूजन हैं उन्हें भी करूंगा यह 
संकरप करके गणपति पूजा आदि करके इसके _पीछे “ओम 
मही यौ:” इस मंत्रस ( इसका अर्थादि पीछे कहचुके हैं। ) 
भूमिका स्पश करके “ ओम ओषधयः समवद्न्‍्त सोमेन 
सह राज्ञा । यस्मे कृणोति ब्राह्मण सते राजन्‌ “पारयाम्सि'? 
आऔषदषधियोंने सोमराजास साथिकार कहा है कि, जाह्मण 
जिसके छिये हमको प्रयुक्त करता हे उप्त कायको हम 
सिद्धकर देती हैं”! ,इस मंत्रस यवॉको बिछाकर उन पर 
हि पे | के ९ ७.. 
ओम आकछगशेषु धावति, पवित्रे परिषिच्यते उक्थयज्ञेषु 
वद्धते ”' है पवसान | आप कछशॉतक धावते हैं. पवित्रमें 
भर दिये जाते हो, यज्ञों में उक्थोंस बढते हो यह प्रमान 
आप समंडलके अनुसार अथ है। स्थानीय विनियोग् तो 
यह है । कछश उठा छाये गये पवित्रपर रख <दिये गये, ये 
यज्ञॉमें वेट मत्रों्त बढाये जाते हैं इस मेत्रस कुँभ स्थापित 
करके ओम इसमे में गंगे यमुन” ( यह मंडछ देवतामें छिखा 
च ९. 6 पृ ९ हर 
हे ) इस मेत्नस उस घटको पानीसे पूर्ण कर “ओमू गन्ध- 
द्वाराम” इस मंत्रस गन्धके छींटे देकर “ ओम ओषधघयर! 
इस मंत्रस सब ओबधी डाढऋर-“ओपू कण्डात्क ण्डात्‌ 
भरोहन्ती प्रुष: परुइस्परि। एव! नो दु्वें प्रततु सहखण 
शतेन च” हे दुर्वे | जेप्ते तू काण्ड काण्ड और पर पवसे 
अकुरित होती है इसी तरह हमें भी सबसे बढा, हम सहसख्र 
और शत सब ओरसे बहें। इस मंत्रस दूवाकुरों को डाढुकर 
“ओम अश्वत्थे वो निषद्र्न पर्ण वो वसतिष्कृता। गोभाग 
इत्किलासथ यंत्सनवथ पूरुषम्‌ ।” अश्वत्थमें विश्राम भोर 
परम आपने वस्ती की है आप सूयकी किरणोंमें हो, आप 
इस यजमानको रक्षाकरें॥ इस मंत्नस पांच पहव डालकर 
५ ओम स्योना प्रथिवी ” इस मंत्रस सातों मृत्तिकार्ये 
डालकर ( इस मन्रका अर्थादि मण्डल जआाह्यणम करदिया 
है ) “ओम याः फछिनीर्या अफला अपुष्पा याश्र पुष्पिणी:। 
कृहस्पतिप्रसूतारतानो मुच्वन्त्वंहसः ॥ ५९ ॥ जो ओोषधी 


फलवाढी हैं, जो अफछा हैं जिनके पुष्प ही नहींआते, या 
जिनपर पुष्प ही पुप्प आते हैं वे बृहस्पति महाराजकी प्रेर- 
णासे मुझे पापस बचायें। इस मंत्रस उसमें सुपारी डाहकर 
“सरिरित्यानि दाशुषे सुवाति संविता भगः । ते भाग चित्र- 
मीमहे” वे सर्वश्वय्येशाली धू्यें देव यजमानके छिये रत्न 
देत हैं; हम उन चाहने छायक भाग्यको मांगते हूँ ॥ इस 
मत्रस पंचरत्न डाढकर “ओम हिरण्यरूपा उषसो बविरोक, 
उभाविन्द्रा उद्थिः सूयश्न, आरोहत वरुण मिन्नगर्त तत्य्व- 
क्षाथामतिर्थि द्तिं च । मित्रोडसि वरुणो5सि ॥”-हे घुब - 

णेके समान रूपवाड़े इन्द्र और सूय्ये, आप दोनों उषा 
काछके समाप्त होते ही प्रकट होते हो, आप दोनों इस 
कछशमें विराजमान हों अदिति और दि्ति दोनोंको देखो । 
इस मंन्नस उस कछणशामें सुबंण डालना चाहिये। “ ओमू 
युवा सुवासाः परिवीतल आगात्‌ सड अयान्‌ भवति जाय" 
मान; ॥ ते घधीरासः कव्रय॒उन्नयन्ति खाध्यो मनसा देव- 
यनन्‍्तः || यदि अच्छे कपड़े पहिननेवाढा युवा परिवीती 
होकर आता है तो वो अच्छा छगता है उसको विचारशील 
ऋन्त द्शी विद्वाचू पवित्र सनसे विचार करते हुए उत्पन्न 
करते हैं। इस समंत्रस कछश पर वस्र डाल सूत्रस वेष्टित 
कर; “ओम पूर्णा दृर्ति परापत, सुपूर्णो पुनरापत, वस्नेंव 
विक्रीणावहे इषधूज +शतकतो ॥” है पूणपात्र | तू उत्कृष्ट 
दो ऋर इस पर बैठ जा, सुपूण होकर फिर आ। हे शवक्रतो। 
मूल्य देकर खरीदनेके समान इष और ऊजे छेते हैं। इस 
मंत्रसे पूणपात्रकों कखछश्‌ पर रखदे फिर उसपर वरुणका 
पूजन करके नूतन मूर्ति हो वा पुरानी मूर्ति हो; उसमें ढुगो- 
का आवाहन करना चाहिये। यदि नयी मृति हो तो पूर्वकी 
तरह अग्न्युत्तारण करना चाहिये | अथपूजा-हे वरके देने- 
वाली देवि | हे देत्योंके अभिमानकोी नाशकरनेवाढ्ली आ; 
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हे सुमुखि | पूजाकों ग्रहण कर, है शकरकी प्यारी तेरे लिये 
नमस्कार है । सब तीथंम्य जछ सब दृवॉसे समन्वित ह, 
हे देवि | अपने गणोंके साथ इस घदपर आकर बैंठो। हे 
दुगदिधि | यहां आकर मुझे सन्निधि हो एवमू आठों शक्ति- 








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चक्रगदाहस्ते झुत्रवर्णे शुभासने ॥ मम देवि वर देहि सर्वेश्वर्यत्रदा यिनी ॥ सहस्तशीष " 
हिर्ग्यव्णों “इत्यावाहनम्‌ ॥ नानाप्रभासमाकी ण्‌ नानावर्णविवित्रितम्‌ । | आसन कॉल्पत देपि 
प्रीत्यथ तव गृहाताम्‌ ॥ पुरुषए० तांमआ० इत्यासनम॥ गंगादिसवेतीयभ्य आनीत तय क्‍ 
त्तमम्‌॥ पा्य तेईह प्रदास्यामि गृहाण परमेश्वरि। । एतावानस्थ० अश्वपूर्णा० पाद्यम ॥ गंधाक्षतेत्र 
संथुक्त फलपुष्पदुतं तंव ॥ अध्य गृहाण दत्त मे मसीद परमेश्वरि ॥ त्रिपादूधदे० कांसोस्मितां' 
अध्यम्‌ ॥ गंगा गोदावरी चेव यमुना च सरस्वती॥ तांभ्य आचमनीयार्थमानीतं तोयमुत्तमम 
तस्मादिरा० चर्द्रांपघ> आचमनीयम्‌ ॥ पञ्वामृतं मयानीत॑ पयोदघिसमंन्वितम्‌॥ घृत॑ मधु 
शर्करया प्रीत्यर्थ प्रतिगंह्मयताम्‌ । आप्यायस्व०१ दधिक्राव्णोअ०२ घृत॑मिमि० शेमजुवाताऋण 
प्वादुः पवस्व०५ इति पश्चनिमत्रेः पथ्चामृतसस्‍्नानम्‌ ॥ ज्ञानमूर्ते भद्धकाले दिव्यमूर्ते सुरेश्वारि॥ 
स्नान गहाण देवि त्वं नारायाणे नमोस्तु ते ॥ यत्ठु हबेण० आदित्यवर्गें० स्नानम्‌ नििते ताइ प; 








योंके साथ पूजा और बलिको ग्रहण करिये।हे शंखचक्र | “ओम तस्माद्विरा०” इस मेत्रस तथा “चन्द्रां प्रमासां बश्न- 
और गदाको हाथ छिये हुए, हू सुन्द्रवर्ण जोर शुभगु- | सा ज्वलन्ती श्रिय छोके देवजुष्टामुदारास्‌ । तां पदानेपि ' 
खबाली, हे सर्व ऐश्रयॉंको देनवाली दवी, मुझे वर दे | शरणमहं प्रपये अछक्ष्मीमें नश्यतां त्वा बरणोमि” चांदूके 
“ओम सहख्)<- शीर्ष”! इस मंत्रस तथा “ द्रिण्यवण |संप्तान प्रकाशमान, प्रकृष्ट कांतिवाडी ए। यशसेभी ग्रका- 
हरिणी सुवगेरजतखजाम्‌ । चन्द्रां . हिरण्सयों छक्ष्मीं जात- | शमान, उदार, जिसकी कि, इन्द्रादिक भी सेवा करते हू, 
वेदों ममावह ॥”हे जात-बेद! तेजस्वरूपिणी, सब ढुखोंको | पद्मनेमि, उस श्रीके शरण हैँ।अपनी अछक्ष्मीको नाश कर- 
हरनेवाली, सोने चांदीको रचनवाली एवम्‌ सबको आरहा- * 


[६ आर्हा- | नंके लिये में तुम्हारा आश्रय लता हूं। इस मंत्रस आचम- 
दिक करनेवाली, तेजोमय लक्ष्म को बुढाओ । इससे दुर्गा- | त्ीय देना चाहिये । आपकी प्रसन्नताके छिय मैं पंचामत 
का आवाहन करे । है देवि! आपकी प्रसन्नताके छिये अनेक 


हे आपका असन्नत नरक | छात्रा हूं इसमें घी, दूध, दही, मधु और सकर मिली हुए 
तरहकी प्रभाओंसे व्याप्त रंग विरंगा आसन तयार है । | है, ग्रहण करियें। इस मंत्रस तथा “ओमू आप्पायस' इस 
प्रंहण करिये। ओमू पुरुष एवेद / सवम्‌ इस सेत्रस तथा मेत्रस ( इसके अर्थादि, मंण्डलदेवतामें लिख चुके हैं) तथा. 
तामू आंवाह जातवेदो रद्मीमनपयामिनीम्‌ । यस्यां हिरण्य 'ओमू द्धिक्राध्णो'”इस मैज्स (इसको पंचगव्य प्रकरणों 
विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्‌ ॥| है जात वेद्‌ | उस न जाने- ड्िख चुके है ) तथा घृतस्मिमिशे घृतमस्य योनिश्वेते श्रितो 
वाली रक्ष्मीको .छादे, जिसमें में गो; अश्व, हिरण्य, और | धृनमस्य घाम,अनुष्वधमावह माद्यसव,स्वाहाकृते वृषभव्षि 
कह इससे दा आह चाहिये । 528 हृव्यमू ” में इस देवको धघृतस सीचनेकी इच्छा रखता हूँ, 
सब ताथास उत्तम्त- पाता मगयों है; स तुझ प्राद्य समस्मापत | .. श प्ि भा हा  । 
करता हूं, हे पस्मेश्वरि | प्रहणकर । गय ४ ओम्‌.एवावा- सकी धृत ही योनि के टेप ही श्रित हर घुतकी का 
नस्‍्य ?* इस मेत्रस- तथा“ अश्वपूर्वी र्थमध्यां हस्तिनादप्र-[ , वितेत्ों छा, हम मैसज्ञ करदे, ह. का्मोंकपूरे करनेवाढ 
मोदिनीम्‌ । श्रिय देवीमुपहये श्रीर्मा देवीजुषताम” में ऐसी | उधाक अनुसार स्वाहाकृत हंउयछे तथा-/“ आओमू - मधुवाता 
श्रीदृवीक! आहाते करता हू, जिसके अगाडी अगाडी घोड़े, | ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः माध्वीनः सन्त्वोषधीः ॥” 
३3 कह हो, हाथी चिंघाडते घढें, वो श्री- | सत्य देवके- छिये वायु मधु रारहा है, नदियों! मधु वह 
नै, इससे पाद्य देना चाहिय । गर हैं, हमारे लिंर हे 
फछ और पृष्पोंस बह कक वियाजारह है इस पक हे का रा ओषबी उमा कि पी न 
प्रश्ण करिये। है परसेश्वरि ! प्रसन्न हृजिये। इससे तथा $ पत्ते विव्यास कि शक र्न्द्रायसुदबीत गि 
' ओम त्रिपादूध्व” इस मंत्र सथा “कांसोस्मितां हिरण्य- | 3 मित्राय वरुणाय वायवे, बृद्दस्पतय मंधुमों अद्राभ्य)ै 
भाकारा सादर! ज्वढन्तीं ठप तपेयन्तीमू । पद्मे स्थिवां पद्म- | भय दिव्य उदयके लिये स्वादिंपठ होजायेँ तथा इन्द्रके ढिये 
चणा चामिहोपहये श्रियम्‌” अनिवेचनीय मन्दहासवाली, | स्वादिष्ठ होकर सुहव करें/मित्र वरुण वायु और बृहदस्प तिके 


कल 00003 > पर बयतृप्त तथा ढिये नहीं दूब सकनेवाले मीठ.स्वादिष्ठहो जायें, इन पांचों 
बणेवादौ, दस औको # बुझा रहा हूँ। इस मेत्रसे अच्ये | स्तन कराना चाहिये । दे ह्ानमूर्े | 
देना चाहिये।शणा, गोदावरी, यमुना और सरखतीसे |: 5 + («दिव्य मू्तें! है सुरेशार! हे नारायणि 
भाचमनडे लिये उत्त८ पानी छाया हूं इस संत्रसे तथा | + पति परे लिये नमस्कार है, स्नान प्रहणकर इसतें) . 
यश सका इन शा अलवर कब लग तथा-ओमू ४०३४ इस मंत्रस तथा ४ अ हक 

में कहा, है... | तपस्तो+धि जातो वनस्पतिस्तव वृक्षो5थ वचिए्व)। तस्य फुछाति 


एक शाप+४67:६८१78 १८६ ८४४३३: ४ हा लक 5१208 तप, शक 7 पक 70067 27:20 0:क770/05207 % 5:43 7070 ४7407 2:2 चक्र: ६74 कै?/ 7 77772: 07/70/2700 04% :/60 75 ९ आउल778 5५१4/३%१९ ३ ५९ ३7 कबीते 
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उत्तरीयम्‌॥ अल पफाराइम नाहत्न सलान ॥ गहाण देवदादे त्वे प्रसी 
अलंकारान्‌ ॥ मलयाद्रेसमुद्भधत कप्रागुरुवासितम्‌ ॥ मया निवादल भक्त्या चन्दर्न प्रहेट्ड: 
ताम्‌ ॥ तस्मा्यज्ञा० गन्धद्वारां० गन्धम्‌ ॥ अक्षताश्व सुरश्षष्ट कुंइुमेन समान्विता३ ॥ नया 
निवेदिता भक्‍त्या प्रीत्यथ मतिगहाताम्‌ ॥ अक्षताव ॥ मन्दार्पारिजातानि पाटलीपड्ुजान्यपि/॥। 
मयाहतानि पूजा पुष्पाणि प्रतिशहाताम्‌ ॥ तस्मादश्वा« मनस+ काम० पुष्प्णणि » अहि 
रिव भोग; ० ऋछ ॥ परिभमलद्रव्याणि ! अथाइपूजा ॥ दुगाये नमः पादों पूजयामि | महाकाल्ये० 
गुल्फों पू० । मड्रलाये० जाठुनीपू० । कात्यायन्ये० ऊरू पू० । भद्गकाल्य० कडी पू० । कमछाये 
नामि पू० । शिवाये० उदर पू० । क्षमाये० हृदय पू० | स्कन्दाये० कण्ठ पू०। मा।हेषाछुरभारदेस्ये० 
नेत्रे पू० | उमाये> शिरः पू० | विन्ष्यवासित्थे० सवाड्र पू० | दशाहड़ रुग्गुल धूप चन्दनाझुरुसे- 
युतम्‌ ॥ मया निवेदितं मकत्या ग़हाण परमेशथारि ॥ यत्पुरुषव्य० कर्मेनमजानू० घूपम्‌ । आज्ये 
च वातिसयुक्त वद्धिना योजितं मया ॥ दीप गहाण देवि त्व॑ तेलोक्यतिमिरापदहे ॥ ब्राह्मणोह्य० 


६३८८ थ। 


्ँ 











आपः सुजन्तु० दीपम्‌ ॥ अच्च चतु॒विध स्वाद रसः पड़ानें; समाब्वितम्‌ | अध्ष्यमोस्यंसमायुक्त 





तपसा नुदनन्‍्तु मायान्तरायाश्व बाह्या अरब्मी: ॥ हू 
सूयके समानवणवाह्लो आपके तपसे वनस्पति हुआ आपका | 
फ्‌छ तो बिल्‍्व है, उसके फछ तपके प्रभावसे मेरी बाहिर | 
भीवरकी अछक्ष्मीको नष्ट कर दें । इस मंत्रसे उत्तरीय देना । 
चाहिये ॥ है देव देवि | अनेक प्रकारके र॒त्नोंस जड़े हुए | 

पूजन कर डाले । दुगो देवीको उम्स्कार इससे पाद, तथा 


महाद्व्य अछंकारोंको ग्रहण कर और प्रसन्न हो ! 
इंस मत्रस अलकार देने चाहिये ॥ यह चन्दन सकूय- 
गिरिका हैं कपूर ओर अगर इसमें डाले गये हैं । में पर 


भक्तिस आपको निवदन करता हूं, आप इसे ग्रहण करिये, | 
इस मंत्रंस तथा “ओम तस्माग्ज्ञा” इस मंत्रसे तथा-। 
४ गन्धद्वारां दुराधषां नित्यपुष्टा करीषिणीम्‌। इंश्वरीं | 
सवभूतानां तामिहोपह्नय' श्रियम्‌ ॥ ?” जिसकी प्राप्तिका | 
द्वार सुगन्धिही है, जिसको कोई डरा नहीं सकता, जो | 
सदा पुष्ठ करती है, जिससे अनेकों गाय आदि आजाती | 
बुलाता 
हू, इस मन्र्स गन्ध समपंण करना चाहिये ॥ दे सुर-।! 
श्रेष्ठ ! ये कुकुम मिछे हुए अक्षत रख हुए है, में भक्तिपूवक । 
आपको निवदन करता हूं ग्रहण करिय इस मंत्रस अक्षत। 
देदि ! मे आपकी पूजाक ढछिय | 
मंदार, पारिजात तथा पाटली पंकज छाया हू, उन्हें अहण | 
करिये। इस मंत्रस तथा- ओम तस्मादुखा ” इस मंत्रसे 
तथा-मनसः काममाकूति वाचः सत्यमशीमहि, पशूना रूप- | 
| चाहिये | इस दीपकर्मे घी और-बत्ती पडीहुई हैं, न जोड़ 


हैं, जो सब प्राणियोंकी स्व्रामिनी है, उसे 


समपण करने चाहिय ॥ 


मन्नस्य मयि श्री: श्रयतां यह्यः ” | श्री दवीजीके भ्रभावस 


हमारे मक्‍की इच्छायें तथा संकल्पें और बराणी सत्य हों, | 
पशुओंके दही, दूध आदि तथा अन्नकी चीजें हमें प्रप्त हों | 
श्री और यश मुझमें रहें, इन मंत्रोंसे पुष्प चढाने चाहियें । | 
“ओम अहि रिव भोगें: पय्येति बाहुं ज्याया हेतिम्परिबाध- | 
मानः | हस्तन्नो विश्वा वयुनानि विद्वान पुसान्‌ पुमांस परि-। 
पातु विश्वतः॥”जेसे सांप अपने शरीरसे चारों ओर छिपट | 
जाता हैं, उसी तरह तू भी ज्याके आधातोंको निवारण | 


हि 





करता हुआ शरीरके चारो ओर भोग की वरह फेछ गयाहे;तू 
सब कामोंका जाननेवालछाहें,सब ओरसे भेरी रक्षा कशशइस 
मेत्र्स परिम्मल द्रव्यॉका समपंण होना चाहिय। इसके बाद 
दुगाक अगोॉकी पूजा करनी चाहिय,एक एक अगक पू जनेका 
जुदा जुदा मंत्र है । पहिल मंत्र चोछकर पीछे उस अगका 


महाकालोके लिय नमस्कार, इससे दोनों शुर्कफ तथा मेंग- 
छाके लिय नमस्कार; इससे दोनों जानु तथा कात्यायनीके 
लिये नमस्कार इससे ऊरू, एवं सद्गकाछीके लिये लसस्कार 
इससे कटदि तथा कमछाके लिये नप्तस्का र, इससे नामि,तथा 
शिवाके लिय नमस्कार, इससे उदर ओर क्षमाके लिये नम- 
स्कार, इससे हृदय; स्कन्दार्के लिय नमस्कार, इससे कंठ 
एवप्‌ महिषासुर मर्दिनीके लिये नमस्कार ,इससे नेत्र,डमा- 
के लिय नमस्कार, इससे शिर तथा विन्ध्यवासिनदीके लिये 
नमस्कार, इससे सबॉगको पूज देना चाहिये। दर्शांगगू- 
गलछ जिसमें है,जो चदन ओर अगरसे संयुक्त ह,ऐसा घूप 

ने शक्ति भावसे निवेदित किया हैं, है परमेश्वरी | अहण 
कर;इस संत्रेस तथा “ओम यत्पुरुष व्यद्धुः इस मसन्नसे, 
तथा-“कदंमन प्रज्ञा भूता साय सम्रम कदुम।श्रव वासय 
में कुछे, मातरं पद्ममालिनोम्‌ ॥ है कदम : आपन तअजा 
उत्पन्न की; आप मेरेम यथष्ट श्रमण कारिये, पद्ममालिनी 
माता श्रीको मेरे कुछमे वसा दीजिय | इस मत्रस घूप दला 


भी दिया है, हे तीनों छोकोंके अन्धक्वारको नष्ठ कएन्‍वाली 
दीपकको ग्रहण कर ॥ इस संत्रस तथा ओम आाह्मणोड्स्य 
इस मंत्रस तथा “आपः सजन्तु ज्िग्घानि विल्कोत वसम 
गह । लिच दंवीं मातरं श्रियं वासय से कुछ” हं समुद्र 

आप लक्ष्मी जेसे ही पदा्थाकों पैदा करें, है लक्ष्मीक पुत्र 
चिछीद ! मेरे घरमें रह, दवी मालाश्रीकों मर कुछमें बसा।। 
इस संत्रसे दीप देना चाहिये। चारों तरफका स्वाठु अन्न 


| 








प्रीत्यथ प्रतिगह्मताम्‌ ॥ चन्द्रमा० आदी पृष्क० नेवेद्यम्‌ ॥ आचमनीयम्‌ ॥ मलय'चलसंभ] 
कस्तूर्या च समखितम्‌ ॥ करोद्वर्तनक देवि गृहाण परमेश्वर ॥ करोद्व्तनम ॥ इद फल मय 
देवि स्थापति पुरतस्तव ॥ तेन मे सफलावा तिमेवेज्नन्माने जन्मनि । नाभ्याआ०्आ द्ीयःकः 
फलम्‌ ॥ पूगीफलम्‌ महद्दिव्य नागवल्ल्या दर्लेथुतम॥ कपूरेलासमायुक्ते ताम्बूल प्रतिगहमताग। 
ताम्बूलम्‌ हिरण्यगर्मेति दक्षिणाम्‌॥ यज्ञेनयज्ञ॑ण्यः शुचिःत्र० ॥ मंत्रपुष्पाअलिम्‌ ॥ अश्वदाग 
गोदाये इत्यादि प्रार्थथेत्‌ ॥ ऊँ श्रियेजातः०्नीराजनम॥श्रीसूक्त संपू्ण पठित्वा पुष्पाअलिम॥ 
मंत्रहीने क्रियाहीन भक्तिहीन खुरेधरि ॥ यत्तूजितं मया देवि परिष्‌ण तदस्‍्तु मे ॥ महिष 
महामाये चाम्॒ण्डे मुण्डमालिनि ॥ यशो देहि धन देहि सवान्कामांश्व देहि में ॥ नमस्कारम। 
अथ कुमारीपृजा ॥ एकवर्षो तु या कन्या पूजाथें तां विवजेयेत।गन्धपुष्पफलादीनां भीतिस्तस्था 
न विद्यते॥ तेन दविवर्षामारभ्य दशवर्षपर्यन्ता एव पूज्या न त्वन्या॥ सामान्यपूजामंत्र॒स्तु-मंत्र- 
क्षरमयीं लक्ष्मी मात॒णां रूपधारिणीम्‌ ॥ नवदु्गांत्मिकां साक्षात्कन्यमावाहयाम्यहम्‌ । इति॥ 
तासां पृथदुनामान्याह--द्विवपेकम्पामारम्य दशवषान्तविग्रहाम्‌ ॥ पूजग्रेत्सवेकार्थेषु यथाविध्ु-, 
क्तमार्मत॥कुमा रिका द्विवर्षा तु त्रिवर्षा तु त्रिमूलिका॥चतुर्वेषों तु कल्याणी पश्चव्षा तु रोहिणी 





जिसमें छओ रस मिलें हुए ह,भक्ष्य और भोज्यसे युक्त है, | 


आपकी ग्रसन्नताके छिय छाया हूँ ग्रहण करिये।। इस मत्रस | 
तथा “ओम चन्द्रमा ममसो जात” इस मेत्रसे तथा-| 
“आदर पुष्करिणीं पुष्टि पिड्डछां पद्ममालिनीम्‌ । चढद्रां हिर. | 
०्मयीं छक्ष्मीं जातवेदों ममावह॥'”जिसका अभिषक दिः्गज | 
करते हैं तथा जो सबको पुष्टि देती है, पिड्डछ वर्णकी है, | 
कमलछकी मालायें पहिन हैं, सबको प्रसन्न करनेवाली है, | 
दयाद्रेचित्त हे स्वय तेजो भय है,ऐसी लक्ष्मीको हे जातवेद | | 


मुझे छा दे ॥ इस मंत्रसे तेवय्य निविदन करना घाहिये; 


मलयाचलूपर पेदा हुआ है, कस्तूरी इसमें मिली हुई है; 
तुम्हारी प्रसन्नवाके लिय यूह करोहतेन तयार है, ग्रहण 
करिये। इस मंत्रस करोह्वतन देना चाहिये ॥ हे देवि | यह 


सह 


फछ सेने आपके सामने स्थापित किया है, इससे मुझे इस | 
ज्ञर के हक २ फस्त ३ 
' जन्म तथा दूसरे जन्मसे सफल प्राप्ति हो ॥ इस अंत्रसे, 


क्‍्था-' ओम नाभ्या आसीदन्त ! इस संत्रस . तथा-“आद्रा 


यः करिणीं यरष्टि सुवर्णा हंममालिनीम। सूर्य हिरण्मजीं 
लक्ष्मी जातवेदों मावह ॥ ' भक्तोपर दया करनेवाली 
जिसका कि, द्माज असिषक करते रहते हं। जो स्वयम्‌ 
सब अयत्न करती है, सुन्दर वर्णवाल्ली सोनेकी माढाएं 


पहिने हुई है, जो सूयंके भीतर भी विराजसान रहती है, | 


ऐसी तेजोमयी ढक्ष्मीको हृ जातवेद तू छे आ ॥। इस संत्रस 
फल समर्पित करना चाहिय ॥ बढ़ा सन्दर पान हैं. सुन्दर 
सुपारी, इलायची और कपूर पड़ा हुअ 


गभे ” इस मेत्रसे दृक्षिणा दे, ' 
क्वा हे श्स यः हि लगते * 
मन्तृहम्‌ । शरियः पलद्दई ५ को ना बहुवादाज्य 
वह __ उदेखच व श्रीकामः संतर्त जपेत ॥? 
लिस धनकी इच्छा हो वह पवित्रतापूवंक सावधन होकर 









| । है, इसे आप ग्रहण | 
* रस सत्रस तास्वृद्ध दे द् हिरण्य- | 
आर क बे (* ओमू हिरण्य- | करनेवाली साक्षात्‌ नवदुर्गात्मिका कन्याका में आवाह 

मू यज्ञन यज्ञम्यजन्तं | हे | 


रोज हवन करता हुआ श्रीपृक्तकी पंद्रहों ऋवाओंका नि 

न्तर जप करता रहे।॥ इससे मेंत्रपुप्पाजलि दे | तथा- 
' अश्वदाये गोदाये घनदाये महाघने । घने मे जुपतां देपि 
सवकामांश्व देहि मे ॥ ? अरब, गो और घन दनेवाढीपे 
लिय नमस्कार है। हे महाघनवाली देवि ! मेरे सब कामों 
मुझ दे तथा घनका भी सेवनकरे । अथवा हे मह।धनवाही 
देवी अइव, गो और घन देनेके लिय मुझसे प्रेम कर दया 
घन ओर सब कामोंको दे। इस मंत्रसे प्राथना करो 
चाहिये। ' ओम श्रिय जातः भ्रिय आनिरीयाय अ्रियं व्ये 


पीछे आचमनके मंत्रंस आचमन कराना चाहिय। यह | “स्टिम्यों दंदाति श्रिये बसाना अश्ृतत्वमायन्भर्वान 


| सत्यासमिथामितद्रो ॥ ? श्रीक छिय पंदा हुआ श्रीक्रे हि 


ही प्राप्त हुआ है स्तुति करनेवालोंके लिये श्री और वयर 
देता है, श्रीकी रखनेवाले अमृतत्वको प्राप्त होते हूँ, वही 
७ हा 5 कप दि रे 

समग्रामके वीर, मित चलनेवाले, सत्यसाबित होते है । इप 


'मेत्रस आरती करनी चाहिये | संपूण श्रीसूक्त पढकर पुष्पां ' 


जलि देनी चाहिये । कि, हे. सुरेश्वरि ! जो मैंने आप 
भक्तिहीन क्रियाहीन और संत्रहीन पूजन किया हे वो मे 


परिपृण हो, हे महिषासुरकों मारनेवाली महामाये .( 
मुण्डोंकी माला पहिननेवाली चाण्मुडे ! मुझे यश दे था 


| देभऔर सब कामोंको दे । इससे नमष्कार करना चाहिय। 


कि कुमारी पूजा-एक वषकी कन्याको पूजनमें प्रहण | 
करे, क्योंकि उसकी ग्रीति गन्ध पुष्प और फछ आदिकों/ 


| नहीं होती इस कारण दो वषकीस लेकर दशवर्ष तदवी 


ही पूज्या है, अन्य नहीं हैं ।। सामान्य पूजा मंत्र तो यह 
कि, संत्राक्षरमयी लक्ष्मी तथा मातृकाओंका रूप धाण 


करता है उनके प्रथक्‌ नाम भी कहते ह--दो वर 
कन्यास लेकर दश वर्षतककी कन्‍्याको विधिके #*ह 
सार सब का्मोमें पूजना चाहिये ॥ दो वर्षकीका ना 
.कुमारिका तथा तील वर्षकी चिमू्िका तथा चार वर्षत 


(तानि, | भाषाटीकासमेतः । ( ६७ ) 





(वर्षा तु काली स्थात्सतवषों ठु चण्डिका)। अष्वर्षा शाम्भवी च दुर्गा च नवमे स्मृता ॥ दश- 
शे सुभद्वेति नामत+ परिएजयेत्‌.) प्रातःकाले विशेषेण कृत्वाउम्यड़रं समाहितः ॥ आवाहये- 
तः कम्याँ मन्जैरोनिः उरथक्प्रथक ॥ तानेव मंत्रानाह--जगत्पूज्ये जगदन्दे सवंशाह्िघ्वरूपिणि ।। 
ज्ां गहाण कोमारि जञगन्मातनमोस्तु ते ॥ १ ॥ तिपुर्रां जिंगणाथारों त्रिमार्गज्ञानरपिणीम्‌ ॥! 
लोक्यवन्दितां देवीं त्रिमाति पूजयाम्यहम्‌ ।। * !' कालात्मिकां कलछातीतां कारुण्यहदयाँ 
शबाम्‌। कल्याणजननीं नित्पां कल्याणी पूजयाम्पहम्‌ ॥ हे ॥ अणिमादिशणाधारामकारा' 
क्षरात्मिकाम्‌ ॥ अनन्तशक्तिमिंदां ताँ रोहिणी पूजयाम्यहम्‌ । ४ || कामचारी कामरात्री 
उलचकऋस्वरूपिणीम्‌ ॥ कामदां करुणाधारां कालिकां पूजयाम्यहम्‌ ॥ ५ ॥ उम्रध्यानां चोप्- 
'पां दृष्ठासुरनिबर्हिंणीम)। चावद्रीं चण्डिकां लोके पूजितां पूजयाम्यहम्‌ 0 ९ | सदाननन्‍्दकरी 
गानतां सर्वेदिवनमस्कृताम्‌ ॥ सर्वभूतात्मिकां लक्ष्मी शाम्भवी पूजयाम्यहम । | ७ ॥ दुर्गमे 
(ह्तेर शुद्ध भथढुःखविनाशिनीम )! पूजयामि सदा भक्‍त्या ढुगा डुगॉतिनाशिनीम || 4 ॥। 
नदी स्वणंवर्णामां स्वेसौभाग्यदायिनीम्‌ !। सुभद्रजननीं देवीं खुभद्रां पूुजयाम्यहम्‌ ॥९%। 
ति कुमारीपूजनम्‌ ॥ प्रारम्भोत्तरं सूतकप्राप्तावाह ॥ खूतके पूजन भोक्त जपदाने विशेषतः ॥ देवी- 
वुद्दिश्य कर्तव्य तत्र दोषो न विद्यतादाति॥ अनारब्धे त्वन्येन कारयेत्‌ ॥ रजस्वला ठ बराह्मणेः 
उजादिकं कार्य: सूतकवादिशेषवचनाभावात्‌ ।! समलेकस्त्रीणां नवरात्रे गन्धादिसेवनं न 
दोषाय ॥ तदुक्त हेमादरो गाशझडे--गन्धालड्भारताम्बूलपुष्षमालालुलेपनम्‌ ॥) उपवासे न दुष्यन्ति 
दस्तवावनमखनम ॥ दृत्याखिनशुक्कर्पातिपत्कृत्यम्‌ ॥| द 

अथ का विं#शक्कअरतिपत्‌ ॥ सा पूर्वी आह्या ॥ पूवाबिद्धा भकतेव्या शिवराचिबंलीदनम्‌ ॥ इति 
पा्मोक्तेः॥ अत्नाभ्यज़ो नित्यः॥वत्सरादों वसन्तादो बलिराज्ये तथेव च ॥ तेलाम्यड्रमकुवाणो 





















कल्याणी एवम्‌ पांच वर्षकी रोहिणी, छःवर्षकी काली, सात | आनंद करनेवाली, शान्त है, जिसे सब देवता नमस्कार . 
बर्षकी वडिका, आठ वर्षकी शांभवी तथा नौ बंषेकी दुर्गा | करते हैं, जिसकी सब प्राणी आत्मा हैं; ऐसी लक्ष्मी शांभ- 
और दशवर्षकी भद्राके नामसे पूजी जानी चाहिये | प्रात | वीको मे पूंजवा हूँ ॥ ७॥| जो दुर्ग तथा दुस्तर युद्धमें 
काल विशेषरूपसे उबटन करके नित्यनेमित्तिक कृत्यसे | भय और दुःखका नाश करती है, उस कठिन आपत्ति- 
चितृत्त हो, एक ग्रचित्तसे बैठजाय फिर इन मन्त्रोंसे प्रथकू* | यॉका नाशकरनेवाली दुर्गोंको मं भक्तिके साथ सदाही 
कन्याओंका आवाहन करे । उन्हीं मन्‍्त्रोंको कहते हं- | पेजता हूं ॥ ८ ॥ परम सुंदरी तथा सोनेक रंगकीसी आभा- 
जिनसे कि आवाहन किया जाता है--हेजगकी पूछ्ये ! हे- | वाली, सब सोभाग्योंको देनेवाली, सुभद्रकी जननी, देवी 
जंगवकी वन्ये | हे सर्वशक्तियोंके स्वरूपव्राढी कौमारी | सभद्राकों में पूजता है ॥ ५ ॥| इति कुमारी पूजनम्‌ ॥ प्रारंभ 
देवी। पूजा अहणकर, हे जगन्मातः | तेरे लियः नमस्काः करनेपर सूदक हो जाय तो-उसमें कुछ विशेष कहते हैं कि, 


हैं ॥१॥ छोग जिले त्रिपुरा कहते हु, जो तीनों गुणोंकी | पूतकेमें दबीका उद्देश लेकर पूजन और विशेष करके जप 
दान करने चाहिये। इनमें कोई दोष नहीं है । पर प्रारम्भ 


आधार है तीनों मागेके ज्ञानकी रूपवाली है; ऐसी तीनों | 

छोकोंठारा वन्दित त्रिमूर्ति देवीको में पूजता हूँ ॥ ९॥ जो | न किया हो तो दूसरोंस ही कराने चाहिये। जो रजस्वला 
कालात्मिक है कछास अतीत हैं; करुणा भरे हृदयकी है, | हो उसे तो ब्राह्मणों त् पूजादिक कराने चाहिये। क्योकि, 
शिवा है कल्याणकी जननी हैं. नित्य हें; ऐसी कल्याणी | पूतककी तरह इसके छिये कोई विशेष वचन नहीं है 
देवीको में पूजता हूं ॥ ३ ॥ 'अणिमादिक गुणोंकी आधारहै | सुहयमिन स्थियाँ यदि नवरात्रि गन्ध॒ आदि सेवन करें तो 
अकारादि अक्षरात्मिका है, अनन्त शक्तियोंके भेदवात्गी है | उन्हें कोई दोष नहीं हैं, ऐसा हेमाद्विंम गरडपुराणका वचन 
ऐसी रोहिणीका में पूजन करता हूं ॥४)। जो कामचारिणी | कहा हे कि गंध; अलंकार, पान, इलमाला, अनुलेपन, 
' क्वामरात्री तथा कारूचकऋके स्वरूपवाली है, कार्मोंको देने- | इव्धावन और मज्जन; उपवासमे भी सुहागिन स्त्रियां कर 
वाली है। जिसमें करुणा भरी हुईं है, ऐसी कालिकाको में | सकतीं हैं। यह आश्विनशुद्धा भ्रतिपदाका कृत्य समाप्त 
पूजता हूं ॥६॥ उम्र ध्यानवाल्ली, उम्र रूपवाली, दुष्ट असु- | हुआ ।॥। अथ कार्तिकशुक्छाप्रतिपदा-पूव्वां परहणकरनी 
रोंको मारनेवाली, सुद्र शरीरवाली तथा छोकमें पूजिता [क्योंकि पद्मपुराणमें लिख हुआ है, शिवरात्रि ओर कार्ति- 


श्रीयंडिका देवीजीकी में पूजा करता *॥ ६॥ जो सदा | कशुक्छा प्रतिपद पूृवधिद्धाही ऋरनी चाहिय, इसमें उव" 








९ 


4 प्रतिपदृ७ 
घेछ्ोक्ते: | अब कलव्यमाह ॥ प्रातगोवद्वेनः पज्यों द्यू्त चापि समः 
भ्रूषणी पूज्याश्वावाहदीह ना: ॥ अब इत्म5।तः4 ॥ वालखिल्या उच्ु। 

क्‌ कहे अब्शे की 0 $ आ' 

तिपदादयेसयर्क कृत्शा नीराजन तत$ । खुबंष: लत्कथागीतदानिश् दिवस नयत्‌ ॥ १ ॥ शक्ष 
स्ठ तदा झत ससज सुमनोहरम॥ कार्तिके शुकृपक्षे त॒ प्रथमे5हान सत्यवत्‌ ॥ २॥। अत्युवाप 
वचओेद देवी मति सदाशिवः ॥ कालक्षेपाय केषांचित्केषांचिद्धनहितवे ॥ ३ ॥ केषाँचिद्धनना 
शाय पहय झूते कृत मया ते तस्‍्य त्वं कौतुक पहण खुबन लापयाम्यहम्‌ ॥४॥ उद्ेत्थ कीति/ 
ताथ्यां सवान्या च जिते तदा ॥ पुनर्दधितीय झुवन छापितं निजितं तथा ॥५॥ पुनस्ततीए 
धवन लापित॑ निर्जितं तथा ॥ पुनवृर्ष पुनश्चर्म पुनः पत्नगबन्धनम्‌ ॥ ६९॥ शशिलेखां उमर 
सर्व तस्याप्यजीजयद॥ निर्मतस्तु हरों गेहाल्वीरवल्कलघारकः ॥ ७ ॥ गड्जातीर॑ समागत 
तघ्थों चिन्तासमन्वितः ॥ सस्मिन्क्ष णे कार्तिकेयः खेलितु च गतःक्तचित॥ ८ ॥ गड्ढातीराध्गे 
गेहमपह्यत्पाथे शंकरम्‌ ॥ ईषत्कुट्टं विरक्त॑ च ननाम चरणों पितुः॥ ९ ॥ तेनापि माज्नि चादत्रात 
पुँत् याहि गहं सुखम्‌ ॥ तब मात्रा जितश्वाहं गच्छामि गहने वनम्‌॥ १०॥ सकद्द उवाच ॥ क्य 
मात्रा जितों देवो बन॑ कस्माज्च गच्छसि ॥ अहमधप्यागमिष्यार त्वत्पादों सेबयाम्यहस्‌॥ १९॥ 
शिव उद्याच ॥ विजित्य तव मात्रा त॒ क्षण न स्थेयमत्र वे। मम लोके तथेत्युक्तः ऋचिद्वच्छाम्प 
ततः ॥ १२ ॥ स्कन्ह उबाच ॥ मा गच्छ त्व॑ महादेव यतमाग प्रदशिय ॥ आनीयते .मया जिला 
स्व तव घनाविकम्‌ ॥ १३ ॥ शिवेनापि तथेत्युदत्वा चूतमाग अदाशितः ॥ स्कल्दोपि गृहमागद 
पावेदी वाक्यमबवीत ॥१४७॥ स्कम्द उवाच ॥ देवि देवो गत काउसो वृषभोज्ेव संस्थितः। 
शीर्ष च न विधु कस्मान्मातः सत्य बदाद्य में ॥ १५ ॥ देव्युवाच ॥ स्वय्रमेव कृत शृत 
स्वयभव पराजितः ॥ स्वयमेव गतः क्रोधात्पाथ्यतां स कर्थ मया ॥१९६॥ स्कन्द उवाच ॥ मय 

















ठन करना जरूरी है, क्योंकि वत्सरके आदिम, वसतके 
आदिम तथा बलिक राज्यमें जो तेलाभ्यजड्ग नहीं करता वो 
नरकमें जाता है, यह वसिद्ठंजीने कहा है।॥ इस तिथि 
क्या करना चहिये ! सो कहते हैं कि-प्रातःकाल गोवर्धन 
का पृजन करे तथा जूआ भी खेले तथा गझओंका पूजन 
ओर श्ूद्भार भी करना चाहिये।अथ कथा-बाछूखित्य 
बोले कि, प्रतिपदाके दिन प्रातःकाकू उबटन स्थान करके 
अपना आगार करना चाहिये। फिर अच्छी कथा वातांओं 
में इस दिन्को पूरा करना चाहिये ॥ १॥ श्रीप्रहादेवजीने 
कातिकशुक्ला प्रतिपदाकों सत्यकी तरह सुंदर जूआ रचा 
था।॥ २॥ सदाशिव भगवानने देवीजीसे कहा कि हे- 
देवि ! किसीके फालक्षपके लिये तथा किसीको धन पानिके 
किए ॥ ३ ॥ एवम्‌ किसीके घनके नाशके लिये मैंने जूआ 
बता दिया है, इस जुएके खेछको अप देखें मे एक भुवन 
दावपर छूगाता हू ॥ ४ ॥ एक भुवत्त दावपर रख दिया 
और दोनों जूआ खलने छंगे पर पावेतीजीने उस दावको 


'जीद् लिया । महारेवजोते दूर 
गप हइवज़ःत दूसरा भुवन दावपर रखदि 
शीसदीय चद भी जीत रख ) क्‍ 


कल जीत लिया )। ५ ॥ महादेवजीन वीसरा 
बन भी दुषपर रख दिया, उसे भी अम्वाने जीत छिया, 
का क हक पीछे चरम, फिर सांप दावपर छगा- 
दा बको श अछ सा, इसके पीछे डमरू दावपर रखा, 
इन एवॉको पा जीत लिया। शिवजी सब कुछ 
एंकर वल्कछ् बसन पहिनकर घरसे चले गये ।॥। ७॥। 


शिवजी गेगाकिनारे वक्े आये और गहरी चिन्तासे व्या 
कुछ होकर वहीं बेठ गये, उस समय कार्तिकेय वहीं-कहाँ 
खेलने गये थे ॥ ८ ॥ गज्ञाकिनारेसे धर जा रहे थयेकि। 
ने हे. कवर तर पा श्रास कह 
मागम शिवजी दीख पड़े, कुछ क्रोधर्म थे, तथा सबसे विए' 
क्त हो रहे थे, स्वाभिकातिकजीन पिताके चरणोंमें प्रणाम 
किया ॥ ९ ॥ शिवजीने पुत्रके शिरको सूघकर कहाकि। 
बेटे सुखपूवक घर जाओ, तुम्हारी माने मुझे जीत लियाईं 
इस्त कारण भें तो गहन बनको जाऊँगा ॥ १०॥, यह पुर 
स्केद बोले क्लि, आपको मांने केसे जीत लियः ? तथा क्यो 
बनको जा रहे हो ? में मी आता हैं, आपके चरणोंकी 
सवा करूँगा ॥११॥ शिवजी बोले कि, तुम्हारी माताब 
जीलऋर कहदिया है कि. यहां मरे छोकोंमें मत ठहस्वा 
इस कारण में कहीं जा रहा हूँ ॥ १२॥ यह सुन सकल 
बोले कि, है महाहेव | आप कहीं न जाये आप मुझे जूआ 
सिखादें | में आपके खोये हुओंकी जीत करके छा दूँगा 
॥ १३ ॥ शिवजीन कहा कि, अच्छी बात हे, स्वामी का द 
कको जूआ खलना बता दिया, स्कन्दमी घर आकर पा" 
तीजीसे बोले ॥१४॥ कि, है देवि ! देव कहां हैं नांदिया 
यहीं है आज माथेपर चन्द्रमाभी नहीं रखा हैं। यह क्यों 


है मातः | मुझे सब बातें सच सच बता दीजिय ॥ १५॥ 


दूवी बोली कि; अपने आपही जूआ बनाया दी 
आपही रु पराजित हुए, एवम्‌ आपही गुस्साई 
भार चढू गये मर उन्हें केस मनाऊं।॥ १६॥ सं 


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त्कीडन त्विति ॥ देव्यक्रीडत्तेन सार तत) स्कन्देन निर्फेल्द ॥१७। 


(स्द्धा 
मयरेण दृषस्‍्तस्थाः शक्त्या पतन्नगबन्धनम्‌ | वृषेणेन्ुस्ततोषधो डर तत्सवे तेन निजितम ॥१८॥ 
कोपीन निर्जितं चर्म गृहीत्वा तद॒पाययों ॥ गक़ातीरे यत्र शिवस्तत्रगत्य व्यवेदयत है १९ ॥ 
ततो देवीसमीपे तु विश्नराजः समाययों ॥ किमर्थ म्लानवदना देवी जाताओि तद्गद ॥ २० ॥ 
देंव्युवाच ।। मया ।र्जतो महादेवः स तु गेहादिनिगेतः ॥ आयास्यति छ्बाह्मथोमाति संचित्य 
संस्थितम्‌ ।। २१ ॥ तब श्रात्रा तु ताल्ित्वा से तस्मे निवेदितम्‌ ॥ नायाध्यत्यछुना देव इते 
चिन्तापरास्म्यहम्‌ ॥९२॥ गणेश उवाच ॥ देवि शिक्षय मां. झतं जेष्यानि जातर हरम्‌ ॥ 
आजनाथिष्याने साभग्रीं यद्य॒ह स्थां सुतस्तव ॥२३॥ इति पृत्रवचः श्रुत्वा तस्मे द्ृतमशिक्षयत्‌ ॥ 
स गहीत्वा पाशयुर्ग सारिकाः शीघ्रमाययों ॥ २४॥ प्रृष्ठाप्रद्टा यत्र देवा: स्कनदो यत्र व्यव- 
स्थितः ॥ गणेश उवाच ॥| मंयानीताविमों पाशों सॉरिकाः पट एबं च ॥ २५॥ क्रीड रथ तु 
मया साह् देवस्यथाग्रे ममाश्नज ॥ इति अआ्ातृवचः श्र॒त्वा छाुमाभ्यां क्रीडिति तदा ॥ २६॥ 
मूषकेण बलीवदे मयूरं चाप्यजीजयत ॥ शिवश्य सर्वाविष्य स्कन्दस्थ च तथेज च ॥ २७॥ 
गृहीत्वा स तु विध्रशस्तत्झालेपावंतीं ययो ॥ पावेत्यपि च संतुष्दा गणेश॑ वाव्यमबबीत्‌ ॥शै८। 
सम्यक्‌ कृत॑ त्वया पुत्र नानीतोसों महेइवरः ॥ सामदानादिक॑ कृत्वा आनयात्र महेइवरम्‌॥२९॥ 
तथेत्युकत्वा गणेशोपसो समारुहाय व सूषकमष्स त्वरित चाययों तत्र गह॑ नेतु हहेइवर्स ॥३०॥ 
इंइवरस्तु सघुत्थाय हारेद्वारं समागतः॥ नारदेरितवृत्तान््तो विष्णुस्तत्र समागलतः ॥३१ ॥ विष्णु 
रूवाच ॥ ज्यक्षां विद्यां कुछ शिव एकाक्षोह भवाम्यहम ॥ रावणन तथत्युक्ते कोणों भव 
जनादुन ॥ श२ ॥ विष्णुझवाच ॥ ओतुवत्पश्यसे मां त्वें तस्मादोतुर्भविष्यसि ॥ नारदउठबाच ॥ 
देव सिद्ध महत्कायमायाति स गणेइबरः ॥ ३२३ ॥ ज्ञातुमत्र संवद्ू मूडकाप्श्य धष्यताम ॥ 





पावतिजीस बोले कि, मेरे साथ खेलिय, जआ केसे खा | आप मेरे साथ शिव्रजीके सामने खडछ, भाईके वचनसुनकर 
। स्कनद्‌ खलनकी तयार होगये, फिर दोनों माइयोंसें जूआ 
जीत छिया ॥ १७ ॥ मयूरसे नांदिया जीता, शक्तिसे पन्न- | मचा ॥ २६ ॥ गणेशजीने मूसेस वृषभ और मथूरको भी 
गबन्धनको जीता, इस प्रकार सब कुछ जीत लिया ॥१८॥ | जीवलिया तथा शिवजी और रकन्दकी सब कुछ ॥ २७॥ 
स्कन्दजी शिव जीके कौपीन और चम्म उससे जीतकर + जीवकी चीजेंलेकर गणेश पावतीके पास आये पावेतीजीसी 
गंगाकिनारे वहाँ छेकर पहुँचे, जहां गंगारु कितारे शिवजी | जयी पुत्रस बोलीं कि ॥२८॥पुत्र ! यह तो तूने ठीक किया 
५४ शक लत चल ल आकक 0 करदिया ॥| १९॥ | पर शिवजीको न छाया. जा. साम दामादिक करके शिव- 
हक सी न 322 बता जल जीको यहां! छेआ ॥२९॥ गणेशजीने कहा कि अच्छी बात 
पर 86 कल जहर क | है; अभी छाताहूँ, झट मूसपर सवार हो शीघ्रही शिव जीको 
कि,मैने 8 05. शलानिक लिये सके दियआ बेलाओों विज वहांसे उठकर 
कि, अपने दृषादि छेनेके लिय घर आयेंगे इसी लिय बेटी जिदार ले आय वार देय हे आज विष्णु- 
रह गयी ॥| २१॥ तरे भाईने सब जीतकर उन्हें देदिया सकल की पी हट मर्ज कह कक 
वो अब नहीं आरहे हैं में इसी चिन्तामें हूं ॥ २२ ॥ यह |  त त शहर हि कक के आक है. के हा । 
सुनकर गणश बोले कि, दददवी! मुझे जूआ खलना सिखादे | बिण्शु भगवान्‌ शिवजीसे बोले; कि शिव महाराज ! ज्यक्ष 


करते हं,पा व तिजी स्कन्दके साथखली,स्कन्दन पावतीजीको 


कक 


स्वामिकातिकजी बठेथे | स्वामिकार्तिकजीसे बोले कि, मे 


१ एकश्चासावक्षः पाशक्श्वेतिविश्रह्टे विवक्षित्पि बहुब्नीहिणा शब्दच्छलात्काण इत्युक्तम्‌ । 


से भाई और शिवकों जीत कर सब कुछ छादूं तो तेरा | 
हे आप ज् ' 

बेटा, नहीं तो नहीं ॥ २३॥ पुत्रके ऐसे वचन सुनकर | 
हिए.०५४ जूः हि स्‌ दर 
उन्हें जूआ खछना बतादिया, वो दो पासे और गोद ढेकर | 
खेलन चलदिय ॥ २४ ॥ पूछते पूछते वहां चले आये, जहां ; 
| नारदजी बोछे कि; हे-दव! अब बहः दाय सिद्ध होगया, 
दो पासे गोट और कपडा छेकर चलाहूँ॥२०॥ है बडे माई! : 





विद्याकरिये, में एक अश्ष होजाऊँगा, रावण वहां सुन 
रहा था बोछा कि अच्छी बात है, आप काने हो जाइये 
॥१२॥ यह झुन्र विष्णु भगवान्‌ बोले कि, तुम्त मेरी ओर 
बिलावकी तरह देखते हो इस कारण आप बिछ्ठे होजाओ,. 


चर 
वो गणेश्वर आरहा हे ॥३३ ॥ आपका समाचार जाननेको 


प्रतियद-- 
(७० ) 'तराज। हि ले ु 





इति श्रत्वा नारदस्य वचन रावणोग्रतः ॥ ३४ ॥ कुवन्माजारवच्छब्द ४ ३०% 
* व्यज्य गणपः शनेः शनेरुपाययों ॥ २५ ॥ जातो विष्णुः पाश इति दूः देलोकि- 
का कर सी महादेव॑ विनयानतकन्धरः ॥ ३६ ॥ गणेश उबाच ॥ आगम्यतां देव गह देवी 
8 ॥ यदि नायासि गेह त्व॑ मरार्णास्त्यक्ष्यति चामि बका | हे ७| कल्‍ कह जया सब 
कार्यमेतदुपायनम्‌ ॥ महादेव उवाच ॥ एषा ध्यक्षा महाविद्याईडना गणए ध | अनया 
कीउते देवी आगमिष्ये शहं तदा ॥ गणेश उबाच ॥ सवथव क्रीडितव्यं शा नास्त्यत्र संशय: 
॥३९॥ आगम्य्ता गह देव भ्रात्रा सह हि मा त्रज ॥इति तस्थ बचः श्रुत्वा ईशवरः सगणो ययौ 
॥४०॥ नारदोप्यागतस्तत्र महोत्र॒पि चागतः॥उपविष्टास्तु केलासे देवास्तत्र ९०५४० ३६६ ॥४१॥ 
हृष्ठा देवीं प्रहस्यादों महेशों वाक्यमबबीव ।॥ ज्यक्षविद्या महादोवि गड्लीद्वारे विनिर्मिता। ४२॥ 
अनया जयसे त्व॑ चेत्तदा त्व सत्यभाषिणी॥देव्युवाच।|ब्षादि तब सामग्री मयेय॑ लापिता शिवा 
॥४३॥ त्वया कि लाप्यते ब्रहि दर्शयस्व सदोगताव।इतिश्रुत्वा बचस्तस्याः प्रक्षताधोमुख हर: 
॥४४॥ तास्मिव्‌ क्षणे नारदेन स्वकोपीन समर्पितम्‌ ।। बीणादण्डश्रोपवीतमनेन ऋरीडतामिति 
॥४९॥ सदाशिवः असत्नोभृत्कीडन संप्रचक्रठः ॥ यद्यद्याचयते रुद्र॒स्तथा विष्णु: प्रजायते॥९ | 
यद्यद्याचयते देवी विपरीतः पतत्यसों ॥ स्वकीयाभरणा्ं च महादेवेन निर्जितम्‌ ॥४७॥ स्कन्दा 
लड्डारिक सर्वे पुनराप्त हरेणच ॥ ततो गणेशः छोवीच वाक्य सदसि गार्वितः ॥ ४८ ॥ न क्ीडि- 
व्ये है मातः पाशों लक्ष्मीपतिः स्वयम्‌ | कृतो हरेण सर्वस्वं ते हरिष्यति मत्पिता ॥४९॥ इति 
पुत्रवचः श्रुत्वा पावेती ऋषमाछिता॥ तथाविधां तामालोक्य रावणों वाक्यमत्रवीत॥५०॥ रावण 
उवाच॥पापिष्ठेनाद्य शप्तोःस्मि हुंढु रूठेन विष्णुना।अधमॉय न कर्तव्य इत्युक्त तु मथा यत/५१॥ 
देव्युवाच ॥ स्ोच्छषिष्ये वत्साह धूततानेतान्‌ महाबलान्‌ू ॥ सामथ्थ पह्य मे पृत्र धर्मत्यागफले 
पद प कल द  न्‍  न प 3 


हे रावण ! तुम उनकमूसेको डरा दो। श्रीदेव्षिके ऐसवचन जीत छेंगी तोआप सच बोलनेवालीहैंयह सुनकर देवीबोढी 
छुनकर रावण भगाडीस ॥ ३४ ॥ बिछावकी तरह शब्द | क्लि आपकी वृषादिक सामग्री मेने दावपर छगादी ॥४३॥ 
करने लग/ जिसको सुनझर मूसा भाग गया, गणेशजी | आप क्या लगाते हैं ऋहें, सभासदोंको तो दिखा दें, 'पावे- 
मूसेको छोड धीरे धीरे पैदुछ चल आये ॥ ३५ || गणेश- तीजीक ऐसे बचनसुनकर,शिवजी नीचेको मुंहकरके देखने 
जीने दूरसही देखलिया कि, विष्णुभगवान पासा बन | छगे॥ ५४ "| उसी समय नारदुजीने कौपीन, बीणा दृण्ड 
गये हैं, महादेवजीक सामने प्रणामकरके नम्रतासे नीचा | और 'जनेऊ शिवजीको समर्पित किय कि, इनसे खेल 
शिरकरक बोले ॥ ३६ ॥ कि, हे देव | माने आपको मान- | छीजिये। | ४५ ॥ सदाशिव प्रसन्न हो कर खलन ढगे, रुद्र 
पूवंक घर बुलाया है, यदि आप न पधारेंगे तो अंबिका | जो दाव चाहते थे, विष्णु वही बनजाते थे ॥ ४६ ॥ पर 
प्राणोंकीं छोड देंगी ॥३७॥ आप जब घर चहल आवेंगे | जो पारबतीजीका .दाव होता था वो उलटा ही पडता था, 
तोम वहां सब भेट कर दूगा, यह सुन शिवजी बोले क्वि हे इश्स तर ह शिवजी न अप हे हार हुए क्‍ कि आभरणादिक 
गणेश ! इस समय मैंने ज्यक्ष ५ दम फिर जीत छिये ॥४७॥ स्कन्दके भी अरूंकारकी जो वस्तुएं 
वेश . इस समय मन ज्यक्ष महा विद्यानिर्माण कीहै॥३८॥ गीं बे सब भी शिवजीने फिर जीत हीं. इस कि 
यदि इनस मेरे साथ पावतीजी खेले तो मैं आऊं। यह सुन | अ ये सब हक है न्‍ गे अल कक कक 
गणंशजी बोले कि आपके साथ मा अवश्य खढगी, इसमें | रख कं पति 5 वात: 
कोई मन्देह नहीं है || ३९॥ भाइको 'साथ छे घर आइये वा सर पति स्वयम्‌ पाशे बने हुए हैं, पिता 
अत पर ै पा सवस्व हर लेगे ॥ ४९ ॥४ पत्रक एसे वचन सुनकर 
घरढो चहतिय 8 रैक गरणोंसदित शिवजी | पावती ऋधसे मूछित हो गयीं, पावत्तीजीको इस प्रकार 
हे 33-48: 49080.89% हक कक: हा द्ख कर रावण बोछा कि ॥|५० | सैंने केवछ विष्णुसे 
आये हुए बेटे थे 2९ हि के 5 सब भा | यही कहा था कि, अधम न कर, इसी बातपर इस पापीने 

५ का आप रा का आवरतीजीको देखते ही से शाप दे डाछा ॥ ५१॥ यह सुन द्‌वी बोलो कि ्द 
गए" दारपर बनाया 30५) ५3 7... #यक्ष विद्याको पड, + सेब महाबलशाल्ी धूतोंकोम शाप दूंगी। 
.... 3३ इस विद्यासे भी जोआप मुझे उत्र मरे सामथ्येको देख ! तथा इनके धर्व॑त्यागके फलकों 


न्‍+ब_ न. 








१ इुवेज्भूदितिशषः । २ कुत्सितिन । 


55 अं 


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28727 / 77 07560 03600 20/66/7768 67070 68077 70007 60% ; 52222 280 32202 28000 5008 38 7 2270 0:06 % 7:62 2807 70600 77 27/00/7020 इक ४ लक ४ 82758 72726: हु 








तथा ॥५२॥ देव यस्‍म!|दबलथा कपर् च कृत स्वयापहास८ा हर ८5 ते मूर्धा गड़ामारभपीडितः 

इतह्वनतः कुबेर त्व यतः शिक्षयलें घने । सदेव अममगं ते स्थादे झब न मवेत्सियथितिः ॥ «४ ॥ 
यतः कृता त्वबलया सह माया त्वया हरे ॥ एबं बेरी रावणोय तव ऋायों नथिष्यति ॥५८॥ 
हित्वा मां मातरं पुत्र बालकत्व॑ त्वया कृतम्‌ ॥ अतस्त्वं न शुवा बद्धो बाल एव मविष्यत्धि।५६॥ 
स्वभेषि ते छुखे ख्लीणां न कदापि भविष्याति ॥ गणेश उदाच ॥ अनेन चौतरूपेण मूष- 
कोषयं पलायथितः॥ ५७॥ मध्यमाग कृत॑ विश्व शपेन राध्षसाधमम्‌ !। देव्युवाच ॥ यस्‍्माद्रिन्ने 
त्वया इड्ट कूत मद्ठालकस्य तु ॥ ५८ ॥ तस्मादयं तव रिवुविष्णुस्त्वाँ घातयिष्यपते ॥ इति 
देव्या बचः श॒त्वा सर्वे संछुद्ठमानलाः ॥ ५९ ॥ देंवीशापे मनश्वकुनारंदों वाक्यमबबीत ॥ 
नारद उवाच ॥ कोप॑ कुवेन्तु मां देवा न्थ शाप्या कदाचन ॥ ६०॥ सर्वषामादिमायेय यथा- 
; ॥ नाय॑ शाप इये देवी समतेव्या तु विचक्षणेः ॥ ६१॥ गड़ग सदा लिष्ठतु रूद्- 
मस्तके बलादमां वा नयतु क्षपाचरः ॥ जायाहरस्थाथ ययोचिताम्ुतिब्वानड्भरतृष्णारहितः 
कुमार; ॥ ६२॥ अहं श्रमामि घरणीं न स्थातव्यं तपोधने॥ सम्यग्देवि त्वया जोक्त श्रण्विदानीं 
बचो मम ॥ ६३॥ सर्वक्रोधापलुत्यथ ननरतमुनिपुड्रवः ॥ कक्षानाद चकारोचेहॉहाहीहीति चांब- 
वीत्‌॥ ६४॥ तस्य चेष्टा विलोव्थाथ सर्वे हबेमवाप्तुयु॥देव्युवाच ॥ भो भो विदूइकश्रेष्ट कूत- 
कत्योसि नारद ॥ ६५॥ वर वरय भद्ठरं ते यद्यन्मनासे रोचते ॥ नारद उबाच ॥ याचयनन्‍्त वर 
सर्वे को कि याचयिष्यति ॥६६॥ सर्वे ते याचयिष्यत्ति यथाचेष्ट ब्र॒वन्तु तत्‌ ॥ शिव उबाच ॥ 
सब सक्षम्य॒तां देधि जिते यद॒बनादिकम्‌॥ ६७० ॥ तम्ममाध्तु अतशतलेन ग्राह्म जगंदम्बिके ॥ 
देव्युबाच॥ मास्तु त्वया समेनाथ स्वप्नेषि मम चान्तरम्‌ ॥६८॥ एतदेव वर मन्ये धो माभू- 

















देख | ॥ ५२ | हू दव | आपने एक अबछाक साथ कपट 
किया है, इसकारण आपका शिर सदा गंगाके 'भारस 
पीडित रहेगा ॥। ५३ ॥ पीछे नारद्जीस दुगांने कहा कि; 
हैं मुन . आप इधर उधर कुचष्ठाएं करते फिरते है, इस 
कारण आप अ्रमते ही रहें, एक जगह आपकी स्थिति न 
रहें, || ५४ ॥ हे विष्णों ! तुमन जो एक अबछासे साया 
की है, इस कारण आपका वेरी यह रावण आपकी ख्लीको 
हरगा ॥५५०।॥ पीछे पावतीजी स्कन्द्स बोली कि; हे पुत्र . 
तूने मुझ माकी छोडकर जो छडकपन किया है, इस कारण 
तू सदा बाछक ही रहैगा, न युवा होगा और न बूढाही 
होगा ॥ ५६ ॥ तुझे स्वप्नण भी खी सुख न मिलेगा यह 
सुनकर गणेशजी पाव॑तीजीस बोढे कि; मां | इसने बेला 
बनकर सरे सूसेको भगा दिया था। ५७ ॥ इसने सर 
मागके बीचसें विन्न किया था, इस कारण- इस अधघम 
राक्षसको तो शाप दे | देवी बोली कि, हे दुष्ट | तूने मर 
पुत्रक मार्गस विन्न किया था ॥ ५८ ॥ इस कारण, यह 
तेरा वरी विष्णु तुझे मारेगा, देवीके ऐसे वचन सुनकर 
सबको मनमें क्रोध आगया ॥ ०५९ ॥ इन्होंने देवीको शाप 
देनका विचार किया कि, नारदजी बोले-हे देवों! आप 
क्रोध न करो, यह किसी तरह भी शाप देन योग्य नहीं है 
॥ ६० ॥ यह सबकी आदिमाया हैं, यथा योग्य फछको 
देनवाली है, यह शाप नहीं है, यह तो सदा विद्वानों के याद 


करने योग्य है ॥| ६१ ॥ गेंगाका सदाही शिवक्ेे शिरपर 
रहना अच्छा है, बछात्‌ भठे ही रमाको राक्षस हरे पर 
जिष्णुके हाथस इसकी मृत्यु उचित ही है, कुमारका काम 
तृष्णास अछग रहना ही अच्छा हैं॥ ६९२ ॥ मे भूमिपर 
घूमता ही रहूं, क्योंकि, तपोधनोंको कभी एक जगह न 
रहना चाहिये, हे देवी | आपने ठीक ही कहा हैं, अब से 
कहूँ सो खुनो ॥ ६३ ॥ यह कह मुनिपुगव श्री नारदजी 
सबके क्रोधको दूर करनके छिय नाचने छगे, कक्षानाद्‌ 
करन लगे,हा हा है है आदि अनेक शब्द करने छगे ॥६४।॥ 
नारदजीकी चष्टाओंकी देखकर सब प्रसन्न होगये; इतनमें 
देवी कहनेलगी कि, भो भो विदूषक श्रेष्ठ नारद ! आप 
कृतकृत्य हों | ६५ || तुम्हारा कल्याण हो; जो आपको 
अच्छा छगें वो वरदान मांगलो, यह सुन नारदज्ी बोले 
कि, हे देवो | सब वरदान मांग छो), कौन क्या मांगेगा 
|| ६६ ॥ जो वरदान माँगना चाहते हैँ उनको जो मांगना 
हो सो कहें | यह सुन शिवजी बोल कि, जो वृषभस लेकर 
जो भी कुछ आपने जीता था, उसे आप क्षमता करिये।।६७॥ 


है जंगदम्बिके ! मेरी वस्तु सुझपर ही रहनी चाहिये चाहें 


आप सो बार जीतीं पर मेरी चीजें सुझे मिले, यह सुन 
पावतीजी बोलीं कि, मेरा आपसे कभी स्वप्नमं भी वियोग 
नहों॥ ६८ | मे यह भी मसांगती हूँ कि, आपका क्रोध 





» - १ एप रावणस्तव बरी सविताडय तब भायों नथयिष्यतीति संबंध: । इंट्छांद्सः २ विदृषको विनोद तू । 


अतिपहु- 


अलराजः । 





ड 





87:07 / 77:88: 
अपमान १” 





न्ममोपरि ॥ कांतिके छक्कपक्षे ठ प्रथमेहहनि सत्यवत्‌ ॥ ९६॥ जयो लब्धो २3 सत्ये- 
नव महेल्‍्चर ॥ तस्मादयूल प्रकतव्य प्रभात तच्च मानर्दः | कि | गाह ते गया! यसय तस्य॑ 
संव॒त्सरं जयः॥ विष्णुरुवाच ॥ अहं य॑ य॑ करिष्यामी श्रेष्ठ वा लधुमेब वा ॥७१॥ तथातथा 
भवन तद्रमेन वदाम्यहम्‌ ॥ स्कत्द उवाच॥ सदा मनस्तपस्यायां मम तिष्ठत देवताः ॥७२॥ 
कदापि विषये मास्तु देय एप वरो मम ॥ गणेश उबाच ॥ संसार यानि का्याण तदादों मम 
पूजनात ॥ ७३ ॥ यान्तु सिद्धि मम कृपां विना सिध्यस्त मा कचित्‌। रावण उबाच ॥ वेदव्या- 
ख्यानसामथ्य मम शीघ्र भवत्विति ॥ ७४७ ॥ सदाशिवे सदा चास्त भक्तिमेंप्यमिचारेणी॥ 
नारद उवाच ॥ छद्घाऊुद्धाश्व ये केचिन्मूखोम्खांश्व थे जनाः ॥ ७५॥ मद्वाक्‍्यं सत्यमित्येव 
मानयन्तु सहासुराभा इत्युक्त्वान्तहिंताः सर्वे देवा रुद्रपुरोगमाः ॥ ७६॥ तस्मात्मतिपदि थूत॑ 
कुर्या्सवॉपि वे जनः ॥चूत॑ निषिद्धं सर्वत्र हित्वा प्रतिपद बुधाः ॥ ७७॥ स्वस्योग्रमादिज्ञानाय 
कुर्यादददतमतन्द्रित॥विशेषव्ध मोक्तव्यं सुहृद्धिबोह्मणेः सह॥७८॥दयिताभिश्व सहित॑ नेया सा 
च्‌ भवेत्रिशा ॥ ततः संपूजयेन्मानेरन्तः पुरसुवासिनी॥७९॥पदातिजनसंघातान्‌ ग्बेयः कटके 
शुभे॥ स्वनामाडः स्वयं राजा तोषयरेत्स्वजनान्पृथकू ॥८०॥ वृषभान्महिषांश्वेव युद्धयमानान्‌ 
परः सह ॥ गजानश्वांश्र योधाँश्व पदातीन्समलंकृतान्‌ ॥ ८१ ॥ मथारूटः स्वयं पहयेन्नटनर्तक- 
चारणान्‌ ॥ योधयेन्न त्रासयेच्च गोमहिष्यादिक तथा ॥ ८२ ॥ ततोपपराहुसमये पृर्वस्यां दिशि 
भारत ॥ मार्गपालीं प्रबध्नीयातुद्गस्तंमेईय पादपे ॥८३॥ कुशकाशमय्यीं दिव्यां लम्बकेबंहनियु- 
ताम।दशेयित्वा गजानश्वान्‌ साथमस्यास्‍्तले नयेत॥८४॥ कूते होमे द्विजेन्द्रेश्य बध्तीयाव्मार्- 
पालिकाम्‌॥ नमस्कार ततः कुयान्मंत्रेणानेन सुब्रत ॥८५॥ मार्गपालि नमस्तेस्तु सर्वलोकसुख- 
प्रदे ॥ विधेयें: पुत्रदारादः प्रयेहां इतस्थ में ॥ ८६॥ नीराजन॑ च तत्रेव कार्य राष्ट्रजयप्रदम ॥ 
शिकिशल लि ललिरलटीएस है ले मम की लीक जले लिप डे जल कमल कपिल लि किकली फोन 6 फल का * मर जल केटटह 


हु ८५२ पृ कक. 3०0 च् ब््‌ कर 
मुझपर कभी न हो। कारतिक शुक्षा प्रतिपदाके दित भने | खलना चाहिये तथा दो पहरके सप्य अपने कुटुम्बी मित्र 


सत्यके समान ही ॥६५॥ हे महेश्वर ' सत्यसे ही में आपसे 
जीती हूं, इस कारण आजके दिन ग्रातःकार सबको जूआ 
खलना चाहिये ॥७०॥ आजके दिन जिसकी जीत होगी, 
उसकी साकछुभर जीत रहेगी; यह सुनकर विष्णु भगवान्‌ 
बोले कि, जिसको में छोटा या बढ़ा बना दूं ॥ ७१॥ वो 
वेसाही हो जाय, यह वर मे आपसे मांगता है ॥| स्कन्द्‌ 
बोले कि है देवो | मेरा मन सद्‌! तपस्या ही में छगा रहे 
॥७२॥ कभी विषय न पडे यही मुझे दर दो, गणशजी 
कहने छगे कि; संसारम जो कोई काम हो उससे मेरे पूज- 
नको सदसे पहिले होनेपर ॥ ७३ ॥ सिद्धि हो मेरी कृपा 
बिना सिद्धि न हो | रावण बोला कि, वेदोंके झ्राष्य रच- 
नंकी मेरेसें शीत्र ही सामथ्ये हो जाय || ७४ ॥ तथा सदा- 
शिवमें मेरी सदा अव्यभिचारिणी भक्ति बनी रहे, नारदजी 
बोले कि, जा परम क्रोधो हैं अथवा जिन्हें कभी ऋोध ही 
नहीं आता ह्‌ चाहें मूख हों चाहे विज्ञ हों ॥ ७५ ॥ भेरे 
वक्यापर्‌ सत्र विदवास करें, इस प्रकार वर याचता और 
वरदान इनेपर सब देव अन्तथ[त्र हो गये ॥ ७६ ॥| इस 
कारण कात्तिक शुक्ल प्रतिपदाक्तो सबको जूः केक 
ः ब्ाहिय। है पिदानो, «डी लबकों जुआ खेलना 
ग जप हो 08 पद्ध है ॥ ७७ ॥ अपने साल 
: ता एल आ्भतेक छुय म्रालस होकर जुआ 


एवम्‌ योग्य आह्यणोंके साथ बैठकर भोजन करना चाहिये 
७८॥ इस निश्ाको प्यारी स्लियोंके साथ बितवानी चाहिये 
एवम्‌ अन्तःपुरकी सुवासिनियोंका मान सनन्‍्मान करना 
चाहिये ।। ७९ ॥ पदातिजन तथा पासके रहनेवाले अपने 
जनोंको जिनपर कि, अपने नामकी छापछगी हुई ह। ऐसे 
गलके भूषण ओर कड्टूछॉसे प्रसन्न करना चाहिय || ८०॥ 
इसके बाद थोड़े, हाथी, ब्रष, भैसे आदिको सजवा कर 
_नह आपसन् छडवावे तथा सनिकोंका भी नकली युद्ध 
इस ॥ ८१ ॥ राजा मचपेर ब्रेठा हुआही रखे । नट नतेक 
ओर चारणोंकी भी नकली छडाई देखे तथा साड, भसा 
आदि किसीको भी ढराना नहीं चाहिये || ८२॥ इसके 
पछ सध्याहके समयमें पूवेदिशाम राजाको चाहिये कि 
किसी ऊँचे वृक्षपर अथवा किसी ऊँचे छट्टेपए, माग- 
पाली बँधवादे ॥ ८३॥ वो कुशकाशकी बनी हुईं भव्य 
होनी चाहिये, जिसमें बहुतसे छटकन छगे रहने चाहिये 
पहिडे घोड़े हाथियोंको उसका दशन कराके, साये- 
कालको उन्हें उसके नोचे होकर ,निकलवाता चाहिये 
पे | कया कराकर-मार्गपाली बांपरनी 
यू, है सुब्रत | फि त्र्से उसे नमस्का 

करना चाहिये ।८५॥ हे मार्नपालि | परेछिये नमरतार है, 


आप ५ के. ४ 
है सब छोकों को सुख देनवाली ! विधय, पुत्र, दार आदि- 


कोंस मुझे पतिपृण कर दे ॥ ८६॥ वहांद्दी राष्ट्रको जय- 






ध्रतानि, | 


ः ही ... भाषाटीकासमेतंः 


मागपालीललेनाथ यारित गावो दृषा गजाः ॥ <७॥ राजानों राजपुत्राश्य॒ बराह्मणाः झद्जा 
तयः ॥ मार्गपार्ली सपुलंध्य नीशजास्तु खुखान्विलाः॥ ८८॥ तस्मा 
विधिपूर्वकम्‌ ॥ इति सनत्कुमारसंहितायां यूतविधि 
अथ बलिपूजागोऋ्ौनवश्टिकाकषणानि | 

तत्रेव--वालखिल्या ऊत्चुः॥ पूर्वाविद्धा मकतेव्या प्रतिपदठलिपूजने ॥ वर्धमानतिथिनेन्दा यदा 
साद्धत्रियामिका है| ह्वितीया वाद्धेगामित्वादत्तरा तत्र चोच्यते । धजिण लेजट द्त्यन्द्र वर्णकेः 
पश्चरड्रके! | गहमध्यम शालायां विन्ध्यावंल्या समान्वितम्‌ ॥ जिह्दा च॒ ताल्वक्षिप्रान्तों करयो 
पादयोस्तले ॥ रक्तव्णनास्य केशान्‌ कृष्णेनेब समालिखेत ॥ सवाड्र पीतवर्णेन शस्रा्य नील- 
वर्णतः॥ वरस्त॑ व श्वेतवर्णेन यथाशो् प्रकल्प्येत ॥ सवानरणशोभाव्य द्विक्षुज नृपचिद्वितम॥। 
लोकों लिखेद गहस्यान्तः शय्यायां शुक्लतण्डले;॥ मन्त्रेणानेन संपूज्य पोडशेरूपचारके॥बलि- 
राज नमस्तुभ्य देत्यदानवपूजित ॥ इन्द्रशत्रोपउनराराते विष्णुसान्रिध्यदों भव ॥ बलिसुद्दिय 
दीयन्ते दानानि मुनिपुड्वाः ॥ यानि तान्यक्षयाणि स्थुमयेतत्संग्रदर्शितम्‌ ॥ कोझुत्ीतिर्बले 
येस्‍्मादीयतेःस्यां युधिष्ठिर.॥ पार्थिवेन्द्रेसेनिवरास्तेनेयं कोमुदी स्मृता । यो यादशेन भावेन 
तिष्ठत्यस्थां युधिष्ठिर ।। ह्षदेन्यादिरूपेण तस्य वर्ष प्रयाति वे ॥ बलिपूजां विधायेव पश्चाद्रो 
क्रीडन चरेत्‌। गयाँ क्रीडादिने यत्र रात्रों दृश्येत चन्द्रमा।। सोमो राजा पशुन्‌ हन्ति सुरभी; 
पूजकांस्‍्तथा ॥ अतिपदर्शसंयोगे क्रीडन च गवां मतम्‌॥परायोगे तु यः कुयात्पुत्रदारधनक्षयः ॥ 
अलंकायोस्तदा गावो आसाझेश्व स्थ॒ुरचिताः ॥ गीतवादित्रधोषेण नयेन्नगरबाह्यतः । आनाय्य च 
ग्रह पश्चात्कुर्यान्नीराजनाविधिम्‌॥ अथ चेत्मतिपत्स्वल्पा नारी नीराजद चरेत ॥ द्वितीयायां 
तदा कुयोत्सायं मड्ररूमालिकाम्‌ ॥ एवं नीराजनं कृत्वा सर्वपापेःप्रसुच्यते । मतिपत्पूर्वविद्धेव 

















देनवाली आरती करे, मार्गपालीक नीचेस जो गऊं; वृष, 
गज आदि ॥ ८७॥ बथा राजा, राजपुत्र ब्राह्मण और शूद्र 
जातिके लोग निकल जाते हैं बे नीरोग एवम्‌ सुखी हो जाते 
हूं (| ८८ ॥| इस कारण दूत आदिको त्रिधिपूवंक करना 
चाहिये।। ८९॥ 
यह सनत्कुमारसहिताकी छतविधि समाप्त हुईं ॥ 

अथ बलिपूजा, गोक्रीडन, वष्टिकाकषण-बलिकी पूजा, 
गऊूओंके साथ खेलं ओर वष्टिकाका कषेण (रस्सीखीं चना) 
भी इसी दिन होता हें, सनत्कृमारसहितामेही कहा है । 
वाहुखिल्य ऋषि बोले कि, बलिक पूजनमे पूव॑विद्धा प्रति 
पदा करनी चाहिये, यदि वधमाना प्रतिपदा साढे तीनपहर 
हो । द्वितीयामें वृद्धिगामी होनेके कारण. उत्तरा प्रतिपदा 
लेनी चाहिये । पंचरंगके दुत्येन्द्र बढिको विन्ध्यावलीके 
साथ घरके बीचकी शालामें काढतीवार जीम, वालु, आंख 
और हाथ, पावोके तले छाहूरंगस छिखने चाहिये तथा 
केश काले ही रंगसे बनाने चाहिये | सारा शरीर पीतव- 
णका हो,शबख्बरादिक्त नीले रंगके बनाये जायँ,वर्र शत रंगके 
जसे कि, शोभित लगे वेस ही बनाये जायें, सब आभरण 
पहिनाये जाये, जिनसे कि; सुन्द्र छगे, दुश्ुुंज एवम्‌ राज 
चिहसे चिहित होना चाहिय। घरके भीतरकी शस्यापर 
तेडुलोंस इसके छोकफो लिख दे, तथा इस निम्नल्ठिखिल मंत्र 


समुदायसे सोलहों उपचारोंसहित पूजे। हैं देत्यदानवपू: 


छ 


जित बलिराज ! तेरे लिये नमस्कार है, हे अमरॉके भराते। 
एवम्‌ इन्द्रक शत्रु ! बिष्णुके सान्निध्यको देनेवाछा हो, 
मुनिपुंगवो! बढिक उद्देशस जो दान दिये जाते हैं वे अक्षय 
हो जाते है । यह मने तुम्हें बतादिया है। हे मुनिवरों |! इस 
प्रतिपदाके दिन इस भूमिपर राजालोगोंढ्ाारा किये हुए 
पूजनसे बलिको प्रसन्नता होती है, इस कारण इसे कौमुदी 
कहते हैं, हैं युधिप्चिर |! जो मनुष्य जिस भावसे इसमें 
हेगा चाहें उस हषे हो चाहें उसे शोक हो वोबही साहभ- 
रतक बराबर चलता रहेगा।। इस प्रकार बलिपूजा करके 
पीछे गोक्रीडन करना चाहिये | जिस दिल कि, गोक्रीडनरमे 
रातको चाद॒का प्रकाश हो तो सोमराजा उन पशुओं तथा 
सुरभियों और पूजकोंका नाश कर देते हैं, इस कारण प्रति- 
पदा और दशके योगमें गोक्रीडन होना चाहिये ।जो छ्विती 
या युक्त प्रतिपदाके दिन गोक्रीडन और गोनतैन कराता हैं 
उच्तके पुत्र दारका नाश होता हे | गोक्रीडनके दिन गऊ- 


ओं रो खिला पिछाकर सजाना चाहिय, गीत बाजों से उन 


गामके बाहिर छेजाय, पीछे घर छाकर उनकी सीराजन- 
विधि होनी चाहिये ॥ यदि प्रतिपदा थोडी हो तो ल्लियोसे 
आरती कराना' चाहिये और ह्वितीयामें अनेक मंगलकृद्य 


कराने चाहिये। इस प्रकार नीराजन करके सब पापोसे छूट 


जाता हू । पूवविद्धा प्रतिपदा ही बष्टिका कष णर्में छी जाती 
है, द्वितीया युक्ता नहीं ली जाती। कुशकाशकी एक सुन्दर 


| प्रतिपदू* 









एम गए य 77 
की पक 2:07777 20070 42% 
५0४४ /४६ ०४० कन्क 72:77: ये पक: की / 72 


2 (02% १7४५ ०४ (8628० ० कैंट ८/ कट घ ४४ कफस्ामदाआ 
250:::5 5०55:5540 7 पेंग: अनेक पीने विद दि ककलिकप प ५ कप पक पद ए पद: ख्शाखय | 
५४222 बंका पाक न्याय समा जन न नि 


वेडिकाकर्षणं मवेद्‌ ॥ कुश कोशमर्यी कु्षादृष्टिकां छुहढां नवाम्‌ ॥ देवद्वारे अर कक नेया 
चतुष्पये ॥ तामेकतों राजपुत्रा हीनवर्णास्‍तर्थकतश शहीत्वा कर्षययुस्तां यथासार मु हु 
समसंख्या द्योः कार्या सर्वेपि बलवत्तरा॥जयोत्र हीनजातीनां जयो राज्ञस्ठ वत्सरम॥उनयोः 
पृष्ठत/कार्या रेखा स्वाकर्षकोपरि | रेखान्ते यो नयेत्तस्य जयो भवति _नान्‍्यथा॥ जयचिहृमिद 
राजा विदधीत प्रयत्नतः ।। अन्तकूटकथा ॥ अथान्रकूट[पर पर्यायों गोवद्धनोत्स व्‌ः। "कसम 5 
तायाम ॥ वालखिल्या उत्चुः ॥ कार्त्तेकस्य सिते पक्षे ह्युत्नकूट समाचरेत्‌ ॥ गोवद्धनोत ४3 
श्रीविष्णुः प्रीयतामिति ॥ १ ॥ ऋषय उल्चः ॥ कोइसो गोवद्धंनों नाम कस्मात्त परिषजयेत॥ 
कस्मात्तदुत्सवः काये; कृते किंच फर्ले भवेत्‌ ॥२॥ वालखिल्या ऊच्चुः ॥ एकदा भगवान कृष्णो 
गतो गोपालकेः सह ॥ गहीत्वा गाए प्रतिपदि कात्तिकस्य सिते बने ॥३॥ तत्र नानाविधा लोका 
गोप्यश्वापि सहस्तशः॥ गोवद्धनसमीपे तु कुव॑न्त्युत्सवमादरात्‌ ॥ ४॥ खाद्य लेहां च चोष्य॑ न 
पेयं नानाविध कृतम्‌ ॥ कृता नगास्तथान्नार्ना नृत्यान्त च परे जनाः ॥५॥ नानापताकाः संग 
केचिद्धावन्ति चाम्मत॥॥ केचिद्रोपाः अनृत्यन्ति स्तुबन्ति च तथापरे ॥ ६॥ इंतस्ततों वितानानि 
तोरणानि सहख्रशः ॥ इश्नेतत्कौत॒क कुँष्णो वाक्यमेतहुबाच है ॥ ७ ॥ कृष्ण उवाच ॥ उत्सव) 
क्रियते कस्य देवता का च पूज्यते॥पक्कान्नखादनाथाय कल्पितो वोत्सवोउघुना॥८॥ न॒भक्षयन्ति 
ये देवास्तेम्योःने तु मदीयते॥प्रत्यक्षमीजिनो देवास्तेब्योःन्न न तु दीयते ॥ ९॥ दृछ्ेह्शी भवद- 
बुद्धि गोपाला वेघसा कृता॥गोपाला ऊचु॥ एवं मा बद कृष्ण त्वं वृननहृत्तुमहीत्सवः ॥ वार्षिक: 
क्रियतेस्माभिदेंवेसद्रस्य च्‌ तुष्ठये .॥ १० ॥ इन्हे पूजझय भट्ट ते भाविष्यति न संशयः॥ 
अद्य कुबेति देवेन्द्र महोत्सवर्मिम नरः ॥ ११ ॥ दुलिक्ष च तथाब्वृष्ठटिदेश तस्य न जायते॥ 
तस्मात््वमपि क्कुष्ण तर कुरूत्सवमनेकथा ॥ १२ ॥ कृष्ण उधाच ॥ अय गोधधेन; साक्षादवृष्ठि- 


है अऋ तए ३070 २४7० हब 


कहना शा-टनक 
कण ०7 ट टटए ए 





नई छुदृढ रस्सीको देवद्वारपर या दर्पद्वाएपर अथवा चौरा- 
हेपर एक तरफ राजकुमार आदि उच्च वणके छोग खीचें 
तथा एक ओर हीन ब्रणके छोग खींचें जबतक वे न थक्ें; 
तबंतक खींचते ही रहें | खींचनेवा्ॉंकी दोनोंही तरफ 
बराबरकी संख्या रहनी चाहिये, जो इसमें जीतेगा! उसकी 
एक साठ्तक बराबर जीत रहती है।।दोनों ही भोर हृदकी 
रेखाएं रहनी चाहिये, जो अपनी ओर खींचकर हृदतक 
छेजाये उसकी जीत होती है, अन्यथा नहीं ॥ राजाकों 
चाहिये कि,राजा सा इस जीतके चिह॒को प्रयत्तके साथ बनावे 
यह बलिपूजा, गोक्नीडन ओर वष्टिकाकषेणकी विधि पूरी 
हुई॥ । 
अन्नकूट-सनत्कुमार संहितामें गोवधेनोत्सव कहा है 
जिसे छोग अन्नकूट कहते हैं। वालखिल्यऋषि बोले कि, 
का्तिकके शुद॒पक्षमें अज्ञकूट और गोवर्धनोत्सव, श्रीविष्णु- 
भगवानकी प्रसन्नताके लछिय करे || १।| ऋषि छोग बोढ़े 
कि,यह गोवधन कौन हे, किस कारण उसे पूजे, क्‍यों उस- 


का उत्सव किया जाय; तथा कियेपर क्या फछ होता है ?' 


॥ ९ 0 बालखिल्य बोले कि, एकसमय भगवान्‌ कृष्ण का- 
स््ि ड़ रोके ३ 
पकूशुक्दप्रतिषदको ग्वालबाढोंके साथ गायें लेकर पनको 


भ, ४ ३ 
3. | धनेक सके छोग और हजारों ही गो- 


गत छोके ४ | शब्देत ब्जु हे कक हल 
* 5 चठेशब्देन प्रसिद्ध रब्जुविशषः । २ कुर्चे इति प्रतिजानाती तिशेष: ॥ इछोपआर्ष: 


श्ूः कल हि. 
: छरेनि चू्‌ दृवन्द्रमहोत्सवसिस परमिति पाठ 


पियों गोवधेनके समीपमें आदरसे उत्सव कर रह थे ॥४8॥ 
अनेकतरहके खाद्य, लेद्य, चोष्य और पेय पदार्थ बचाये थे, 
अन्नक कूट कर रखे थे बहुतस नाच रहे थे ॥ ५ ॥ कोई १२ 
अनेफ तरहकी झन्डियोंकों छेकर अग़ाडी अगाडी चढतेग्े 
कोई गोप नांच रहे थे, तो कोई स्तुतियां कर रहे थे ॥ ६ ॥ 
इधर उधर अनेक तोरण और लेबू तने हुए थे,भगवानक्ृष्ण 
कौतु भ्५ पु ञ्५ 
यह कौतुक देख कर बोछ॥७।क्िसका उत्सव कर रहे हो | 
किस देवताको पूज रहे हो! अथवा पकाज्न खानेके डिये ही 
आपने यह उत्सव किया ह॥८॥ जो देवता नहीं खाते उन्हें 
तो दे रह हो पर जो देव प्रत्यक्ष भोजी हैं, उन्हें नहीं देते 
|| ९ ॥ आपकौ ऐसी बुद्धिको देखकर ही आपको बद्माने 
गोपाल किया है। यह सुन वे गोपाल बोले कि, हे कृष्ण ! 
आप ऐसे न कहें । यह वृत्रके हन्ताका उत्सव है, हम देव" 
राज इन्द्रकी प्रसन्नताके लिये हर साल करते हैं।।१०॥आप 
भीप्रसन्नचित्तस इन्द्रकी पूजा अवश्य करिये,आपकाकल्या- 
ण होगा।जो कोई आजके दिन इन्द्रकी पूजा करता है॥११॥ 


हि 


उसके देशमे कभी अकाल और अनावृष्टि नहीं होती, इस 


कारण है कृष्ण आप भी इस उत्सवको अनेक तरहसे 
भनाथ ॥ १९ ॥ यह सुन कृष्ण बोले कि, देखो यह साक्षात््‌ 


॥ नर इति राजोपछक्षणम |) 


९ न त्ृ श हि ।] 
'उ छुग़स:। हृश्यते चाय समत्कुमारसंहितास्थकार्तिकमाहात्म्ये || 
| 


वतानि, | 


कह 
अजगधक ख्क्स््मुत्पि धाा्ाछाह: 4 रह 
बा कास जल: के 
28:77 72677 27/20/7770 25/67/2772 707 2 हम कम 2 77226 722 20075 का 40770: .%) 70777 20220 %2/000/0/500/7/20000 07778 :/0 72768 20% 786 87000 00 5007 कै 2660९ 00 



























सौमिक्ष्यकारकः ॥ मथुरास्थेत्रजस्थेश्व प्रजितव्यः प्रयत्नतः ॥९श॥ हित्वेतत्पूजनं लोके वृथेर्द्र 
पूज्यते कथमउत्सवः क्रियतामस्य मत्यक्षो5यं घुनक्ति च।१४/करिष्यति कृषि सम्य 
हनिष्यति ॥ यदायदा संकर्ट मे महृदागत्य जायते ॥ १५॥ तदातदा पूजयामि दृइ्यं गोवर्धन 
गिरिमाश्रवणेश्रवणे गोपा वाती झुवेन्ति कित्विदम ॥१६॥ तेषां मध्ये केश्रिदुक्त कृष्णोक्त क्रिय- 
तामिति || यदा खादाति चाजन्न॑ वे नगो गोवर्धनस्तथा ॥ १७॥ तदा कृष्णोक्तमाखिलं सत्यमेव 
भविष्यति ॥ सर्वण्व तदा गोपा विनिश्िित्य च नन्दज॒म्‌ !। १८ ॥ बचर्न आाहुरित्यं चेन्रिश्वयोस्लि 
तथा कुछ ॥ सर्वेषामग्रणीमत्वा गोवर्धनमहोत्सवम्‌ ॥ १९ ॥ ततः. कृष्णस्तथेत्युक्त्वा उत्सवे 
क्रतनिश्चयः ॥ नानासामग्रिक चक्क्‌येथोक्त नन्दसूद॒ना॥२०॥ नानावस्थाणि पात्राणि विस्ततानि 
नगाप्नत) ॥ तत्र दत्तोषन्नपुखस्तु यथा गोवद्धेनो महान्‌ ॥२१॥ भक्त खूपाने शाकाश्व काजिकं 
बटकास्तथा ॥ रोटकाः प्रिकार्य च लड़डुकान्मण्डकादिकम्‌ ॥२२॥ दुग्ध॑ दाये पृत क्षोद्र लेहां 
चोप्यं तथामिषम्‌ ॥ कथिकाये सर्वमपि तत्र दत्वा वचोध्बवीत ॥ २३ ॥ कृष्ण उबाच ॥ मत््त 
पठित्वा गोपाला नेत्रे संमीलयन्तु च॥ गोवंधैनेन भोक्तव्यं सर्वभन्न॑ न संशयः ॥ २४ ॥ गोवर्द्धन 
धराधार गोकुलबाणकारक ॥ बहुबाहुकतच्छाय गवां कोटिमदो भव ॥ २५॥ लक्ष्मीर्या 
लोकपालानां घेलुरूपेण संस्थिता ॥ घृत॑ वहाति यत्षार्थें मम पा व्यपोहतु ॥२६॥ पढठित्वेर्द 
मन्जयुगं सर्वे सादितलोचनाः ॥ कृष्णो गोवद्धेन विश्य सर्वेमन्नमभक्षयत्‌ ॥ २७ ॥ भ्नक्षणावसरे 
केश्रिज्ननेदेष्ो गिरिस्तथा ॥ अतीवा मूत्तदाश्वर्य तच्चेतसि सुनीश्वराः ॥ २८॥ ततो नाडीदयात 
कृष्णो गोपान्वाक्यसुवाच सः ॥ अहो गोवद्धनेनात्र क्षणाुक्तमिद स्फुटमू ॥ २०॥ पश्यत्तु 
सर्वे गोपालाः भत्यक्षोई्य न संशयः ॥ यद्यस्ति सुखवाज्छा वः कुवेन्त्वस्थ महोत्सवम्‌ ॥ ३० ॥ 
इति ख्त्वा वचस्तस्य सर्वे बिस्मितमानसाः ॥ गोवद्धनोत्सवं चक्रेल्द्राच्छतगुणं तथा ॥ ३१ ॥ 
इन्द्रोत्सवं द्रष्टुकामः समागच्छत नारदः ॥ गोवद्ध॑नोत्सवं दृदष्वा देवेन्द्रस्थ सभां यणों ॥ ३२ ॥ 











ह 5. का कप 
देवता गोवर्धन हैं यह वृष्टि और सोभिक्ष्य करनेवाह है, 
मधुराबवासी और ब्रजवासियोंकों प्रयत्नके साथ इसका 
पूजन करना चाहिए ॥ १३ ॥ इसके पूजनकों छोड़कर 
छोकम इन्द्र क्‍यों वृथा पूजा जाता है । इसका उत्सव करो, 
यह प्रत्यक्ष खायगा ॥१४॥ खेती अच्छी करेगा, विन्नोंका 
नाश करेगा, जब जब मुझे कोई बंढा भारी संकट भा 
जाता हैं ॥१०॥ तब तब में इसी प्रद्यक्ष देंब गोवधेनको 
पूजला है यह सुन गोप आपसमें काना फुस्सी करने रूगे 
कि, क्या करें ॥ १६ ॥ उन गोपोंमेंसे कुछएक कहने छगे 
कि, कृष्णकी कही सानों, यदि यह खा छेगा तो इसे केव 
पहाड़ न समझ कर गोवर्धन देव समझना || १७ ॥ तब 

जो कुछ कृष्ण करता है वो सत्य ही होगा, इस प्रकार 
सब गोप निश्चय करके कृष्णसे बोल ॥ १८ ॥ कि, जिससे 
हमें मिश्चय हो सो करिये। तथा सबके आगाड़ी होकर 
गोवधनोत्सव मनवाइये ॥ १९ ॥ भगवानने भी उर्त्सवका 
निश्चय करके कहा कि, अच्छी बात है, फिर कृष्णजीने 
जो सामाग्रियां कराना चाहीं गोपॉने सब तयार करदी 
| १० ॥ अनेक वरहके वस्य और बडे बडे पात्र गोवर्धन 
" सामने रख दिये तथा वहां एक गोवर्धेतके बराबरकासा 
अन्नपुख छगा दिया ॥ २१॥ भात, कढी, दाल, शाक; 
कांज्नी, बढ़े, रोहियां, पूरियाँ, लड्डू; और मांदे आदिक 


॥ २९ || दूध, दही: घी, सहद, चटनी, चूसनेंकी चीज 
तथा बिना मांसकी सब चीजें देकर | २३।| कृष्ण बोले 
कि, हे गोपो ! मन्त्रकों पढकर आंखें मीचलो, इतनेमें ही 
गोवर्धन सब खालेगा, इसमें कोई संदेह मत करना ॥२४७।। 
हे गोवधेन | हे धराधार ! है गोकुछके त्राण एवम्‌ ! अनेकों 
भुजाओंसे छाया करनेवाले | हमें करोड गऊ दें ॥ २५ | 
जो छोकपालॉकी रूक्ष्मी पेनुरूपसे स्थित हो यज्ञके लिये 
घूत देती हैं, वो मेरे पापोंको दूर करे ॥ २६॥ इन दोनों 
मन्त्रोंको पढकर सबने आंखें मींचली, इतनेंस ही गोपाल 
कृष्ण्‌ गोवधेनम प्रविष्ट होकर सब अज्न खा गये ॥ २५ || 
कोई गोप जो आँख बिना मिच बेठे थे उन्होंने देखा कि, 
गोवर्धन सबका भोजन कर गया हे तो हे भुनीश्वरो' | उसके 
आश्वयका ठिकाना ही न रहा ॥ २१८ ॥ इसके दो नाडीके 
बाद, भगवान कृष्ण गोपोंसे बोछे कि देखो-गोवर्धनतें 
एक क्षण भरमें ही सब खा छिया ॥ २० ॥ है गोपालों ! 
देखो यह प्रयक्ष देव है, इसमें कोई सन्देह नहीं है, यदि 
आपको सुखकी इच्छा हो तो सब मिठुकर इसका उत्सव 
करिये ॥ ३० । भगवान्‌ कृष्णक ऐसे बचन सुनकर सबने 
बड़े ही आश्रयके साथ इन्द्रके उत्सवस सोगुना, गोबधेन 
का उत्सव किया ॥ ३१॥ नारद आये तो थ इन्द्रोबत्स 
को देखने पर गोवधनका उत्सव देखकर इन्द्की सभासें 














ह या चाचा सर 






द 



























देबेन्द्रेण कृतातिथ्यों वार॑वार प्रणोदितः! ॥ नोवाच वचन किचिदेवेन्द्र! प्रत्यभाषत ॥ 
«. आदर, 





8 कप 25 

















5 तट धत्श तार हा १2220 /2/26 90820 600/070000603/7%0 60, 
अपर 404 088207 00%: 20200 7/4207 400 ४7४७४ //0027९२/ ६ हैः 22%/77॥ ३४९५५ 
220 202205 0 04 02652 00 20 /0000 7: 2002 70658: 











[ प्रतिपदृ- 


23: बम: कद 2 
४7.2 25248 40082. 727, 2607 











22222 22% हर 222:.25%. ; 
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३३॥ 


इन्द्र उवाच ॥ युष्मार्क कुशल विप्र वतेते वा नवेति वा ॥ मदओे कथ्यता हुःखे मु हरा- 
म्यहम्‌ ॥ ३४॥ नारद उवाच ॥ अस्माक कि सुनीर्द्राणामेन्द्र हःखस्थ कारणम ॥ पर॑ गोवद्ध॑न: 


शेलः शक्रों जातो विलोकितः ॥ २५॥ त्वहुत्सवे पृज्यतेःसौ 


गोपालेगोकुलास्थिते! ॥ अतःप्र॑ 


यज्ञभागाव्‌ म्रहीष्यति स एवं हि॥ ३६॥ इन्द्रासनं तथेः द्रारणी क्रमात्स थे हरिष्याति ॥ यस्य 
वीय च शर्त्रं च तस्य राज्य प्रजायते ॥ २७ ॥ किमस्माक॑ मुनीन्द्राणां य एवेन्द्रासने बसेत॥ 
व्षाद्या मासषट्काद्ा द्रष्टव्योइसों समागतः ॥३८॥ इत्थमुक्त्वों च देवेन्द्र प्रययों नारदों श्रुवि॥ 
इत्थं नारदवाक्यं स श्रुत्वा शक्रोडभ्यभाषत ॥ ३९ ॥ अहो आवतंसंबर्ता द्रोगनीलकपुष्कराः ॥ 
सर्वे मेघा जल ग़ह्म करकामः समन्विताः ॥४०।प्रयान्तु गो कुले शीघ्र मारयन्तु च गोपकान॥ 


गोवद्धंत स्फोट्यन्त वल्वपातेरनेकशः ॥ ४१ 
ततो घनघटाघोषो गोकुलेःभून्सुनीखराः ॥ 


॥ घातयन्तु चगाश्रापि ग्हाप्युत्चाट्यन्तु च॥ 
४२॥ 


जात आरादन्धकारो मध्यादह्रसमये तदा॥ 


काम्पितास्तु तदा गोपाः किमकाण्डसुपर्थितम ॥४३॥ ववृषबहुपानीयं करकामिस्तदा घनाः॥ _ 


गोपा उच्ुः ॥ हा कृष्ण क्ृष्ण हे कृष्ण किभिदानीं | 
कुपितो5यं हि वासवः ॥ कृष्ण उबाच ॥ निमील्याक्षीणि भो गोपा ध्येयों 


रक्षाकता स ण्वास्ति नान्योस्ति जगतीतले ॥ 
ते ॥ ४६॥ ततः श्ोवाच वचन गोपान प्रति 
तत्स्थल दत्त ब्रजन्त्विह ॥४७॥ अन्य: 
दिन तोयं बृष्टं सुसलधारया ॥ ४८ ॥ 
नाम्नेव कृष्णो नित्य प्रयच्छति ॥ 


बलाहुजः ॥ श्रीकृष्ण उबाच॥ अहो 
को(स्ति स्थल दातु भत्यक्षोई्य॑ नगोत्तमः ॥ एवं सप्त- 
नानादेशा ययुनाशं न 
४५९ ॥ पक्कान्नाने च गोपेभ्यस्तत्र 


विधीयताम्‌ ॥४४॥ मृताः सम सर्वे गोपाला! 


गोवर्धनों गिरिः ॥४५॥ 
इत्युक्तवोत्पाट्य त॑ रोल तत्तले स्थापितास्तु 
गोवद्धे नेने- 
गोपाः शरणं ययुः ॥ गोवद्ध॑नस्य 
ते सुखमावसन्‌ ॥ इत्येव॑ 


कोठक दृष्ट्वा सत्यलोक॑ ययो मुनिः ॥५०॥ ब्रह्म॑स्त्वे कि प्रसुप्तोत्सि जायते सश्ठिन 'शनम्‌॥ 


जा दाखिल हुए ॥| ३२ || देवेन्द्रने आतिथ्य करके वार वार 
“2? पर जब नारदजीने कुछ न कहा तो इन्द्र बोला कि, 
॥ ३३॥। है विश्र ! आप प्रसन्न हैं या नहीं कहें | में आपके 
कष्टोंको मिटा दूंगा ॥। ३४ ॥ यह सुन नारद बोले कि, हे- 
इन्द्र : इससे ज्यादा और मेरे दुःखका कारण क्‍या होगा 
कि, एक पहाढुको भी मेने दूसरा इन्द्र बना देखा ॥ २५ ॥ 
>ज आपके हत्सव्सें वो गोकुलके ग्वाढोंसे पूजा जा रहा 
है इंसक बाद वो यज्ञके भागकों कभी न कभी लेगा ही 

॥ ३३॥ धीरे धीरे वो इन्द्रासन और इन्द्राणीको ढेकर 

2 कुछ हर लेगा क्योंकि, जिसके पास हथियार हों तथा 

धरुपाथ होता है उसका ही राज होता है ॥ ३७ || 

इस सुनीन्द्रोंका क्या है, बोही भरे इन्द्र हो, साढ़ छ: 


सभ्योसे इन्द्र बोला ॥ ३९ ॥ है आचत । २ ते 
द्रोण ! नीढ ! भर, [ ३९ है आवत ! संबत ! 


* आर पृष्करो | आप सब 
साथ पाती भरकर ॥ ४० | ! शीघ्र ग 
मार दो, बजोंसे गोब शीघ्र गो 


संघगण' उपलोंके 


कुछ जाओ । गोपोंको 


» | यहां सब आ जांओ | ४७ || 


? मे के अनेकों टुकड़े ह 
गायोंको भार डे, घरोंको उस _ हे उंडादो ४ ४१ ॥ |: 


मुनीश्वरो |! गोछुछुपर घनकी घटाओंका घोष होने ढछगा 
॥ ४२ ॥ सध्याहकाछमें एकदम अन्धकार छागयीों, गोप 
इकद्स कांप उठे, कि यह अकारण क्या हो गया ॥ ४३ ॥ 
बहुतस पानीके साथ ऑले बरसने छगे | गोप. कहने छगे 

/ है| कृष्ण ; हा कृष्ण |! हे कृष्ण !!|! अब क्‍या करना 
जहिए । ४४ ॥ यह इन्द्र नाराज हो रहा है,.हम सब 
गोंपाछ मर रहे हैं, यंह सुनकर भंगवान्‌ कृष्ण बोहे कि, 
हे गोपो ! आंख मींचंकर गिरिगोव भेतका ध्यान करो 
0 इस भूमिपर सिवा गोवर्धनके दूसरा कोई भी 
एक करनवाढा नहीं है, यह कहकर गोवधेनको उठा; 
सबको उसके नीचे बिठा दिया ॥४ ६॥ इसके पीछे भग- 
वान्‌ गोपोंस बोले कि, देखो ! गोवर्धनने जगह ढदेदी ! 
इस समय कौन स्थल दे 
यह उत्तम नगप्रयक्ष देव हे | 
सात दिनितक मूसलछधार पानी बरसा ॥ ४८॥॥ उस 
हम अनेक देश नष्ट हो गये, जिन्होंने शरणागति 
नहीं की थी, पर शरणगोप नष्ट न हुए, गोवर्धनके नामसे 
बान कृष्ण रोज देते थे ॥ ४९ ॥ गोपोंके छिये पक्षान्नके 
दाता थे जिससे गोप वहां सुखपूर्वक रहे आरये,नारदजी यह 


सकता है, इसीने रिया है, 


री सेब कौतुझ देखकर सत्यक्षोक 'चलेगय|॥५०। जा कंर 
उजाड़ दो। इसके पीछे ह का मिल शक, 


नेझाजीसे बोढे कि, हेन्नद्वान ! भाप सोरहे हैँ क्या ! सृष्टि का 


व्रतानि, ] भाषाटीकासमेतः । 


तस्माच्छीघ्रं गोकुले त्व॑ गत्वा व" बा 
छष्टिविनाशनम्‌ ॥ कल्िदेत्यः समुत्पत्न: स्वमाख्याहि मे सुने ॥ ५२ ॥ नारद उवाच ॥ नोत्पन्नो 
देत्यराद कश्चिस्यक्तः शक्रोत्सवो छवि ॥ गोपकेरिति संछुद्ध इन्द्र ण्यं प्रव्षति ॥ ४३२॥ इते 
तस्य बचः श्व॒त्वा हेसमारुझम वे विधि! ॥ आगतो यत्र शक्कोौइस्ति ऋषधादेव भमवषति ॥ ५४ ॥ 
बक्योवाच ।।| कर्थ व्यवसिता बुाद्धरीव्शी ले सुरेधवर ॥ चलोक्यनाथों भगवात्रिजेतव्यः कर्थ 
त्वया ॥ ५५ ॥ एकय्रेव करांगुल्‍या पदय गोवद्धनो धुत) ॥ इंष्यों कथं॑ तेन साक॑ त्वया शक्र 
विधीयते ॥ ५६ ॥ इति बह्ावच:ः श्वत्वा मेघान्संसतभय वासवः ॥ प्रणिफ्त्य चर कूष्णं 
शक्तों वचनमबवीत्‌ ॥ ५७ ॥ इन्द्र उवाच ॥ क्षन्तव्या मत्कृतिर्विष्णो दास्ो् शरणागतः ॥ 
यद्रोचले तत्मदेयमपराधापलुत्तये ।। ५८ ॥ कृष्ण उवाच ॥ अज्ञात्वा तव सामथ्य .गोपालेरचि्स 
त्विदम्‌ ॥ एवाँ दण्डस्त थोग्योः्यं सम्पगेव त्वया कृत: ॥५९॥ अहं कनीयाँसस्‍ते जाता तवात्ञा- 
परिपालकः ॥ शरणागतजातीनां रक्षणं तु मया कृतम्‌ ॥ ६० ॥ यदि प्रसन्नो देवेश उत्सवोष्य 
प्रदीयताम्‌ ॥ गोवद्धनाय गिरये गोकुल रक्षितं यतः ॥ ६१ ॥ वालखिल्या ऊच्चुः | शक्रोपि च 
तथेत्युकत्वा तत्रेवान्तरधीयत ॥ गते शक्रे गिरीनद्र ते संस्थाप्य हरिस्त्रवीब ॥६९२॥ कृष्ण उवाच।। 
गोपा दृ्॑ तु माहात्म्यममद्धतं शेलज तु यत्‌ ॥ अद्यारभ्य प्रकतेव्यों महान गोवद्धनोत्सव१ ॥६३॥ 
गोवद्धनेन शेलेन निखिला तु धरा धता ॥ एतत्सारमजानद्धिः कर्थ संक्रीडितं पुरा ॥ ६७ ॥ 
अद्य पव्रतराजस्तु सर्वे बते ममाग्रतः ॥ एलत्लवाप्भावेन बल्ले लब्धघं मया महत्‌ ॥६५॥ अति“ 
संव॒त्सरं तस्मादन्नकूओे विधीयताम्‌ ॥ गवां मवति कल्याण पृुत्रपोत्रादिसनततिः ॥ ६६॥ ऐश्वर्य 
च सदा सोख्य॑ भवेहोवद्धेनोत्सबात्‌ ॥ कृत यत्कातिके स्नान॑ जपहोम।चनादिकम्‌ ॥ ६७ ॥ सबब 
निष्फलतां याति नो कृते पर्वेतोत्सवें ॥ णवमुक्तास्तु ते गोपाः सत्य स्वममन्यत ॥ ६८ ॥ ययु: 
कृष्णादयः सर्वे नवमेःहाने गोकुलम्‌ ।। वालखिल्या ऊचुः ॥ इत्येतत्सवेमारूयातमस्मामिःष्तु 


(७७ ) 
निवारय ॥ ५१ ॥ बद्योवाच ॥ । केमथ जायत॑ द्वाष्ट: कथ 

















नाश हो रहा है, इस कारण शीघ्र गोकुलमें जाकर वृष्टिका 
निवारण करिये ॥५१॥ यह सुन ब्रह्माजी बोले कि, किस 
ढिये वृष्टि हो रही है, सष्टिका नाश केसे हो रहा है ? हे 
मुने | क्‍या कोई दैत्य पेदा होगया ? मुझे सब बतादें॥५२॥ 
नारद बोले कि, दैत्यराद तो कोई नहीं हुआ हे पर भूमि- 
मंडलपर गोपॉने .इन्द्रोत्सव छोडदिया है, इससे इन्द्र नाराज 
होकर वरस रहा है ॥ ५३ | त्रह्माजी यह सुनकर हँसपर 
चढ़े ओर वहां जाये जहां इन्द्र कोधित होकर मूसछघार 
बरस रहा था ॥०७। ब्रह्माजी इन्द्रसे बोल कि, हू इन्द्र ! 
तेरी ऐसी बुद्धि केसे होगइई, क्‍या तू चत्रिकोकनाथ भगवा 

नको जीत सकता है ? ॥५०। देख, एकही चिटली उंग 

लीसे इसने गोवर्धन उठा रखा हे, हेइन्द्र | तू उसके साथ 
क्‍यों हष्या कर रहा है॥ ५६ ।॥ इन्द्रने अद्याजीके ऐसे 
बचन सुनकर मेघोंको रोक दिया, एवम्‌ भगवान रृष्णके 
चरणों पडकर बोछा ॥ ५७ ॥ कि-भगवन ! में आपका 
शरणागत दास हूँ। मेरे कारनामें क्षमा किये जायें. यदि 
ऐसी ही इच्छा हो तो अपराधको दूर करनेके छिय दण्डही 
दे दीजिये ।| ५८ ॥ भगवाब्‌ कृष्ण बोले कि; हे इन्द्र 
तेरी ताकतकों जाने विना इन गोपालॉने यह पूजडाला, 
इनको ज़ो तुमने दण्ड दिया वह ठीकृही दिया है।॥ ५९ ॥ 


में आपकी आज्ञा साननेवाला, आपका छोटा भाई हूं, मेंने 


शरण आये हुओंका रक्षण किया है ॥६०॥ यदि आप 
क्ैड शव के 

प्रसन्न है तो आप इस गिरिगोवर्धनकों अपना उत्सव देदें, 
जिससे कि, मेने गोकुछकी रक्षा की है ॥ ६१ ॥ वाढखिल्य 
बोले कि, इन्द्रभी एवमस्तु कहकर वहीं अन्तर्धांन हो गय ७ 
इन्द्रके चठे जानेपर भगवान परवेतकों रखकर बोले ॥६२॥ 
है गोपों | तुमने गोवधनका- माहांत्य देखा आजसे लेकर- 
आप सदा गोवधनका ही उत्सव करना ।।६३१॥ इस्री गोव« 
धनने सारी भूमि धारण कर रखी हैं, पहिले आपने इसकी 
शक्तिको न जान, कसा खेल किया था ॥६४। यह पवेत 
सब कुछ मुझसे कह देता है, इसकी सवाके प्रभावसे ही 
इतना भारी बल मुझे मिला है ॥६७५।॥। इससे आप हरसाछ 
अन्नकूट करना, जिससे गौओं का कल्याण होगा ओर पूत्र 
पौचत्रादि सन्ततियाँ प्राप्त होंगी || ६६ ॥ गोवधनके उत्सवस्त 
ऐश्वथ्य और सदा स्रोख्य प्राप्त होगा, कार्तिकके महीतनामें 
जो भी कुछ जप होम अचेन किया हो ॥६७॥ वो विना 
गोवर्धनके उत्सव किये, निष्फल हो जाता है। भगवानने 
गोपोंस कहा तथा गोपोन उसे सत्य मान छिया ॥६८ 

नौमें दिन कृष्णादिक सब गोकुछ चले गये, बालखिल्य 
बोले कि, हे मुनीश्वरों | हमने सब आपको सुनादिया 


( ७८ ) 


पट गम ज उप 


अलराजे ० ० ये पा कै । 
४००३ कक)0: 7248: 022 7700:4/0 7 


१ ० ८/॥ चर करी बस 5 527 577 529 ४ हैक 
90% 0027 7237: /800./2 ९0 8048९ ४0250: //04//42:% ;4 77650 


४४600: क 00 है कक 2260 0 8820 सम 4 अदा पि2 
ह् बढ. मर परमराध्ता॑ाकाचशाकषाादा0०0७७ ७, ५ प्याआर2डफफापरापट 





का: की 





फटा: शक कर 


रह बम तएा 7 पर 7 4 कफ पदक 





छत फप्ओ "कान 


तुष्टथे तामू ॥ नानाप्रकारशाकाए देश- 
मुनीश्वराः ॥ ६९ ॥ श्रीकृष्णस्य ठु संतुष्टये अन्नकूटों विधी ७००५४०« ं 
कालोबचितानि व ॥७०॥ पक्कान्नानि विचित्राणि कुयाच्छब्त्यलुसारतः ॥ स्वान्रपबत॑ कुयाच्श्री- क्‍ 
क्रष्णाय निवेदयेत्‌ ॥ ७१ ॥-गोवद्धनस्वरूपाय मन्त्न कृष्णोदित उठब्‌ ॥ एव यः कुरुत भक्तों 
विष्णुलोके महीयत ॥ ७२ ॥ इति श्रीसनत्कुमारसंहितायां अतिपत्कत्यम्‌ ॥ 


अथ द्वितीयाबरतानि ॥ ॥ 

यमद्रितीयानिणयः ॥ कारतिकशुक्कद्वितीया यमद्वितीया ॥ सा अपराहव्यापिनी आह्या ॥ उद्ें 
शुक्ृदितीयायामपराहेःचेयेद्मम्‌ ॥ स्नान॑ कृत्वा भावजायां यमलोक॑ न पश्यति ॥ ऊजें शुक्क- 
द्वितीयायां पूजितस्तर्षितो यम॥।वेष्टितः किन्नरहेष्टस्तस्मे यच्छति वाज्छितम्‌ ॥ इति स्कान्दात्‌॥ 
दिनद्वये अपराहव्यातावव्यात्तों वा परेवेति युग्मवाक्यात्‌ ॥- प्रथमा श्रावण मासि तथा भाद्रपदे 
परा ॥ तृतीयाश्वयजे मालि चत॒थी कार्तिकी भवेत्‌ ॥ श्राषणे कछुषा नाम्नी तथा भाद्दे व 
निर्मला॥ आबिने प्रेतसंचारा कार्तिके याम्यतो मता ॥ इति ॥ चतस्नो द्वितीया उपक्रम्य प्रथ- 
मायां किचित्मायश्रित्त द्वितीयायां सरस्वतीपूजा तृतीयायां श्रा द्रस॒कक्‍्त्वा चतुथ्यों यमपूजनमृु- 
क्तम्‌॥ कार्तिक शक्ृपक्षे त॒ द्वितीयायां युधिष्ठिर ॥ यमो यमुनया पूर्व भोजितः स्वगहेःचिंतः॥ 








अतो यमद्वितीयेयं त्रिष छोकेषु विश्वुता ॥ अस्यां निजग॒हे पार्थ न भोक्तव्यमतो नरे: ॥ यत्नेन 
भगिनीहस्ताद्वोक्तव्य॑ं 3४४3. ॥ दानानि च प्रदेयानि भगिनीभ्यो विशेषतः ॥ स्वणी- 


लड़ारवखात्रपूजासत्कारभोजनेः ॥ सर्वा भगिन्यः संपूज्या अभावे प्रतिपन्नकाः 
मित्रभगिन्य इति हेमाद्िः ॥ पितृव्यमगिनी हस्तात्मथमायां युधिष्ठिर 
ट्वितीयायां युधिष्ठिर ॥ पित॒र्मातुः स्वसुश्रेव ततीयायां 
भगिन्या हस्ततः परम्‌ ॥ सर्वासु भगिनीहस्ताड्रो 


है ॥६९॥ भगवान्‌ क्ृष्णको प्रसन्न करनेके लिये अन्नकूट 
करना चाहिये, देशकाह़॒के अनुसार अनेक तरहके शाक 
॥७०॥ तथा अपनी शक्तिके अनुसार अनेकतरहके पक्तान्न 
बनाने चाहिये, सब अन्नोंका पर्वत बनाकर श्रीकृ” 
प्यके लिय निवेदन कर दे ॥७१॥ यह भी गोवधनस्वरूपी 
कृष्णके लिय दोनों मंत्रोंकी पढकर निवेदन होता है, जो 
कोई इस प्रकार अन्नकूटको श्रीकृष्णके लिये निवेदन करता 
है, वो विष्णु छोकको पाता है ॥७२॥ ये संनत्कुमार संहि- 
ताके कहे हुए प्रतिपदाके ब्रतादिक पूरे हुए । 


द्वितीयात्रतानिं॥ 
अथ यम द्वितीयाका त्रत-कार्तिकके शुद्ध पक्षक्ी द्विती- 
याको यमद्टितीया कहते हैं, इसे ऐसीको ढेना चाहिये जो 
कि अपराहमें भी व्यापक हो । क्यों कि, ऐसा छिखा 
ता है कि, जो मनुष्य कातिकके रुक पक्षकी ट्वितीयाको 
यभुनाजीम स्नान करके अपराहु समय यम॒का पूजन करता 
वो यम॒लोकको नहीं देखता | प्यारे किश्नरोंस घिर हुए 
राज, कार्तिक शुक्छृपक्षकी द्वितीयाके दिन दृप्त और 
प्रसन्न करनेपर पूजन करनेवालेको मनवांछित फछ देते डर 
नी सन्द्पुराणमें लिखा हुआ है | यदि दो दिन द्वितीया 


हो, चाहे दोनों ही सिल हे 
बा मध्याह न, वहच्यापिनी हो, चाहें दोनों 
ठीया माननी चाहिये। 


गे आवणसें पहिली त में दृर 
एवम कारमे तीसरी हेली तथा भादोंमें दूसरी 


 कातिकर्म चौथी ये चार यम- 


हो, तो दूसरीको ही यमहि- | ह्विती 


॥ प्रतिपन्नका।- 
॥ मातुलस्य खुता हस्ता- 
तयोः करात्‌ ॥ भोक्तव्यं सहजायाश्र 


क्तव्यं बलवर्धनम्‌ ॥ धन्य यशस्यमायुष्य धर्म- 


द्वितीयाएं होतीं हैँ । आवणकीका 'नाम कछुषा, तथा भादों- 
कीका नाम निमछा, एवम्‌ कारकीका नाम प्रेतसंचारा और 
कारतिककी द्वितीयाका नाम यम द्वितीया है। इन चारोमैंसे 
पहिलीम प्रायश्ित्त तथा दूसरीमें सरस्वतीपूजा तीसरीमे 
श्राद्ध और चौथी यमद्वितीयामं यमका पूजन होता हें। है 
युधिष्ठिर : पहिले यमुनाजीने यमको अपने घरपर बुढा, 
स॒त्कार कर उसे भोजन कराया था इस कारण इसे तीनों 
लोकॉम यमह्वितीया कहते हूँ इसी कारण हे पार्थ ! इस 
द्वितीयाको अपने घरपर भोजन न करके प्रयत्नके साथ 
बहिनके हाथस स्वादिष्ठ भोजन करना चाहिये तथा उस 
दिन बहिनको विशेषरूपसे दान देने चाहिये । सोभमेके 
अछकार, सुन्दर वस्र ओर सुस्वादु अन्नस सभी बहिनोंकी 
पूजा, सत्कृति होनी चाहिये । यदि बहिन न हों तो जिन्हें 
बद्दिन मान रखा हो उनको इसी विधिशे सत्कृत करना 
चाहिय। क्योंकि, ऋोकमें जो प्रतिपन्नभगिनी शब्द आया 
है उसका अथ मानौ हुईं मित्र बहिन होता है ऐसा हेसा- 
ट्रिका मत है। हे युधिष्ठिए ! पह्चिली द्वितीयाकों तो चाचाकी 
बेटीके हाथसे तथा दूसरी द्वितीयाको' मामाकी बेटीके 
हाथस खाना चाहिये तथा कार शुदी द्वितीयाके दिन 
भूआकी या मौसीकी बेटीके दाथसे तथा कार्तिक जुकक। 

याके दिन अपनी बहिनके, हाथसे सपत्लीक भोजन 


करना चाहिये, यदि ऐसा न हो सके तो सभी द्वितीयाओंको 


: अपनी संगी बहिनके हांथसे, धन्य एबमू यशके- देनेवाढ, 





धाषाटीकासनेल: ! 








कामार्थपाधकप्‌ ॥ यस्‍याँ तिथों यझुनया यमराजदेवः संभोजितो तिडकशस्ख्सूसोहदेट 
तस्यां स्वसुः करतलादिह यो झुनक्ति म्राप्तोति रत्नधनधान्यमक्तत्तमं सः ॥ इति हेमादों 
भविष्ये यमद्वितीयाविधिः ॥ । ह 

ला बमद्विवीयाकथा--वालखिल्या ऊतुशकार्तिकस्य सिते पक्षे द्वेतीया यमसंज्ञिता ॥ तत्रापराह्ने 
कर्तव्यं सर्वथेव यमार्चनम्‌ ॥१॥ प्रत्यहं यमुनागत्य यममम्रार्थयत्पुरा॥श्रातंमंम झुहँ याहि भोज- 
नाथ गणाव॒तः ॥९॥ अद्यशो वा परश्रो वा प्रत्यहं बदते यमः ॥ कार्यव्याकुलचित्तानामबकाशो 
न जायते ॥शा तरैकदा यम्॒नया बलात्काराह्निमन्त्रितः ॥ स गतः कांतिके मासि द्वितीयायां 
सुनीखराः॥४॥ नारकीयजनास्घुकत्वा गणेः सह रवेः खुतः ॥ कृतातिथ्यो यमुनया नानापाकाः 
कृतास्तथा ॥५॥ कृताभ्यड़ो यमुनया तेले्गन्धमनोहरेः ॥ उद्गर्तन॑ लापयित्वा:स्लापितः रूर्य- 
नन्‍दनः ॥ ६॥ ततो$लड्ारिक दत्त नानावस्थाणि चन्दनम्‌॥ माल्यानि च प्रदत्तानि सम॑ चोप- 
भुपाविशव ॥७॥ पक्कान्नानि विचित्राणि कृत्वा सा स्वर्णमाजने ॥ यम च भोजयामास यखुना 
प्रीतमानसा ॥८॥ श्ुक्त्वा यमोषपि भगिनीमलड्भारेः समचंयत्‌ ॥ नानावख्नेस्ततः माह वर 
वरय भामिनि॥९॥ इति तद्बचनं श्रुत्वा यमुना वाक्यमब्बीत्‌ ॥ यमुनोबाच ॥ प्रतिबंष समा: 
गच्छ भोजनार्थ तु मद्शहे ॥१०॥ अद्य सबवे मोचनीय।ः पापिनों नरकाद्यमम ॥ ये चेव भगिनी- 
हस्तात्करिष्यत्ति च भोजनम्‌ ॥९१॥ तेषां सौर्यमदो हि त्वमेतदेव इणोम्यहम्‌ ॥ यम उवाच!| 
यमुनायां तु यः स्नात्वा संतप्य पितृदेवताः ॥१२॥ झनक्ति मगिनीगेहे भगिनीं पूजयेदपि॥ 
कदाचिदपि मद्द्वारं न स पश्यति भाठुजे ॥ १३॥ वीरेशेशान दिग्भागे यमतीय प्रकीतितम्‌ ॥ 
तत्र स्‍्नात्वा च विधिवत्संतर्प्य पिवर्देवताः.॥१४॥ पंठेइतानि नामानि आमध्याह्ने नरोत्तम: ॥। 
सूर्यश्यामिस्ुखों मौनी इडचित्तः स्थिरासनः ॥ १५॥ यमो निहन्ता प्शिधमराजों वेबस्वतो 
जि किक जि सिअिकिफिकिएएएएएकाा 





आयुका बढनेबाछा और धममे) अथे, कामका_देनेंवाछा | प्रीछे यमके छिये अलंकार करनेके अनेक लरहके सामान 
बलवर्धक भोजन करना चाहिये। जिस तिथिको भगिती | व और चन्दून माला आदिक दिये जो कि! यमके न: 


गत 


प्रेममें डूबी हुईं यमुनाजीने अपने हाथस यमदेवको जिम।या | पानेके ही ह भ ॥ ७ | अनेक तरहके पक्तान्नोंस सोनके 
था, उस दिन जो मनुष्य अपनी बहिनके हाथसे जीमता है | थालोंको सजाकर अत्यन्त प्रसन्नताकें साय यमकों भोजन 
वो अपूर्व रतन तथा धनधान्योंको प्राप्त होता है । यह हेमा- | कराया ।! ८ ॥ भोजन करनेके पीछे यमने भी, अनेक तर: 
द्विम भविष्यके अनुसार यमद्वितीयाकी विधि कही है ।।_ । हके वल्लालंकारोंस बहिनका पूजन करके बहिनसेकहा कि, 

यमद्वितीयाकी कथा-वारूखित्य ऋषि कहते छंगे कि। ए बहिन ! आपकी जो इच्छा हो सो मांगो ॥ ९॥ यमके 
कार्तिकके शुक्ृपक्षकी द्वितीयाको यमद्वितीया कहते हैं.उसमें| ऐस बचन सुनकर यमुनाजी कहते-छगीं कि, आप प्रतिवर्ष 
सायकाछके समय यमका पूजन करना चाहिये || १.॥ प्रति। आजके दिन मेरे घरपर भोजन करनेके लिय पधारा करे 


द्नि श्रीयमुना महारानी आकर. यमदेवकी प्राथेना करने । १० ॥ तथा जिन पापियोंने आजके दिन आपकी बरह 


छगीं कि, हे भाई | अपने सब इष्ट मित्रोंको छेकर मेरे घर | अपनी बहिनके हाथसे भोजन किया हो, उन पापियोंको 
भोजनके लिय आओ ॥|२॥ यमका भी यह काम रहता था| आप अपने पाशसे सदा मुक्त करते रहें एवम्‌ जो बहिनके 
कि, कल आऊंगा या परसों आजाऊंगा क्‍्योंकि,हस काममें | हाथसे इस प्रकार भोजन करें ॥ ११ ॥ आप उन्हें सदा 
छगे रहते हैं इस कारण अवकाश नहीं मिलता ॥ ३॥ है | सुख पहुँचावैं, यही में आपसे वरदान मांगती हूँ। इतनी 


मुनीश्चरो ! एक दिन जबरदस्ती निमनन्‍्त्रण दे दिया, तथा | सुनकर यम कहने छगा कि; जो तुझमें स्नान तर्पण करके 
यह भी कार्तिकके शुह्ृ॒पक्षकी द्वितीयाको यमुनाजीके घर |॥ १९ ॥ बहिनके घर भोजन करे उसका पूजन करेंगे है 
भोजन करने गया।| ४॥ जातीवार रविस्ुत यमने अपने | सू्यपुत्रि ! वे मनुष्य कभी भी मर द्रवाजेको न देखेंगे || 


है? 


पाशसे सब लोगोंको सुक्त कर दिया था एवम्‌ अपने इृष्ट ॥ १३॥ वीरेश महादेवकी इंश! नी दिशास एक हक 
गणोंकों लेकर यमुनाजीके घर गया था तथा यमुनाजीने | है, उसमें स्नान करक विधिके साथ पिलर ओर देवताओंका 


९5 हि डर 


यमका प्रिय आतिथ्य किया और पाक भी अनेक तरहके | वर्षण करके 0 १४ ॥ जो (अलुष्य _अछ; एकाग्र 0 
बनाय ।। ५॥ यमुनाजीने सुगन्धित तहोंसे ग्मका अभ्यज्ञ मौनपूर्वेक स्थिरासनसे सूथ्यके सामने सध्याहे हाटूर हे। 


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हम ही च्च ४ 3 ३ पल २०७. को के प्र 
किया, पीछे उब॒टन करके स्वच्छ जलसे स्तान कराया॥६॥ | नार को पढता है १०) वे नाम ये हैं किन्‍्यम, निहन्ता, 





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दण्डधरश्र काल! ॥ भूताविपों दत्तकृताठ॒सारी क्ृतान्त एतदशॉनाममिजपेत ॥ १६ ॥ एगानिय 
तानि द्श त्ैः नामदशकेनेत्यथेः ॥ ततो यमेश्वर प्ज्य भगिनीणहमात्रजेत्‌. | मन्त्रेणानेन च तय 
भोजितः पू्वमादरात ॥ १७ श्रातस्तवाठुजाताह भुंक्ष्व भक्ष्यमिर्द शुभम्‌ ॥ प्रीतये यमराजस्य 
यमुनाया विशेषतः ॥ १८॥ सम्तोषयेद्यो भगिनी वख्यालड्रणादिनिः ॥ स्वप्ने5पि यमलोकस्य 
भविष्यति न दशेनम्‌ ॥२९॥ तृपेः कारागृहे ये च स्थापिता मम वासरे । | अवश्य ते भेषणीया 
भोजनाथ स्वछुर्गंहे ॥२०॥ विमोकव्या मया पापा नरकेभ्योधद्य वासरे ॥ येप्य बन्दीकरिष्यत्ि 
ते दण्डया मम सर्वधा॥२१॥कनीयसी स्वसा नास्ति तदा ज्येष्ठागह बजेत।तदभावरे सपत्नीजां 
तदभावे पितृव्यजाम॥२२॥ तद्भावे मातृस्वसुमातुलस्यात्मजां तथा॥ सापत्नगोत्रसम्बधेः कर्प- 
येत्तु यथाक्रमम्‌ ॥२१।सर्वाभावे माननीया भगिनी काचिदृव